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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

जब तक आमूल बदलाव का कोई क्रान्तिकारी विकल्प नहीं होगा तब तक ऐसे प्रहसन चलते ही रहेंगे



हाल के दिनों में भ्रष्टाचार मिटाने का नारा उछालने वाले दोनों आन्दोलनों के अलग-अलग तरह के जमावड़े पिछले दिनों दिल्ली में आगे-पीछे लगभग एक साथ ही हुए और दोनों ही इसी बीच अपनी-अपनी तार्किक परिणतियों तक पहुँच गये। बाबा रामदेव कीमहाक्रान्तिकी घोषणा तो रामलीला मैदान से चलकर अम्बेडकर स्टेडियम में सिमट गयी। अब शायद वे इसमहाक्रान्ति के फुस्स होने के बाद डीलक्स क्रान्ति, सुपरडीलक्स क्रान्ति या फिर श्रीश्री108क्रान्ति का नारा देंगे। एन.जी.. के मठाधीशों आदि को लेकर भ्रष्टाचार विरोध की दूसरी मुहिम चला रही अण्णा हज़ारे-अरविन्द केजरीवाल मण्डली की तथाकथितदूसरी आज़ादी की लड़ाईभी बीच में ही बिला गयी। वैसे शायद वे भूल गये थे किदूसरी आज़ादीकी लड़ाई एक बार पहले भी 1974 के जेपी आन्दोलन के समय यह देश देख चुका है जिसके नतीजे के तौर पर कांग्रेस की जगह जनता पार्टी की सरकार बनी थी जो जल्दी ही नेताओं की आपसी सिरफुटौवल के चलते बिखर गयी। यह मण्डली तो अब टूट भी चुकी है। अण्णा रूठकर वापस रालेगण सिद्धी में अपने गाँव सिधार गये हैं और केजरीवाल एण्ड कम्पनी (अब तक बिना नाम की) पार्टी बनाकर संसदीय सुअरबाड़े में घुसने की कवायदों में जुट गये हैं।
पूँजीवादी लूट-खसोट, अत्याचार और उसके साथ-साथ पलने वाले भ्रष्टाचार से तंग आम जनता के सामने जब तक वास्तविक बदलाव का कोई ठोस विकल्प नहीं होगा तब तक ऐसी जोकरी चलती रहेगी। हर कुछ वर्ष के अन्तराल पर कोई मदारी जनता को उसके कष्टों से मुक्ति दिलाने के लिए कोई नया नुस्खा दिखाता हुआ थोड़े समय के लिए मंच पर तमाशा दिखाकर ग़ायब हो जायेगा और जनता को पहले से भी अधिक भ्रमित और निराश कर जायेगा।
भ्रष्टाचार मिटाने के रामबाण नुस्खे के तौर ये लोग जिस जन लोकपाल की माँग कर रहे हैं उसके बारे में सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज मारकण्डेय काटजू का कहना है कि देश के सभी विभागों को लोकपाल के दायरे में लाने के लिये कम से कम एक लाख लोगों का स्टाफ चाहिए। ज़ाहिर है, ईमानदारी का सर्टिफिकेट पाये हुए एक लाख लोगों की भरती अपनेआप में एक भारी कठिन काम होगा, और फिर इस भारी-भरकम नौकरशाही को भ्रष्ट होने से रोकने के लिए एक औरसुपर जन लोकपालटाइप संस्था की दरकार होगी। जन लोकपाल को सरकारी नियंत्रण से मुक्त स्वायत्त संस्था बना देने से उसकी पवित्रता की गारण्टी नहीं हो जायेगी। यदि स्वायत्तता की ही बात होती तो देश की न्यायपालिका तो स्वायत्त ही है, मगर न्यायपालिका में नीचे से लेकर ऊपर तक व्याप्त भ्रष्टाचार से कौन परिचित नहीं होगा। अण्णा के आन्दोलन से ही जुड़े पूर्व कानून मन्त्री शान्तिभूषण का कहना है कि उच्चतम न्यायालय के 16 में से कम से कम 8 मुख्य न्यायाधीश भ्रष्ट थे (एन.डी.टी.वी, 16 सितम्बर, 2010) ऐसे में यह कैसे सम्भव होगा कि पूँजीवादी आर्थिक सम्बन्धों के बीच रहकर यह संस्था और इसमें चुने गये लोग भ्रष्ट नहीं होंगे। इस तरह की माँगे मुंगेरीलाल के हसीन सपने देखने वाले कुछ लोगों को कुछ समय के लिये प्रभावित कर सकती हैं, लेकिन उससे अधिक इससे ठोस रूप में और कुछ भी हासिल नहीं हो सकता।
