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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

बिजूका को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं

बिजूका समूह वॉट्स एप पर १९ फरवरी २०१४ को बना. इस १९ फ़रवरी को बिजूका दो साल का हो रहा. शुक्रवार के दिन  बिजूका का जन्म दिन है.

इसलिए शुक्रवार-शनिवार बिजूका
पर बात होगी. समूह के सभी साथियो से
विनम्र अनुरोध है..कि आप बिजूका से
जुड़ने और अब तक बिजूका के साथ
बने रहने के अपने अनुभव को साझा करे. इन दो वर्षों में बिजूका ने अनेक उतार चढ़ान देखें है...और उन सब बातों
ने हमें किसी न किसी रूप में समृद्ध किया
है .
इस मौक़े पर आप जो कुछ साझा करने
योग्य अनुभव समझते हैं..प्लीज साझा करे.
मुझे लगता है कि हम सब ने इतने लम्बे समय साथ रहकर एक दूसरे से बहुत कुछ जाना सीखा है. एक दूसरे को समृद्ध किया है. समूह के हर साथी के पास कोई एक बात तो होगी ही...जिसे वे इस दिन साझा कर सके. आपका स्वागत
है. संक्षिप्त में ही लेकिन कुछ न कुछ
कहे ज़रूर...

इस मौक़े पर एक निर्णय और लिया है..
वह यह कि अब रोज़ शाम को समूह में पोस्ट रचना से इतर मुद्दों, तात्कालिक
विषय आदि पर बात की जा सकेगी....

आपका साथी
सत्यनारायण पटेल

आशीष मेहता:-
"दो साल से कुछ कम समय, बिजूका के साथ।"
सत्य भाई की विनम्रता इतनी बलिष्ठ है कि 'आग्रह' प्रतीत होने वाले वाक्य भी दिल में 'निर्देश' सा असर डालते हैं। यही ताकत, बिजूका पर बेहतर असर छोड़ती है, जब अनुशासन एवं सभी को साथ रखने का उनका संकल्प, साथ नुमाया होता है।

मेरा और व्हाट्स्अप का साथ सिर्फ बिजूका की वजह से ही है। मैं कोई और डिजिटल प्लेटफार्म भी उपयोग नहीं करता, सो बिजूका की किसी और समूह से तुलना भी नहीं कर सकता। पर शुरुआती बिजूका और फिलहाल बिजूका में जो मुख्य अंतर देख पाता हूँ, वह है वैचारिक आदान प्रदान की कमी (पहले की बनिस्बत)। इसके सकारात्मक कारण, साथियों की व्यस्तता हो सकती है, और नकारात्मक कारणों में, कटु अनुभव, अहम् एवं अन्य समूहों पर सक्रियता हो सकती है।

हालांकि, व्हाट्स्अप वैचारिक आदान प्रदान के लिए कोई बहुत सुविधाजनक माध्यम नहीं है, इसलिए अभी तक, साथी जो भी सहभागिता रख पाएँ हैं, वह 'कमाई' ही है।

मै, जिसका रचनाकर्म से दूर दूर तक सरोकार नहीं है, जो पाठक कहलाने लायक भी नहीं, कविताएँ जिसके लिए अबूझ पहेलियाँ रहीं, आज कुछ-एक कविताओं में कुछ पा लेने का सौभाग्य पाता हूँ, तो सिर्फ बिजूका की वजह से। गणित का छात्र रहा और एक बेटी का पिता हो कर भी निरंजन सर () के "दो -तिहाई भाग" को समझने में समय लगाया। स्त्री विमर्श पर मुखर स्त्रियों से वाद-विवाद में पड़, उन्हें उचित संवाद-शैली से परे पाया। सत्य भाई के अलावा सिर्फ "देवीलालजी" ही से रुबरु मुलाकात कर पाया हूँ। उनके  इत्यादि इस कदर  हावी रहे, कि आमने-सामने भी सिर्फ़ में मुलाकात सम्पन्न हो गई। इन वर्षों में कुछ चार पांच साथियों के फोन आए, जो मूलत: टिप्पणियों पर त्वरित प्रतिक्रियाए रही। लब्बोलुआब यह कि किसी को न जानते हुए भी, अद्वितीय भाईचारे/अपनेपन को जिया। जब बिजूका की 'लत' सी महसूस हुई, व्हाट्स्अप ही उड़ा दिया।

