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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

कविता : ओमप्रकाश कुर्रे

आज समूह के साथी की कुछ कविताएँ यहाँ प्रस्तुत कर रही हूँ।
आप सभी साथी पढ़कर अपने विचार रखें।

1.     "किसान"

आसों के बरस हर भइगे भईया
नई बरसिस बदरिया अउ नई भरीस तरिया
किशान के आंखी सुखा गे
फेर नई बोहाइस नदिया न नरवा 
आसों के बरस हर भइगे भईया
खेत के धान प्यास म सुखा गे
कोला के रुमझुम गोंदा घलो मुरझा गे
का दुःख ला गोहराववँ संगी 
ये बरस कोठी के चीज घलो नंदा गे
नोनी बाबू ला धार के परदेश जायेके नाैबत आगे
आसों के बरस हर भइगे भईया
दाता मन तहसील तहसील ला सुखा बताये हे 
फेर मुवजा ककरो घर नई आये हे, 
ये दुःख म समारू मर गे सुकालू मर गे 
अब मोर बारी आ गे भईया
छाती ठोक के मैं किशान कहों
अब मोर अकड़ के दिन नाद गे भईया का दुःख ला बताओ बोदलहा
बेटी के गौना के सपना थिरा गे मोरो बहुरिया ये बछर मइके म टंगा गे काला खवाहुं सोंच के संगी अब घेंच ला ओरमए के  नाैबत आ गे
आसों के बरस हर भइगे भईया
   

अनुवाद--- 

इस साल का समय बहुत तकलीफ भरा है
इस साल न बारिश हुई और न ही 
तालाब नदी नालों में पानी भरा है ।
सारे किसान अपनी फसल को लेकर रो रहे हैं
फिर भी भगवान उन पर तरस नही खा रहे हैं ।
खेत में जो फसल थी वो अब प्यास में सूख गई है 
और जो घर में  फुलवारी थी वो सारी भी मुरझा गई। ऐसी स्थिति आ गयी है, कि सारे परिवार के साथ किसान को कमाने व खाने के लिए परदेश जाना पड़ रहा है ।जो सरकार है उसने  तहसील को सूखा घोषित तो कर दिया है ,मगर मुआवजा किसी के घर में नहीं आया है ।
अपने फसल के दुःख में न जाने कितने किसान मर गए है  अभी और कितने किसान बाकी हैं मरने के लिए।
पहले किसान अपनी किसानी पर गर्व करता था ,
पर अब मौसम ने उन्हें बर्बाद कर दिया है ।
किसानी में किसान की अकड़ ख़त्म हो गयी है ।
किसान किससे अपना दुःख कहे कि,उसकी बेटी इस साल अब मइके में ही रहेगी उसका गौना नहीं हो पाया है। उसकी बहू जो अभी अपने मइके है उसे भी वो गरीबी के कारण नहीं ला पाया क्योंकि किसान अपने परिवार को क्या खिलायेगा ये सोच कर परेशान है और सभी समस्या से निजात पाने के लिए वो मरने की सोच रहा है।

                   
2.    "वक़्त-1"

"उस लड़की" का सोच कर
तरस आता है मुझको
जिस पर वक़्त से पहले
जवानी थोप दी गयी
हाथ पीले कर उसके 
बचपन क़ैद कर दिया गया
 परिस्थिति की पीड़ा झेल
सम्हाल न पाई ख़ुद 
मगर जिम्मेदारियां संभाल रही है 
खेल न पाई वो गुड़ियों से 
अब अपने बच्चे खिला रही है 
हौसले बढ़ा कर 
भूल कर हर ख्वाब
झेल कर हर चोट को 
सारे दुखों को ले साथ 
जी रही किस्मत की लकीरों को 
"उस लड़की" का सोच कर 
तरस आता है मुझको 
जिस पर वक़्त से पहले 
जवानी थोप दी गयी! 
                           
3.     "वक़्त -2"

अस्सी साल का वो बुज़ुुर्ग
चिल्ला रहा था पथ पर 
कहता था लो.... 
सत्तर साल का
इतिहास पूछ लो मुझसे 
लो इतिहास पूछ लो मुझसे! 
कह रहा था 
वो चीख -चीख कर 
पहले भी कानून थे 
आज भी कानून हैं 
पहले भी नेता थे 
आज भी नेता हैं 
पहले भी जनता दुखी थी 
आज भी जनता दुखी है
पूछ रहा था ,वक़्त में क्या बदला है
और  बता भी रहा था कि वक़्त ने क्या- क्या बदला! 

