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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

लेख : अस्मिता क्या और क्यों : प्रफुल्ल कोलख्यान

जैसा कि आप सब जानते हैं कि रविवार को बिजूका में कोई साहित्यिक पोस्ट नहीं लगाई जाती है,  यह दिन आपका होता है...  आप कोई सूचना आदि साझा करना चाहें,  तो रविवार को कर सकते हैं। शेष दिनों में हमारी कोशिश रहती है कि उस दिन की पोस्ट पर ही आप टिप्पणी / चर्चा करें। 
      तथापि हमारे खजाने में कुछ पठनीय लेख या बहस के लिए कुछ मुद्दे रहते हैं,  जिन्हें हम रविवार को आपसे साझा कर उन पर खुली चर्चा,  विमर्श आदि का स्वागत करते हैं। 
      आज हम आपके समक्ष समूह के नए साथी और विद्वान समीक्षक प्रफुल्ल कोलख्यान जी का यह विचारोत्तेजक लेख प्रकाशित कर रहे हैं। आशा है आप इसे पढ़कर लाभान्वित होंगे व एक सार्थक विमर्श की ओर अग्रसर होंगे।

          नव-सामाजिक आंदोलनों की खासियत यह है कि ये अस्मिता के सवाल को तो उठाते हैं, लेकिन उसके वर्गीय आधार को नकारते हैं। बल्कि ये अपने को सामाजिक दायरे के नाम पर आर्थिक और राजनीतिक प्रसंग को अपने लिए निषिद्ध ही मानते हैं। ये सामाजिक स्वायतत्ता की बात तो करते हैं, लेकिन इसे राजनीतिक प्रसंग नहीं मानते। आर्थिक प्रसंग नहीं मानते, राजनीतिक प्रसंग नहीं मानते तो फिर बचता क्या है? सांस्कृतिक आधार! सांस्कृतिक आधार के मतलब धर्मीय, जातिवादी, पारंपरिक और नस्लीय आधार आदि! यानी पहचान के पूर्व आधुनिक या आधुनिकता विरोधी आधार! कहना न होगा कि अस्मिता की तीव्र आकांक्षा के एभँवर में व्यक्तियों और समुदायों को फेंककर उसे गलत दिशा में बहा ले जाने के लिए बचाव-रस्सी फेंकती है उनिभू की विभिन्न प्रक्रियाएँ और उसकी सांस्कृतिक चेतना की उत्तर आधुनिक परियोजनाएँ और उन्हें गलत घाट पर किनारे लगाती हैं।

अस्मिता क्या और क्यों

-- प्रफुल्ल कोलख्यान

ओ पृथ्वी, लौटा दो मुझे अपने ख़ालिस तोहफ़े,
खामोशी की वे मीनारें जो उठी थीं
अपनी जड़ों की महानता से :
जाना चाहता हूँ वह बनने जो मैं नहीं हूँ,
वापस जाकर उतनी गहराई से सीखने
चाहे तमाम प्राकृतिक चीजों के बीच
मैं जी सकूँ या न जी सकूँ : कोई बात नहीं
एक और पत्थर होना, वह काला पत्थर
वह ख़ालिस पत्थर जिसे ले जाती है नदी अपने साथ।1

                   - - पाब्लो नेरूदा

चारो तरफ कोलाहल बढ़ रहा है। बढ़ते हुए कोलाहल से आक्रांत संवेदनशील मन अपनी जड़ों की महानता से उठी खामोशी की मीनारों को पृथ्वी से खालिस तोहफे के रूप में माँगता है। मन जाना चाहता है वह बनने जो नहीं है, वह! सभ्यता विकास के विभिन्न चरणों पर व्यक्ति और समुदाय के जीवन में इस तरह के दौर आते ही रहते हैं, जब अपनेपन और परायेपन की नई-नई और कई-कई परिधियाँ खींचनी पड़ती है। आज पूरी दुनिया में आत्मीयकरण और अनात्मीयकरण की प्रक्रिया तेज हो रही है। इस प्रक्रिया में ‘जड़ों’ और ‘पहचानों’ के प्रसंग नये सिरे से महत्त्वपूर्ण हुए हैं। इस प्रसंग में सजाई जा रही ‘रणभूमि’ में ‘मातृभूमि’ और ‘कर्मभूमि’ को ‘पितृभूमि’ और ‘पूण्यभूमि’ से विस्थापित करने की कसरत जारी है। ‘पहचान’ और ‘अस्मिता’ के बारे में आम धारणा यह है कि इसका अनिवार्य संबंध सामाजिक असुरक्षा के भावबोध से होता है। सामाजिक असुरक्षा का सबसे अधिक भय समाज के हाशिए पर होता है। स्वभावत: ‘पहचान’ और ‘अस्मिता’ की तीखी आवाज भी समाज के हाशिए से ही उठती है। चूँकि ये आवाज हाशिए से उठती है इसलिए समाज की मुख्य-धारा से इसका संबंध नहीं होता है, बौद्धिक एवं अकादेमिक स्तर पर चाहे भले ही मुख्य-धारा के लोग इसके साथ अपनी कितनी भी सहानुभूति क्यों न रखते हों। इस आम धारणा की अंतर्वस्तु में इधर तेजी से बदलाव आया है। इसके पीछे कई कारण हैं। सामाजिक असुरक्षा का कँटीला भय समाज के प्रत्येक स्तर पर अंतर्व्याप्त है।

असामाजिक होते समय में सामाजिक पदानुक्रमता के प्रत्येक पायदान पर अवस्थित व्यक्तियों और समुदायों को सामाजिक सुरक्षा की जरूरत होती है। शोषण एवं भेदभाव के विभिन्न स्तरों के होते हुए भी गाँव लोगों के लिए लगभग ‘सुरक्षित’ एवं ‘सुनिश्चित’ वास-स्थान थे। औद्योगिक पूँजी की सक्रियता से समाज की संरचना में व्यापक परिवर्तन आया। लोग बाहर औद्योगिक केंद्रों में जमा होने लगे। गाँवों को औद्योगिक सभ्यता अपने कार्मिकों के ‘परमानेंट ठिकाना’ के रूप में चिह्नित करती रही है। औद्योगिक केंद्र और उनके आस-पास गाँवों से आये इन कार्मिक लोगों का नया और ‘अस्थायी ठिकाना’ बना। औद्योगिक पूँजी की सक्रियता से लोगों को दोहरी पहचान मिलनी शुरू हुई। यह दोहरी पहचान थी— एक ‘परमानेंट’ और एक ‘अस्थायी’! ‘परमानेंट पहचान’ में धर्म, जाति, गोत्र, नस्ल, क्षेत्र, भाषा जैसे तत्त्व अधिक अर्थवान थे। ‘अस्थायी पहचान’ में इन सबसे निरपेक्ष पद, कौशल, शिक्षा, आर्थिक-स्थिति जैसे तत्त्व अधिक सुग्राह्य थे। औद्योगिक विकास और सामाजिक प्रगतिशीलता की नजर से ‘परमानेंट पहचान’ के ये सारे ‘अर्थवान’ तत्त्व निरर्थक ही नहीं बल्कि अधिकांश में अनर्थक भी थे। ‘अस्थायी पहचान’ के तत्त्व अधिक महत्त्वपूर्ण थे। खासकर, दलित और स्त्री के लिए परंपरिक एवं परमानेंट ‘पहचान’ और ‘अस्मिता’ के बरक्स आधुनिक एवं अस्थायी ‘पहचान’ और ‘अस्मिता’ अधिक अर्थवान थी। इस अधिक अर्थवान ‘पहचान’ और ‘अस्मिता’ का संबंध सामाजिक एवं धार्मिक सुधार से भी बहुत ही गहरा था।