आज के ताजा निर्णय का स्वागत है। साथियों से भी निवेदन है कि समयोचित, विषयोचित हस्तक्षेप को गरिमापूर्वक बनाए रखें... बढ़ाएँ, यही तो 'बिजूका' की मौलिकता है।

और हाँ, यदि 'सुनाई देने वाली कहानियाँ ' बढ़ाईं जाए, तो मेहरबानी। फरहत भाई का शुक्राना, तितिक्षाजी, मनीषाजी एवं सभी मित्रों को साधुवाद। आशीष मेहता।

मणि मोहन:-
बिजूका साहित्य और विचार का एक महत्वपूर्ण मंच है इसमें दो राय नहीं।
सत्या भाई और सभी एडमिन साथियों को बधाई और शुभकामनायें।

देवेन्द्र रिनावा:-
सर्वप्रथम बिजूका को जन्मदिन की बहुत बधाई।बिजूका से जुड़कर बहुत आनंद उठाया और अभी भी इस स्तरीय मंच से लगातार कविताओं ,कहानियों ,वार्ताओं और स्तरीय सामग्रीयों से अपने आपको समृद्ध कर रहा हूँ।इस माध्यम का बहुत उपयोग नहीं कर पाटा हूँ पर जब भी मोबाइल उठाता हूँ सबसेपहले बिजूका के ही दर्शन करने से नहीं रोक पाटा हूँ।भाई सत्यनारायण ने इसे कचरापने से बचा रखा है इसके लिए उन्हें धन्यवाद।

निरुपमा नागौरी:-
बिजूका से जुड़कर लगातार स्तरीय रचनाआों का आस्वाद करते आये हैं।बिजूका ने अपनी गरिमा का हमेशा ध्यान रखा है।जब से मैं इससे जुड़ी हूं ,अलग अलग फॉर्मैट में कविताएं और अन्य रचनाएं पढ़ती आ रही हूं और कहीं भी गुणवत्ता में कोई हेरफेर नहीं  पायी ।
भविष्य में भी गुणिजनों से बहुत कुछ सीखने,समझने और गुनने मिलता रहेगा यही विश्वास है।
समूह के सभी सदस्यों को सहृदय   धन्यवाद।
हार्दिक शुभकामनायें  सत्या भाई और संपूर्ण बिजूका परिवार।

आनंद पचौरी:-
बिजूका ने एक ऐसे माध्यम को गरिमा दी है जिसका प्रायः दुरूपयोग ही अधिक होता है।परिपक्वता, के साथ सौदंर्य और  गरिमा का जो समन्वय बिजूका के परिवेश में हुआ है,वह स्तुत्य है।  बहुत शुभकामनाओं के साथ इसके उज्जवल भविष्य की कामनाएँ।

गीतिका द्विवेदी:-
तकरीबन दो साल से मैं भी नियमित रूप से वाट्सएप का इस्तेमाल करती आ रही हूँ।इस बीच कई ग्रुपों से मुझे जोड़ा गया या कई ग्रुपों से मैं जुड़ी।कुछ समय के बाद बेमतलब के पोस्ट और कुछ खास लोगों के आपसी संवाद तथा एक -दूसरे के वाह,वाह ने मेरे मन में उबन भर दी।इस कारण मैं कई ग्रुपों से अपने आप को अलग कर ली या निष्क्रिय रही।बहुत ईमानदारी से आप लोगों को बताना चाहती हूँ कि बिजूका से जुड़ कर मैंने बहुत सीखा है।मेरे लिए बिजूका मेरा विद्यालय है। इस ग्रुप का अनुशासन मुझे  सबसे अधिक प्रिय है। यहाँ  रचनाओं का चयन भी बहुत सोच-समझ कर किया जाता है।            मैं मूल रूप से गद्य लिखती हूँ।परन्तु बिजूका ने मुझे कविता समझने की समझ दी।शायरी सिर्फ बिजूका में पढ़ने को मिलता है।              बिना दिखाई दिए कई रचनाकार मित्रों से मित्रता बढ़ी ।हम एक शहर में रहने के बावजूद एक- दूसरे से अंजान रहते हैं किंतु बिजूका के कारण पिछले दिनों एक साहित्यिक कार्यक्रम में डा.राजेंद्र श्रीवास्तव से मुलाकात पारिवारिक हो गया जबकि इससे पहले भी हम कई बार मिल चुके थे किंतु तब हमारे साथ बिजूका नहीं था।धन्यवाद आप सभी मित्रों को जिन्होंने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मुझे सिखाया।

देवीलाल:-
कोई भी परिवर्तन समाज मे बाद मे आता हे पह्ले वह आदमी के दिल व दिमाग मे आता हे .
जिसे वह भाषा मे कहता लिखता हे जिससे हम  आज के समय  को देख व जान सकते हे .
मेरे लिये बिजुका का समुह का यही महत्व हे .
कला के दूसरे मध्यमो मे परीवरतन बहोत बाद मे दर्ज होता हे .
बिजूका मे रहना आज मे रहने मे मेरी मदद करता हे इस लियि सब का आभार .

पवन शेखावत:-
दो वर्ष पूर्व मेरे  whats app में बिजूका नाम उभरा और उसमें सारी साहित्यिक गतिविधियों की चर्चा परिचर्चा दिखती रही... समझ नहीं आ रहा था कि मेरे मोबाइल पर ये गतिविधियां कैसे शुरू हो गई और यह बिजूका है क्या... इसी दौरान मेरी बात सत्यनारायण सर से हुई जिन्होंने मुझे बिजूका के बारे में बताया... बिजूका से जुड़कर मुझे बहुत अच्छा लग रहा था... यह मेरा सबसे पहला ग्रुप था जिससे मैंने साहित्य से जुड़ी बहुत सारी बातों को समझा ,सीखा और मैं रिचार्ज होता रहा.. यह ग्रुप एक बहुत ही सुलझा ग्रुप है... इस समूह के कारण मुझे समूह के बहुत से सदस्यों से निजी सहयोग व ढेर सारा प्यार मिला... मैं सत्यनारायण सर का बहुत शुक्रगुज़ार हूं जिन्होंने मुझे इस समूह के लायक समझा और मुझे देश भर के साहित्यकारों का इतना प्यार मिला.. हालांकि मैं निजी कारणों से समूह में एक्टिव नहीं रह पा रहा हूँ लेकिन फिर भी समूह की गतिविधियों पर नजर हमेशा से बनी रहती है... और ज्यादा मैं क्या कहुं... बस इतना ही कि समूह का बहुत बहुत शुक्रिया... आप सब का प्यार और सहयोग यूं ही बना रहे और मैं इस परिवार से यूं ही साहित्य की बारिकियों को सीखता रहूं... बस इतना ही

मनचन्दा पानी:-
साथियों बिजूका समूह जब बना था तब मैं उसमें था। हुआ यह था की नई दिल्ली में विश्व पुस्तक मेले से जाने के एक-दो दिन बाद ही सत्या भाई ने यह ग्रुप बनाया था। मेले में हम लोग मिले थे सो उन्हें लगा की इस नालायक को भी समूह में जोड़ लिया जाए। तब से अब तक हमारे इस समूह का विस्तार ही हुआ है, आज बिजूका अलग-अलग विधाओं और नामों के लगभग दस समूह हैं, मेरी किस्मत कि मैं इन सबमे हूँ।
बिजूका ने निरंतर अपनी कमियों को खोजा और सुधारा है, समय-समय पर साथियों से सुझाव लिए जाते रहे हैं और मिले सुझावों पर गंभीरता से ध्यान दिया गया है, जिसका नतीजा आज आपके सामने एक सुव्यवस्थित सुचारू समूह खड़ा है।

सबसे पहले तो सत्या भाई को सलाम वे ही कल्पना कर सकते थे एक ऐसी एप्लीकेशन को इस प्रकार इस्तेमाल करने की जिसको सारी दुनिया बेहूदा, फूहड़, अश्लील और चुगलखोरी के मेसेज करने के लिए इस्तेमाल करती है।

बिजूका संभवतः एकमात्र ऐसा समूह है जहाँ सभी साथियों का सामान मूल्य माना जाता है, कभी किसी भी स्थिति में अडमिंस की भूमिका अन्य साथियो से ज्यादा नहीं मानी गयी है। रचनाएँ लगाने में भी यहाँ कभी कोई पक्षपात नहीं देखा गया है, जो दुसरे समूहों की सबसे बड़ी बिमारी है।

आप सबको शायद एक बात का ध्यान नहीं है। इन सभी समूहों को बनाने वाले, चलाने वाले, हर गतिविधि पर अपनी पैनी नज़र रखने वाले सत्या भाई की आज तक के दो साल में एक भी रचना किसी समूह में नहीं लगी है।

याहू से काम छोड़कर टाइम पास में व्हाट्सएप्प बनाने वाले ब्रायन ऐक्टन और जान कौम ने इसे केवल इसलिए बनाया था कि वे बिना sms के खर्च के बात कर सकें। उन्होंने कभी नहीं सोचा होगा जब यह एप्लीकेशन सत्या भाई के हाथ लगेगा तो वे इसको एक औज़ार, एक ज़रिया बनाएंगे और और एक नयी दुनिया गढ़ देंगें।
उसके बाद बधाई सभी समूह के अडमिंस को जो निरंतर अपनी सेवाएं देते हैं। अलग-अलग समूहों को एक ही सुर में चलाते हैं और रचनाओं को चुनने, उन्हें व्हाट्सऐप के फॉर्मेट में बनाने, उनपर चर्चा के लिए साथियों को प्रोत्साहन देना जैसे काम बिना किसी विलम्ब के, पूरे मन से करते हैं।
और फिर समूह के साथियो को बहुत-बहुत बधाई। आप सभी तो हैं जिनकी रचनाएं यहाँ महकती हैं, जिनकी टिप्पणियाँ इन समूहों का सबसे बड़ा आकर्षण हैं। आप सभी हैं जो यहाँ ऐसा अनुशासन बनाये हुए हैं जो मिसाल बन गया है दुसरे समूहों के लिए।

आप सभी को बधाई।
आप सभी को शुभकामनाएं।
आप सभी का धन्यवाद।

किरण येले:-
सत्याभाई ओर सभीको प्रणाम. अगस्त १५ से मराठी बिजुका में शामिल हुआ। आजतक का मेरा अनुभव बहोतही सुखद रहा. आभार।

आलोक बाजपेयी:-
बिजूका से जुड़कर साहित्य समाज की तमाम ऎसी रचनाएं और विचार मिले जिनसे मई अनभिज्ञ था। सोशल मीडिया का यह बेहतरीन उपयोग है।

विजय श्रीवास्तव:-
मेरे जैसे सामान्य पाठक को भी बिजूका से जो मिलता है वह गहरे संतोष और आनंद का अनुभव है । अच्छे साहित्य के विविध रंगों को प्रतिदिन सुधिजनों को उपलब्ध कराना बहुत बड़ी सेवा है । बहुत  बधाई एवं शुभकामनाएं  ।

भागचंद गुर्जर:-
मेरे लिए बिजूका समूह में जुड़ना बहुत सुखद रहा। मैं सत्या भाई का इसके लिए आभारी हू्ँ। सबसे बड़ी खूबी मुझे बिजूका का अनुशासन लगा। बिजूका पर पोस्ट होने वाली रचनाओं से बहुत कुछ सीखने को मिला । समय की कमी के कारण ज्यादा सक्रिय तो नहीं रह पाता हूँ। फिर भी देर सवेर रचनाओं को पढने का समय निकाल ही लेता हूँ।सत्या भाई जिस व्यवस्थित ढ़ग से इसे चला रहें है वह कबीले तारीफ है। बिजूका समूह के सभी साथियों में इसी तरह प्यार और सहयोग बना रहे .. इसी आशा के साथ ... सभी को बधाई ...

कविता गुप्ता:-
सबसे पहले बिजूका से मुझे जुड़वाने वाले अशोक बिंदल जी का आभार। मुझे बिजूका के कई फ़ायदे मिले हैं ।
१  साहित्य की समझ का फ़लक बढ़ना शुरू हुआ हैं ।
२  मेरे परिवार के सदस्यों में साहित्य के प्रति रुचि बढ़ी हैं ।
३  मेरे से पहले मेरे परिवार में मेरे बच्चे तक बिजूका पढ़ने लगे हैं।

बिजूका को धन्यवाद

वनिता बाजपेयी:-
मैने बिजूका का नाम सुन रखा था । मणि भाई ने समूह से जोड़ा । बहुत अच्छा मंच है  । सार्थक और अनुशासित। आभार मणि भाई और सत्य जी

रचना:-
बिजूका के दिल्ली समूह के सभी साथियों को नमस्कार
   मैं इस समूह में अपेक्षाकृत नई हूँ लेकिन फिर भी इस समूह की कुछ विशिष्टताओं ने मुझे आकृष्ट किया। जहाँ एक ओर वाट्स ऐप को मनोरंजन और निरर्थक वार्तालाप के  साधन के रूप में अधिक जाना जाता है, वहीं बिजूका जैसा साहित्यिक समूह साहित्यिक विचारों व रचनाओं के आदान-प्रदान व विमर्श की दिशा में एक गंभीर व सराहनीय क़दम है । इस समूह के नियम इसकी गरिमा को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
सप्ताह के तयशुदा वारों पर सुन्दर व सार्थक रचनाओं का प्रकाशन और उन पर निष्पक्ष व सटीक टिप्पणियाँ,  प्रतिक्रियाएँ निश्चित ही रचनाकार का मार्गदर्शन करने में सहायक हैं। और इस निष्पक्षता के लिए रचनाओं को रचनाकार के नाम के बिना प्रकाशित करना ही इस समूह की विशिष्टता व उपलब्धि है। इसके अतिरिक्त यहाँ नियत नियमों के अनुसार सदस्य अन्य कोई भी सामग्री केवल रविवार को ही पोस्ट करते हैं,  यह समूह के सदस्यों के अनुशासन का प्रशंसनीय उदाहरण है।
 
      उपरोक्त सभी बातें बिजूका को अन्य साहित्यिक समूहों से अलग खड़ा करती हैं,  जिसे बनाए रखने में इसके कर्ताओं का बहुत योगदान है जो अपने बहुमूल्य समय में से कुछ क्षण निकालकर इसकी गुणवत्ता बनाए रखे हुए हैं।
       उन सभी संचालकों व बिजूका को आज इस समूह की दूसरी वर्षगाँठ पर हार्दिक बधाई व शुभकामनाएँ।
आशा है कि अपने उद्देश्यों की गंभीरता बनाए रखने में बिजूका भविष्य में भी सफल होगा और अन्य नई योजनाओं व प्रयोगों को अंजाम देगा।

मनीषा जैन :-
मैं बिजूका से करीब डेढ़ वर्ष पहले एक सदस्य के रूप में जुड़ी थी। और रचनाओं को गम्भीरता से पढ़ती थी और टिप्पणी भी करती थी। जिससे की रचना कार को आलोचनात्मक टिप्पणी करने के हुनर में इज़ाफा होता है। मुझे यहां का अनुशासन बहुत मुत्तासिर करता है और वहीं समूह के कीमती सदस्यों की टिप्पणी भी पढ़ने को मिलती है जैसे गरिमा जी , प्रज्ञा जी , अलकनंदा जी से बहुत कुछ सीखने को मिलता है और सत्या जी का अनुशासन भी बहुत कुछ सीखता है। जहां अन्य समूहों में चुटकुले तथा अन्य सामाग्री परोसी जाती है। अतः समूह उत्तरोउत्तर विकास करे यही कामना है।

वासु कुमारी:-
रचना की भिन्न-भिन्न विधाऐं होती हैं। बिजूका ऐसा समूह है जो हमें ये भिन्न विधाऐं एक ही मंच पर उपलब्ध कराता है।

रचनाकार का नाम बाद में छपने के कारण सदस्य अपनी आलोचनात्मक प्रतिक्रियाऐं निष्पक्ष रुप से दे सकते हैं, जिससे रचनाकार को मार्गदर्शन मिलता है।

समूह की गरिमा बनाए रखने में इसके नियमों व सदस्यों के अनुशासन का भी बहुत योगदान है।

जिस प्रकार एक परिवार अपनी परंपरा,अपनी संस्कृति को समृद्ध करता चलता है, उसी प्रकार बिजूका परिवार भी हमारी साहित्यिक संस्कृति को समृद्ध करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। कामना करती हूं, अपने उद्देश्यों की पूर्ति करते हुए बिजूका समूह भविष्य में भी निरंतर विकास करता रहे।

बिजूका समूह के संचालकों व सभी सदस्यों को इस परिवार की दूसरी वर्षगाँठ पर ढेरों शुभकामनाएँ

संजना तिवारी:-
बिजूका ग्रुप को ढेर सारी बधाई , 
मुझे बिजूका की सक्रियता , गंभीरता और नियमतता बेहद पसन्द है । ग्रुप पर रचना रखने से पूर्व उनपर की एडमिंस् की मेहनत दिखाई देती है और यही बिजूका की सबसे बड़ी खासियत है ।
यहाँ होना मेरे लिये ख़ुशी की बात है

मीना अरोड़ा:-
" बिजूका "मुझे अपने आप से जोड़ने के लिये आप सभी का धन्यवाद।
यही वह ग्रुप है जिसमें जुड़कर में खुद को एक साहित्यिक दुनिया का बाशिंदा मानती हूं
१५ जनवरी एक न भूलने वाला दिन मेरे लिए जिस दिन बिजूका के सदस्यों ने मुझे अपनाया
आप सभी का स्नेह मुझ पर बना रहे
मेरा रिश्ता आप सभी से मेरे जीवन के अंत तक बना रहे।

संतोष श्रीवास्तव:-
बिजूका को जन्मदिन की बधाई ।सत्यनारायण जी के द्वारा अच्छी रचनाओ से बिजूका रूबरू कराता है और इस तरह साहित्य की धारा में बहाए ले जाता है।शुभकामनाएं

उदय अनुज:-
बिजुका में कई नये रचनाकारों को पढने का मौका मिल रहा है। सभी के पास हर तरह की पत्रिकाएँ तो आती नहीं उस लिहाज से यह कमी बिजुका कुछ हद तक पूर्ण करता है। गद्य और पद्य दोनों का मिश्रण है इसमें। समकालीन सोच से पाठक रूबरू हो रहा है।

सरिता सिंह:-
जन्म दिन की सार्थकता... जीवन.. के... साथ - साथ साहित्यिक यात्रा को भी गतिमान बनाना होगा.... पूरी सहजता के साथ.... हार्दिक शुभकामनाएं

आशा पाण्डेय:-
आदरणीय सत्यनारायण जी,नमस्ते
मैं बिजूका समूह के पोस्ट को नियमित  पढती हूं.मेरी कवितायें और कहानियां भी इसमें लग चुकी हैं.मैंने हमेशा महसूस किया कि ये एक निष्पक्ष मंच है जहां हर लेखक को समान रूप से महत्व मिलता है.लेकिन कुछ महीनों से इस पर सदस्यों की सक्रियता कम हुई है .कारण क्या हो सकता है .मैं अपनी बात करूं तो ..कभी कभी व्यस्तता के कारण और कभी अन्य सदस्यों की सक्रियता न देख मैं भी निरलिप्त हो जाती हूं मैं मानती हूं ये मेरी गलती है.तितिक्षा जी का समर्पण काबिले तारीफ है.मैं बिजूका समूह के लम्बे भविष्य के लिये कामना करती हूं और स्वयं की सहभागिता को बढा़ने की कोशिश भी करूंगी.

ललिता यादव:-
बिजूका समूह को दो वर्ष पूरे करने पर अनन्त शुभकामनाएं। बिजूका विविधतापूर्ण समूह है।
सत्या जी चुन चुन बड़े परिश्रम से वैविध्यपूर्ण रचनाओं से हमारा साक्षात्कार कराते हैं ।
उनका काव्य चयन का तो जवाब ही नहीं।
समसामयिक विषय चर्चा बिजूका को और जीवन्त समूह बना देगी।इस पहल का स्वागत है। इस समूह की सदस्य होना मेरे लिए गर्व की बात है।

पारितोष:-
बिजूका साहित्यिक रूप से बेहद समृद्ध है और भी समूह हैं जो ऐसी साहित्यिक गतिविधियों को संचालित करते हैं लेकिन बिजूका में जैसे नए और पुराने रचनाकारों की रचनाओ का समावेश और उन पर चर्चा का एक व्यवस्थित मंच देता है वह सराहनीय है।बस एक ही कमी दिखती है साहित्य से इतर जो सामाजिक और राजनैतिक गतिविधिया होती हैं और जो आम जनजीवन को गहरे से प्रभावित करती हैं,उनकी चर्चा नगण्य होती है,वैचारिक उहापोह और उसके दुष्परिणाम से सामाजिक गतिरोधता पर भी अगर चर्चा हो सके तो इसकी सार्थकता का आयाम दुगुना हो जायेगा।

राहुल शर्मा:-
बिजूका परिवार को दूसरे जन्मदिवस की हार्दिक शुभकामनाएं। इस परिवार के रूप में मुझे एक ऐसा मंच मिला जिसमें न केवल साहित्य बल्कि अतीत, वर्तमान और भविष्य का सामंजस्य भी देखने को मिलता हा

तिथि:-
बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएँ बिजूका की वर्षगांठ पर । मेरे लिए ऐसे साहित्यिक समूह से जुड़ना खुद को समृद्ध करना है।मेरी पहुंच हर पत्र पत्रिका तक नहीं  हो सकती,इस लिहाज से  यह  समूह बहुत महत्वपूर्ण है। मेरी रचनाओं को भी यहां प्रस्तुत किया गया,जिसके लिए आभारी हूँ। समूह  ऐसे ही निरंतर गतिशील रहे और सबका साथ और सहयोग बना रहे।

विदुषी भरद्वाज:-
सद्भाव और संवेदना जगाते हुए
रस बरसाते हुए बिजूका की यात्रा अनवरत चलती रहे
अनन्त शुभकामनाएं एवं ढ़ेर सारी  बधाई

सत्यजी और तितिक्षा जी, आभार

रेनुका नंदा:-
उन दिनों निजी कारणवश अपनी अठारह वर्ष की सार्थक नौकरी छोड़कर मैं एक नीरस-सी दिनचर्या जी रही थी. मानो ख़ाली समय में दिमाग को ताला लग गया हो. भय था की कहीं उसे यूं ही पड़े-पड़े जंक न लग जाये. तभी एक दोस्त से मेरी भेंट हुई जिन्होंने मेरी व्यथा सुनी. ख़ाली समय में कागज़ के पन्नों पर लिखी कुछ अपरिष्कृत टुकडियां भी पढ़ीं. तब उन्होंने मुझे ‘बिज़ूका” समूह से अवगत कराया. मेरी जिज्ञासा देखकर मुझे ‘बिज़ूका इंदौर चार’ समूह में सम्मिलित भी करवाया.

फिर क्या था? मेरी रुकी हुई ज़िन्दगी जैसे कमल-सी खिल उठी. बिज़ूका पर प्रतिदिन नए-नए प्रसंग, कविता, कहानी, ग़ज़ल इत्यादि पढ़ने को मिलने लगे. ख़ाली समय प्रशस्त रूप से कटने लगा. इस समूह की दीवानी होते मुझे देर न लगी. बड़े-बड़े दिगज्जों को घर बैठे पढ़ने का इससे अच्छा ज़रिया कोई और हो सकता था भला? उच्च विचार, सुन्दर शब्दावली, उत्कृष्ट रचनायें पढ़ते-पढ़ते मेरा  हिंदी भाषा का ज्ञान भी प्रशस्त होने लगा. साथ ही विश्वभर के श्रेष्ट रचनाकारों के बारे में जानने तथा उनकी रचनायों को पढ़ने का अवसर भी मिला. नए रचनाकारों को पढ़ने से हौसला भी बढ़ा. इसी हौसले से एक लघु कहानी लिखने का प्रयास भी किया जो बिज़ूका पर छपी भी. (हालाँकि प्रतिक्रियाएँ कुछ ख़ास उत्साहजनक नहीं रहीं, खैर......)

मेरा बिज़ूका समूह को तहे दिल से शुक्रिया. आशा करती हूँ कि यह समूह सालों साल यूँ ही मेरा तथा समुह के सभी साथियों का विकास करता रहे, सभी में एकता का प्रतीक बने, मुझ जैसे सैकड़ों दिशाहीन मित्रों का मार्ग दर्शन करता रहे, एवं हमें कुछ अच्छा लिखने को प्रोत्साहित करता रहे. बिज़ूका के माध्यम से एवं समूह के साथियों की शुभकामनाओं से मुझे उम्मीद है कि आने वाले समय में मैं अपना एक उपन्यास लिखने में सक्षम रहूँ.
शुभकामनाओं के साथ,

आशुतोष गौड़:-
बिजूका ने हमेशा साहित्य के द्वारा सभी सदस्योंको विचारो के नए आयाम उपलब्ध किये।

नई सोच,

किसी एक प्रश्न के विभिन्न अंगो का अभ्यास करना,

विविध भावनाओ को शब्दों के प्रयोग से प्रदर्शित करना,

अनेक लेखक व कवियोके साहित्य को पढ़कर अपने दैनिक जीवन को समृद्ध करना...

