image

सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

कवितांए तितिक्षा जी की और टिप्पणी तुषार धवल जी की हैं।

मित्रो आज बातचीत के लिए कविताएँ और
टिप्पणी प्रस्तुत है....

कविताएँ

1 चले आना

चले आना जब मेरी याद आए
चले आना जब दिल भर आए
चले आना जब कोई पास न हो
चले आना जब कोई राह न मिले
चले आना गर कुछ तुम्हारे पास न रहे
चले आना जब सुकून तलाशते थक जाओ
चले आना
चले आना
चले आना कि तुम्हें तुम्ही से मिला सकूँ
वो तुम जो मुझमें बसते हो....


2 अनकहे शब्द

शब्द चले गए
कई दफा की गई
नाकाम कोशिशों से हारकर
रोये-बिलखे, चीखें
सब अनसुना किया गया
किसी मुख द्वारा व्यक्त किये जाने को आतुर
उनका अव्यक्त रहना नियति बना दिया गया
आखिर
वे चले गए
बिना किसी आहट के
और छोड़ गये
मूक इंतज़ार
अपने लौट आने तक...


3   माँ

काश माँ होती
सृष्टि के सारे नियमों के विरुद्ध
मिलने आती

स्नेहपूर्ण स्पर्श करते ही
बरसों से ना आई मीठी नींद
पलों में आ जाती

प्यार भरी मुस्कान से
दिन की सफल शुरुअात होती
इस तरह उसके होने
या न होने की अहमियत को
बेहतर जानते हुए
जीवनरस ले पाते

बहुत कुछ बच जाता फिर

टूटने और टूट जाने से..


4  उलझन

बड़ी उलझन है
रिश्तों में
निभाने से ज्यादा
उन्हें चुनने में
किसी एक के लिये
दूसरे का बलिदान

कहीं परिवार के लिए
प्यार का बलिदान
कहीं प्यार के लिए
परिवार का
बड़ी उलझन है

कहीं रीती-रिवाजों का झमेला
कहीं समाज की बेड़ियां
देना पड़ता है बलिदान
बड़ी उलझन है

एक तरफ नौकरी की हार
दूजी और पैसों की मार
देना पड़ता है बलिदान

समाज से डरती स्त्री
और उसके स्त्रीत्व की असुरक्षा
देना पड़ता है बलिदान

तोड़ दे गर बेड़ियाँ
भुला दे गर रीती-रिवाज़
उसकी इस लड़ाई में
खड़ा नहीं समाज

अस्वीकृति है भाग्य में
साहस गर वो कर बैठे
कोई साथ न दे तो
देना पड़ता है बलिदान...


5 आत्ममंथन

आत्म मंथन करना
हर मोड़ पर
सही गलत के पैमाने पर तोलना विचारों को
किसी एक बात पर अटकना मन का
लगातार विचारना कई पहलुओं पर
दिनों दिन चलता मंथन
और निर्णय न ले पाने की विवशता
बढ़ते हुए इस बोझ से मुक्ति पाने
खुद को जिंदादिल बनाए रखने को
उठते कई बार कदम
जो न सही है न गलत
है बस एक आखरी आस
किसी पेड़ पर लगे आखरी पत्ते की तरह..
०००
04:59, Feb 2 - Satyanarayan:

टिप्पणी                                                                                  

पहली झलक में ही एक चीज़ जो साफ नज़र आती है वह यह कि इस कवि में कवित्त की एक नैसर्गिक सम्पदा है। मन पर उठते भावों और विचारों की अन्तर्लय को समझने की एक 'इन्ट्यूटिव' समझ है। ये तथ्य रूप में इन कविताओं के शिल्प और शब्दों के चयन में झलक जाते हैं।
निश्चय ही कवि के ये शुरुआती दिन हैं। सूरज जैसे जैसे उठेगा, उसका ताप भी बढ़ेगा, ऐसी उम्मीद की जा सकती है। यहाँ चन्द और बातें हैं जिनके प्रति सतर्कता कवि को और अच्छी कवितायें दे सकती हैं। मसलन,