पूँजीवादी समाज जिस बुनियाद पर खड़ा है वह अपने आप में भ्रष्टाचार हैयानी अतिरिक्त मूल्य के रूप में मज़दूरों की मेहनत की लूट जिसे इस समाज में क़ानूनी माना जाता है। ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने की होड़ में सारे पूँजीपति बने-बनाये नियमों-क़ानूनों को भी तोड़ने, मज़दूरों को न्यूनतम क़ानूनी अधिकारों से भी वंचित करने, टैक्स चोरी करने और नेताओं-अफसरों को ख़रीदने में लग जाते हैं। ज़ाहिर है, फिर लुटेरों के सेवक भी सदाचारी नहीं हो सकते। पूँजीवाद इसके बिना चल ही नहीं सकता है और कोई भी पूँजीवादी देश इसका अपवाद नहीं है। लूट पर टिके उत्पादन सम्बन्धों की सेवा करने के लिए बनायी जाने वाली कोई भी संस्था चाहे वह स्वायत्त हो या हो उसे भ्रष्टाचार से नहीं बचाया जा सकता।
केजरीवाल एण्ड कम्पनी की दूसरी माँग है कि ग्राम पंचायतों को ज्यादा अधिकार दिया जाये और ग्राम स्वराज्य को साकार बनाया जाये जो उनके मुताबिक भ्रष्टाचार ख़त्म करने का एक और अचूक नुस्खा है। अपनी किताबस्वराज्यमें केजरीवाल ने लिखा है कि पंचायतों में कलक्टर के माध्यम से सरकारों का बहुत हस्तक्षेप होता है इसीलिए वे ईमानदारी से काम नहीं कर पातीं।
केजरीवाल या तो बहुत भोले हैं या बहुत शातिर जो वे कहते हैं कि ग्राम पंचायतों को ज्यादा अधिकार देने से जनता के हाथों में सत्ता जायेगी। हर कोई जानता है कि पंचायतों पर धनी किसानों, गाँव के धनाढ्यों, दबंगों का कब्ज़ा है। पंचायती राज का ढाँचा लागू ही किया गया है ग्रामीण क्षेत्र के शासक वर्गों को सत्ता में भागीदार बनाने के लिए। गाँव में प्रधान वही चुना जाता है जो पैसे और डण्डे के दम पर वोट खरीद सकता है। ज्यादातर छोटे किसानों और मज़दूरों की उसमें कोई भागीदारी नहीं होती। हर पंचायती क्षेत्र में ज्यादातर धनी किसानों-कुलकों-दबंगों के परिवार के सदस्य या उनका कोई लग्गू-भग्गू ही चुनाव जीतता है। जब तक आर्थिक ढाँचे में कोई बदलाव हो, तब तक कैसी भी चुनाव प्रणाली हो, आर्थिक रूप से ताक़तवर लोग ही चुनकर ऊपर जायेंगे। ऐसे में, पंचायतों को और अधिक अधिकार देने से केवल इतना ही होगा कि गाँवों में अमीरों और दबंगों के हाथ में और अधिक ताक़त जायेगी, और ख़ुशहाल किसानों की ख़ुशहाली थोड़ी और बढ़ जायेगी। गाँव के बहुसंख्यक ग़रीबों को इससे कुछ हासिल नहीं होने वाला है।
इन लोगों की तीसरी माँग है कि जनता के पास किसी भी जन-प्रतिनिधि को चुनने और उसे वापस बुलाने का अधिकार होना चाहिए। इस आर्थिक व्यवस्था के भीतर प्रतिनिधि चुनने की चाहे कोई भी प्रक्रिया अपनायी जाये फिर भी आर्थिक रूप से विशेषाधिकार प्राप्त लोग ही चुनकर ऊपर पहुँचते हैं। इसका अनुमान वर्तमान संसद से ही लगाया जा सकता है जहाँ चुने गये 543 संसद सदस्यों में से 315 यानी लगभग 60 प्रतिशत करोड़पति हैं, जो उद्योगपति, बिल्डर, व्यापारी या शेयर-ब्रोकर जैसी पृष्ठभूमि के हैं। बुनियादी आर्थिक ढाँचे में बदलाव किये बिना चुनाव प्रणाली में कोई भी सुधार वास्तव में बेमतलब ही होगा।
