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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

लेख :स्त्रीकाल में निवेदिता शक़ील

नमस्कार साथियों,
   आज हम समूह की साथी निवेदिता शक़ील का एक लेख यहाँ प्रकाशित कर रहे हैं। यह लेख एक ऐसे विषय पर आधारित है,  जिसकी चर्चा भी लम्बे समय तक वर्जित माना जाती रही थी...  किन्तु अब महिलाएँ बहुत मुखरता से अपना पक्ष रख रही हैं। यह सकारात्मक बदलाव है। अपने जीवन से जुड़े मुद्दे जितनी स्पष्टता से स्वयं महिलाएँ उठा सकती हैं,  पुरुष नहीं।
आशा है आप इस लेख पर अपनी प्रतिक्रियाएँ देकर इसे एक सार्थक विमर्श का रूप देंगे......
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"स्त्रीकाल में निवेदिता शक़ील" --

मैं कुछ दिनों पहले दिल्ली में एक गोष्ठी में गयी थी। जहां मेरी मुलाकात स्वामी शिवानंद से हुई। उन्हें पर्यावरण के मुद्दे पर अपनी बात रखने के लिए बुलाया गया था। हमारे देश में धर्म के नाम पर बाबाओं ने जो कुछ कुकर्म किया है उसकी वजह से मुझे बाबाओं से काफी अरुची है। पर उन्हें जब सुना तो लगा कि ये जनता के बाबा है। उनकी बातों ने मुझपर गहरा असर किया। मैं उसी असर में उनसे मिलने गयी और कहा बाबा आपको सुनकर अच्छा लगा और स्नेह से उनकी तरह हाथ बढ़ाया । अचानक उनके शिष्य ने मुझे धकेल दिया और कहा कि बाबा के शरीर को छुए नहीं। मैं अपमान से भर गयी। मैंने कहा बाबा आप तो अभी प्रकृति  की बात कर रहे थे। प्रकृति की कल्पना हमारे शास्त्रों में भी स्त्री के रुप में की गयी है। क्या स्त्री के छूने से आप अपवित्र हो जायेंगे?  बाबा तैयार नहीं थे कि कोई स्त्री ऐसे सवाल कर सकती है। वे लज्जित हुए और जवाब नहीं दे सके। मुझे लगा कम से कम वे लज्जित तो हुए पर आज भी हमारे देश में औरतें अपवित्र मानी जाती हैं। जो धर्म के ठेकेदार हैं स्त्रियों के मंदिर और मस्जिद जाने पर प्रतिबंध लगाते हैं और बड़ी बेशर्मी से इसके पक्ष में तर्क देते हैं। शनि मंदिर और हाजी अली की दरगाह में औरतों के प्रवेश के बहाने कम से कम इस देश में यह बहस का मुद्दा तो बना ।

दरअसल जब हम धर्म की बात करते हैं तो उसके भीतरी तहों में झांकने की जरुरत होती है। मैं लोगों के जीवन में धर्म के गहरे असर से इंकार नहीं करती । शायद यही वजह है कि मार्क्स  ने  धर्म की व्याख्या करते हुए कहा था कि धर्म हृदयहीन विश्व का हृदय है। अगर धर्म के पास हृदय होता तो दुनिया में धर्म के लिए मर-खप जाने वाली स्त्री के खिलाफ धर्म षड़यंत्र करता हुआ नजर नहीं आता। दुनिया में इतने दुख नहीं होते, इतनी असमानताएं नहीं होतीं, इतनी अनिश्चिताएं नहीं होतीं तो शायद धर्म इतना फलता -फूलता नहीं। इतने लंबे अनुभवों के बाद मैंने यही पाया है कि धर्म स्त्रियों के जीवन में दुख लेकर आता है। धर्म स्त्रियों को अपवित्र समझता है। धर्म स्त्री के शरीर से घृणा करता है। धर्म स्त्री के शरीर पर कब्जा जमाता है। सवाल यह है कि जिस धर्म की रचना पुरुषों ने की उस धर्म में स्त्री के लिए क्यों जगह होगी!  दुनिया का कोई धर्म ऐसा नहीं है जहां स्त्री का दर्जा कमतर नहीं है। स्त्रियां अपने जीवन में धर्म द्वारा किए जा रहे इस विभेद को झेलती रहती हैं।

मुझे याद है बचपन में अक्सर हम सारे भाई, बहन शाम को प्रार्थना करते थे। पर जब मेरी माहवारी होती तो उस दौरान भगवान के घर में हमारा प्रवेश निषेध रहता। मैं अक्सर मां से सवाल करती रहती थी मेरा ये खून अपवित्र क्यों है? जो खून हमारे बदन  से रिसता है, जिसकी वजह से स्त्री को मां का दर्जा मिलता है वही खून समाज के लिए ,धर्म के लिए अपवित्र है। धर्म ने स्त्री के लिए सुचिता जैसे शब्दों का इजाद किया।  उसकी रक्षा के लिए नयी नयी तरकीब निकाले। इतिहास बताता है कि दुनिया में स्त्री पर एकाधिकार के लिए धर्म का सहारा लिया गया। यूरोपीय सामंत घर से बाहर जाने पर अपनी पत्नियों  को कमरपेटिया पहनाते थे। जो लोहे की बनी होती थी। जिसमें आगे-पीछे मल-मूत्र त्यागने के लिए छेद बने रहते थे। दक्षिण भारत में भी इसका रिवाज था। "मरुगुब्ल्लिा" के नाम से लोहे और सोने की कमर पट्टियां बनती थीं। "मरुगुब्ल्लिा" और "सिगुब्ल्लिा" तेलगू शब्द हैं। सिग्गुब्ल्लिा का अर्थ होता है लाज-रक्षक पदक । मरुगुब्ल्लिा का अर्थ है मर्मांगों को छुपाने वाला।  यह सब पातिव्रत्य धर्म के रक्षा के नाम पर होता। आज भी धर्म के नाम पर स्त्री के लिए तरह तरह के बंधन हैं।

मनुस्मृति से लेकर अनेक ग्रथों में इसकी चर्चा है कि स्त्री को क्या करना है और क्या नहीं। धर्म जिस तरह आत्म सम्मोहन में फंसकर  विवेक का ध्वंस करता है उसका सबसे वीभत्स रुप  धर्मिक नरसंहार और साम्प्रदायिक दंगों में देखा जा सकता है। वहां एक पक्ष धर्म के लिए मरता है, दूसरा पक्ष धर्म के लिए मारता है। और जब स्त्री का सवाल हो तो धर्म सबसे वीभत्स रुप में सामने आता है। सती प्रथा से लेकर मंदिरों की दासियों की अनगिनत गाथाएं हमारे पास है। सामंतवादी व्यवस्था में सबसे ज्यादा इसकी शिकार औरतें होतीं रही हैं। धर्म के नाम पर जब मुसलमान औरतों को सार्वजनिक रुप से कोड़े से उघेड़ा जाता है और हिन्दू स्त्री को नंगा कर  घुमाया जाता है या एक स्त्री को डायन, चुडैल कह कर मारा जाता है तो उसके पीछे उसका धर्मिक होना होता है। स्त्री का बलात्कार कर दुश्मन के धर्म से बदला लिया जाता है। मुझे लगता है ऐसे धर्म के साथ रहने से अच्छा है कि स्त्रियां खुद को विधर्मी कहें। या फिर अपने लिए एक नए धर्म  की रचना करें जो सहृदय हो और सभी तरह के विभेदों से मुक्त हों। क्योंकि ये  धर्म स्त्री का धर्म नहीं है। ये धर्म मनुष्यता के साथ खड़ा नहीं है। धर्म के इस चेहरे की रचयिता स्त्री नहीं हो सकती।

(लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता निवेदिता "स्त्रीकाल" के संपादन मंडल की सदस्य हैं)
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टिप्पणियाँ:-

प्रणय कुमार:-
सार्थक विमर्श। धर्म के विरुद्ध जाने की बजाय उसे और मानवीय बनाया जाय|उसके ठेकेदारों और मठाधीशों को बहस की चुनौती दी जाय|उसे बाह्याडंबर से बाहर निकाल आंतरिक शुद्धि और आत्मिक उन्नति का माध्यम बनाया जाय|यह लेख बहुत निष्पक्ष भाव से लिखा गया है|मैं लेखिका के अधिकांश तर्कों और दृष्टांतों से न केवल सहमत भर हूँ,बल्कि चाहता हूँ कि ये स्थितियाँ बदले|इस लेख की सबसे बड़ी विशेषता मुझे यह लगी कि इसमें छद्म धर्मनिरपेक्षता की बू नहीं आ रही है|

मनचन्दा पानी:-
अच्छा विषय उठाया है बहस के लिए। दो विषयों पर अच्छी बहस की जा सकती है एक है धर्म और दूसरा है स्त्री अधिकार। इसमें दोनों हैं तो साथियो को इसपर अपनी बात जरूर रखनी चाहिए।

मैं इनकी कही सभी बातो से सहमत हूँ और रहा हूँ। हालांकि पुरुष के लिए भी धर्म कोई अच्छा काम नहीं करता। करता उन्हें भी लाचार ही है। पर स्त्रियों के साथ यहां ज्यादा भेद किये गए हैं। जो कुछ हमें अपेक्षाएं है कि धर्म से हमें मिलेगा वह सब हम बिना किसी धर्म के मार्ग पर चले भी कर सकते हैं।

अपने घर परिवार और समाज में मैं देखता हूँ कि धर्म का बोझ स्त्रियां ही ज्यादा ढोती हैं। बाबाओं के चक्कर में पड़ती भी स्त्रियां ही हैं ज्यादा। कोई भी साधू बाबा इनके माध्यम से ही पहले अपना विस्तार करता है। व्रत, मंदिर, पूजा, कथा सबकुछ स्त्रियां ज्यादा करती हैं पुरुषों के मुकाबले। और ये जो परहेज बताये गए हैं कि इन दिनों में पूजा नहीं कर सकते इसे स्त्रियां और लड़कियां बिना सवाल किये स्वीकार करती हैं।

पवन शेखावत:-
निवेदिता जी ने उस पहलू को छुआ है जिसे अक्सर बात करने में भी कठिनाई होती रही है लेकिन आज समाज में काफी बदलाव आया है.. आज की पीढ़ी इस रूढिवादिता को सिरे से नकार रही है... मैं आपको बताऊं.. जब हमारे प्रदेश ( पहाड़ी इलाकों में ) में किसी महिला को इस स्थिति से गुजरना पड़ता था तो उसे रहने के लिए घर में जगह नहीं दी जाती थी.. उसे कई दिनों तक पशुशाला में ही समय बिताना होता था.. यह उसके साथ हर महीने होता... लेकिन अब बदलाव काफी आए है लेकिन काफी बुजुर्ग अभी भी उसी ढर्रे में कुंडली मारकर बैठे हुए हैं..

संजीव:-
स्त्री पर तमाम तरह के शारीरिक और मानसिक नियंत्रण के लिए ऐतिहासिक कारण हैं। वैदिक काल से पूर्व जब आर्य जाति भारत आ रही थी तो उसके साथ बहुत कम स्त्रियां थीं। न के बराबर। भारत में आकर यहां के मूल निवासियों से संघर्ष में आर्यों को जब जीत मिलने लगी तो वे विजितों की स्त्रियों को उठाकर अपने इस्तेमाल के लिए रखने लगे पर उनके भाग जाने का खतरा हमेशा बना रहता था इसलिए उन्हें बाडे में बांधकर रखा जाता था। पैर में रस्सी  या लोहे के प्रयोग के बाद सांकल से बांधकर रखा जाता था। इन्हीं बंधनों के प्रतीक पायल चूडी कान छिदवाना नाक छेदना हैं । ये तरीके पशु और स्त्री के साथ समान रूप से आज तक प्रयुक्त होते हैं। क्योंकि पशुधन और स्त्रीधन पराये घरों से लाया जाता था। बाद में जब स्त्रियां आर्यों के प्रति शीरीरिक रूप से अनुकूलित हो गईं तो पुरुष उसकी सृजन शक्ति से डरता रहा । इसलिए उसके मानसिक अनुकूलन के लिए रीति रिवाज और आचार संहिताएं रची गईं। तमाम तरह के प्रतिबंध उसकी यौनिकता पर लगाये गए क्योंकि वह स्त्री की सबसे बडी सृजनात्मक ताकत इसके बल पर वह साम्राज्यों को उलट सकती थी यदि पुत्रों पुत्रियों पर उसका अधिकार रहता। संतान को पिता के नाम से पहचाने जाने की तकनीक ईजाद करना स्त्री की सृजन क्षमता पर नियंत्रण करने का तरीका ही था। स्त्री मुक्ति के संदर्भ में यौनिकता से मुक्ति के आयाम को ग्रहण करने के पीछे यही ऐतिहासिक प्रतिबंध है।

प्रणय कुमार:-
यह लेखक की कपोल-कल्पना अधिक और ऐतिहासिकता कम लगती है|विशेष रूप से उनके साज-सज्जा आदि प्रवृत्तियों को गुलामी का प्रतीक मानना|कहीं गहरे में यह स्त्री से उनके सजने-संवरने के स्वाभाविक अधिकार को छीन लेने की पुरुषवादी मानसिकता का परिचायक है|इतना ही नहीं,वरन् देश के कई हिस्से में पुरुषों के भी कान आदि छिदवाने का चलन है,कड़ा या अन्य आभूषण भी पुरुषों में खूब लोकप्रिय हैं|शायद लेखक इसे ब्राह्मणवाद की उपज बता दें तो ब्राह्मणों में भी अनेक ऐसे संस्कार प्रचलित हैं,कर्णछेदन आदि तो आपने सुना ही होगा|आर्य-अनार्य सिद्धांत पर भी विद्वान एकमत नहीं हैं|यौनिकता से मुक्ति भी कहीं गहरे में दासता की ओर ही ले जाती है|

गीतिका द्विवेदी:-
निवेदिता जी का लेख अंतर्मन को झकझोर देता है।सच में सारे नियम  और बंधन धर्म ने हम स्त्रियों के लिए ही बना रक्खे हैं।परन्तु मैं अपने मित्रों के विचारों से भी सहमत हूँ कि आज स्थिति बहुत बदल गई है।विशेषकर शहरों में स्त्रियाँ नियम और बंधन को मानने के लिए विवश नहीं हैं।धार्मिक मान्यताएँ भी उन्हें रोक नहीं पातीं ।हाँ गाँव की औरतों को आज भी कमोवेश इन बंधनों का शिकार बनना पड़ता है।कई महिलाओं को इन धार्मिक और सामाजिक शिकंजों में जकड़ कर रहना बहुत गौरवान्वित करता है।ये बातें मैं अपने अनुभव के आधार पर कह रही हूँ।

आशीष मेहता:-
निवेदिताजी को साधुवाद, एक गम्भीर यक्ष प्रश्न को उठाने के लिए।

धर्म की विवेचना के लिए तो मैं असमर्थ हूँ। पर इस अभिव्यक्ति (स्त्रीकाल...) में मुख्यतः, दो नकारात्मक पक्ष पर ध्यान जाता है :
१) स्त्री को इन्सान न मानते हुए, वस्तु मानना।
२) स्त्री का अपवित्र होना।

धर्म पर कोई स्वामी व्याख्यान दें या मार्क्स की नजर से देखें, तो चर्चा संगोष्ठी / वाद-विवाद के स्तर पर तो दमदार रहती है। पर, व्यवहारिक तौर पर तो आचरण बतौर (स्त्रीदशा के लिए) स्त्री -पुरुष बराबर के दोषी पाए जाते हैं।

संजीवजी की पोस्ट्स् पर सहमति- असहमति न रखते हुए वर्तमान की भारतीय परिस्थितियों में उपरोक्त दोनों 'नकारात्मक तथ्यों' को मानवीय स्तर पर टटोलें, तो पाएँगे कि शिक्षा/रोज़गार के बढ़ते अवसरों में स्त्रीदशा में सुधार तेज गति से हो रहा है। स्वावलंबन बढ़ रहा है, जो 'आजादी' की धूरी है।

चाहे पशुशाला में रहें, मंदिर में न जा पाए, अपनी रसोई में न जा पाएँ, या फिर निवेदिताजी को मिले धक्के (बाबा के शीष्य से) खाऐं, यह तो फिर भी वो चोटें हैं, जो स्त्रियां घर (या घर सी जगहों) में ही खाती हैं। कभी बाहर की दुनिया देखें, जिसे न धर्म की परवाह (या दरकार) है न किसी विचारधारा की।

स्त्री-पुरुष के स्वभावगत एवं यौनिक अंतरों के बहुआयामी पहलू है। बेशक हर जगह पलड़ा 'पुरूषों' की तरफ झुका है । जरुरत धर्म (आडंबर पढ़ें) से  परे व्यवहारिक धरातल पर विमर्श की है। संजीवजी की 'गहरे अनुकूलन' की बात तार्किक है, पर '१००% वाम' चश्में ने विमर्श की दिशा ही बदल दी है। 'वाम-अवाम' के निरंतर प्रवाह में 'भारत' क्या पाऐगा, क्या खोएगा, पता नहीं, पर संजीवजी के थोड़े नम्बर कम करने का मन हो रहा है। ..... (यह द्वेषरहित है....., तथा नम्बर मिले हैं, इस सकारात्मकता के साथ  है, कोई फैसला सुनाने जैसा लगे, तो मुआफ करें )......

निवेदिताजी का पुन:आभार, "आज के विचार" के लिए।

प्रणय कुमार:-
आशीष जी की बातें तर्कसंगत हैं,इसलिए नहीं कि उन्होंने किसी से सहमति-असहमति प्रकट की है|अपनी-अपनी बात कहने की सबको आज़ादी है,मानने की भी|मैंने जो कहा उसके अन्यार्थ न निकालें|स्त्रीदशा में सुधार तो हुआ है,अभी और होने की जरूरत है|वाज़िब सवाल 'वाम-अवाम' के बहस में वर्गीय हितों के साथ देश के हितों का भी ध्यान रखा जाय तो खांटी वामपंथी होने में भी मुझे कोई गुरेज़ नहीं|

संजीव:-
वस्तु मानने का अर्थ उसके साथ पशुओं की तरह व्यवहार करना है और अपवित्रता का संबंध यौनिकता से है या स्त्रीत्व की वस्तुता से। दोनों ही प्रश्न उसके साथ परायेपन का बोध कराते हैं । जो चीजें हजारों सालों से निरन्तर चली आ रही हैं उनके कारण हमें इतिहास की परिस्थितियों में ही खोजना होंगे। सजने संवरने की संकल्पना उनके साथ किए जाने वाले पशुवत व्यवहार को उनकी सहमति हासिल करने के लिए की विकसित की गई। जरा सोचें जब सोना चांदी नहीं था तब स्त्री नाक कान गले में क्या पहनती होगी? और वे किस बात के लिए पहनाए जाते होंगे? हाथ में चूड़ियां उसके निरन्तर मौजूदगी का बोध कराती हैं बजती रहती हैं, पायल भी आवाज करती हैं ताकि उसके भागने की सूचना मिल सके। ये प्रतीक हैं। आज ये प्रतीक उसके सौन्दर्य से जोड दिए गए। ये अधिकार नहीं बंधन है जिससे उसे वस्तु की तरह इस्तेमाल किया जाता है  । इस सजने संवरने के कारण स्त्री की चेतना को उलझाए रखा जाता है स्वयं अपनी देह की सजावट तक ताकि वह पुरुषों की दुनिया से दूर रहे घर के काम या आफिस के काम के अलावा जो समय मिले उसे सजने संवरने में गंवा दे। बाहर की दुनिया और उसकी वास्तविक दशा के संबंध में सोचने का वक्त न मिले।
मेरे आस पास जितनी पढी लिखी स्त्रियां हैं उनमें से अधिकांश अपना समय सजने संवरने में, या उसकी तैयारी में व्यतीत करती हैं। वे रचनात्मक या सामाजिक कामों से बचती हैं बहाना ये कि समय नहीं मिलता। मेरे कहना यह नहीं कि अच्छे से नहीं रहना चाहिए। पर इसे इतना ग्लेमराइज किया जाता है कि दीगर काम जो वे कर सकतीं हैं, नहीं कर पातीं। ये स्त्रियों पर इलजाम नहीं है उन पर थोपी गई मानसिकता है जो पुरुष ने अपने स्वार्थ में अंजाम दी है। जो स्त्रियां शारीरिक मेहनत करतीं हैं वे सजने संवरने पर कम ध्यान देती हैं। निराला की वह तोडती पत्थर, प्रेमचन्द की धनिया, छिन्नमस्ता की प्रिया क्यों अच्छी लगती हैं?
मेरा कोई विरोध सजने संवरने से नहीं है। मैं तो उसके पीछे निहित तर्क की बात कर रहा हूं। पूँजीवाद के आर्थिक शोषण का बहुत बडा भाग प्रसाधन उद्योग से ही आता है। स्त्रियां जिस षड्यंत्र की शिकार हैं उसे वे अपना हक मानतीं हैं। मेरी बात इस पर केन्द्रित है। एक प्रोफेसर स्त्री एक तीन सौ रुपये की किताब एक साल में एक भी नहीं खरीदती है और 500 रु का फेसियल हर सप्ताह कराती है। मैं इस मानसिक स्थिति की बात कर रहा हूं।

प्रणय कुमार:-
सभ्यता की विकास-यात्रा में कुछ बातें स्वाभाविक रूप से शामिल होती हैं|साज-शृंगार,आभूषण-अलंकार मनुष्य की स्वयं को सुंदर तरीके से अभिव्यक्त करने का प्रतीक है न कि वर्ग-संघर्ष की उपज|इस तर्क के अनुसार कल को यह भी कहा जाएगा कि वस्त्र धारण करना भी गुलामी का प्रतीक है|वनफूलों और जूड़े आदि से स्वयं को सजाने की वृत्ति आज भी गाँव-देहात में देखी जा सकती है

संजीव:-
तर्क और तथ्य तो बिखरे पडे हैं किताबों और प्रकृति में।विचार ही उन्हें जीवन देते हैं। बिना " वाद "के कोई संवाद होता नहीं। वाद के बिना प्रतिवाद कैसे होगा और बिना प्रतिवाद के निष्कर्ष एकांगी होगा। क्या हम ऐसा निष्कर्ष चाहते हैं तो समूह की आवश्यकता ही नही  है।

वनिता बाजपेयी:-
मैं अपनी बात करूँ तो में प्रोफेसर भी हूँ और पढ़ती भी हूँ फेशियल नहीं । महीने में कम से कम 3 हजार की किताबें खरीदती हूँ । वैसे सजने सवरने को बुरा नहीं मानती चाहे स्त्री हो या पुरुष परन्तु स्त्री को केवल सजने के पर्याय के रूप में नहीं देखना चाहती और इसके लिये में कोशिश भी करती हूँ

निवेदिता:-
Darsal Sanjiv ka ishara us tarf hai jab  istree ke liye sare niyam dusre banate hai...samaj ne istree ki yek chavi gadhi hai..wo chavi bajar bhunata hai .  yek had tak wah dabab banaya hai ki aap kis tarh dikhe..yah sanyog nahi hai ki gorepan ke liye samaj Mara ja raha hai.  Fair and lovely ka bajar kya hai..istree ko apni chavi khud gadhni hogi