'चले आना' कविता के जन्म लेने के पहले की हड़बड़ाहट में लिखी गई प्रतीत होती है। यहाँ 'चले आना' का बार बार दुहराव और हर 'चले आना' के बाद फीका सा कोई वाक्य अपने ऊपर फिल्मी या सस्ती शायरी का प्रभाव दिखाता है। 'चले आना' के दुहराव में कसाव या तनाव पैदा नहीं हो सका है क्योंकि ऐसे विषय की प्रेम सिक्त कविता की यह आन्तरिक माँग होती है कि वह भावों के वेग पर उमड़े। हृदय से उठती पुकार का एक थके हुए मन ने जैसे यहाँ बुद्धि के जोर पर सिर्फ अनुवाद भर कर दिया है। उसे तराशा नहीं है। कवि थोड़ा सब्र से अपने भीतर उतरे, उन भावों को, उनकी ऊष्णता को महसूस करे तो निश्चय ही अभिव्यक्ति और प्रखर हो जायेगी।
लेकिन फिर भी, यह अवश्य कहा जाना चाहिये कि इस कविता में कवि ने एक आन्तरिक लय हासिल कर लिया है और उसे अपनी अभिव्यक्ति में तब्दील भी किया है। यह एक अच्छा प्रयास है।

'अनकहे शब्द' एक बेहतर कविता है। यहाँ कवि ने अपने भीतर अधिक झाँका है, उसे महसूस भी किया है। जीवन में बहुत बार हठात् ही कोई चला जाता है और बहुत कुछ अनकहा रह जाता है। एक मूक इन्तजार अपने उन्हीं शब्दों की उलझनों को लिये बैठा रहता है। इसकी खलिश और ख़ला की अभिव्यक्ति अच्छी हुई है।

माँ पर अमूमन हम सबने कवितायें लिखी हैं। हमारे काव्य पूर्वजों से ले कर हम तक और हमारे बाद भी कविता में माँ की सनातन उपस्थिति बनी रहेगी।
              'बहुत कुछ बच जाता फिर
               टूटने और टूट जाने से'
इस कविता का एक ताकतवर वाक्य है जो माँ की कमी को झेलते मन की हताशा को बड़ी खूबी से समेट लेता है। यह एक अच्छी कविता है।

'उलझन'  कविता में कवि अपने दिमाग में ही जैसे भुनभुना रहा/ रही है। ठीक है, ये उलझने हैं, पर क्या सिर्फ इतना ही कह देने भर से कविता बन जायेगी ? 'कहीं परिवार के लिये... बड़ी उलझन है' एक अत्यन्त सतही अभिव्यक्ति है और एक चलताऊ किस्म की मंचीय कविता (जैसे 'सब' चैनल के 'वाह वाह' वाली बेहद सस्ती कविताओं ) के प्रभाव में उगी हुई लगती है। इस कविता पर कवि/ कवयित्री को फिर से काम करने की आवश्यकता है।

'आत्ममंथन' अच्छी कविता है। इस कविता में भी मन की कशमकश पर कवि/कवयित्री की उंगली सही पड़ी है। इसमें अपने भीतर के ऊहापोह के भाव से एक तालमेल बन पाया है और यह कविता पाठक के मन को अपनी तरफ खींचती है।

कुल मिला कर यह एक अच्छा प्रयास है । स्पष्ट है कि कवि नया है और ये लिखने के शुरुआती दिन हैं। एक सुझाव देना चाहता हूँ। कवि को 'अपने' स्वर की तलाश और शिनाख्त करनी होगी। बाहर बहुतेरी आवाज़ें हैं और उनके शोर का आवर्तन भी बहुत है। इन सबमें, थोड़ा ठहर कर अपने मनोभावों, चिन्तन और अपने मूल स्वभाव में डूबना होगा, मद्धिम आँच पर पकने देना होगा। यहीं वह सम्पदा मिलेगी जिसे कविता कहते हैं। एक और बात, मेरी यह राय है कि अच्छी कविता में भाव और विचारों का सन्तुलन बहुत आवश्यक है, यानि हृदय और मस्तिष्क का। कवि को विचारों के स्तर पर पुख्ता होने के लिये बहुत अध्ययन करना चाहिये, लगभग हर तरह के विषय पर। ये विचार कवि के व्यक्तित्व को गढ़ेंगे और उसके भावों में जब डूब कर निकलेंगे तो कविता एक ऊँचाई हासिल कर लेगी।
फिर भी, हम सभी यहाँ सहमत होंगे ही कि कवि ने बहुत अच्छा प्रयास किया है। उन्हें बहुत बहुत बधाई और उतनी ही शुभकामनायें।

कवितांए तितिक्षा जी की और टिप्पणी  तुषार धवल  जी की हैं।
31.01.2015


आपका साथी
सत्यनारायण पटेल

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें