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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

पूंजीवादी व्यवस्था के पतनशील दौर: ओम प्रकाश ग्रेवाल

साहित्य और विचारधारा
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ओम प्रकाश ग्रेवाल
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पूंजीवादी व्यवस्था के पतनशील दौर में जब समाज के प्रगतिशील और प्रतिक्रियावादी तत्वों के बीच संघर्ष तीव्र हो उठता है और शोषित उत्पीडित जनसमूह सचेत और जागरूक होकर पतनशील बुर्जुआ चिंतन द्वारा पोषित विभ्रमों को त्यागने लगते हैं तो समाज के यथास्थितिवादी तत्वों की यह भरसक कोशिश होती है कि साहित्य को स्वस्थ सामाजिक मूल्यों का संवाहक तथा बहुसंख्यक जनता की चेतना को विकसित करने का माध्यम न बनने दिया जाए। इनके अनुसार जब साहित्यकार किसी विचारधारा से जुड़ जाता है तो उसकी सृजन क्षमता धीरे-धीरे समाप्त हो जाती है और दृष्टि भी धुंधली पड़ जाती है। वास्तव में एक वर्ग विशेष के सामूहिक राजनीतिक कार्यक्रम को ही नहीं बल्कि व्यक्ति की समूची वर्गीय चेतना को हमें विचारधारा की संज्ञा देना चाहिए।
साहित्य और विचारधारा के परस्पर विरोध के सिद्धांत की पुष्टि में प्रतिक्रियावादी बुर्जुआ चिंतकों द्वारा यह तर्क दिया जाता है कि साहित्यकार किसी वर्ग विशेष से प्रतिबद्ध नहीं होता बल्कि उसकी प्रतिबद्धता तो मानव मात्र के साथ होती है। यह दलील खोखली और भ्रांतिपूर्ण है क्योंकि एक वर्ग विभाजित समाज में प्रत्येक व्यक्ति अनिवार्य रूप से किसी वर्ग के साथ जुड़ा होता है।
प्रतिक्रियावादी साहित्यकार को पूंजीवादी व्यवस्था में मेहनतकश जनता का शोषण दिखाई नहीं देगा और वे इसे मानव नियति का एक अनिवार्य पक्ष मानकर छुट्टी ले लेंगे। निष्कर्ष यह है कि रचना में व्यक्त होने वाले अनुभव को हमें उसकी समग्रता में देखना चाहिए और उसकी सार्थकता को केवल उसमे अन्तर्निहित विचारधारा के आधार पर नहीं आंकना चाहिए।
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▪ओम प्रकाश ग्रेवाल (आधार प्रकाशन की किताब "साहित्य और विचारधारा" से।)
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बिजूका इन्दौर एक से साभार

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