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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

'दुविधा' : मणि कौल



पिछले दिनों भारत के प्रयोगधर्मी फिल्म निर्देशक मणि कौल हमारे बीच नहीं रहे. मणि कौल का नाम भारत के उन चुनिन्दा फिल्म निर्देशकों में शामिल है, जो दुनिया में अपनी विशिष्ट शैली के लिए जाने गए. फ़िल्म एंड टेलिविज़न इंस्टीटयूट ऑफ़ इंडिया ( FTII ) से स्नातक एवं बंगला सिनेमा के प्रसिद्ध निर्देशक ऋत्विक घटक के शिष्य रहे मणि कौल ने बाद में स्वयं फिल्म निर्माण के क्षेत्र में एक शिक्षक के बतौर भी काम किया. उनकी पहली ही फिल्म ' उसकी रोटी (1969)' को उस वर्ष सर्वश्रेष्ठ फिल्म के लिए फिल्मफेयर क्रिटिक्स अवार्ड दिया गया था . अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित अपनी फिल्मों के कारण मणि २१ वें बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में जूरी मेम्बर भी रहे. साथ ही कुछ समय तक उन्होंने हार्वर्ड विश्वविद्यालय में भी विजिटिंग लेक्चरर के रूप में सेवाएँ दीं. 'उसकी रोटी', 'आषाढ़ का एक दिन', ' ईडियट', ' दुविधा ' आदि उनकी कुछ प्रमुख फिल्में रहीं. विजयदान देथा की कहानी पर आधारित उनकी फिल्म 'दुविधा (1973)' को उस वर्ष सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी दिया गया. प्रस्तुत है फिल्म पर रघु यादव की टिप्पणी :



एक वो ज़माना था जब मोहल्ले के बच्चे....बेसब्री से.....इंतज़ार किया करते थे बिजली के गुल होने का....कोई चाचा, कोई दादा, कोई मौसी, कोई नाना....मिल जाते थे....हो जाता था.....थोड़ी काम, थोड़ी ज़्यादा, थोडा यथार्थ, थोड़ी फंतासी....जैसे तैसे....किस्सागोई का जादू....चल जाता था.....

' दुविधा ' देखने के बाद जो सबसे पहला सवाल मन में आया वो यह था की इसे किस श्रेणी की फिल्म माना जाए. क्या हम इसे surrealism मान सकते हैं ? नहीं. क्या यह पारंपरिक फिल्मों की श्रेणियों में फिट बैठती है ? यह भी नहीं. खैर, यह पहला सवाल आज आखिरी सवाल बन गया है और निर्दिशक मणि कौल की इस फिल्म को experimental film कहकर सस्ते में निपट लेना ही अभी उचित होगा.

फिल्म की शुरुआत एक बेहतरीन संगीत उद्घोषक, कुछ फालतू images और stylish titles के साथ होती है. फिर narration start होता है - " संयोग की बात है की बरगद के इस पेड़ के अन्दर एक भूत का निवास था....." . हाँ भई, ऐसी कहानियां संयोग पर ही आधारित होती हैं.

शादी निबटाकर बारात वापस आ गयी है. गाँव में गुड बांटा जा रहा है और रीति रिवाज...तीज पर दुल्हे को व्यापार के सिलसिले में दिसावर जाना है जहाँ वह पांच साल तक रहेगा. " दो दिन के लिए वासना को क्यों उभारा जाए ! पांच वर्ष तक दो दिन की रंगरलियाँ कष्ट पहुचायेंगी. और फिर समय गुज़रते क्या देर लगती है. आँख झपकने के साथ ही पांच साल बीत जाएंगे. "

उधर दूल्हा दिसावर की रह पकड़ता है और इधर प्रेत उसका रूप धर घर पर आ जाता है. पिता को बताता है कि रास्ते में उसे समाधी लगे एक महात्मा के दर्शन हुए. महात्मा ने खुश होकर वरदान दिया कि रोज़ सवेरे पलंग से उतरते ही उसे पांच स्वर्ण मोहरें हमेशा मिलती रहेंगी. दिसावर जाने से यह वरदान नहीं फलेगा.

पति के लौटने पर पत्नी खुश हो जाती है. " पहले पता तो कर लो कि मै कोई दूसरा तो नहीं हूँ. शायद तुम्हारे पति का रूप धरकर कोई और कहीं तुम्हे छलने तो नहीं आया है. " पत्नी कोई दोष नहीं देखती. भूत से रहा नहीं जाता, वह उसे सच्चाई बताता है कि उस बरगद के नीचे दुल्हन को देखकर वह कैसे मूर्छित हुआ. दिसावर जाते हुए पति से क्या बातचीत की. उसका रूप धरकर कैसे हवेली आने का साहस जुटाया, महात्मा का वरदान किस प्रकार रचाया.

भूत : अब जो भी तुम्हारी इच्छा सो बताओ, भूत होकर भी मैंने कोई बात नहीं छिपी.

दुल्हन : अब भी यह बात मेरी समझ में नहीं आई कि यह भेद प्रकट करने से ठीक रहा या न प्रकट करने से ठीक रहता. कभी तो एक बात अच्छी लगती है, कभी दूसरी.

कुछ शांत camera movements चरित्रों और कमरे कि दीवारों पर. पत्नी का भूत के कंधे पर हाथ रखा जाना. नज़रों का ऊपर उठना, फिर झुक जाना. कुछ seconds का static shot. .

जैसे जैसे फिल्म आगे बढती है, identity theft , स्त्री स्वतंत्रता, और सामाजिक मापदंड जैसे मुद्दे सामने आते हैं जो कि रोचक हैं. पर आखिर में केवल एक बात मायने रखती है - किस्सागोई.

विजयदान देथा कि इसी कहानी पर आधारित ' पहेली ' भी एक मनोरंजक व्यावसायिक फिल्म है लेकिन राजस्थानी संस्कृति की जो raw qualities ( संगीत, वेशभूषा, तौर - तरीके आदि ) 'दुविधा' capture करती है, वो गहरे स्तर पर छूता है. जो बात इसे एक अलग किस्म कि फिल्म बनाती है वो यह है कि सामान्यतः हम फिल्मों में कहानियों को घटते हुए ऐसे देखते हैं जैसे वे वास्तव में घटित हो रही हैं. पर दुविधा को देखते वक्त कहानी देखने और सुनने के मिश्रित भाव को हम महसूस करते हैं जो कि इसकी फंतासी के स्तर को और ऊपर उठा देता है. आखिर में गडरिया प्रेत और पति के बीच भेद करने कि युक्ति सुझाता है.

१९७४ का Filmfare Critics Award for Best Movie जीतने वाली यह फिल्म ज़्यादातर लोगों को पसंद आएगी ऐसा कहना मुश्किल है. किस तरह के लोग इस फिल्म को देखें ? शायद वे लोग नहीं जो फिल्मों में गहरे अर्थ, उद्देश्य या special effects खोजते हों. शायद ये फिल्म उन लोगों को देखनी चाहिए जिनके पास फालतू ( ! ) वक्त हो फालतू चीज़ों के लिए. जो तंगहाल शहरी जीवन में रेगिस्तान के सपने देखते हों, जो दूर आकाशगंगाओं कि निरर्थकता पर मज़ा लेते हों, जो समंदर में कहीं अनजाने द्वीपों कि कल्पना करते हों, और जिन्हें कहानियां सुनने के लिए बहाने न खोजना पड़ते हों !

3 टिप्‍पणियां:

  1. ACHCHHE TIPANI HAI....AMEY BADHIYA KAAM HAI...SILSILA ZARI RAKHO...SHUBHKAMANAYE
    SATYANARAYAN PATEl

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  2. रघु से इसी तरह के और भी reviews की उम्मीद है....!

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  3. आपने सही कहा इस तरह की बेहतरीन फालतू फिल्‍में वे ही लोग देखते हैं जिनके पास फालतू ( ! ) वक्त हो फालतू चीज़ों के लिए. जो तंगहाल शहरी जीवन में रेगिस्तान के सपने देखते हों, जो दूर आकाशगंगाओं कि निरर्थकता पर मज़ा लेते हों, जो समंदर में कहीं अनजाने द्वीपों कि कल्पना करते हों, और जिन्हें कहानियां सुनने के लिए बहाने न खोजना पड़ते हों !

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