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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल
अन्धा युगः टूटे पहिए के साथ उलटा पड़ा समय का रथ

संगम पांडेय

फिरोजशाह कोटला के विस्तृत परिसर के मध्य मंच के पीछे पेड़ों के झुरमुट, भग्न दीवारें और एक विशाल दरवाज़ा दिखाई पड़ता है। युद्ध में घायल लोग कमर पकड़े, करहाते, लंगड़ाते किसी के कंधे पर लदे इस दीवार पर पीछे से चले आ रहे हैं। सत्रह दिन के युद्ध के बाद यह मंजर है कौरव नगरी का। अंधे धृतराष्ट्र छू-छूकर जान रहे हैं घायलों की पीड़ा। इस दीवार के पीछे से कुछ देर बाद युयुत्सु का प्रवेश होता है। अभागा युयुत्सु जिसने महाभारत युद्ध में सत्य का साथ देना चुना। आज वह अकेला बचा है। यह कौरव पुत्र अपनों की ही घृणा का शिकार है। इसी दीवार से सटे मुख्य मंच पर धृतराष्ट्र, गांधारी और विदुर दिखते हैं, लेकिन यह सिर्फ़ मंच का एक छोर है। दूसरा छोर ऊबड़खाबड़ पत्थरों के बीच एक गुफा है, जहाँ कुछ देर बाद नरपशु बन चुका अश्वत्थामा वृद्ध याचक की हत्या करेगा। इन दोनों छोरों के बीच रुके हुए समय का रथ अपने टूटे पहिए के साथ उलटा पड़ा है।
साढ़े छह सौ साल पुराने फिरोजशाह कोटला के भग्नावशेषों में इन दिनों खेले जा रहे नाटक ‘अन्धा युग’ में मूल आलेख की मुद्रा कुछ बदली हुई है। यह धर्मवीर भारती के आलेख से निकाला हुआ निर्देशक भानु भारती का पाठ है। आस्था और अनास्था के उप पाठों में जटिल होते आशय को भानु भारती ने उसी तरह सीधा किया है जैसे कभी मॉर्क्स ने हीगेल की ‘द्वंद्वात्मक आदर्शवाद’ की दार्शनिक अवधारणा को किया था, जिस तरह सुकरात के बारे में कहा जाता है कि उसके सवाल अपनी दुनिया में जी रहे लोगों को असमंजस में डाल देते थे। वैसा ही कुछ काम ‘ अन्धा युग ’ भी करता है। वह जीवन की तर्कहीनता पर अपने प्रतितर्कों के जरिए एक विलक्षण नाटकीयता पैदा करता है।
भानु भारती उसे पुनर्गठित करने के क्रम में इस नातकीयता को दरकिनार करने का जोखिम लेते हैं। फिर वे एक बड़े मंच के फैलाव में विषय के तनाव को सतत बनाए रखने का मुश्किल काम चुनते हैं। अपनी प्रश्नाकुलता में निरंतर व्यग्र पाठ को वे हमारी समकालीन दुनिया के वास्तविक सवालों के परिप्रेक्ष्य में स्थिर करने की कोशिश करते हैं। इस क्रम में नाटक के अंतिम दो अंक प्रस्तुति में नाममात्र के हैं और आस्था के विवादित केन्द्र कृष्ण एक गौण पात्र।
भानु भारती किसी पारलौकिक संदर्भ से ज्यादा तवज्जो वस्तुजगत को देते हैं। वे मनुष्यता की त्रासदी में विडंबनाओं के रहस्य से ज्याद स्वार्थ के अन्धेपन से उपजी व्यक्ति की हिंसा और प्रतिहिंसा को रेखांकित करते हैं। व्यक्ति , जिसका इलहाम धृतराष्ट्र की तरह का है जिसे नहीं पता था कि वैयक्तिक सीमाओं के बाहर भी कोई सत्य हुआ करता है। तटस्थ दृष्टा संजय उनकी प्रस्तुति का केन्द्रीय किरदार है। लेकिन उसके चरित्र की अनाटकीयता मंच पर सबकुछ के बाद भी उसे बहुत प्रमुख नहीं बनने देती। इस भूमिका में जाकिर हुसैन अपने साफ़-सुथरे वाचिक के बाद भी दर्शकों का बहुत ध्यान नहीं खींच पाते हैं।