संजीव:-
‘स्त्री मुक्ति’ के विमर्ष का स्वरूप
‘स्त्री विमर्ष’ या ‘स्त्रीवाद’ उत्तर आधुनिक वैचारिक परिदृष्य का एक महत्वपूर्ण आयाम है। हिन्दी साहित्य में इसका उदय लगभग 1960 के बाद माना जाता है। स्त्री मुक्ति का संघर्ष तो पंडिता रमाबाई ने आरंभ कर दिया था और उसके भी पहले कष्मीरी कवयित्री लल्लद्येद और हब्बाखातून, दक्षिण की आण्डाल और पष्मिच की मीरा ने आरंभ कर दिया था, परन्तु ‘स्त्री विमर्ष’ एक तकनीकी अर्थ में 1960 के आसपास उदित हुआ माना जाता है। स्त्री विमर्ष स्त्री को स्त्रीत्व के रूप में अपनी पहचान प्राप्त करने का विमर्ष है। स्त्री को एक गुमनाम इकाई के रूप में जाना जाता है जिसकी कोई स्वंतत्र अस्मिता नहीं थी और न बिना पुरुष संदर्भ के कोई अस्तित्व था। स्त्री विमर्ष इसी अस्मिता और स्वतंत्र अस्तित्व को प्राप्त करने का विमर्ष कहा जा सकता है। इस अर्थ में स्त्री विमर्ष का स्वरूप ‘स्त्री मुक्ति’ के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।
यहाँ ‘मुक्ति’ शब्द परंपरागत अर्थ में प्रयुक्त नहीं है। ‘मुक्ति’ एक ऐसे संदर्भ से मुक्ति जिसके तहत स्त्री को परिभाषित किया जाता था, यहाँ मुक्ति एक ठोस और वस्तुगत कार्यवाही है, जो स्त्रियों को स्वयं अपने संकल्प और साहस के साथ अंजाम देनी है। मुक्ति कोई धार्मिक कर्मकांड नहीं जो पुरोहितीय पद्धति से आषीर्वाद स्वरूप मिल जाये। यह एक क्रांतिकारी आचरण है जो आलोचनात्मक चिंतन और दूसरे के अस्तित्व को खंडित नहीं होने देकर भी किया जा सकता है। मुक्ति एक ऐसे ‘आचरण’ से मुक्ति है जो स्त्रियाँ करती थीं पर जो उनके अपने संकल्प और निर्णय का परिणाम न होकर दूसरांे के द्वारा संकल्पित और निर्णीत हुआ करता था। ‘मुक्ति’ कर्म से नहीं कर्म के पीछे के चिंतन से है, उस दबाव से है जो उन्हें हांकता था पषुओं की तरह। यह एक शब्द ‘मुक्ति’ नई दुनिया और नये संदर्भों को रचे जाने के लिए किया गया महाभारत है। एक ऐसी दुनिया जिसमें किसी की अस्मिता और अस्तित्व को न तो जुंए में दांव पर लगाया जायेगा और न चोटी पकड़कर भरी सभा में बेआबरू किया जायेगा। यह दुनिया और यह सभा सिर्फ ताकतवरों और अंधों की नहीं होगी। इसमें सब बराबरी से एक दूसरे के बजूद को स्वीकार करेंगे और सम्मान करेंगे सबका सब। ऐसी दुनिया के सृजन के लिए महाभारत से कम संघर्ष का तो सवाल ही नहीं उठता है। अतः मुक्ति एक सकारात्मक आचरण है, एक ऐसा चिंतन है जो ‘प्रत्येक स्वयं’ के द्वारा ‘प्रत्येक दूसरों’ के साथ किया जायेगा और सब सामूहिक रूप से इसे अंजाम देंगे अपनी अपनी अस्मिता और गरिमा के साथ। मुक्ति एक नई महाभारत की इबारत लिखे और अंजाम हो सबके लिए सबकी स्वतंत्रता।
दरअसल स्त्री जो निरंतर दूसरों के सोचे गए को आचरित करती रही है, उसे ‘स्वतंत्रता से भय’ (इस पदबंध का प्रयोग पाओलो फ्रेरे ने अपने ‘उत्पीड़ितों के षिक्षा शास्त्र’ में जिस अर्थ में किया है उसी अर्थ और संदर्भ में यहाँ इसका प्रयोग किया गया है) लगने लगा है। उसे इस ‘स्वतंत्रता के भय’ से मुक्त होना है। यह एक ऐसा भय है जो स्त्री जाति के रक्त में संस्कारों की तरह बह रहा है। स्वतंत्रता के भय से मुक्त होने में खतरे तो बहुत हैं, पर खतरों से खेलने के बाद जो मुक्ति युक्त आचरण होगा, कर्म होगा, वही असली जीवन होगा। स्वतंत्र, निर्भय, स्वयं निर्णीत, साहस और आत्मसम्मान, आत्मगौरवपूर्ण आचरण। ऐसा आचरण जो ‘उपलब्धि के इस क्षण’ के पहले कभी नहीं ‘जिया गया’ था। ‘एक अब तक न आचरित किया गया आचरण’ जिसे जीने के लिए लाखों स्त्रियाँ कोषिष करती रहीं पर उन्हें ऐसा नहीं करने दिया गया और उन्हें आत्मबलिदान देना पड़ा। जोखिम उठाये बिना उपलब्ध जीवन उपहार हो सकता है और उपहारों और कृपा से प्राप्त जीवन (स्वतंत्रता उपहार में नहीं मिलती, संघर्ष में विजयी होने पर मिलती है। उसे पाने का प्रयास लगातार और जिम्मेदारी के साथ करना पड़ता है। स्वतंत्रता कोई ऐसा आदर्ष नहीं है, जो मनुष्य के बाहर स्थित हो।’’ (पाओलो फ्रेरे, उत्पीडितों का षिक्षा शास्त्र, गंथ षिल्पी पृ. 10) में और पशु के समान जीवन में कोई अन्तर नहीं होता। पषु अपने निर्णय स्वयं नहीं लेता, वह अपने जीवन का रूपांतर नहीं कर सकता, वह अपने जीवन के लिए स्वयं उत्तरदायी नहीं होता, विष्व उसके लिए प्रदत्त आवास है जिसमें बिना किसी रूपांतर के उसे जीना है। वह सिर्फ अपने वर्तमान में जीता है, उसके लिए भूत और भविष्यकाल नहीं होता। वह एक अनैतिहासिक प्राणी होता है। यदि स्त्री बिना स्वयं के बारे में निर्णय लिए जी रही है और उसका अपने प्रति कोई उत्तर दायित्वपूर्ण अनुभव नहीं है तो वह अपनी दुनिया स्वयं रचने के लिए संकल्पबद्ध नहीं हो सकती और उसके लिए स्त्री मुक्ति का कोई अर्थ नहीं है, जैसा पषुओं के लिए बाड़े में बंद रहना या खुले जंगल में रहने का कोई विषेष अर्थ नहीं होता क्योंकि वह प्रदत्त भौतिक परिस्थितियों को बदलने के बारे में सोच नहीं सकता, निर्णय नहीं कर सकता और न रूपांतरण के लिए कर्म कर सकता है।
‘स्त्री विमर्ष’ स्त्री मुक्ति के लिए किया गया चिंतनपूर्ण कर्म होना चाहिए। एक उत्तरदायित्व पूर्ण आचरण जिसमें विष्व के रूपांतरण के लिए प्रतिबद्धता हो। यदि सिर्फ विमर्ष के लिए विमर्ष होगा और जैसा कि अक्सर हो रहा है तो यह पदबंध (स्त्री विमर्ष) अपनी प्रामाणिकता खो देगा वह एक सक्रियतावाद में बदल जायेगा। एक ऐसा विमर्ष जो सिर्फ विमर्ष के लिए किया जा रहा है। इसमें वास्तविक रूपांतरण के लिए किये जाने वाले कर्म का नितांत अभाव होगा। यथार्थ का रूपांतरण बिना ‘अयथार्थपूर्ण वास्तविकता’ की भर्त्सना के संभव नहीं होता, परन्तु यह भर्त्सना एक क्रांतिकारी कर्म में तब्दील होनी चाहिए।
अब तक न परखी गई संभावनाओं को परखने का सुख जीवन का अनमोल क्षण होता है। सदा ही दूसरों द्वारा तय किये गए रास्तों पर चलते रहना, दूसरों द्वारा बताई गई दिषा में एक निष्चित गति से चलते रहना, जानवरों की तरह चलने में कोई फर्क नहीं होता। जानवर भी कभी-कभी अपनी मन मर्जी के रास्ते पर चल पड़ता है। भले ही इसके लिए उसे मालिक द्वारा डंडे खाने पड़ें। कभी जब वह बहुत तंग आ जाता है ‘खूंटे से’ तो तोड़ देता है अपना सारा बल लगा कर एक बारगी तो उसे, भले ही पुनः मालिक द्वारा बांध दिया जाये उसी खूंटे से। मगर ‘अन परखी संभावनाओं’ को परखने का मजा कभी कभार तो चख ही लेना चाहिए। मुक्ति का प्रयास भी यदि नहीं होगा, स्वप्न में भी यदि ‘स्वतंत्रता के भय’ से मुक्त नहीं होंगे तो कैसे मिलेगी मुक्ति?
मुक्ति एक विमर्ष है, मुक्ति एक आचरण है जो हम अपने लिए नहीं दूसरों की मुक्ति के लिए सबके साथ दुनिया पर करेंगे, क्योंकि दूसरों के मुक्त हुए बिना हम प्रमाणिक रूप से मुक्त नहीं हो सकते। हमारे इस आचरण से संबंधों का नया संसार बनेगा, अब तक के संबंध अधिकारी और अधीनस्थ के थे, अब जो संबंध होंगे वे ‘सबके साथ सबके’ साहचर्य के संबंध होंगे। कोई किसी का मािलक और कोई दास नहीं होगा। संबंधों का यह नया स्वरूप मुक्ति के इस आचरण में निहित है।
पाओलो फ्रेरे ने लिखा है - ‘‘इस प्रकार मुक्ति एक प्रसव है और यह प्रसव पीड़ादायक है। इससे जो मनुष्य पैदा होता है, एक नया मनुष्य होता है, जिसका जीवित रहना तभी संभव है जब उत्पीड़क-उत्पीड़ित के अन्तर्विरोध के स्थान पर सभी मनुष्यों का मानुषीकरण हो जाये। अथवा दूसरी तरह से कहें तो, इस अंतर्विरोध का समाधान उसी प्रसूति में जन्म लेता है, जिसमें नया मनुष्य पैदा होता है-ऐसा मनुष्य, जो न तो उत्पीडक है न उत्पीड़ित बल्कि जो स्वतंत्रता प्राप्त करने की प्रक्रिया में है। वही पृ. 12)
‘मुक्ति’ एक ऐतिहासिक मनुष्य का संपूर्ण मनुष्य जाति के प्रति किया गया आचरण है। यदि ‘स्त्री मुक्ति’ पदबंध को इस संदर्भ में व्याख्यायित किया जाये तो स्त्री को अपने आपको एक ऐतिहासिक मनुष्य मानना होगा। एक ऐसा मनुष्य जो अपनी दुनिया को बदलने के लिए चिंतन कर सकता है और अपना जीवन अपने हाथ में ले सकता है। पूर्व की स्त्रियों के जीवन से प्रेरित हो सकता है और उनकी कमजोरियों से सबक सीख सकता है। अपने आचरण के प्रति स्वयं उत्तरदायी अनुभव कर सकता है और सबके प्रति अपने दायित्व को अनुभव कर सकता है। वर्तमान भौतिक परिस्थितियों में जीना ऐतिहासिक प्राणी का का काम नहीं है, ऐतिहासिक प्राणी का दायित्व भौतिक विष्व को अधिक मानवीय बनाने के लिए रूपांतरित करना है। अतः ‘मुक्ति’ का संदर्भ स्वयं को परिस्थितियों से मुक्त कर लेना नहीं है जैसा कि धर्म कहता है, बल्कि परिस्थितियों को अधिक मानवीय बनाने वाला आचरण है। मनुष्येतर प्राणी परिस्थितियों के दास होते हैं क्योंकि वे परिस्थितियों को बदलने के संबंध में सोच नहीं सकते चिंतन नहीं कर सकते और बदलने के लिए आचरण नहीं कर सकते इसलिए वे अनैतिहासिक प्राणी होते हैं। मनुष्य और ‘स्त्री मनुष्य’ यदि इसी तरह का अनैतिहासिक आचरण करे तो ‘स्त्री मुक्ति’ शब्द अपनी तमाम ऊर्जा को जड़ता में बदल चुका होगा। इसके लिए निर्मला पुतुल की एक कविता की ये पंक्तियाँ विचारबिन्दु बन सकती हैं - ‘‘मैं चाहती हूँ /आँख रहते अंधे बने आदमी की/आँख बने मेरे शब्द/उनकी जुवान बनें/ जो जुवान रहते गूंगे बनें  देख रहें हैं तमाषा।’’ स्त्री का आचरण ठीक इसी तरह का है आँख रहते अँधे बने आदमी की तरह का है। उसे अपने इसी आचरण से मुक्त होना है। स्त्री मुक्ति का सदंर्भ यही है। इस संदर्भ को स्त्री को स्वयं आचरित करना है। जब तक स्त्री इसका निर्णय स्वयं नहीं करेगी, स्वयं नहीं सोचेगी, तब तक उसकी दुनिया का रूपांतरण नहीं होगा। दुनिया को निरंतर पुनर्सृजित करने की क्षमता रखने वाली सृजनक्षम प्राणी होने के नाते उसे अपनी दुनिया को पुनः रचने का निर्णय करने का साहस और संकल्प लेना ही होगा। कोई देवता या पुरुष या भाग्य और नियति उसकी दुनिया को नहीं बदल सकती और यदि बदलेगी भी तो वह ‘स्त्री मुक्ति’ नहीं होगी बल्कि एक नये तरह की दासता होगी जो कुछ समय तक मुक्ति का भ्रम पैदा करेगी।
इतिहास में प्रायः ऐसा होता रहा है कि ‘मुक्ति का भ्रम’ भर पैदा किया गया और कई पीढ़ियाँ इस भ्रम को ही सच्ची ‘मुक्ति’ मानकर जीवन को खत्म करती गईं। आज की भूमंडलीकृत स्त्री का एक दायित्व यह भी है कि वह इस तरह के भ्रमों को अपने बौद्धिक चिंतन पूर्ण आचरण से तोड़े। उनकी संरचना के चक्रव्यूह को तिनके-तिनके बिखेर दे ताकि ‘वे लोग’ जो ‘स्त्री की मुक्ति’ से डरते हैं और उसे दासत्व की अवस्था में ही कैद रखने के लिए धर्म और संस्कृति के भ्रम को फैलाते हैं, इस तरह के आचरण को बदलने के लिए तैयार हो जायें और स्वयं भी मुक्त हो सकें अपने अमानवीय कर्म से और एक बेहतर मानवीय जीवन की संरचना में संलग्न हों। ‘सबकी मुक्ति में ही स्वयं की मुक्ति है’ यह पदबंध पुरुष पर भी उतना ही लागू होता है जितना स्त्री पर। पुरुष भ्रम में है कि वह तो मुक्त है और उसने अपने घर के बाड़े में एक ‘मादा’ को दास बना रखा है। दास जितना मालिक पर निर्भर नहीं होता उससे अधिक निर्भर मालिक दासों पर होता है। दास यदि मालिक के प्रति उसकी दुनिया को बदलने के लिए किया जाने वाला ‘कर्म’ करना बंद कर दें, स्वयं की मौत की शर्त पर तो मालिक दास के मरने से पहले मृत हो जायेगा। पुरुष जिस भ्रम में जी रहा है वह सिर्फ ‘स्त्री की मुक्ति’ का डर है। यह डर की यदि स्त्री मुक्त हो गई तो उसकी दुनिया समाप्त हो जायेगी। उसकी पूरी व्यवस्था और समाज संरचना विखर जायेगी। ऐसे में उसका अस्तित्व भी समाप्त हो जायेगा। यदि स्त्री अपने मुक्त और दायित्वपूर्ण आचरण से इस भ्रम का निवारण कर दे तो दुनिया बहुत खूबसूरत हो जायेगी। सब ‘स्वतंत्रता के भय’ से मुक्त होकर स्वतंत्र आचरण करेंगे जिसमें किसी दूसरे की स्वतंत्रता का हनन नहीं होगा।
‘सत्ता संरचना’ दूसरों के ‘स्वतंत्रता के भय’ पर आधारित होती है। सत्ताधारी वर्ग निरंतर इस बात का प्रयास करता है कि उसके अधीनस्थ वर्गों के अन्दर निरंतर यह भय बना रहे की यदि वे स्वतंत्र हुए तो उनका अस्तित्व ही समाप्त हो जायेगा। ‘स्वतंत्रता के भय’ को यथास्थिति बनाये रखने के सुरक्षा कवच में छिपाकर प्रस्तुत किया जाता है ताकि जब यथास्थिति के टूटने का समय आये तो ऐसा लगे कि स्वतंत्रता ही खंडित हो रही है। सत्ता संरचना की यही ताकत है जो उसे निरंतर बनाये रखने में सहायक होती है। मुक्ति का विमर्ष चाहे वह स्त्री मुक्ति का हो या सबकी मुक्ति का विमर्ष सत्ता संरचना के इसी विमर्ष को तोड़ने के स्वरूप को धारित करने वाला होना चाहिए। सत्ता विमर्ष ‘मुक्ति’, स्वतंत्रता और आजादी जैसे शब्दों की ताकत को विस्फोटक होने से रोकने के लिए निरंतर इनका प्रयोग इनके वास्तविक संदर्भों से काटकर करता है ताकि लोग इनके वास्तविक रूपांतरणकारी अर्थों को भूलते जायें। ‘स्त्री मुक्ति’ के संदर्भ में हमेषा से यही होता रहा है और परिणामस्वरूप वह पराधीनता की यथास्थिति को ही मुक्ति की स्थिति मानकर जीती रही है। उसके लिए ‘मुक्ति’ एक खोखला और पोपला शब्द है जिसके लिजलिजेपन से वह घृणा करती है। निरंतर की भोगी जाती रही यथास्थिति ने स्त्री चेतना के अस्तित्व और अस्मिताबोध को अपने से अलग कर दिया। उसने अपने अस्तित्वगत अनुभव को हमेषा ही उत्पीड़क व्यवस्था के साथ अनुभव किया। अपनी ‘अस्मिता’ को पितृवर्चस्वी संस्कृति के प्रवाह में ही ‘जिया’ इसलिए वह उत्पीड़क को अपने अंदर सुरक्षाबोध के रूप में अनुभव करती रही। स्त्री चेतना को अपनी उत्पीड़क परिस्थितियों और व्यवस्था को अपने से बाहर अनुभव करना, उनके बिना अपने अस्तित्व को जीना, ‘अपने होने’ को पहचानने की प्रक्रिया पर चिंतन करना उनकी मुक्ति के वास्तविक अनुभव को यथार्थ में तब्दील करने की परिस्थितियों को निर्मित करने की दिषा में उठाया गया कदम होगा। इस अनुभव से वह मुक्त नहीं होगी पर मुक्ति की राह को अन्वेषित कर सकेगी।
परिस्थितियाँ खुद व खुद कभी नहीं बदलती और न स्वयं बदली हुई परिस्थितियों और व्यवस्थाओं से स्त्री मुक्त हो सकती। मुक्ति की अनिवार्य शर्त है कि जिसे मुक्त होना है, उसे स्वयं अपने चिंतन और आलोचनात्मक क्रांतिकारी आचरण से परिस्थितियांे और व्यवस्थाओं को बदलना होगा। इसके बरक्स जो कुछ भी प्रयास दूसरों के द्वारा किये जाते रहे हैं वे सिर्फ और सिर्फ भाग्यवादी नियतत्ववाद को स्थापित करते रहे हैं। यही कारण है कि स्त्री हजारों लाखों स्त्रियों के बलिदान के बावजूद मुक्त नहीं हो सकी। संपूर्ण स्त्री जाति को मुक्ति के प्रति षिक्षित होना होगा। किसी एक स्त्री चाह वह झलकारी बाई हो या पंडिता रमाबाइ के प्रयास उसे तो मुक्ति का अनुभव करा सकते हैं, पर दूसरों को नहीं। मुक्ति एक निरंतर की जाने वाली प्रक्रिया है। एक स्थायी मूल्य या परिस्थिति नहीं है जिसे भारत की आजादी की तरह एक बार पंद्रह अगस्त 1947 को पा लिया गया तो हम आजाद हो गए हों। क्या आज हम स्वयं को स्वतंत्रता के भय से मुक्त अनुभव करते हैं? क्यों बार-बार हमें लगता है कि हम ठगे गए? आजादी एक प्रक्रिया है जिसे पाने और जीने का निरंतर संघर्ष करना पड़ता है। हमने उसे स्थायी जड़ता में बदल दिया इसलिए ही हम स्वयं को ठगे गए सा अनुभव करते हैं। मुक्ति का आंदोलन 15 अगस्त 1947 को समाप्त नहीं हो जाना चाहिए था, वह वास्तविक मुक्ति के आंदोलन में रूपांतरित होकर निरंतर चलते रहना चाहिए था, यदि ऐसा संभव होता तो आज हम भारतीय मनुष्य भ्रष्टाचार और स्वार्थ की अंधी दौड़ में शामिल नहीं होते।
‘स्त्री मुक्ति’ को कर्मकांड की तरह विमर्षित नहीं करना चाहिए। उसे अपने अस्तित्व के संघर्ष की तरह पाने का प्रयत्न करना होगा। इसके लिए अनुकूल परिस्थितियों का इंतजार करने का समय नहीं है। इसी निरंतर बदसूरत होती जा रही दुनिया मंे, इन्हीं संकटों और अमानवीय होती जा रही व्यवस्थाओं के बीच प्रत्येक स्त्री को संकल्पबद्ध करने का विमर्ष पैदा करना होगा। यह विमर्ष कुछ तथाकथित मुक्त अनुभव करने वाली स्त्रियों के द्वारा शेष उप्तपीड़ित स्त्रियों के लिए किया जाने वाला उपकार नहीं होना चाहिए। जो ‘कुछ स्त्रियाँ’ यदि इस भ्रम को जी रहीं हैं कि वे तो मुक्त हो चुकीं अब उन्हें दूसरी स्त्रियांे को मुक्त करना है, तो वे स्वयं को ही धोखा दे रहीं हैं। कोई एक इकाई अलग से स्वतंत्र नहीं हो सकती। उसका अस्तित्व उसके संपूर्ण वर्ग के साथ नाभिनालबद्ध है। सबके मुक्त हुए बिना एक व्यक्ति मुक्त नहीं हो सकता। मुक्ति का भ्रम पाल सकता है और गफलत में जी सकता है। ‘दूसरों के अस्तित्व के बिना मेरा अस्तित्व नहीं हो सकता’ पाओलो फ्रेरे का यह मुक्तिदायक वाक्य इस तरह आगे बढ़ाया जा सकता है कि सबके मुक्त हुए बिना मैं मुक्त नहीं हो सकता। मुक्ति अकेले अनुभव की जाने वाली कुल्फी नहीं है जिसे जिसने खाया उसने अनुभव किया। यह एक सामूहिक आचरण है, सामूहिक अनुभव है, सामूहिक प्रक्रिया है - ‘‘वस्तुपरक परिस्थितियों में जन्म लेने वाली क्रांति उत्पीड़नकारी स्थिति को बदलकर उसके स्थान पर ऐसे मनुष्यों के समाज का शुभारंभ करती है, जो निरंतर मुक्ति की प्रक्रिया में होते है।’’ और भी ‘‘क्रांति की प्रक्रिया गतिषील होती और इस निरंतर जारी रहने वाली प्रक्रिया में ही अर्थात् क्रांतिकारी नेताओं के साथ जनता के आचरण में ही, जनता और नेता दोनों संवाद करना तथा सत्ता का उपयोग करना सीखेंगे।’’ (वही, पाओलो फ्रेरे, पृ.94)
स्वतंत्रता की वास्तविक प्राप्ति के लिए जिस क्रांतिकारी आचरण की आवष्यकता है वह स्वतंत्र कर्म से ही संभव है। ‘स्वतंत्रता का भय’ और ‘स्वतंत्र कर्म’ दो परस्पर विरोधी स्थितियाँ हैं। जो स्वतंत्रता के भय में जीता है वह स्वतंत्र कर्म नहीं कर सकता। उसका सब कुछ दूसरों के द्वारा निर्देषित होता है, दूसरों के द्वारा आदेषित होता है, इस दूसरों द्वारा विचारित और निर्देषित कर्म में कर्म करने वाला उस दूसरे के लिए ही आचरण कर रहा होता है। अतः वह दूसरों के विष्व का उनके हित में रूपांतरण कर रहा होता है। यही दासता की स्थिति है। स्वतंत्र कर्म में वह स्वचिंतित, स्वविचारित, स्वप्रेरित, स्वनिर्देषित कर्म का आचरण कर रहा होता है अतः वह स्वयं के विष्व का रूपांतरण कर रहा होता है -‘‘स्वतंत्र कर्म वही हो सकता है, जिसके द्वारा एक मनुष्य अपने विष्व को और स्वयं को बदलता है।....स्वतंत्रता की एक सकारात्मक शर्त है आवष्यकता की सीमाओं का ज्ञान, मानवीय सृजनात्मक संभावनाओं का बोध।.....एक स्वतंत्र समाज के लिए किया जाने वाला संघर्ष तब तक स्वतंत्र समाज के लिए किया जाने वाला संघर्ष नहीं है, जब तक उसके जरिए उत्तरोत्तर अधिक वैयक्तिक स्वतंत्रता का सृजन न होता हो।’’(वही, पृ.95) इस तरह स्वतंत्र कर्म मुक्ति के अनुभव की प्रक्रिया है जो न केवल स्वयं को मुक्त करती है बल्कि दूसरे सब को भी मुक्त करती है। स्वतंत्र कर्म के लिए स्वतंत्र समय का होना भी अनिवार्य शर्त है। यदि दासता की स्थिति में स्त्री का संपूर्ण समय दूसरों के आदेषपालन और उनके द्वारा प्रदत्त कर्मों के करने में व्यतीत हो रहा होगा तो वह अपनी मुक्ति के लिए स्वतंत्र समय का उपभोग करने की स्थिति में ही नहीं होगी। पितृसत्ता जिस वर्चस्व की तकनीक का उपयोग करती है, उसमें वह स्त्री को ‘स्वतंत्र समय’ नहीं देती। ऐसा कोई समय उसके पास नहीं होता जिसमें वह अपनी मुक्ति के संबंध में सोच सके, चिंतन कर सके और तदनुसार कर्म करने के लिए प्रेरित हो सके।
वर्चस्वी विचारधारा ने उत्पीड़कों को सोचने का समय प्रदान किया है जिसमें वे अधीनस्थ को निरंतर अधीनस्थ बनाये रखने की प्रक्रिया के बारे में सोच सकते हैं। क्योंकि उनके स्वयं के लिए किये जाने वाले कर्म अधीनस्थ लोग करते हैं और वे अपने स्वतंत्र समय और स्थान का उपयोग उन्हें उत्पीड़ित बनाये रखने की तरकीबें सोचने में लगाते हैं। स्त्री को निरंतर उत्पीड़ित की स्थिति में बनाये रखने के लिए पितृसत्ता में जिन मूल्यों की सांस्कृतिक परंपरा की संरचना की ही उनका गहन विष्लेषण यह सिद्ध कर देगा कि उसके पीछे एक मात्र उद्देष्य है कि वह सोचने का अवसर न पाये, दूसरी स्थिति यह है कि उसके पास स्वयं के बारे में स्वयं के लिए, अपनी दुनिया को रचने के बारे में सोचने लायक स्वतंत्र चिंतन की मानसिक स्थिति ही न हो। उत्पीड़क हमेषा यह सोचता है कि उत्पीड़ित सोचे नहीं। मुक्तिदायी चिंतन बिना दूसरों के साथ नहीं हो सकता, परन्तु दासत्व का बनाये रखने का चिंतन दूसरों के बिना हो सकता है -‘‘प्रभुत्वषाली अभिजन जनता के बिना सोच सकते हैं-और सोचते हैं - गोकि वे जनता के बारे में न सोचने की विलासिता की इजाजत स्वयं को नहीं दे सकते, क्योंकि अधिक कुषलतापूर्वक शासन करने के लिए जनता को बेहरत ढंग से जानना उनके लिए जरूरी होता है। नतीजतन, जनता और अभिजनों के बीच दिखाई पड़ने वाला संवाद या संप्रेषण वास्तव में उन ‘विज्ञप्तियों’ को जनता में ‘जमा करना’ है, जिनकी अंतर्वस्तु जनता को पालतू बनाने वाला प्रभाव उत्पन्न करने के इरादे से तैयार की जाती है।’’(वही, पृ.90) स्त्री को पालतू बनाने के लिए पितृसत्ता निरंतर सोचती है और उसके समय को फालतु की कार्यवाहियांे, उन पर की गई मक्कार किस्म की प्रषंसाओं से भरने का प्रयास करती है ताकि वह स्वयं की दुनिया बदलने संबंध में कतई न सोच सके। इसमें सबसे फालतू की कार्यवाही है जो आज की आधुनिक स्त्री का सबसे अधिक समय ‘लील’ जाती है, उसके अन्दर अपने ‘अच्छे दिखने की ललक’ पैदा करना। यह एक ऐसा धारदार हथियार पितृसत्ता के हाथ लगा है जिसके कई फायदे वह उठा रही है और स्त्री सदियों के लिए उसके जाल में फँस चुकी है, गोकि इसके कारण वह अपनी वास्तविक अच्छाई और वास्तविक सौंदर्य के संबंध में सोचने के लिए भी समय नहीं निकाल सकती है। स्त्री को ही क्यों अच्छा दिखना चाहिए? इस प्रष्न पर सोचने की आवष्यकता भी पैदा नहीं होने देता यह सौन्दर्य विमर्ष। पुरुष की कामुकता की कामना को पूरा करने के लिए। पुरुष के सौन्दर्य और प्रसाधन उद्योग से अकूत मुनाफा कमाने के लिए। उस उद्योग का विज्ञापन कर भोली-भाली मध्यवर्ग और निम्नवर्ग की स्त्रियों में भी अच्छे दिखने की ललक पैदा करके उन्हें भी एक वस्तु में सुन्दर चीज में बदलने के लिए। ‘तू चीज बड़ी है मस्त-मस्त’ गाना जब पड़ी लिखी आधुनिक स्त्रियाँ मजे लेकर गाती और सुनती हैं तो तरस आता है उनके मनुष्य होने पर। उनकी चेतना की कुंठित और जड़ हो चुकी अवस्था पर। एक जीती जागती इकाई को ‘चीज’ में बदल दिया गया और वही चीज में बदली इकाई उसे चटकारे लेकर इंजॉय कर रही है। पितृसत्ता की सफलता और स्त्री जाति की असफलता ही इस बात में है कि स्त्री ने स्वयं को ‘चीज’ या वस्तु या माल के रूप में स्वीकार कर लिया है। जब तब स्त्री स्वयं को मनुष्य के रूप में स्वीकार नहीं करेगी मुक्ति का संघर्ष आरंभ करने के संबंध में अपनी और अपनी संपूर्ण जाति की दुनिया बदलने में, नये सिरे से दुनिया को रचने के संबंध में सोचने की प्रक्रिया भी आरंभ नहीं होगी -‘‘उत्पीड़ितों के सर्वनाष का कारण ही यह है कि उनकी स्थिति ने उन्हें मनुष्यों से चीजों में बदलकर रख दिया है। अपनी मनुष्यता को पुनः प्राप्त करने लिए आवष्यक है कि वे चीजें न बने रहें बल्कि मनुष्यों की तरह लडें़। यह एक आमूल-परिवर्तनवादी आवष्यकता है। वे ऐसा नहीं कर सकते कि चीजों के रूप में अपना संघर्ष शुरू करें और सोचें कि मनुष्य बाद में बन जायेंगे।’’(वही पृ.30) स्त्री का चीजों में बदलना स्वयं स्त्री ने स्वीकार कर लिया है क्योंकि वह इसके खिलाफ आवाज नहीं उइा रही है। स्त्री के प्रति हो रहे अन्याय के खिलाफ कभी कभार कुछ प्रतिक्रिया दिख जाती है, परन्तु बलात्कार की मानसिकता का मूल उत्स ही स्त्री का चीज में रूपांतरण हो जाना है और चूँकि चीजें प्रतिक्रिया नहीं करती हैं, बदले की कार्यवाही नहीं करतीं हैं, इसलिए पेपर नेपकीन की तरह अपनी गंदगी पोंछ कर उसे कचरेदान में फेंक दिए जाने की मानसिकता निरंतर बलात्कार और अमानवीय हिंसा को जन्म दे रही है और कहीं भी कोई आंदोलनात्मक कार्यवाही स्त्रियों की ओर से सामूहिक तौर पर नहीं चलाई जाती है। कोई आवाज नहीं उठती है स्त्री के वस्तुकरण के खिलाफ। उसे निरंतर वस्तु में बदलते जाने की विज्ञापनीय प्रवृत्तियों की ओर कोई ‘इंकार’ का एक शब्द दिगंतों में नहीं गूँजता है कि बस बहुत हुआ अब नहीं सहन होगा यह। एक ‘इंकार’ ‘बस एक इंकार’ समस्त स्त्री जाति की ओर हर गाँव और नगर और घर से उठना चाहिए। यह ‘एक इंकार’ बबंडर की तरह सारे आकाष में गुँजायमान ‘हो’ और ‘होता रहे’ तब तक जब तक वस्तुकरण की सारी तकनीकें ध्वस्त न कर दी जायें, सारी मानसिकता को समुद्र के नीचे दफन न कर दिया जाये।
यह स्त्री को सोचना है कि उसे स्वयं को वस्तु में तब्दील होने देना है या नहीं। सोचने का अर्थ है उस पर आचरण करना और आचरण क्या सिर्फ एक ‘न’ ही तो कहना है, यह ‘न’ अपनी पूरी नकारात्मक क्षमता से सामूहिकरूप से जब उच्चरित होगा तो तमाम दुनिया का स्वरूप रूपांतरित हो जायेगा। यह ‘न’ नगाड़े की तरह बजना चाहिए लोगों के दिमाग में और जिसे सुनकर लोग सड़कों पर निकल आयें। ‘मै चाहती हूँ कि मेरे शब्द नगाड़े की तरह बजें/ जिसे सुनकर लोग निकल पडें़ अपने घरों से/सड़कों पर।’’ (निर्मला पुतुल, ‘नगाडे की तरह बजते शब्द’ ) दुनिया निहायत खूबसूरत है, बस उसे खूबसूरत देखने की उम्मीद जगाना है। यह ‘उम्मीद’ ही है जो एक जिंदा मुहावरा है। जिसके सहारे हम अपने परिवेष को रूपांतरित कर सकते हैं।
स्त्री की चेतना का वस्तुकरण किस हद तक हो चुका है यह उसे महसूस ही नहीं होता। कभी महसूस करने की कोषिष भी नहीं करती। स्त्रियाँ ऐसा इसलिए नहीं कर पातीं क्योंकि पितृसत्ता ने उनके प्रति होने वाले अमानवीय और नृषंस अपराधों को एक ‘व्यक्तिगत घटना’ के रूप में प्रस्तुत करके वर्गीय चेतना को विच्छिन्न कर दिया है। विघटित अन्तरात्मा अपने से बाहर निकलकर अपनी चेतना का विस्तार कर ही नहीं पाती। यही कारण है कि निरंतर छोटी-छोटी बच्चियों और विवाहिता स्त्रियों के साथ सामूहिक बलात्कार और अंगभंग तथा हत्या की घटनायें महज एक ‘न्यूज’ बनकर न्यूज पेपर की तरह दूसरे ही पल बासी हो जाती हैं। हमारी व्यक्तिगत सुख, व्यक्तिगत संपत्ति और व्यक्तिगत सुविधाओं की अनुभवगत संवेदनायें अन्ततः इन निरंतर बरती जाने वाली क्रूरताओं को भी ‘व्यक्तिगत क्षण’ मानकर सुख भोग की तरह विस्मृत कर जातीं हैं। पितृसत्ता के इस वर्गीय चेतना से विच्छिन्न और विघटित अन्तरात्मा को सचेतन अन्तरात्मा में बदलने की प्रक्रिया का नाम ‘स्त्री की मुक्ति का विमर्ष’ है।
जब तक समस्त स्त्री जाति किसी के प्रति कहीं भी होने वाले अपराधों को स्वयं पर घटित और स्वयं पर घटित होने के अनुभव से विचलित और विक्षोभित होकर उसकी भर्त्सना नहीं करेंगी तब तक इस तरह का वस्तुकरण और क्रूरतायें निरंतर बढ़ती रहेंगी। सच्चे अनुभव से जनित भर्त्सना विष्व को रूपांतरित करने की दिषा में उठा हुआ एक सार्थक कदम होगा। बिना सत्य का अनुभव किये असत्य की भर्त्सना संभव नहीं है। सत्य को निजी अनुभव की तरह जीना होगा तभी उसके खिलाफ होने वाले अपराधों और अवमाननाओं की मुखालफत की जा सकेगी। वर्चस्वी सत्ता विमर्ष अपने अधीनस्थ जनता को चाहे वे मजदूर हों, उपनिवेषित लोग हों या स्त्री हो को कभी भी एक उत्पीड़ित की चेतना से युक्त अनुभव नहीं करने देते। वे हमेषा उन्हें व्यक्तिगत इकाईयों में विभाजित करके लाभ-लोभ-भय के चक्रव्यूह में उलझाये रहते हैं। यह एक ऐसी तकनीक है जिसके कारण उत्पीड़ित उत्पीड़न का जातीय अनुभव नहीं कर पाते और उसके खिलाफ सामूहिक विरोध की चेतना से अनुप्राणित नहीं हो पाते। ‘स्त्री मुक्ति’ का सबसे बड़ा अन्तर्विरोध ही यह है कि वह एक व्यक्तिगत इकाई या चीज में बदल दी गई है उसे ‘स्त्रीय चेतना’ अनुप्राणित नहीं होने दिया जाता है। स्त्री को स्त्री की इस व्यक्तिगतता से मुक्ति पानी है और स्वयं को एक वर्गीय चेतना से अनुप्राणित होने की आवष्यकता है। यही वह स्थिति है जब स्त्री मुक्ति का संघर्ष सही दिषा में आरंभ हो सकेगा।
स्त्री चेतना को अपने अंदर बैठे पितृसत्ता के द्वारा ‘प्रदत्त स्वरूप’ से भी मुक्त होने की प्रक्रिया आरंभ करनी होगी। स्त्री की परिभाषा में जिन तत्वों को समाहित किया जाता है उनमें वह स्वयं को या तो पितृसत्ता के रूप में देखने लगती है या उसके द्वारा परिभाषित विनम्र, सुकोमल, मृदुभाषी, सुन्दर, दयालु, परिवार के प्रति निष्ठावान, बच्चो को पालने वाली माँ, समपर्णषील, विरोध न करने वाली, सहनषील, चुपचाप रहकर आज्ञा मानने वाली, करुणामयी,  इत्यादि। आज की आधुनिक स्त्री में हमें इन दोनों रूपों का अजीव घालमेल देखने को मिलता है। एक ओर वह पुरुषों की तरह रहन-सहन अपना रही है तो दूसरी और वह स्वयं को परंपरागत रूप में दिखाने को भी बेचेन है। दरअसल इसके पीछे पितृसत्ता की वर्चस्वी विचारधारा है जिसमें वह अपने वास्तविक स्वरूप को कभी नहीं समझ पाती और न उसके अनुरूप आचरण कर पाती है। पितृसत्ता के चस्मे से स्वयं को देखने और दिखाने की आदत उसके संस्कारों में और खून में समागई है। सुन्दरता और सहजता सहगामी होनी चाहिए। कृत्रिम रूप से सुन्दर दिखने की प्रवृत्ति विषुद्व सामंतीय और स्त्रीत्व विरोधी है। कृत्रिमता ने क्रूरता को जन्म दिया है। अपनी ही स्वाभाविक दैहिक स्थिति को हिंसक तरीकों से क्रूरता के साथ पुरुष को अच्छी लगे ऐसा दिखने के लिए विकृत किया जाता है जिसे कॉस्मेटिक सर्जरी कहा जाता है। स्त्री निरंतर अपनी छवि को जो है उससे ‘अच्छा’ (दूसरों की नजरों में कामुक) दिखाने का प्रयास करती है, दरअसल वह अपनी स्वाभाविक सौन्दर्य को विकृत कर रही होती है। मगर इस तरह सोचने का न तो उसके पास वक्त है न दिषा है। वह तो बस दूसरों के सौंदर्य के हंटर से हांकी जा रही है और अच्छा दिखने की होड़ में पागल है। यह विकृति हिंसा है अपने प्रति स्वयं के द्वारा की गई हिंसा। कैसे मुक्त होगी स्त्री अपने प्रति की गई इस हिंसा से? इस स्थिति को बदलने के लिए उसकी शैक्षिक स्थिति की दिषा बदलने की आवष्यकता है। उसे मानवीय स्वभाव और उसकी गरिमा की वास्तविक परिभाषा समझने की आवष्यकता है। स्वयं को एक मानवीय इकाई जानना और मानना और तद्नुसार आचरण करने की आवष्यकता है।
स्त्री की संपूर्ण चेतना दूसरों के द्वारा निर्देषित है, इस अकाट्य सत्य को किसी तथाकथित पढ़ी-लिखी अंग्रेजी में बोलने वाली, कम्प्यूटर पर काम करने वाली, आधुनिक दिखने वाली स्त्री से कही जायेगी तो वह कहने वाले पर हंसेगी। उसे इस बात पर तनिक भी विष्वास नहीं होगा की उसके बारे में जो कुछ कहा जा रहा है वह पूर्णतः सत्य है। यह इस कारण नहीं होगा क्योंकि जो कहा जा रहा है वह वास्तव में ‘पूर्ण सत्य है’ कि उसकी चेतना पूर्णतः पितृसत्ता द्वारा निर्देषित है। पराधीनता की चरम अवस्था यही होती है कि अधीनस्थ व्यक्ति या वर्ग उस अधीनस्थ अवस्था को ही अपना स्वरूप मान ले। इसे आसान शब्दों में कहें तो शेर पिंजड़े को ही अपना प्राकृतिक आवास मान ले तो वह पिंजड़ा खुलने पर भी भागेगा नहीं। स्त्री की चेतना इसी तरह की पराधीनता की स्थिति में पहुँच चुकी है। सुन्दर दिखने वाले कपड़े, गहने, मेकअप, सेंडिल, हेयर स्टाइल, फेसियल, आई ब्रो, दंत पंक्ति, होंठ, नाखून इत्यादि देह के इतने टुकड़े कर दिये गए कि अपनी देह के प्रति एक समग्र चेतना-संवेदना का होना असंभव हो गया। यह तमाम टुकड़े दैहिक चेतना को विघटित करने के लिए ही किये गए हैं। एकाग्रता और अखंडित चेतना ही अपने उत्पीड़न के खिलाफ जाग्रत हो सकती है विघटित और खंड़-खंड़ चेतना सिर्फ गुलामों की तरह का आचरण कर सकती है। स्त्री एक ऐसी मानसिक गुलामी की स्थिति में है जिसमें से निकलने के लिए उसे सदियों तक संघर्ष करना पड़ेगा।
स्त्री चेतना एक मानवीय इकाई है और उसमें किसी भी अतिवादी स्वरूप की स्थिति नहीं है। एक स्वाभाविक मानवीय चेतना समस्त अच्छाइयों और बुराइयों के साथ सहज में उसमें निहित हैं। वैषिष्ट्यीकरण उसे अलग दिखने अलग रहने और अपने ही वर्गीय साथियों के प्रति विद्वेषी और क्रूरतापूर्ण व्यवहार करने की ओर प्रवृत करता है। पितृसत्ता ने आरंभ से ही स्त्री को कई विषिष्ट केटेगिरी में विभाजित कर रखा है। इसका चरम निदर्षन देवी, सती, और राक्षसी या चुडैल के रूप मंे देखा जा सकता है। एक ओर यदि स्त्री ने स्वयं को देवी की विषिष्टता का पद स्वीकार कर लिया तो दूसरी ओर आप राक्षसी, चुडैल के विषिष्टीकरण से इंकार नहीं कर सकते। इसके बीच में जो अन्य स्त्रियाँ होती हैं वे देवी की प्रषंसा-पूजा और राक्षसी या चुडैल की निंदा करने में स्वयं को अपनी स्थिति से विच्छिन्न कर लेती हैं। पितृसत्ता यही तो चाहती थी कि यह पूरा वर्ग अपनी वर्गीय स्थिति से च्यूत हो जाये और इसमें स्वयं अपने ही वर्ग के प्रति प्रषंसा और हिंसा का भाव पैदा हो। ऐसा ही हुआ। सती के मिथक या विरूपीकरण ने लाखों स्त्रियों को पतिता के निम्नीकृत अभिषाप से उत्पीड़ित कर दिया। सती या देवी अंगुलियों पर गिनी जा सकती हैं, परन्तु पतिता के अभिषाप से उत्पीड़ितों का कोई इतिहास नहीं बन पाया और इस प्रवृत्ति ने उनके प्रति सच्चाई जानने की किसी तकनीक को आविष्कृत नहीं होने दिया। सच्चाई जब जानी ही नहीं गई तो उनके प्रति संवदेनषीलता या सहवेदना का पैदा होना और उनके पक्ष में संघर्ष करना स्वयं में एक अपराध घोषित कर दिया गया। पितृसत्ता ने अपनी वर्चस्वी विचारधारा और प्रभावषीलता के कारण कुछ चंद स्त्रियों को अपने समकक्ष दिखाने का भ्रम पैदा किया और शेष स्त्रियों में उनके प्रति ललक पैदा की। इस ललक के कारण भी स्त्री अपने वास्तविक स्वरूप से विच्छिन्न होती रही। आज भी कुछ स्त्रियों को ‘मुक्त’ दिखाकर एक उन्मुक्तता का भ्रम पैदा किया जाता है। इस काम में मीडिया सबसे अधिक प्रतिगामी भूमिका निभाता है। पूँजीवादी पितृसत्ता का स्वार्थ है कि स्त्रियाँ स्वयं को ‘मुक्त’ नहीं ‘उन्मुक्त’ महसूस करें। यह उन्मुक्तता उनमें उन्माद पैदा करती है और उन्मादी व्यक्ति अपने स्वरूप को समझने में उस पर चिंतन करने के लिए पंगु हो जाता है। आज का विज्ञापन जगत मध्यवर्गीय स्त्रियों में एक उन्माद की हद तक उन्मुक्तता की ललक पैदा कर चुका है। तमाम तरह की विकृतियाँ और विरोध की चेतना का अभाव इस उन्मादपूर्ण स्वरूप के धारण कर लेने के कारण ही है। यह पितृसत्ता के द्वारा स्त्री की चेतना में अपने स्वरूप की प्रतिष्ठा करना है। अब स्त्री दो चरम स्थितियों में जीती हुई दिखाई जाती है। पूर्ण स्वतंत्रता का उपभोग करती हुई या निरंतर परंपराओं का निर्वाह करती हुई। ये दोनों रूप अलग-अलग स्त्रियों के नहीं है। एक ही स्त्री दोनों तरह की स्थितियों को जीती हुई आपको सीरियलों में दिख जायेगी।
स्त्री की यह अपने स्वरूप से विच्छिन्न होने की स्थिति ही है जो उसे उत्पीड़न के वास्तविक रूपांे के प्रति जागरूक नहीं होने देती। बलात्कार अबोध बालिकाओं, ग्रामीण लड़कियों और शहरी आधुनिक युवतियों के साथ समान रूप से हो रहे हैं, परन्तु उनके खिलाफ प्रतिरोध सिर्फ कैंडिल जला कर प्रदर्षन करना नहीं हो सकता। कारपोरेट जगत से जुड़ी पढ़ी लिखी अच्छा पैकेज पाने वाली लड़कियाँ उन बलात्कृत लड़कियों से संवेदना के स्तर पर कितना जुड़ पाती हैं? उनकी वेदना के प्रति सहवेदना का अनुभव कर पाती हैं कभी? शायद नहीं। उसे व्यक्तिगत दुर्घटना की तरह देख-सुन कर अपने शानदार ऑफिसों में कम्प्यूटरों पर काम करती रहती हैं। अपनी बहन के साथ हुए इसी तरह के बलात्कार के बाद भी क्या वे इसी तरह व्यस्त रह सकती हैं? शायद नहीं। यही कारण है कि उनमें बहनापे का सहजात बोध नहीं है। स्त्री अपने को एक उत्पीड़ित वर्ग नहीं मानती यद्यपि उत्पीड़ित सब हैं किसी न किसी रूप में। दूसरी ओर उत्पीड़ित स्त्री भी यह मानती है कि यह एक व्यक्तिगत घटना है। उसे ऐसा लगता है उसके साथ जिन लोगों ने बलात्कार किया है वे व्यक्तिगत रूप से सजा के पात्र हैं। यदि कुछ प्रतिरोध के स्वर दिखाई भी देते हैं तो सिर्फ उस एक व्यक्ति को सजा दिलवाने की हद तक। सवाल उस मनोवृत्ति का होना चाहिए जिसके कारण स्त्री के प्रति इस तरह के अपराध करने को बोध पैदा होता है। बलात्कार एक सामाजिक अपराध है। हमारी सामाजिक संरचना में स्त्री के प्रति जो वस्तुकरण, चीज या माल होने का बोध पैदा किया गया है वह इन अपराधों को करने की मानसिकता पैदा करता है और आचरण करने के लिए उकसाता है। इस वैचारिक स्थिति के खिलाफ लगातार संघर्ष करना आवष्यक है। यह संघर्ष स्त्री को ही करना होगा।
स्त्री मुक्ति का अर्थ स्त्री का पुरुषीकरण होना या पुरुष के स्वरूप को ग्रहण करते जाना नहीं होना चाहिए। स्त्री मुक्ति का अर्थ है उसका मानुषीकरण होना। वस्तुकरण से सजीवितीकरण होना। ‘खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी’ यह मर्दाना होना स्त्री का विरूपीकरण है। आज पूरा तंत्र यही कर रहा है और स्त्रियाँ भी इसे स्वीकार कर रही हैं। सत्ता में शामिल होते ही वे पुरुष स्वरूप को धारण कर लेती हैं। सत्ता की संरचना का स्त्रीकरण या मानवीयकरण करने के बजाय वे स्वयं को कायान्तरित कर लेती हैं। सत्ता का स्वरूप चाहे वह धार्मिक सत्ता हो, सामाजिक सत्ता हो, राजनैतिक या सांस्कृतिक सत्ता हो, पितृसत्तात्मक ही है। उसके इस स्वरूप को मानुषीकृत करना होगा। पितृसत्तात्मकता को ही अब तक मनुष्य का स्वरूप माना जाता रहा है और स्त्रियों को उसमें समाहित मानने पर जोर दिया जाता है। यह संपूर्ण मानवीय स्थितियों का पुरुषीकरण करना है और ऐसा किया गया है। स्त्री मुक्ति के संघर्ष में तमाम तरह की संरचनाओं के इस पितृसत्तात्मक स्वरूप को बदलकर संपूर्ण मानवीयकृत बनाना होगा जिसमें स्त्री और पुरुष दोनों की समान स्थिति होगी अपने अपने स्वरूप के साथ कोई किसी के स्वरूप को धारण करने के लिए विवष नहीं किया जायेगा कोई किसी के स्वरूप को बदलने के लिए मजबूर नहीं किया जायेगा। सब अपने अस्तित्वगत अनुभवों के साथ अपनी अस्मिता की पहचान के साथ सामूहिक मानवीय दायित्वों का वहन करेंगे। यह एक अनपरखी संभावना है जिसे परखने का अवसर तो मिलना ही चाहिए।
                                                डॉ. संजीव कुमार जैन
                                                सहायक प्राध्यापक हिन्दी
                                  शासकीय संजय गाँधी स्मृति स्नात्कोत्तर महाविद्यालय,
                                           गंज बासौदा (म.प्र.)  मो. 09826458553






