टीम अण्णा की एक और माँग यह थी कि सरकार से 15 भ्रष्ट मन्त्रियों को हटाया जाना चाहिए। उनसे किसी ने यह नहीं पूछा कि ऐसा कैसे सम्भव है कि जो दूसरेसदाचारीलोग मन्त्री बनाये जायेंगे वे भ्रष्ट नहीं होंगे। इस तरह की माँगों से अण्णा टीम लोगों के सामने यह सिद्ध करने की कोशिश करती है कि वर्तमान पूँजीवादी व्यवस्था अपनेआप में ग़लत नहीं है, सिर्फ कुछगन्देलोगों को हटाकर साफ़-सुथरे लोगों को सत्ता में लाने की आवश्यकता है जो पूरी ईमानदारी से अपना काम करें। अण्णा ऐसे मौकों पर नैतिकता और सदाचार की नसीहत देकर भ्रष्टाचार को समाप्त करने की बात करने लगते हैं। लेकिन यहाँ भी वह पूरी आर्थिक व्यवस्था पर कोई टिप्पणी नहीं करते। पूँजीवाद में काला धन सफेद धन से ही पैदा होता है। पूँजीवादी सरकार वास्तव में पूँजीपतियों की मैनेजिंग कमेटी होती है जो पूँजी को मैनेज करती है जिससे मज़दूरों का अतिरिक्त श्रम निचोड़कर मुनाफा पैदा करने की प्रक्रिया सुचारू रूप से चलती रहे। पूँजीवादी आर्थिक सम्बन्धों में यदि क़ानून के हिसाब से बिल्कुल भ्रष्टाचार ना हो (हालाँकि भ्रष्टाचार-मुक्त पूँजीवाद एक मिथक है), तब भी मुनाफे के लिए मज़दूरों को निचोड़ना अपनेआप में एक लूट है। सभी क़ानूनी दायरों के भीतर रहते हुए भी करोड़ों मेहनतकश लोग अपने अधिकारों से बेदखल कर दिये जाते हैं। वास्तव में पूँजीवादी व्यवस्था अपने आप में एक भ्रष्टाचार है, पूरी दुनिया में दो नम्बर के कामों और टैक्स चोरी के बिना किसी भी पूँजीवादी व्यवस्था का अस्तित्व हो ही नहीं सकता।
अब काले धन और सफेद धन की बात करते हैं, जिसके बारे में  भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ने वाले ये महारथी काफी तीखे तेवर दिखाते हैं। वास्तव में काले धन और सफेद धन का आपस में उलटफेर होता ही रहता है। काला धन कभी सफेद हो जाता है और सफेद धन किन्हीं स्थितियों में काला धन माना जा सकता है। हवाला, वायदा कारोबार, लॉबीईंग और तस्करी के साथ फिल्म और मनोरंजन उद्योग में लगने वाला धन, खेल उद्योग में लगा धन और सट्टेबाज़ी, हथियारों की ख़रीद-फरोख्त में दिया जाने वाला कमीशन जैसे अनेक उदाहरण हैं जो पूरी दुनिया के स्तर पर देखें तो कहीं क़ानूनी दायरे के अन्दर माने जाते हैं, तो कहीं ग़ैर-कानूनी माने जाते हैं। उदारीकरण और भूमण्डलीकरण के वर्तमान दौर में पूरी दुनिया के देशों के बीच में पूँजी का निर्बाध आदान-प्रदान होता है। इस पूँजी का कोई प्रमाण नहीं होता कि वह काली है या सफेद। आज भारत में एफ.डी.आई. में जो पैसा लग रहा है उसका कोई प्रमाण किसी के पास नहीं है कि उसका स्रोत क्या है। ऐसा ही नशीली दवाओं के खरबों डॉलर के कारोबार में भी है, जो कहीं पर ग़ैरकानूनी रूप से तस्करी के माध्यम से बेची जाती हैं और कहीं इनकी बिक्री वैधनिक रूप से होती है। इन सभी कारणों से काले धन और सफेद धन के बीच आज कोई विभाजक रेखा नहीं खींची जा सकती है। काले धन का अनुत्पादक पूँजी से भी गहरा रिश्ता है।
पूँजीवाद अपनी आन्तरिक गति से लगातार भ्रष्टाचार पैदा करता रहता है और फिर जब वह सारी सीमाओं को तोड़ने लगता है और व्यवस्था के लिए मुश्किल पैदा करने लगता है तो समय-समय पर उसे नियन्त्रित करने के प्रयास भी इसी व्यवस्था के भीतर से होते हैं। ऐसे में कभी-कभी कोई मसीहा, कोई श्रीमान सुथरा जी (मिस्टर क्लीन) डिर्जेण्ट और पोंछा लेकर पूँजीवाद पर लगे खून और कालिख़ के ध्ब्बों को साफ़ करने में जुट जाते हैं। साम्राज्यवादी पूँजी से संचालित एन.जी.. ”सभ्य समाज” (सिविल सोसायटी) के साथ मिलकर पूँजीवाद की एक सुरक्षा पंक्ति का काम करते हैं। लेकिन वर्तमान में वैश्विक स्तर पर पूँजीवादी व्यवस्था मन्दी की चपेट में है, और आसमान छूती महँगाई और बेरोज़गारी आदि के कारण जन-आन्दोलनों का दबाव लगातार बना हुआ है। ऐसे में इस दबाव को कम करने के लिये सेफ्टी वाल्व का काम करने वाले एन.जी.. अभी व्यवस्था की सुरक्षा पंक्ति की भूमिका नहीं निभा पा रहे हैं। ऐसे में ये आन्दोलन वास्तविक मुद्दों से ध्यान भटकाने की भूमिका बख़ूबी निभा रहे हैं।
आज की परिस्थितियों में भारत की वामपन्थी सुधारवादी राजनीतिक पार्टियों के प्रति जनता में बढ़ रहे अविश्वास के कारण वे पूँजीवाद की दूसरी सुरक्षा पंक्ति का काम करने में ज्यादा सफल नहीं हो पा रही हैं। इसलिएसभ्य समाजके इस तरह के आन्दोलनों के कन्धों पर यह कार्यभार पड़ा है कि वे देश की जनता में व्याप्त असन्तोष को कम करने के लिए आगे आयें। ऐसे में इस पंचमेल खिचड़ी द्वारा भ्रष्टाचार विरोध में खड़ा किया गया यह आन्दोलन पूँजीवादी व्यवस्था के लिए दूसरी सुरक्षा पंक्ति का कार्यभार बख़ूबी निभा रहा है।
इस आन्दोलन का जो अन्त हुआ उससे अलग हो ही नहीं सकता था। इसकी सम्भावनाएँ अब समाप्त हो रही थीं और बुर्जुआ संसदीय राजनीति की बन्द गली में इसे मुड़ना ही था। आने वाला वक्त बतायेगा कि मुख्यधारा की राजनीति में एक बटखरे से ज्यादा इनकी कोई भूमिका बन भी पायेगी या नहीं।
इस आन्दोलन से वर्तमान सत्ता के पक्ष में एक सहायता तो यह हुई कि लोगों में यह भ्रम फैला कि देश की मुख्य समस्या भ्रष्टाचार ही है। दूसरी ओर अण्णा आन्दोलन की असफलता भी सत्ता के लिए एक सफलता है, जो लोगों के बीच पस्ती पैदा करने का काम करेगी और लोगों के बीच एक सामान्य निराशावादी धारणा को बल मिलेगा कि किसी भी आन्दोलनों से कुछ हासिल नहीं हो सकता क्योंकि अन्त में ये सभी आन्दोलन बुर्जुआ संसदीय राजनीति के दायरे में जाकर समाप्त हो जाते हैं।