मंच और आसपास का परिवेश एक पूरी दुनिया बनाता है। मंच पर घटित हो रहे दृश्य धीरे-धीरे इस दुनिया का हिस्सा बनते जाते हैं। भीम के छल से युद्ध में पराजित दुर्योधन के शव को झाड़ी के पीछे कुछ पशु घसीट ले गए हैं। कृतवर्मा और कृपाचार्य उसे ढूँढ़ रहे हैं। पूरा दृश्य कुछ देर के लिए दर्शकों को एक स्तब्धता में डाल देता है। मानो सचमुच दुर्योधन वहाँ हो.., जिसे वहीं जाकर देखने की एक हठात उत्कंठा स्तब्धता के इस क्षण में कहीं से उठती है।
नाटक का अश्वत्थामा मंच पर शीद्दत के साथ दिखाई देता है। उसकी प्रतिहिंसा हो या गांधारी के संवादों की, लगता है भानु भारती अपनी प्रस्तुति में उनके चरित्रों के तनाव को एक ऊँचाई पर ले जाकर उनका या दर्शकों का भाव विरेचन करते हैं। हालाँकि गांधारी की भूमिका में उत्तरा बावकर के स्वर की तल्खी में उतार-चढ़ाव की किंचित कमी मालूम देती है। लेकिन कृष्ण द्वारा शाप को कबूल कर लिए जाने के बाद के विलाप में इसकी क्षतिपूर्ति करती हैं।
एक बड़े कैनवास पर और सामान्य से कहीं ज्यादा दूर घटित होते दृश्यों में आंगिक अभिनय वाचिक के सहयोग की कुछ जयादा दरकार रखता है। यहाँ ध्वनियाँ प्रोसिनियम से कुछ अलहदा प्रभाव लिए हैं। आधुनिक उपकरण उन्हें एक मेटेलिक रंगत दे देते हैं। धृतराष्ट्र की भूमिका में वरिष्ठ रंगकर्मी मोहन महर्षि स्वर का ज्यादा बेहतर इस्तेमाल कर पाए हैं। लेकिन जाहिर है आलेख के संपादन में धृतराष्ट्र की भूमिमा कुछ सीमित हो गई है। प्रस्तुति के बड़े स्पेस में संगीत, कोरस, प्रकाश योजना आदि के जरिए निरंतर एक ऎसी गति बनी रहती है, जो देखने वाले को बहुत मोहलत नहीं देती। इसके लिए प्रकाश परिकल्पक आर.के. धींगरा और संगीत डिजाइन करने वाले नवनीत वधवा ने निश्चित ही काफी मेहनत की है।
अश्वत्थामा की भूमिका में टीकम जोशी एक अच्छी ऊर्जा के साथ प्रस्तुति में हैं। उनके अलावा विदुर की भूमिका में रवि खानविलकर, वृद्ध याचक बने रवि झांकल, कृपाचार्य बने गोविंद पान्डे, कृतवर्मा की भूमिका में दानिश इकबाल भी ठीक ठाक हैं। गोविन्द और दानिश ज्यादा नजदीक से दर्शकों को दिखते हैं, जबकि प्रहरी बने अमिताभ श्रीवास्तव और कुलदीप सरीन दूर दीवार पर हैं। यह बात उनकी उपस्थिति के प्रभाव पर एक निश्चित असर डालती है। मूल आलेख के युधिष्ठिर , बलराम और कृष्ण हंता व्याध के चरित्र संपादन की वजह से प्रस्तुति का हिस्सा नहीं बन सके हैं। इसके अलावा ‘प्रभु’ हूँ या परात्पर, पुत्र हूँ तुम्हारा, तुम माँ हो, जैसे संवाद में ओमपुरी का स्वर भी कुछ भारी लगता है।
साभारःजनसत्ता

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