मानसिक गुलामी बरक्स वैचारिक अपंगता
स्त्री मुक्ति का संपूर्ण विमर्ष पूँजीवादी पितृसत्तात्मक वैचारिक परिदृष्य के बीच उसकी अपनी शर्तों और नियमों के अनुसार चलाया जा रहा है। विमर्ष के इस खेल का सबसे मजेदार पहलू है कि इसमें खेलने वालों में जो स्त्रियाँ हैं वे स्वयं को खेल से बाहर समझती हैं परन्तु खेल वे ही खेलती हैं, जो पुरुष प्रतिभागी हैं वे भी वास्तविक खेल से स्वयं को अलग अनुभव करते हैं, पर खेल वे भी खेल रह हैं। इस खेल का जो उद्देष्य है या जो लक्ष्य समूह है वह इस खेल के किसी भी आयाम से जुड़ा हुआ नहीं है। उसे तो संभवतः पता ही नहीं है कि उसकी मुक्ति के लिए कोई विमर्ष का खेल चल रहा है और बड़े जोर शोर से चल रहा है।
खेल का मैदान, खेल के नियम, खेल के औजार, खिलाने वाले रैफरी, निर्णय करने वाले और प्रायोजित करने वाले सब पितृसत्तात्मक पूँजीवादी व्यवस्था के बड़े खिलाड़ी हैं, वे जानते हैं कि इस मैदान में उतरने वाले खिलाड़ी कितनी वैचारिक उछल-कूद मचा लें, इसकी सीमाओं से बाहर नहीं जा सकते और बाहर जो इनके समर्थक टाइप के कुछ लोग हैं वे इसके अंदर नहीं आ सकते। ये सिर्फ जोर आजमाइष कर सकते हैं, परिवर्तन करने लायक ऊर्जा इनके पास नहीं है।