इन कई प्रकार के, बिजूका समूह ने हमे अनेक अमूल्य तोहफे दिए है।

हम सब इस मंच के सदा आभारी है व इस व्यासपीठ की दीर्घायु की कामना करते है।

राहुल चौहान:-
प्यारे साथियो यक़ीन नहीं हो रहा कि, हम सब साहित्य पढ़ते पढ़ाते दो वर्ष साथ निकल आये है,

तक़रीबन रोज ही प्रेरणा और ऊर्जा भरी रचनाओ का डोज़ अपनी दिमागी ख़ुराक में पाया है, रोज ही इस पर आनेवाली पोस्ट का इन्तजार किया है।
इस मंच की खूबसूरती बेबाक, बेख़ौफ़, नवोन्मेषी गूढ़ विचारो की प्रस्तुतियां रही, जिन्होंने सोच की उन बंद खिड़कियों को झाड़ा-ठोका जो पता ही न था की पहले दिमाग में थी भी?

सभी साथी, रचनाकार, प्रस्तुतकर्ता,
संकलक को उनके श्रम विशेष कर उसकी सततता के लिए बहुत बधाई और आभार।

मीनाक्षी स्वामी:स्वामी- बहुत बहुत बधाई। बिजूका समूह का अनुशासन, गरिमा और समृद्ध साहित्य चर्चा प्रशंसनीय है। यह उत्तरोत्तर वृद्धि करे। शुभकामनाएं

मीना शाह इन्दौर:-
पटेल साब आपको इस ग्रुप को बनाने के लिए दिल से सलाम...साने ताई की अनुशासन की छड़ी को मनचंदा जी मनीषा जी और फरहत जी को भी जिन्होंने समय समय पर गजलों की अच्छी जानकारी दी को बहुत बहुत बधाई...इसका ये उच्च स्तर हमेशा बना रहे

रुचि गाँधी शायराना महफिल:-
बिजूका को जन्मदिन की बधाई..
बिजूका को स्थापित करने व इस ऊंचाई पर पहुंचाने के लिए सत्यनारायणजी पटेल...मनीषाजी...मनचंदाजी..........फरहत जी
बधाई के पात्र हैं....
हार्दिक अभिनंदन..
व्यस्तताओं के चलते बहुत सक्रिय नहीं रह पाती अपितु आप सभी गुणी जनों को पढ़ती अवश्य हूं   जिसका श्रेय बिजूका को ही जाता है
समूह के सभी सक्रिय साथियों का भी अभिनंदन...
और हां  ... बाकी सभी समूहों की पोस्ट समय समय पर clear all msg में डाल देती हूं परंतु बिजूका की सभी पोस्ट सुरक्षित हैं....

किसलय पंचौली:-
बिजूका 4 समूह से जुड़ कर मैँ अपने आप को गौर्वान्वित महसूस करती हूँ। कई अच्छी रचनाओं का सुलभ सहज पाठ और उस पर विमर्श का इतना अनुशासित मंच व्हाट्सऐप पर उपलब्ध होना वाकयी तारीफ काबिल कार्य है। ग्रुप ऐडमिन और सक्रीय
सदस्य निसन्देह बधाई के पात्र हैं।

राखी कनकने:-
कविताएँ और कहानियां लिखना पसंद है मुझे  और इसलिए हर दम लिखने की कोशिश करती हूँ। कुछ अलग करने की चाह रखती हूँ। इसलिय मैं अपने आपको भाग्यशाली समझती हूँ की मैं इस मंच का एक छोटा सा हिस्सा हूँ।
बिजूका मेरे लिए एक स्कूल के समान है।
जिसकी क्लास रोज़ लगती है।
हर क्लास में कोई एक बच्चा होता है जो क्लास में होता है मगर उसके होने का एहसास बहुत कम होता है।
मैं भी कुछ शायद ईस तरह की  छात्रा हूँ यहाँ। सब इतने विध्वान दोस्तों के बीच रहती ्हूँ और  सबसे कुछ न कुछ सीखती हूँ।
शाम ऑफिस से लौटते वक़्त जब मैं ट्रेन में होती हूँ तब मैं इस क्लास को अटेंड करती हूँ।
रोज़ कुछ नया सीखती हूँ। ऐसे  कितने  एहसास , बातें, पहलू ,नज़रिये  और  लिखवटों से मेरी यहाँ मुलाकात हुई है जो  मैं कभी सोच भी नहीं सकती  थी। जानती ही नहीं थी। अब सीख रही हूँ।
तो आज इस अवसर पे मैं  यहाँ अपने सभी दोस्तों का जो गुरुजन के सामान है.... शुक्रिया करना चाहती हूँ।
और पटेल सर जी.. आपका दिल से आभार।

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