रचनाकार परिचय:-
नाम-ओम प्रकाश कुर्रे
पिता-श्री सुखी राम कुर्रे
पता-बलौदा  जिला-जांजगीर चाम्पा
                  राज्य-छत्तीसगढ़

शिक्षा-2 वर्ष
       पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग
गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय बिलासपुर
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टिप्पणियाँ:-

परमेश्वर फुंकवाल:-
देवयानी जी से सहमत। अंतिम कविता कुछ बेहतर है पर और बेहतर हो सकती थी। कविता अंततः कम शब्दों में गहरी बात कहना है। इन विषयों पर बहुत कहा जा चुका है और यदि कुछ लिखा जाए तो नवाचार की अपेक्षा रहती है।

संजना तिवारी:-
विषय चयन और जानकारी अच्छी है , बात कहने की कला में थोड़ी सी और गुंजाइश है ।
रचनाकार में बहुत सम्भावनाएं हैं और सामजिक राजनितिक लिखने का हौसला भी , बस थोड़ा सा और शार्प होना बाकी है
बधाई

सुवर्णा :-
जी.. कथ्य अच्छा लगा थोडा कवित्व और होने की गुंजाइश है। परमेश्वर जी की यह बात कि कविता दरअसल कम शब्दों में गहरी बात की अभिव्यक्ति है। हर रचनाकार के लिए याद रखने योग्य है।

फ़रहत अली खान:-
ओम जी को भविष्य के लिए शुभकामनाएँ। अच्छे लेखकों को पढ़ते रहें और उनकी सोहबत में रहें। तीनों कविताएँ देश के(और ख़ासतौर पर छत्तीसगढ़ के) हालात की अक़्क़ासी करती हैं।

आशीष मेहता:-
कचोटती कविताएँ। वक्त १ एवं २, जहां बचपन एवं बुढ़ापे पर केंद्रित थीं, 'किसान' ने 'बीच का सबकुछ' टटोल लिया। रचनाकार समूह पर साथ हैं, जानकर खुशी हुई। रचनाकार एवं प्रस्तुतकर्ता, दोनों का धन्यवाद।

प्रदीप सिंह :-
प्रिय साथी ओम
सनेह
यह जानकर ख़ुशी हुई कि इस ग्रुप के तुम सबसे कम उम्र के सदस्य हो... तुम्हारी कविताएँ बहुत अच्छी लगी... खासकर वक़्त-1 । तुममें बहुत सम्भावनाएं हैं... लगे रहो... सीखना कभी मत छोड़ना अपने को सदैव विद्यार्थी ही समझना साहित्य ज्ञान का सागर है... हर लेखक इसमें अपनी क्षमता अनुसार सम्भावनाएँ खोजता है... तुम सम्भावनाएं बढ़ाओ पढो खूब पढो।

ओमप्रकाश कुर्रे:-
साथियों,  कल हमने समूह में सबसे युवा साथी ओमप्रकाश कुर्रे जी की रचनाएँ पोस्ट की थीं। आज उनका परिचय व तस्वीर भी आपसे साझा किया है।
  आइये,  देखते हैं,  ओम का अपनी रचना प्रक्रिया के बारे में क्या कहना है --

"जब 7 वीं कक्षा में थे तब से डायरी आदि लिखा करते थे ,और हमारा  शौक़ भी लेखनी के क्षेत्र में ही जाना था मगर 10वीं पास करने के बाद हमारे पिता जी ने जबरदस्ती हमें गणित पढ़ने पर बाध्य किया।  उनका सपना था की हम इंजिनियर बनें लेकिन हम कभी इंजिनियर बनना नहीं चाहते थे। 
जैसे तैसे हमने 12वीं की परीक्षा 2014 ने पास की
फिर पापा जी ने दबाव पूर्ण ढंग से हमें फिर से इंजीनियरिंग क्षेत्र में डालना चाहा लेकिन हमने मना कर दिया और इस कार्य में हमारी माता जी ने पूरी सहायता की। 
हमने अकेले ही हमारे सपने की पढाई में आने की ठानी और पत्रकारिता विभाग में दाखिल ले लिया पर मेरे पिता जी को ये बिलकुल पसंद नही आया था 
वो कई बार  मना किये कि पत्रकारिता में भविष्य  नही है तेरा।
लेकिन मैंने अपनी मर्जी से इस क्षेत्र को चुना। 
जब मैंने पत्रकारिता के लिए इंट्रेंस एग्जाम दिया तब अपने ज़िले से अकेला सिलेक्ट हुआ था और जब मैंने 1 सेमेस्टर पास किया और जब घर गया तब पापा के दोस्तों से ने मेरा रिजल्ट पूछा तो मैंने बता 78 प्रतिशत तो उन्होंने ने मुझे नहीं पापा जी को बधाई दी।

और पता नहीं उस वक़्त क्या हुआ, मेरे पिता जी के आँख से आँसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। वो भी पेशे से एक शिक्षक हैं।

लिखने का शौक़ तो पहले से ही है लेकिन बाकि काम के बाद लिखने ले लिए ज़्यादा समय नहीं बच पाता है
और मैं टीवी एंकर बनाना चाहता हूँ।

मुझे पता है मेरे शब्द ज़्यादा भारी  हैं लेकिन थोड़ा सा मन के भाव को शब्दों में उकेरने में कोशिश करता हूँ।

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