[10:34AM, 3/20/2016] फ़रहत अली खान:-: लेख में स्त्री अधिकारों की बात की गयी। मैं इस बात से सहमत हूँ कि स्त्रियों को उनके अधिकार मिलने चाहिए।
लेकिन पूरी तरह से एकतरफ़ा लेख है ये।
किसी धर्म को जानने के लिए उसके ग्रंथों को पढ़ना ज़रूरी है, अगर केवल उस धर्म के मानने वालों का व्यवहार देखकर ही आप धर्म के बारे कोई राय बनाते हैं तो यक़ीनन आप (जानबूझकर या अंजाने में) बहुत बड़ी ग़लती कर रहे हैं, और ये भी एक प्रकार का अन्याय ही है।
दरअसल पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर किसी के भी बारे में कोई नाक़िस राय बना लेना, अन्याय ही है।

मार्क्स के क़ौल कि धर्म हृदयहीन विश्व का हृदय है, से मैं पूर्णतः असहमत हूँ।
हृदय से जुड़े तमाम पैरामीटर्स मसलन मानवता, न्याय, करुणा, प्रेम आदि की व्याख्या धर्म करता है और इनको अहमियत देता है।
इसके बजाए ये कहा जा सकता है कि 'विज्ञान' हृदयहीन विश्व का हृदय है, क्यूँकि विज्ञान अभी तक इन पैरामीटर्स की न तो पुख़्ता व्याख्या कर पाया है और न ही इनकी एहमियत के बारे में कुछ साबित कर पाया है।
इसलिए मेरा मानना है कि अगर हमें स्त्री अधिकारों की वकालत करनी है तो इसके लिए हमें धार्मिक तथ्यों का ही सहारा लेना पड़ेगा, वैज्ञानिक तथ्य यहाँ हमारी कोई मदद नहीं कर पाएँगे।
[10:45AM, 3/20/2016] आर्ची:-: फरहत जी से सहमत हूँ, जो कुछ समाज में धर्म के नाम पर गलत होता है, उसके मूल में धर्म की गलत व्याख्या और अपने स्वार्थ के लिए गलत उपयोग शामिल हैं. धर्म का मूल उद्देश्य सामाजिक संगठन को बनाए रखना होता है, कुछ प्रावधान जो सामाजिक और सार्वजनिक हित पूर्ति के लिए बनाए गए हों कालांतर में धीरे धीरे विकृत भी हो जाते हैं,जिनकी बेशक पुनर्समीक्षा की जानी चाहिए परंतु विधर्मी होना बिलकुल जरूरी नहीं है
[2:16PM, 3/20/2016] संजीव:-: स्त्री पर तमाम तरह के शारीरिक और मानसिक नियंत्रण के लिए ऐतिहासिक कारण हैं। वैदिक काल से पूर्व जब आर्य जाति भारत आ रही थी तो उसके साथ बहुत कम स्त्रियां थीं। न के बराबर। भारत में आकर यहां के मूल निवासियों से संघर्ष में आर्यों को जब जीत मिलने लगी तो वे विजितों की स्त्रियों को उठाकर अपने इस्तेमाल के लिए रखने लगे पर उनके भाग जाने का खतरा हमेशा बना रहता था इसलिए उन्हें बाडे में बांधकर रखा जाता था। पैर में रस्सी  या लोहे के प्रयोग के बाद सांकल से बांधकर रखा जाता था। इन्हीं बंधनों के प्रतीक पायल चूडी कान छिदवाना नाक छेदना हैं । ये तरीके पशु और स्त्री के साथ समान रूप से आज तक प्रयुक्त होते हैं। क्योंकि पशुधन और स्त्रीधन पराये घरों से लाया जाता था। बाद में जब स्त्रियां आर्यों के प्रति शीरीरिक रूप से अनुकूलित हो गईं तो पुरुष उसकी सृजन शक्ति से डरता रहा । इसलिए उसके मानसिक अनुकूलन के लिए रीति रिवाज और आचार संहिताएं रची गईं। तमाम तरह के प्रतिबंध उसकी यौनिकता पर लगाये गए क्योंकि वह स्त्री की सबसे बडी सृजनात्मक ताकत इसके बल पर वह साम्राज्यों को उलट सकती थी यदि पुत्रों पुत्रियों पर उसका अधिकार रहता। संतान को पिता के नाम से पहचाने जाने की तकनीक ईजाद करना स्त्री की सृजन क्षमता पर नियंत्रण करने का तरीका ही था। स्त्री मुक्ति के संदर्भ में यौनिकता से मुक्ति के आयाम को ग्रहण करने के पीछे यही ऐतिहासिक प्रतिबंध है।

ललिता यादव:-
जिन स्त्रियों को इन दिनों कष्ट होता है। सच में रूटीन लाइफ से छुटकारा चाहती हैं।
एक सर्वे करा लिजिए
कितनी स्त्रियां स्वतंत्रता होने पर भी निज गृह के मंदिर में माहवारी के समय पूजा करती हैं? कुछ दिलचस्प नतीजे आ सकते हैं। मंदिरों में भी कौन चेक कर रहा है ठाठ से चली जाइये��
मुझे लगता है पूजा के लिए इतना बबाला क्यों?
और कितना कुछ है करने और स्वयं को सिद्ध करने के लिए।

राहुल सिंह:-
स्त्री-मुक्ति विमर्ष पर बहुत कम ही ऐसी सत्य पूर्ण और बेबाक टिप्पणी लेख सामने आते है।
खुद स्त्री सामाजिक जकड़-पकड़ नाते रिश्तों में इस तरह उलझा दी गई है की उसके सहित सारा बुद्धि वादी वर्ग तक, आज उसकी बेबसी को जरुरी बुराई के रूप में यथास्थिति को सही ठहराता  है।
यह वैश्विक प्रश्न है, स्त्री-गुलामी का, और उनकी परिस्थितियां ज्यादा निर्घृण तम हो जाती है, समाज के उस हिस्से में, जो वर्ग-वर्ण-रंग-भेद के निचले पायदानों पर दबा बैठा है। यहाँ स्त्री कुचल-मसल दी जाने के लिए होती है, क्या कुछ ऊपर स्तर की स्त्रियां इसीमे ख़ुशी मना लें, की वे उस निम्न-जगहों पर नहीं है?

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