अण्णा टीम के बाद अब रामदेव की रामलीला की बात करते हैं। अपने टीवी चैनल पर लगातार प्रचार करने के बाद रामदेव ने विदेशी बैंकों में जमा भारत के 400 लाख करोड़ रुपये को देश में वापस लाने के नारे के साथ अपना आन्दोलन शुरू किया था। पिछले 9 अगस्त 2012 को अनेक लोकरंजक नारों के साथ रामलीला मैदान में रामदेव ने गरमागरम बातों और दावों के साथ आन्दोलन शुरू किया जो 15 अगस्त को एक प्रहसन के रूप में समाप्त हो गया और अन्धी देशभक्ति और धर्मान्धता से लैस रामदेव के समर्थक वापस अपने-अपने घरों को लौट गये। रामदेव देश के बाहर बैंकों में मौजूद काले धन को वापस लाने की बात करते हैं, लेकिन देश के भीतर जो काला धन मौजूद है उसके बारे में कुछ नहीं बोलते। पूरे देश में मठों और मन्दिरों में, पूँजीपतियों और व्यापारियों के गोदामों में, नेताओं और नेताओं के चमचों के पास, सरकारी अफसरशाहों, इंजीनियरों, यहाँ तक कि चपरासियों और बिजली के मीटर रीडरों तक के घरों में करोड़ों की सम्पत्ति मिलती है। यह सारा काला धन जो देश के अन्दर मौजूद है उसकी मात्रा देश के बाहर मौजूद काले धन के भी कहीं ज्यादा है। रामदेव इस धन को बाहर निकलवाने की बात कभी नहीं करते। ख़ुद उनका 1100 करोड़ रुपये का व्यापारिक साम्राज्य काले धन की बुनियाद पर खड़ा है, इसके गम्भीर आरोप उन पर लगते रहे हैं। उत्तराखण्ड में किसानों की सैकड़ों एकड़ ज़मीन पर अवैध कब्ज़ा, मध्यप्रदेश में करोड़ों की अचल सम्पत्ति, स्कॉटलैण्ड में एक पूरा टापू ख़रीदना और स्वदेशी की बात करते-करते विदेशी कम्पनी ही ख़रीद लेना बाबा की कुछ ख़ास लीलाओं  में शामिल हैं। कांग्रेस सरकार बदले के लिए भी उनके ख़िलाफ जाँच की कार्रवाई कर रही हो तो भी इतने थोड़े समय में इतना बड़ा साम्राज्य खड़ा कर लेना सवाल तो खड़े करता ही है। धर्म और पूँजी का इतना अच्छा मिश्रण कम ही देखने को मिलता है।
धार्मिक कट्टरपन्थ की राजनीतिक करने वाले संघ और भाजपा के पास आज कोई ठोस चुनावी मुद्दे नहीं बचे हैं, राम मन्दिर का मुद्दा आगे नहीं बढ़ पा रहा है, और संघ क्षरण एवं विघटन के दौर से गुजर रहा है। ऐसे में रामदेव का आन्दोलन संघ की धार्मिक कट्टरपन्थ की राजनीति के लिए एक उम्मीद जगा रहा है। वैश्विक स्तर पर पूँजीवाद आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहा है और भारत भी इस संकट के प्रभाव से अछूता नहीं रह गया है। ऐसी स्थिति में पीले, बीमार चेहरे वाले मध्यवर्ग के हताश नौजवानों का एक बड़ा हिस्सा अलगाव का शिकार है, जो किसी भी नारे के पीछे बिना सोचे-समझे चल पड़ता है। मध्यवर्ग का यही हिस्सा रामदेव जैसे बहरूपियों के नारों के बहकावे में आकर दक्षिणपन्थी राजनीति की सेवा में जा खड़ा होता है। रामदेव के आन्दोलन के दौरान संसदीय राजनीति के क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर वोट बैंक की राजनीति करने वाले कई बड़े खिलाड़ी इसके समर्थन में मंच पर आकर जनता के समक्ष अपनी-अपनी बात कह गये। मुलायम सिंह, मायावती, प्रकाश सिंह बादल, चौटाला जैसे जो लोग रामदेव के समर्थन में पहुँचे वे सभी अपने अपने क्षेत्र में भ्रष्टाचार और काले धन के सम्राट हैं। इनके साथ ही संघ और नरेन्द्र मोदी भी इनके गले में अपनी बाँहें डाले हुए दिखे।
काले धन से जुड़ी रामदेव की माँगें किसी प्रहसन के मंच पर एक मसखरे के ऊलजुलूल संवादों से ज्यादा और कुछ भी नहीं हैं। यह तर्कहीन नारेबाज़ी समाज के कूपमण्डूक, चर्बी चढ़े मध्यवर्ग की कुछ श्रेणियों को तो प्रभावित कर सकती है लेकिन समाज के संजीदा लोगों में इसकी ज्यादा साख नहीं है। इस प्रकार के सभी लोकरंजक नारे आजकल की निराशा और पस्ती की स्थिति में जनता के एक हिस्से को प्रभावित कर रहे हैं। रामदेव के आन्दोलन के दौरान जिस तरह भगवे झण्डों को फहराया गया, रामदेव और उसके समर्थकों का केसरिया चोला, औरस्वदेशी”, ”भारत माता की जयऔरविश्वगुरु भारतके जो नारे लगाये गये वे सभी सम्मिलित रूप से संघ की हिन्दू धार्मिक कट्टरपन्थी राजनीति में एक नयी जान पूँफकने का काम कर रहे हैं जिसका फायदा भाजपा को ही होगा। केजरीवाल के पार्टी बनाने से भाजपा नाख़ुश है क्योंकि उसे लग रहा है कि कांग्रेस विरोधी वोट काटकर यह पार्टी चुनाव में तो उसे ही नुकसान पहुँचायेगी। दूसरी ओर, रामदेव के कारनामों से कुल मिलाकर चुनाव में भाजपा को फायदा मिलने की उम्मीद है। इसीलिए दिल्ली में रामदेव के मंच पर भाजपा के अध्यक्ष नितिन गडकरी पहुँचकर रामदेव के पैर छू रहे थे।
आज बढ़ते आर्थिक संकट के कारण लोगों में पनपते असन्तोष के माहौल में ये आन्दोलन जनता के बीच भ्रम पैदा कर रहे हैं, और जनता के सामने कोई क्रान्तिकारी विकल्प होने के चलते लोकरंजक नारे देकर उन्हें अपने प्रभाव में ले रहे हैं। आर्थिक ढाँचे में कोई बदलाव किये बिना सिर्फ सामाजिक-राजनीतिक ढाँचे को बदलकर किसी समाधान की बात करना हास्यास्पद है। पूँजीवादी व्यवस्था के तार-तार कुर्ते में पैबन्द लगाने की कोशिश करने वाले हर आन्दोलन को यह व्यवस्था अपने हित में अपना और अपने मुताबिक ढाल लेती है जो व्यवस्था के वर्ग चरित्र पर पर्दा डालने में उसकी मदद करता है। आर्थिक ढाँचे में आमूलगामी बदलाव मेहनतकश जनता के क्रान्तिकारी आन्दोलन के द्वारा राज-काज, समाज और उत्पादन के पूरे ढाँचे को बदलकर ही लाया जा सकता है। ऐसे बदलाव का कोई भी कार्यक्रम साम्राज्यवादी और पूँजीवादी शक्तियों द्वारा देश के संसाधनों और जनता की मेहनत की कमाई की लूट पर तुरन्त रोक लगायेगा। यह देश में निवेश की गयी सभी विदेशी कम्पनियों की पूँजी को तुरन्त ज़ब्त करेगा और सभी विदेशी कर्जों को रद्द कर देगा, देश के सभी मठों-मन्दिरों, वक्फ बोर्डों, चर्चों आदि के पास मौजूद खरबों की सम्पत्ति को ज़ब्त कर सामाजिक काम में लगायेगा, देश के सभी बड़े कारख़ानों का प्रबन्धन तुरन्त मज़दूरों की चुनी हुई कमेटियों को सौंप देगा, हर काम करने लायक व्यक्ति को काम करने का अधिकार देगा और काम करने की बाध्यता लागू करेगा, समाज के हर व्यक्ति को रोटी, कपड़ा, शिक्षा, चिकित्सा और घर की सारी मूलभूत सुविधाओं का अधिकार सुनिश्चित करेगा। इस प्रकार तृणमूल स्तर पर आर्थिक सम्बन्धों में परिवर्तन की माँग के बिना सारे नारे यूटोपियाई और भ्रामक हैं जो जनता को बदलाव की इच्छा से विमुख करते हैं और वर्तमान जर्जर पूँजीवादी व्यवस्था में पैबन्द लगाकर उसे चलाने की प्रतिक्रयावादी मानसिकता को बढ़ावा देते हैं।
 राजकुमार



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