इतिहास बताता है कि भारत में राष्ट्रवाद सामाजिक एवं धार्मिक सुधार के अनुवर्ती बोध के रूप में विकसित हुआ। जहाँ-जहाँ जिस पैमाने पर सामाजिक एवं धार्मिक सुधार संपन्न हुए वहाँ-वहाँ उतने ही निखरे रूप में राष्ट्रवाद का भी विकास हुआ। यह राष्ट्रवाद भी पहचान का एक आधार प्रस्तुत करता है– औपनिवेशिक एवं अन्य प्रकार के शोषणों को जारी रखने के लिए भी और इन शोषणों से मुकम्मल मुक्ति-संघर्ष को चलाने और चलाये रखने के लिए  भी। ध्यान में रखना होगा कि ‘पहचान’ और ‘अस्मिता’ न तो एकरेखीय होते हैं न एक आधारीय इसलिए कई बार इनकी ये बहुरेखीयताएँ और बहुआधारीयताएँ आपस में, एक-दूसरे को प्यार करती हैं, मजबूत बनाती हैं तो एक-दूसरे से टकराती भी हैं और एक दूसरे का शोषण भी करती हैं। प्रसंगवश, याद किया जा सकता है कि राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन के समय दलित और कदाचित स्त्री के प्रसंग में जब भी मुक्ति और हक की हूक उठी, उसे राष्ट्रीय मुक्ति-आंदोलन के साथ ही नत्थी करके देखा गया। माना और बताया गया कि राष्ट्र की मुक्ति के बाद मुक्तियों और हकों के ये सारे सवाल स्वत: हल हो जाएँगे। विश्वास दिलाया गया कि राष्ट्र के मुक्त हो जाने पर सब की मुक्ति हो जायेगी। इस विश्वास पर थोड़ा-सा भी शक करनेवाले को सीधे-सीधे राष्ट्रविरोधी घोषित किया गया, जहाँ घोषित रूप से राष्ट्रविरोधी नहीं भी कहा गया, वहाँ भी मुख्यधारा ने व्यावहारिक रूप में इसे राष्ट्रविरोधी ही माना। अपने ही राष्ट्र की बहुत बड़ी आबादी को व्यावहारिक स्तर पर राष्ट्रविरोधी मानकर विकसित और संचालित हुए इस राष्ट्रवाद ने बाह्य औपनिवेशिक शक्तियों से राष्ट्र-मुक्ति के लिए संगठित होने का व्यापक और मानवीय आधार प्रदान किया तो इसी राष्ट्रवाद के अंतर्गत जाने-अनजाने आंतरिक औपनिवेशिक शक्तियों के वर्चस्व को कायम रखने के लिए संकुचित एवं अमानवीय सामाजिक एवं राजनीतिक मृग-छल के बनने के लिए भी स्पेस बनता गया। यह छल देश की बहुसंख्यक जनता की वास्तविक मुक्ति के अनिवार्य प्रसंग के साथ हुआ। अल्पसंख्यकों की हालत भी अच्छी नहीं थी। विपिनचंद्र जिसे ‘स्थानापन्न राष्ट्रवाद’ कहते हैं उसकी अपनी ऐतिहासिक जरूरतों के अंतर्गत मुसलमानों को जिस सांस्कृतिक प्रताड़ना का विषय बनाया गया उसकी स्वाभाविक प्रतिक्रिया यह हुई कि भारतीय राष्ट्रवाद के भीतर द्विराष्ट्रीयता की विभाजनकारी वैधता के लिए जगह बन गई। राष्ट्रवाद के विकास के राजनीतिक सच का यह स्थूल और भौगोलिक विभाजन तो ऊपरी तौर पर साफ-साफ दिख जाता है। राष्ट्रवाद के विकास के राजनीतिक सच के सूक्ष्म और आंतरिक विभाजन का भीतरी पक्ष उतनी स्पष्टता से दीखता नहीं है। आंतरिक विभाजन का अदृश्य सच आज भी खतरनाक हद तक सक्रिय है। नतीजा यह हुआ कि सामाजिक और धार्मिक सुधार की आधी-अधूरी परियोजनाओं पर राष्ट्रवाद की सवारी लद गई। जहाँ सामाजिक और धार्मिक सुधार की ये परियोजनाएँ अभी ठीक से शुरू भी नहीं हुई थीं, वहाँ इस राष्ट्रवाद ने राष्ट्रीय-मुक्ति की जल्दबाजी में विपरीत सामाजिक प्रवृत्तियों के साथ भी सहमति का संसार रचने से परहेज नहीं किया। हमारा अनुभव बताता है कि नत्थीकरण की इस प्रक्रिया में पड़कर ‘जनराष्ट्रवाद’ के उदय की उज्ज्वल संभावनाएँ निरंतर धूमिल होती चली गईं।

भारत में जिस समय उपनिवेश मुक्त होने की प्रेरणाओं से ऐतिहासिक हकीकत के रूप में राष्ट्रवाद का उदय हो रहा था, उसी समय उसके सामाजिक स्वप्न में समतामूलक विश्ववाद के लिए भी प्रभावी जगह बन रही थी। साहित्य आकांक्षाओं और सपनों के पुष्पित-पल्लवित होने के लिए सबसे अधिक उपयुक्त जगह है। उस समय के महत्त्वपूर्ण साहित्य में राष्ट्रवाद और विश्ववाद की अंतर्क्रिया और अंतर्मेल का अद्भुत भाव-सामंजस्य मिलता है। एक बात यहाँ ध्यान में रखने की है कि भारत में यह सब औपनिवेशिक वातावरण में हो रहा था। यह स्वीकार कर लेने में किसी तरह की कठिनाई नहीं हो सकती है कि औपनिवेशिक अभिशाप के दुष्प्रभाव से न तो ऐतिहासिक हकीकत बचता  है, न हक और न सामाजिक स्वप्न। ऐसे वातावरण में राष्ट्रवाद और विश्ववाद दोनों के विकलांग हो जाने का खतरा तो रहता ही है! भारत में राजनीतिक,  सांस्कृतिक और स्थानापन्न राष्ट्रवाद के तत्त्व कमोवेश एक साथ सक्रिय हो गए।  जैसा कि पहले भी संकेत किया गया है, अपनी अस्मिता को लब्ध करनेवाले राष्ट्रवाद का उदय राजनीतिक आंदोलन के अलावे सामाजिक एवं धार्मिक सुधार आंदोलन के भी एक परिणाम के रूप में हुआ। जहाँ-जहाँ सामाजिक सुधार के आंदोलन और उसकी परियोजनाएँ जितनी परिपक्वता के साथ संपन्न हुईं वहाँ-वहाँ राष्ट्रवाद के भी सारे तत्त्वों में उभार आया। बंगाल और महाराष्ट्र  ऐसे दो महत्त्वपूर्ण क्षेत्र के रूप में चिह्नित हैं। इस ‘अस्मितोवाची राष्ट्रवाद’ की कई जटिलताएँ हैं। इन जटिलताओं की अनदेखी करना इतिहास के साथ न्याय  नहीं है। इतिहास बताता है कि ‘फिर भी, जैसा कि बंग्ला और मराठी के दृष्टांतों से स्पष्ट है, विभिन्न भारतीय भाषाओं के राष्ट्रवादी साहित्य में कुछेक अस्पष्टताएँ भी दिखाई पड़ती हैं। इसकी वृत्ति राष्ट्रीय, प्रादेशिक एवं सांप्रदायिक चेतना को न्यूनाधिक एक साथ पोषित करने की थी। बंकिमचंद्र का सरोकार मूलत: बंगाल के इतिहास से था। वे बारंबार यही दोहराते रहे कि  बंगाल ने अपनी स्वाधीनता बख्तियार खिलजी के कारण खोई थी, पलासी की लड़ाई में नहीं।..... इस प्रकार वह स्थिति उत्पन्न हुई जिसे विपिनचंद्र ने सही तौर पर ‘स्थानापन्न राष्ट्रवाद’ कहा है और कभी-कभी इसका औचित्य यह कहकर सिद्ध किया जाता है कि खुलेआम अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध लिखना खतरनाक हो सकता था (उदाहरण के लिए बंकिमचंद्र का सरकारी नौकरी में  होना)। किंतु इस प्रकार के प्रहार के उद्देश्य से मुसलमानों का अंग्रेजों का स्थानापन्न बनाने के खतरनाक परिणाम ही हो सकते थे। स्वदेशी से संबद्ध हिंदू युवा वर्ग 1905 के बाद से बंकिमचंद्र को देवता मानने लगा था, किंतु बड़ी सीमा तक राष्ट्रवाद से सहानुभूति रखनेवाली ‘मुसलमान’ जैसी जैसी मुस्लिम पत्रिकाओं ने भी उन पर बारंबार आक्षेप किये किये क्योंकि उनकी अनेक रचनाओं में यवनों की निंदा की गई थी। मगर शीघ्र ही मुसलमान बुद्धिजीवी भी अपना अलग किस्म का स्थानापन्न राष्ट्रवाद विकसित करने लगे जिसमें ठीक उन्हीं व्यक्तियों एवं कालखंडों को महिमामंडित किया गया था (उदाहरण के लिए औरंगजेब) जिनकी हिंदू निंदा करते थे। साथ ही यह इस्लाम के विगत गौरव के प्रति टीस भी उत्पन्न करता था।’2 
साफ है कि द्विराष्ट्रीयता के सिद्धांत का गहरा सरोकार इस ‘स्थानापन्न राष्ट्रवाद’ की कोख  से है। इतना ही नहीं, यह ‘स्थानापन्न राष्ट्रवाद’ भाषाई आधार पर आंचलिक भावनाओं या उप-राष्ट्रवाद के विकास के लिए भी जमीन तैयार करता था। इसलिए, ‘इस काल का अंतिम महत्त्वपूर्ण लक्षण था— भाषाई आधार पर आंचलिक भावनाओं का विकास। ये भावनाएँ क्भी-कभी उन युवाओं के लिए अधिक नौकरियों की माँग से जुड़ी होती थीं जो अपेक्षाकृत साधनहीन वर्ग से संबद्ध होते थे, किंतु प्राय: ये अधिक गहरी जड़ें पकड़ लेती थीं और विभिन्न प्रादेशिक भाषाओं सशक्त साहित्यिक एवं सांस्कृतिक प्रवृत्तियों के रूप में अभिव्यक्त होती थीं।’3

भाषाई आधार पर आंचलिक भावनाओं के विकास के साथ रोजगार के अवसरों के संबंध का यह क्रम आज भी जारी है। उदारीकरण-निजीकरण- भूमंडलीकरण (उनिभू) के प्रताप से आज आर्थिक क्रियाकलाप की वृद्धि में रोजगार-निषेध की प्रवृत्ति काम कर रही है। ऐसे में, भाषाई आधार पर आंचलिक भावनाओं के ही नहीं, सांप्रदायिक भावनाओं के भी उभार की लू बह रही है। यह ‘गर्म हवा’ अभी आँधी तो नहीं बनी है लेकिन इसमें धीरे-धीरे  तीव्रता आ जाने की आशंकाएँ भी निर्मूल नहीं हैं। अभी असम में जो कुछ हुआ,  उसके संकेत बहुत ही खतरनाक हैं। असम ही नहीं देश की आर्थिक राजधानी मानी जानेवाली मुंबई भी इस ‘गर्म हवा’ के प्रभाव से बाहर नहीं है। कुल मिलाकर यह कि पूरब से पश्चिम तक इस ‘गर्म हवा’ की आँच राष्ट्रीय संदर्भों को झुलसा रही है। उत्तर-दक्षिण दिशा से भी देर-सबेर ऐसे ही संकेत फिर से उभर सकते हैं। ये सारे संदर्भ हमारी राष्ट्रीयता की सांस्कृतिक एकता को तोड़ते हैं। यह टूटन और अधिक तेज हो जाती है, जब हम इसे एकपक्षीय आग्रहों से समझने और समझाने की कोशिश करते हैं। समस्या की बहुपक्षीयता पर से पकड़ छूट जाने पर ‘हम’ और ‘अन्य’ के बीच तीखी विभाजक रेखाएँ खींचनी शुरू हो जाती है। इन विभाजक रेखाओं के कारण शुरू होती है, विभिन्न रूप-रंग की सांप्रदायिकताएँ। जैसे, भाषाई सांप्रदायिकता! क्या है यह भाषाई सांप्रदायिकता? ‘किसी भ्रम से बचने के लिए हमें स्पष्ट कर देना चाहिए कि हम भाषाई सांप्रदायिकता से क्या समझते हैं। एक समान भाषा बोलनेवाले लोगों के समूह की चेतना, जिसे वे अलग समुदाय बनाते हैं, स्वाभाविक और उपयुक्त है। किंतु यदि उनमें वह भावना निहित हो जाती है, कि उसी क्षेत्र या पास के क्षेत्र में रहनेवाले देश के वे लोग जो भिन्न भाषा बोलते हैं, शब्द के सबसे अनुचित अर्थ में बाहरी हैं, और उनके साथ उसी तरह का व्यवहार करना चाहिए, तब वह भाषायी सांप्रदायिकता का भद्दा रूप बन जाता है...।’4 पूरे भारत के संदर्भ में राष्ट्रीय, स्थानापन्न राष्ट्रीय, उप-राष्ट्रीय या आंचलिक मनोभाव के नाना रूपविधानों में एक सामान्य तथ्य की ओर ध्यान सहज ही चला जाता है कि, चाहे राजनीतिक स्तर पर हो या सामाजिक और  सांस्कृतिक स्तर पर ही क्यों न हो, कमोवेश सभी जगह ब्राह्मणवाद और पूँजीवाद के अलग-अलग और समन्वित दुष्प्रभाव बहुत ही खतरनाक रहे हैं। स्वाभाविक ही है यह सोचना कि ‘इस देश के दो दुश्मनों से कामगारों को निपटना होगा। ये दो दुश्मन हैं, ब्राह्मणवाद और पूँजीवाद...। ब्राह्मणवाद से मेरा आशय स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व की भावनाओं के निषेध से है। यद्यपि ब्राह्मण इसके जनक हैं, लेकिन यह ब्राह्मणों तक ही सीमित नहीं होकर सभी जातियों में घुसा हुआ है।’5 टाइम्स ऑफ इंडिया, 14 फरवरी 1938 की इस रिपोर्ट के अनुसार ब्राह्मणवाद और पूँजीवाद से निपटने के लिए, वर्गीय आधार पर कामगारों की बन रही ‘अस्थायी पहचान’ ही अस्मिता के संघटन एक मात्र वैध आधार हो सकती थी। इस वैध आधार को अधिक उर्बर होना चाहिए था। लेकिन, ऐसा नहीं हो सका! कारण बहुत सारे हैं। असल में यह ‘अस्थायी पहचान’ समाज के बहुत छोटे-से हिस्से को मिली थी। उस पर से यह  भी कि इस छोटे-से तबके ने भी उसे प्रसन्नतापूर्वक स्वीकारा नहीं था, बल्कि किसी तरह ओढ़े रहने पर राजी हुआ था।

अस्मिताओं के संदर्भ को जरूरी माननेवाले ‘हम’ अकेले नहीं हैं। अस्मिता तलाश के संदर्भ पहली बार प्रकट नहीं हुए हैं। एक अर्थ में ऐतिहासिक रूप से राष्ट्रवाद— चाहे वह ‘राजनीतिक राष्ट्रवाद’ हो या ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ हो या ‘स्थानापन्न राष्ट्रवाद’ ही क्यों न हो— की आकांक्षाओं का जन्म और पोषण भी अस्मिता तलाश के इन संदर्भों से होता रहा है। इतिहास बताता है कि 1775 में पोलेंड के पहले विभाजन और 1776 में अमेरीकी स्वतंत्रता की घोषण के साथ राष्ट्रवाद की चेतना का अभ्युदय होता है। 1789 से 1792 तक  की फ्रांसिसी क्रांति में इसकी मूल आकांक्षा प्रकट हुई। यह मूल आकांक्षा थी— समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व। ध्यान में रखने की बात यह है कि फ्रांसिसी क्रांति की मूल आकांक्षा के संदर्भ में समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व अविच्छेद्य हैं। ये तब भी अलग-अलग हासिल नहीं किये जा सकते थे और न आज ही अलग-अलग हासिल किये जा सकते हैं। यह मानने में कोई कठिनाई नहीं होनी  चाहिए कि फ्रांसिसी क्रांति की मूल आकांक्षा में निर्विशिष्ट मानव जाति की मूल आकांक्षा ही मुखरित हो रही थी। अविच्छेद्य बंधुत्व-स्वतंत्रता-समता का व्यवच्छेदन भी इस समय प्रकट होने लगा। असहमति के संतुलित विवेक का तकाजा है कि डॉ. आंबेडकर के ‘बुद्ध और कार्ल मार्क्स’ के इस निष्कर्ष को महत्त्वपूर्ण माना जाये कि ‘समाज की नई आधारशिला फ्रांसिसी क्रांति के तीन शब्दा बंधुत्व, स्वतंत्रता और समता में समाहित है। फ्रांसिसी क्रांति का स्वागत इसी संकल्प के कारण हुआ। यह समता लाने में विफल रही। हमने रूसी क्रांति का स्वागत किया क्योंकि यह समता लाने का लक्ष्य रखती थी। लेकिन समता  लाने के नाम पर समाज बंधुत्व और स्वतंत्रता का कुर्बान नहीं कर सकता है। बिना भाईचारा और स्वतंत्रता के समता का कोई मोल नहीं है। ऐसा प्रतीत होता है कि इन तीनों को एक साथ सिर्फ बुद्ध के अनुसरण से ही हासिल किया जा सकता है। साम्यवाद एक दे सकता है, सब नहीं।’6 ऐसा प्रतीत होता है कि डॉ. आंबेडकर ऐतिहासिक दबाव को झेलते हुए समता-स्वतंत्रता-बंधुत्व की अविच्छेद्यता और इसके आर्थिक प्रसंग के पूरे संदर्भ को ठीक से पकड़ नहीं पाये। 1938 तक साम्यवाद का कोई सघन भारतीय अनुभव तो था नहीं! हाँ एक अनुमान जरूर था। अनुमान ज्ञान का स्थानापन्न नहीं हो सकता है। बौद्ध दर्शन और अनुसरण का भारतीय अनुभव तो शताब्दियों का है। इस अनुभव में ब्राह्मणवाद के जीवित रहने का अनुभव भी शामिल है! डॉ. आंबेडकर के इस आग्रह को यथोचित सम्मान के साथ ही यह भी ध्यान में रखा जाना चाहिए कि ‘ऐतिहासिक रूप से एक सामन्य भारतीय संस्कृति का अस्त्त्वि कभी नहीं रहा है। ऐतिहासिक रूप से भारत तीन रहा है, ब्राह्मण भारत, बौद्ध  भारत और हिंदू भारत। इन तीनों की अपनी अलग-अलग संस्कृति रही है। ....  यह बात भी माननी होगी कि मुसलमानों के वर्चस्व के पहले ब्राह्मणवाद और बौद्धवाद के बीच गहरे नैतिक संघर्ष का भी इतिहास रहा है।’7 मुसलमानों के वर्चस्व के पहले के ब्राह्मणवाद और बौद्धवाद के बीच के गहरे नैतिक संघर्ष का बाद में क्या हुआ? इतिहास बताता है कि मुसलमानों के वर्चस्व के बाद यह नैतिक संघर्ष सामाजिक सुधार की ओर बढ़ने लगा। हिंदी साहित्य के भक्तिकाल की मुख्य प्रेरक शक्ति की नाभिकीय संरचना में परलोक नहीं लोक का वास था। यह चेतना धर्म को अधिकाधिक लोकाभिमुख बनाने के लिए सक्रिय थी। इसमें धर्म के नाम पर जारी कूपमंडूकताओं से बाहर निकलने के लिए समाज-सुधार के पक्ष में और ब्राह्मणवाद के विरोध में संवेदनशील स्वर का आधिक्य मिलता है; सगुणियों और निगुर्णियों में इस स्वर की गुणवत्ता और मात्रात्मकता में अंतर के बावजूद यह सच है। इस मध्यकालीन स्थिति में राष्ट्रवाद का कोई प्रसंग तो नहीं था और न विश्ववाद का ही कोई प्रसंग था। लेकिन आधुनिककाल तक की इतिहास यात्रा करते हुए देखा जा सकता है कि 1880 के पहले तक 19वीं सदी में हिंदू और मुसलमान के बीच सांप्रदायिक संघर्ष नहीं थे। बल्कि ये अपने भीतर के सुधार के लिए अधिक प्रयत्नशील थे। सोवियत संघ की स्थापना के साथ एक सर्वथा नई और शोषण मुक्त एवं न्यायपूर्ण मानवीय विश्व-व्यवस्था की पुरजोर संभावनाएँ सामने आईं। इस सर्वथा नई और शोषण मुक्त एवं न्यायपूर्ण मानवीय विश्व-व्यवस्था के हकीकत  से जनमे सामाजिक स्वप्न में मनुष्य के प्रति सरोकार के गुणसूत्र राष्ट्रीय अस्मिता या राष्ट्रवाद की प्रेरणाओं से मुक्त थे। आत्मीयकरण के लिए राष्ट्रीय की जगह वर्गीय आधार का महत्त्व सामने आया। इस वर्गीय आधार को ध्वस्त करने में राष्ट्रवाद के कुत्सित रूप का उपयोग हुआ। राष्ट्रवाद का कुत्सित रूप शोषक और शोषितों के हितों के अंतर को भावुकता के अंतर्लेप से आच्छादित करते हुए व्यक्तियों और समुदायों को अतार्किकता के वैचारिक दलदल में ले जाकर उनके हितों की हत्या करता है। इसका जन्म इतिहास की गलत व्याख्याओं के सहारे उनके अपने वर्ग-स्वार्थ को साधे रखने की आकांक्षा से होता है। ऐसा राष्ट्रवाद पूँजीपति वर्ग के आर्थिक विकास को देश का आर्थिक विकास मानता है। आर्थिक विकास के संतुलित वितरण के सामाजिक न्याय के  नैतिक और मानवीय प्रसंग को ओझल कर देता है। इतना ही नहीं पूँजीपति वर्ग के आर्थिक विकास की वेदी पर देश के आर्थिक विकास को भी न्यौछावर करता चलता है। हमारा सांप्रतिक और ऐतिहासिक अनुभव दोनो ही यह कहता है कि राष्ट्रवाद के कुत्सित रूपों ने अस्मिता के वास्तविक आधार के रूप में वर्गीय चेतना को हमेशा ही ध्वस्त किया है। लेकिन इससे राष्ट्रवाद के जनहितकारी रूप के प्रति दुराव का आना भी ठीक नहीं है। ऐतिहासिक अनुभव तो यह भी है कि राष्ट्रवाद के जनहितकारी रूप रूप का समय पर उपयोग नहीं करने के कारण ही इसका कुत्सित रूप इतना दुष्प्रभावकारी बन पाया। असल में तत्काल का हुए बिना कालातीत होना या देश का हुए बिना देशातीत होना असंभव होता है। सभ्यता के प्रवाह में पुराने पानी को उतारना  और नये पानी को चढ़ाना एक जिटल प्रक्रिया है। ‘परमानेंट पहचान’ के धर्म, जाति, गोत्र, नस्ल, क्षेत्र, भाषा जैसे अबांछित पारंपरिक तत्त्वों को अवहेलित करते हुए और इन सबसे एकदम निरपेक्ष होकर ‘अस्थायी पहचान’ के पद, कौशल, शिक्षा, आर्थिक-स्थिति जैसे बांछित प्रगति-तत्त्वों का आत्मारोपण इतना आसान नहीं होता है। परंपरा के अबांछित किंतु जीवंत तत्त्वों को अवहेलित नहीं, बल्कि अंतर्वेधित करते हुए ही प्रगति-तत्त्वों का आत्मार्जन संभव होता है। अंतर्वेधन की यह संक्रमण-प्रक्रिया ही परंपरा के साथ प्रगति के  न्याय की नियामिका है। संक्रमण से गुजरे बिना क्रांति बहुत लंबी छलांग हो जाती है। सफलतापूर्वक इतनी लंबी छलांग लगाना अक्सर असंभव ही होता रहा है। राष्ट्रवाद के अंतर्वेधन के पश्चात ही विश्ववाद की ओर बढ़ा जा सकता है और अस्मिता के वर्गीय आधार को हासिल किया जा सकता है। स्वभाविक है कि आज की परिस्थिति में अस्मिता के वर्गीय और राष्ट्रीय समझ में समन्वय  एक दुर्निवार ऐतिहासिक जरूरत है। ऐसा इसलिए भी कि आज बहुराष्ट्रीय पूँजी का आवारापन राष्ट्रीय संप्रभुताओं को रौंदता हुआ पूँजी को वैश्विक आयाम का विस्तार और मनुष्य को ग्रामीय आधार का संकोचन प्रदान करता  है। पूँजी का विश्व और मनुष्य का ग्राम, यही तो है विश्व-ग्राम ! इस ऐतिहासिक जरूरत को ठीक से समझें तो यह बात बिल्कुल ही विचित्र नहीं लगेगी कि क्यों, ‘पूँजीवाद एक ओर भूमंडलीकरण के माध्यम से विश्व बाजार कायम कर रहा है और स्वयं यहाँ कम्युनिस्ट राष्ट्रवादी होते जा रहे हैं।’8

यह अस्मिता है क्या? क्या यह संस्कृत भाषा का कोई पारिभाषिक पद है? ‘अस्मिता देखने में संस्कृत का शब्द लगता है लेकिन है नहीं। यह अंग्रेजी के आइडेंटिटी का हिंदी अनुवाद मान लिया गया है। संस्कृत में इसका अर्थ है– अहंकार। अस्मिता में अहं है– अहं अस्मि। मेरी जानकारी में हिंदी में 1950 के आसपास अज्ञेय जी ने आइडेंटिटी के अर्थ में ‘अस्मिता’ चलाया। संस्कृत के अर्थ से यह भिन्न है। इस व्यक्तिवादी अर्थ से अलग मार्क्सवाद में अस्मिता का दूसरा रूप है। यहाँ ‘जन’ में अपने व्यक्तित्व के विलय का प्रश्न महत्त्वपूर्ण है। यदि आप मध्यवर्ग के हैं तो अपने वर्ग को छोड़कर खुद को सर्वहारा वर्ग के साथ आइडेंटीफाई कीजिये। तो यह माना जाता था कि कवि अपनी अस्मिता का निषेध करता है, अहंकार को छोड़कर वह जन का होता है। इस प्रगतिशील  धारणा के विरुद्ध व्यक्ति की अस्मिता पर बल दिया। उन्होंने ‘हम नदी के द्वीप हैं’ शीर्षक कविता भी लिखी, उपन्यास भी लिखा। अस्तित्ववाद के साथ आनेवाले एक विशेष प्रकार के व्यक्तिवाद की प्रतिष्ठा के रूप में सन् 1950-51  के आसपास यह शब्द आया। इस नाते हिंदी में अस्मिता का ऐतिहासिक अर्थ है– व्यक्तिवाद।... राष्ट्रीय आंदोलन ने कहा कि वर्गों की, जातियों की पहचान  की हमारी जो अलग-अलग लड़ाई है वह राष्ट्रीय मुक्ति का अंग है। पहले राष्ट्र मुक्त होगा तभी उसके जितने अंग हैं, वे भी मुक्त होंगे, दलित भी मुक्त होंगे। बाबा साहेब आंबेडकर ने कहा कि राष्ट्र मुक्त हो जायेगा तब भी जरूरी नहीं कि हम मुक्त होंगे।... अस्मिता, एक समूह के रूप में दलित की अपनी अस्मिता अलग है। इसलिए अस्मिता शब्द को स्वीकार करते समय उससे संबद्ध ऐतिहासिक अर्थों को हमें ध्यान में रखना चाहिए। अब इधर इन दोनों घटनाओं के लगभग तीस वर्ष बाद 1970-75 के दशक से हिंदी में, बल्कि उत्तर आधुनिकता के चलते एक नये अर्थ में अस्मिता का प्रयोग हुआ है।’9 मानना होगा कि आज के सामाजिक रूप से असुरक्षित समय में अस्मिता के सवाल का अपना औचित्य है। वैश्विक स्तर पर जिन कारणों से सामाजिक असुरक्षा के इस वातावरण में अस्मिता का औचित्य नये सिरे से बना है, उन कारणों के प्रति उत्तर आधुनिक में बहुत ही उदारता रही है। विडंबना यह कि इस औचित्य के संदर्भ में उठ खड़े नव-सामाजिक आंदोलनों को भी उत्तर आधुनिकता भरमा रही है। नव-सामाजिक आंदोलनों की खासियत यह है कि ये अस्मिता के सवाल को तो उठाते हैं, लेकिन उसके वर्गीय आधार को नकारते  हैं। बल्कि ये अपने को सामाजिक दायरे के नाम पर आर्थिक और राजनीतिक प्रसंग को अपने लिए निषिद्ध ही मानते हैं। ये सामाजिक स्वायतत्ता की बात तो करते हैं, लेकिन इसे राजनीतिक प्रसंग नहीं मानते। आर्थिक प्रसंग नहीं मानते, राजनीतिक प्रसंग नहीं मानते तो फिर बचता क्या है? सांस्कृतिक आधार! सांस्कृतिक आधार के मतलब धर्मीय, जातिवादी, पारंपरिक और नस्लीय आधार आदि! यानी पहचान के पूर्व आधुनिक या आधुनिकता विरोधी आधार! कहना न होगा कि अस्मिता की तीव्र आकांक्षा के भँवर में व्यक्तियों और समुदायों को फेंककर उसे गलत दिशा में बहा ले जाने के लिए बचाव-रस्सी फेंकती है उनिभू की विभिन्न प्रक्रियाएँ और उसकी सांस्कृतिक चेतना की उत्तर आधुनिक परियोजनाएँ और उन्हें गलत घाट पर किनारे लगाती हैं। हमें सावधान रहना होगा कि कहीं जिस प्रकार राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन के समय कई जरूरी सामाजिक प्रसंगों को राष्ट्रवाद के ही किन्हीं-न-किन्हीं रूपों से नत्थी करके छला गया था उसी प्रकार एक बार फिर  विकास के नाम पर उनिभू की परियोजनाएँ उसे छल न लें।

कहा जा सकता है कि अस्मिता का प्रश्न समकालीन दुनिया में लगभग सर्वथा नये प्रसंग के साथ उपस्थित हुआ है। इस सर्वथा नये प्रसंग को जानना भी नये सिरे से होगा। संयोजन और विभाजन या दूसरे शब्दों में कहें तो विभिन्न संदर्भों से ‘मम’ और ‘ममेतर’ की परिधियाँ सभ्यता के पटल पर निरंतर बनती  मिटती रहती है। इन में से कुछ परिधियाँ अधिक समय तक टिकती हैं और कुछ परिधियाँ त्वरित संकुचन और त्वरित विस्तरण की प्रक्रिया से गुजरती रहती है। इनमें से कुछ परिधियों का संबंध मनुष्य की आत्मनिष्ठ चेतना से होता है तो कुछ का वस्तुनिष्ठ चेतना से होता है। आत्मनिष्ठ चेतना का गहन संबंध मनुष्य की वैयक्तिक और अंतर्वैयक्तिक स्मृतियों, संस्कृति के विभिन्न उपादानों, सामाजिक आकांक्षाओं एवं स्वप्नों से होता है और वस्तुनिष्ठ चेतना का का गहन संबंध देशकाल, भौगोलिक परिस्थितियों, भौतिक उपलब्धियों, आर्थिक गतिविधियों एवं राजनीतिक प्रक्रियाओं से होता है। आत्मनिष्ठ चेतना ‘भाव’ के रूप में और वस्तुनिष्ठ चेतना ‘ज्ञान’ के रूप में अभिव्यक्त होती है। इसलिए, यह ध्यान में रखने की जरूरत है कि यद्यपि आत्मनिष्ठ चेतना और वस्तुनिष्ठ चेतना एक दूसरे से पूर्ण स्वायत्त और पूर्ण स्वतंत्र लगती है लेकिन आत्मनिष्ठ चेतना का विकास वस्तुनिष्ठ चेतना की अंतर्वर्त्ती प्रक्रिया के रूप में होना ही स्वाभाविक होता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल को दुहराते हुए कहा जा  सकता है कि सभ्यता के अब तक के विकास-क्रम में ‘ज्ञान प्रसार’ के भीतर ही ‘भाव प्रसार’ होता आया है। यह सभ्यता विकास की स्वाभाविक और अग्रगामी गति है। सभ्यता की स्वचालित अंर्तक्रिया में अग्रगामी और प्रतिगामी प्रवृत्तियों का द्वंद्व सदैव जारी रहता है। प्रतिगामी शक्तियों में ‘भाव  प्रसार’ के भीतर ही ‘ज्ञान प्रसार’ को सीमित कर देने की तीव्र प्रवणता होती है। भूमंडलीकरण की प्रक्रिया इस प्रतिगामी प्रवणता का इस्तेमाल करते हुए सभ्यता विकास की स्वाभाविक गति को पलट देना चाहती है। सभ्यता के मूलार्थ में समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के विकास एवं व्यवहार के लिए सांस्कृतिक पर्यावरण के निर्माण की दिशा में बढ़ने की गति ही सभ्यता विकास की स्वाभाविक गति होती है । यह गति निर्बाध कभी नहीं रही है। ‘मम’ और ‘ममेतर’ की परिधियाँ भी लगातार सक्रिय रही हैं। कुल मिलाकर समग्र मानवीय सभ्यता के इतिहास में अब तक संतोष की बात यह जरूर रही है कि इसमें ‘मम’ की परिधि सभ्यताओं की विभाजक रेखाओं को अतिक्रमित करते हुए बढ़ रही थी और ‘ममेतर’ की परिधि घट रही थी। सभ्यताओं की पुरानी विभाजक रेखाएँ इस अग्रगामिता को रोक नहीं पा रही थी। क्योंकि ‘सभ्यताओं के टकरावों’ की चाहे जितनी मनौतियाँ मनाई जाये, सच तो यह है कि सभ्यताओं का स्वभाव पारस्परिक टकराव का नहीं अपनाव का ही होता है। यह अलग बात है कि अपनाव का यह रास्ता कभी-कभी टकराव के बीच से निकलता है। इसलिए, वैश्विक स्तर पर मानवीय सभ्यता की समकालीन चर्या विभाजन की पुरानी परिधियों को निरस्त कर नई परिधियाँ  खींच रही है। ये टकराव में अंतर्निहित अपनाव को रोकना चाहते हैं और अपनाव में अनुपस्थित टकराव को लाना और बढ़ाना चाहते हैं! इसके लिए ‘मम’ और ‘ममेतर’ की नई परिधियाँ तैयार की जा रही हैं। आज की तारीख में अस्मिता का प्रश्न ‘मम’ और ‘ममेतर’ की इन परिधियों से उपजता और टकराता है। ‘मम’ और ‘ममेतर’ की इन परिधियों के इस प्रतिगामी नवोत्थान के पहले परिधियों की पुरानी रेखाओं की वक्रताओं को समझना अस्मिता-विमर्श का एक जरूरी प्रसंग है। एक बात और जब हम अस्मिताओं के संदर्भ पर गंभीरता से बात करते हैं तो हमें किसी भी प्रकार के सैद्धांतिक दुराग्रहों से थोड़ा बचना चाहिए और सामाजिक आकांक्षाओं के कारणों को सहानुभूतिपूर्वक समझने का प्रयास करना चाहिए। डॉ. नामवर सिंह के शब्दों में कहें तो, ‘सबाल्टर्न ग्रुप के प्रति छोटे-छोटे सामाजिक समुदायों के, वर्गों के, समाज के जो हिस्से अपनी पहचान के लिए लड़ रहे हैं, उनके प्रति हमारा रुख आक्रामक नहीं होना चाहिए। पहचानने की, समझने की जरूरत है कि क्यों, किन परिस्थितियों में ये हमारे साथ नहीं हैं।’10 यह भी कि किन परिस्थितियों में हम किनके साथ नहीं हैं। वैसे, सच तो यह है कि जिन्हें साबल्टर्न कहा जाता है, उन में बिखराव चाहे जितना हो उनका कुल सामाजिक योग छोटा नहीं है।

अस्मिता के सवाल आगे और तेजी से उठेंगे। अगर उन्हें ठीक से नहीं समझा गया तो वे और उलझेंगे ही। उत्तर आधुनिकता से समर्थित नव-सामाजिक आंदोलन सामुदायिक, सांप्रदायिक और अंतत: वैयक्तिक अलगाव में इन सवालों को हाँक कर ले जायेगा। ध्यान रखना चाहिए कि ‘चूँकि सदियों तक सवर्ण लोगों ने करुणा, सहानुभूति दिखाते हुए एक मानवतावाद का शब्द लेकर यह काम किया। और जिसको कहते हैं न दूध का जला छाछ भी फूँककर पीता है। तो दूध का जला हुआ है यह वर्ग। यानी हमारे देश में स्त्री या दलित।  पहले के अनुभव होंगे। कई लोगों ने केवल करुणा या सहानुभूति के कारण... भगवान को भी हमलोग करुणामयी ही समझते रहे। स्टीफेनजाइ की एक किताब है– ‘वी वेयर ऑफ पिटी’। इसलिए दलित, स्त्री अगर कहती है कि मुझे दया नहीं चाहिए, ये मेरा हक है, तो अस्मिता का अर्थ है-– अस्मिता का हक। अस्मिता दया नहीं चाहती। अस्मिता हक चाहती है।... इतने आंदोलन हुए। समय-समय पर होते रहे, इतने लोग आये, कबीर आये, गाँधी आये, आंबेडकर आये फिर भी हमलोग इसकी चूल ढीली नहीं कर सके। बल्कि वह आज और भी मजबूत होती दिखाई पड़ रही है। उसके पीछे दूसरी ताकतें हैं।’11 इन दूसरी ताकतों को बारबार समझना होगा। ये ताकतें बहुरुपिया हैं। ये ताकतें कभी अपनी मीठी मुसकान को आकश तक फैलाते हुए सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नाम पर मनोरम वितान खड़ी कर सकती हैं तो कभी अपने गुप्त सांप्रदायिक एजेंडे के तहत जनसंहार को भी राष्ट्रीय यज्ञ घोषित करती हुई मिल सकती हैं; एक ही घटना को अंतर्राष्ट्रीय संदर्भ में शर्मनाक और राष्ट्रीय संदर्भ में गर्व का विषय मान सकती हैं। इनके पैरोकार कभी विकास के नाम पर स्वतंत्रता को समृद्धि हासिल करने में बाधक बताते हुए बहुराष्ट्रीय उदारवाद के साथ विश्व-बाजार के फुटपाथ पर देश की बोली लगाते हुए भी मिल जा सकते हैं तो कभी घुटना-टेक संघर्ष की आभासी सफलता को अपनी स्वदेशी चेतना की परम उपलब्धि के रूप में प्रचारित कर सकते हैं। सामान्यत:  सिक्के के दो पहलू होते हैं। इनके सिक्कों में लेकिन एक ही पहलू होता है! इसे हर रूप में पहचानने का कौशल अर्जित करना होगा। एक बात और। यह स्वीकारने में कठिनाई नहीं होनी चाहिए कि किसी भी परिस्थिति में अस्मिता-विमर्श अपने आप में सत्ता-विमर्श भी होता है। जितनी प्रकार की सत्ताएँ उतनी ही प्रकार की अस्मिताएँ! दुहराव की चिंता न करते हुए कहना जरूरी है कि आज की तारीख में उत्तर आधुनिकता से संपोषित नव-सामाजिक  आंदोलनों का अस्मिता-विमर्श, अपने को सामाजिकता से सीमित कर अपनी परिधियों में जन-पक्षीय राजनीतिक और आर्थिक प्रसंगों के लिए जगह नहीं छोड़ता है। यही क्या नव-सामाजिक आंदोलनों का राजनीतिक और अर्थनीतिक पक्ष भी नहीं है! नव-सामाजिक आंदोलनों का अस्मिता-विमर्श अकादेमिक चिंताओं से संचालित है और असली अस्मिता विमर्श को भटकाकर निरर्थक बनाने के लिए अस्मिता-विमर्श का छल तैयार करता है। क्योंकि अंतत: नव-सामाजिक आंदोलनों का अस्मिता-विमर्श किसी भी प्रकार से अस्मिता के राजनीतिक और अर्थनीतिक संदर्भों को ‘आत्मनिर्णय के पूर्ण अधिकार’ या ‘सार्वभौम स्वायतत्ता की माँग’ तक फैलने का अवसर नहीं देता है। जबकि, अस्मिता के प्रत्येक रंग और रूप में राजनीतिक और अर्थनीतिक ‘आत्मनिर्णय के अधिकार’ या ‘स्वायतत्ता’ की सहज आकांक्षा होती है।

यह सच है कि आज ‘हम’ बहुत ही गंभीरता के साथ ‘अस्मिता’, बल्कि ‘अस्मिताओं’ के विभिन्न संदर्भों को समझना जरूरी मान रहे हैं। क्या इसे जरूरी माननेवाले ‘हम’ अकेले हैं या दूसरे ‘हम’ भी इसे उतना ही जरूरी मान  रहे हैं? नहीं हम अकेले नहीं हैं। विभिन्न स्तर पर दुनिया के सभी समाज और समुदाय अस्मिताओं की नई आधारशिलाओं को पहचानने में लगे हैं। क्या यह ‘हमारी’ आत्मनिष्ठ जरूरत भर है या इसके ‘हमारी’ जरूरत बन जाने के कुछ महत्त्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ आधार भी हैं? निश्चित रूप से अस्मिताओं की नई आधारशिलाओं की आत्मनिष्ठ और वस्तुनिष्ठ जरूरतें हैं। क्या हमारे समय में आत्मनिष्ठ यथार्थ और वस्तुनिष्ठ यथार्थ एक दूसरे का हिंसक विलोम रचते हैं या एक ही यथार्थ की दो अभिव्यक्तियाँ बनते हैं? इसका जबाव हमारे विवेक के विनियोग और कौशल पर निर्भर करता है। आखिर एक ही टहनी पर एवं एक दूसरे के सहमेल में विकसित और अभिव्यक्त होते हैं विरोधी गुण-धर्मवाले फूल और काँटे! क्या ‘अस्मिता’ के तय होने में नकार या निषेध की भूमिका सकार और स्वीकार से अधिक महत्त्वपूर्ण होती है? अस्मिता में नकार और निषेध तो होता है। क्योंकि इसकी जरूरत ही किसी बड़े नकार और निषेध से  लड़ने के लिए पड़ती है। लोहे की तलवार का मुकाबला काठ की तलवार से तो  नहीं हो सकता है! कोशिश की ही जा सकती है कि इसके सकरात्मक प्रभाव जीवन पर पड़ें। ‘अस्मिताओं’ को तयशुदा बनाना क्या अनिवार्यत:सांप्रदायिक मनोभाव के लिए नये सिरे से एक स्पेस तैयार करने जैसा है? जी  हाँ। ‘अस्मिताओं’ को तयशुदा बनाना खतरनाक है। अस्मिताएँ जड़ और अंतिम नहीं, गतिमान और अनंतिम होती हैं! एक ध्रुवीय, एक केंद्रीय एक रेखीय और एक आधरीय तो कभी नहीं। अस्मिताओं की गतिमानताओं में बेहद आंतरिक लोच और दृढ़ता का होना जरूरी है। अस्मिताओं के संदर्भ में इस तरह के कई लघुउत्तरीय प्रश्न उठते रहते हैं, उठ सकते हैं, जिनके जवाब ढूढ़े जाने की जरूरत है। यहाँ यह साफ करना जरूरी है कि जवाब देने की हैसियत नहीं होने पर भी जबाव के महत्त्व को समझने की छोटी-सी कोशिश जरूर है और यह कोशिश ना-काफी चाहे जितनी हो, ना-हक तो नहीं है। ये जवाब किसी भी रूप में अनंतिम ही हैं। कहना न होगा कि सभ्यता विमर्श के कोने-अंतरे में इस तरह के सवालों के जवाब ढूढ़ने की अनाहत प्रक्रिया जारी रहती है। यह एक असमाप्य प्रक्रिया है। एक असमाप्य प्रक्रिया से हासिल कोई  भी जवाब अंतिम नहीं होता है। यह जानते हुए बहुत ही विनम्रता और एक तरह के निश्छल विश्वास के साथ ही इस दिशा में कुछ सोचने का साहस किया जा सकता है। विनम्रता यह कि कोई मंजिल नहीं होती इस राह में, बस  सफर ही सफर है। विश्वास यह कि इस सफर में कुछ ‘हम सफर भी’ हैं, ‘हम’ अकेले नहीं हैं।

उदारीकरण-निजीकरण-भूमंडलीकरण के दौर में प्रत्येक स्थानिकता, सामाजिकता, जातीयता और राष्ट्रीयता के प्रसंग नये सिरे से उठ रहे हैं। ‘भारत की खोज’ देश के पहले प्रधानमंत्री आदरणीय जवाहरलाल नेहरू ने की थी। कहा और समझाया जाता है कि भ्ष्टाचार, अत्याचार, कालेधन के पहाड़ के पीछे से नये और शक्तिशाली भारत का उदय हो रहा है! दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के तिमिराच्छन्न आकाश में उदित हो रहे इस नये सूर्य की नई लालिमा की झनकार को नहीं सुन पानेवाला, भारत उदय की इस नई भाषा को नहीं पढ़ पानेवाला सांस्कृतिक निरक्षर तो है ही, राष्ट्र-द्रोही भी है! राष्ट्र-प्रेमियों को यह बात सावधानीपूर्वक समझनी चाहिए कि इस उदय की विज्ञापनी आभा के पीछे विकास के नेपथ्य में भारत अस्त के अंधकार का हाहाकार धीरे-धीरे महाघोष में बदलता जा रहा है। वह कौन सांस्कृतिक महा-साक्षर है जो इस क्रूर आवाज को सचमुच नहीं सुन पा रहा है! संस्कृत के एक श्लोक के अनुसार सभ्यता विपर्य के समय सबसे पहले साक्षर वर्ण-विपर्य का शिकार होता है–- साक्षर सबसे पहले राक्षस में बदल जाता है। हाँ, यह हकीकत है कि जिस भारत को पाने के लिए 20वीं सदी शहीदों और देश-प्रेमियों की अनंत कुर्बानियों की साक्षी रही है वह भारत, हाथ आकर भी,  अब कहीं खोता जा रहा है। इसलिए भी नये सिरे से भारतीयता की खोज आज की ऐतिहासिक जरूरत है। क्योंकि, ‘भारतीयता की खोज आज के संदर्भ दो दृष्टियों से आवश्यक हैं। स्वाधीनता प्राप्ति के बाद देश में एक सांस्कृतिक अराजकता व्याप्त हो गई है। स्वदेश और स्वदेशी की भावनाएँ, अशक्त होती जा रही हैं। हम बेझिझक पश्चिम का अनुकरण कर अपनी अस्मिता खोते जा रहे हैं। यह प्रवृत्ति एक छोटे, पर प्रभावशाली, तबके तक सीमित है, पर उसका फैलाव हो रहा है। यदि इसे हमने बिना बाधा बढ़ने दिया तो हमें परंपराओं की संभव ऊर्जा से वंचित होना पड़ेगा और हमारी स्थिति बहुत कुछ त्रिशंकु जैसी हो जायेगी। दूसरा कारण और भी महत्त्वपूर्ण है। संस्कृति आज की दुनिया में एक राजनीतिक अस्त्र के रूप में उभर रही है, न्यस्त स्वार्थ, जिसका  उपयोग खुलकर अपने उद्देश्यों के लिए कर रहे हैं। उन पर रोक लग सकती है,  यदि हम निष्ठा और प्रतिबद्धता से भारतीयता की तलाश करें।’12 जिन कारणों से भारतीयता की खोज महत्त्वपूर्ण है, ठीक उन्हीं कारणों से हिंदीयता  (अन्य राष्ट्रीयताएँ / उपराष्ट्रीयताएँ भी पढें) – ‘हमारी अस्मिता’– की खोज भी जरूरी है। ‘जड़ों’ और ‘पहचान’ के मुद्दों को ‘कर्मभूमि’ (जीने-मरने और कुछ कर गुजरने की जगह) से दृढ़तापूर्वक जोड़े बिना समझा नहीं जा सकता है। इसलिए, अपने महाक्षेत्र की विभिन्न लघुजातीयताओं, सामुदायिकताओं, सामाजिकताओं, भाषिकताओं, धार्मिकताओं, पंथों और अंतर्क्षेत्रीयताओं या जनपदीयताओं के अंतर्मेल से संपुष्ट और समर्थित अंतर्मिलापी ‘हिंदीयता’ और ‘भारतीयता’ की इस खोज में सावधान संस्कृतिकर्मियों की संगठित भूमिका के  महत्त्व को बार-बार और अलग-अलग कोणों से समझना होगा। खासकर तब,  जबकि ‘वे लोग’ इतिहास को तोड़-मरोड़ कर भारतीयता की खोज के लिए ‘जड़ों’ और ‘पहचान’ के मुद्दों को ‘कर्मभूमि’ के किसी भी प्रसंग से काटकर ‘पितृभूमि’ (पुरखों के जन्म की जगह) और ‘पुण्यभूमि’ (धर्म के उद्भव की जगह) के ही हवाले से हल कर लेना चाहते हैं। कहना न होगा कि आज के इस ऐतिहासिक प्रस्थान-बिंदु पर सावधान संस्कृतिकर्मियों की संगठित भूमिका का महत्त्व कितना बढ़ गया है! क्या हम इसके लिए तैयार हो रहे हैं! उत्तर चाहे जो हो, चलते-चलते चंद्रकांत देवताले से उस औरत का पता तो पूछते चलें, जिस औरत के बारे में वे कहते हैं कि,

‘वह औरत
आकाश और पृथ्वी के बीच
कब से कपड़े पछीट रही है,
पछीट रही है शताब्दियों से
धूप के तार पर सुखा रही है,
वह औरत आकाश और धूप और हवा से
वंचित घुप्प गुफा में
कितना आटा गूँध रही है ?
गूंध रही है मनों सेर आटा
असंख्य रोटियाँ
सूरज की पीठ पर पका रही है,

एक औरत
दिशाओं के सूप में खेतों को फटक रही है

एक औरत
वक्त की नदी में
दोपहर के पत्थर से
शताब्दियाँ हो गई
एड़ियाँ घिस रही है,

एक औरत अनंत पृथ्वी को
अपने स्तनों में समेटे
दूध के झरने बहा रही है,
एक औरत अपने सिर पर

घास का गट्ठर रखे
कब से धरती को
नापती ही जा रही है,

एक औरत अंधेरे में
खर्राटे भरते आदमी के पास
निर्वसर जागती
शताब्दियों से सोई है,

एक औरत का धड़
भीड़ में भटक रहा है
उसके हाथ अपना चेहरा ढूढ़ रहे हैं
उसके पाँव जाने कब से
सबसे
अपना पता पूछ रहे हैं।’13

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1 पाब्लो नेरूदा: रुको, ओ पृथ्वी: स्पानी मूल से हिंदी अनुवाद- प्रभाती नौटियाल: साहित्य अकादेमी

2  सुमित सरकार : आधुनिक भारत : 1885 - 1905 : सामाजिक एवं राजनीतिक आंदोलन

3 सुमित सरकार : आधुनिक भारत : 1905-1917 राजनीतिक एवं सामाजिक आंदोलन

4 एस अबिद हुसैन : भारत की राष्ट्रीय संस्कृति (अनुवाद:दुर्गाशंकर शुकल) नेशनल  बुक ट्रस्ट /1987

5 Gail Omvedt : Ambedkar and After: The Dalit Movement in India: Social Movements and the State, Edit. Ghanshyam Sahah (Sage Pub.2002)

6 . Gail Omvedt : Ambedkar and After: The Dalit Movement in India: Social Movements and the State, Edit. Ghanshyam Sahah (Sage Pub.2002)

7 . Dr. Babasaheb Ambedkar : Revolution and Counter Revolution in Ancient India: Writings and speeches, Volume 3 ( Bombay Govt of Maharashtra, 1987)

8 डॉ. नामवर सिंह : स्वाधीनताः शारदीय विशेषांक 2001

9 डॉ. नामवर सिंह : स्वाधीनताः शारदीय विशेषांक 2001

10 डॉ. नामवर सिंह : स्वाधीनताः शारदीय विशेषांक 2001

11  डॉ. नामवर सिंह : स्वाधीनताः शारदीय विशेषांक 2001

12 प्रो. श्यामाचरण दुबे : समय और संस्कृति : भारतीयता की तलाश

13 चंद्रकांत देवताले : औरत : लकड़बग्घा हँस रहा है

प्रस्तुति: बिजूका समूह 
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टिप्पणियाँ:-

जय:-
फोकस के अभाव में लेख चूं चूं का मुरब्बा बन पड़ा है । एक स्पष्ट समझ का सख्त अभाव है ।eclectic दृष्टिकोण हावी है ।आइंस्टीन ने कहा है किसी बात को सहल ढंग से न रख पाने की वजह है विषय की स्पष्ट समझ का अभाव । सारी लेखकीय डिप्लोमेसी के बावजूद यह लेख सही बिंदु पर फोकस नही कर पाता। विपिन चन्द्र जैसे मेरिटवादी कांग्रेसी इतिहासकार के स्थानापन्न राष्ट्रवाद जैसे उतने ही apologist प्रतिमान को उद्धृत करते हुए बंकिम चंद्र और निराला जैसो की सांप्रदायिक सोच को ढंकने का प्रयास करता है । लेख का मूल उद्देश्य वर्ग नाम के अमूर्त कोटि के eraser से caste को साइलेंस करने की है । पुरे दलित आंदोलन को अस्मिता कह के ख़ारिज करना इसकी जड़ में है । दलित आंदोलन ब्राह्मणवादी दासता से मुक्ति की लड़ाई है । यह अस्मिता की लड़ाई नही है ।इसे अस्मिता में रिड्यूस करने की कोशिश अभय दुबे , बजरंग बिहारी तिवारी , बद्री नारायण तिवारी जैसे ब्राह्मणवादी लोगो ने की है । यहाँ प्रस्तुत लेखक कर रहा है ।
जैसा कि बुरेक ने कहा है दलित आंदोलन प्रतिरोध का आंदोलन है । इसे अस्मिता आदि कहना शाब्दिक जुगाली से बढ़कर कुछ नही ।सबसे पहले तो हिन्दू /ब्राह्मणवाद को क्रिया और बाकी चीज़ों को प्रतिक्रिया मानना ही गलत दृष्टि है । बात उलटी है ।कबीर की प्रतिक्रिया में तुलसीदास का ब्राह्मणवादी साहित्य रचा गया ।कबीर ने टाइम मशीन में जा के तुलसीदास के खिलाफ नहीं लिखा ।इसलिए दलित साहित्य क्रिया है जिसकी प्रतिक्रिया ब्राह्मणवादी साहित्य है ।
लेखक की चेतना भाववादी होने के कारन सर के बल खड़ी है । पूर्वापर सम्बन्ध उल्ट गए है ।वह अत्याचारी को विक्टिम और विक्टिम को अत्याचारी के रूप में प्रस्तुत करता है ।
जब लेखक कहता है कि ऐतिहासिक रूप से भारत तीन रहे है -ब्राह्मण भारत , बौद्ध भारत और हिन्दू भारत तो वह सबसे अनैतिहासिक दृष्टि का परिचय देता है ।इसका कारन भी वेदांती प्रत्ययवादि मानस है जो काल को स्थिर मानता है सनातन । राष्ट्र का जन्म औद्योगिक सभ्यता की देन है । इसे सामन्ती या ब्राह्मणी वर्चस्व के समय मौजूद मानना भूल है । भारत का अस्तित्व उपनिवेशवादी संघर्ष की देन है। इससे पहले भारत एक राष्ट्र  जैसी कोई चीज़ नही थी । राष्ट्र कहते हुए नार्थ ईस्ट हमारे ख्याल में नही होता जो आज के सन्दर्भ में भी न ब्राहण रहा है न बौद्ध न हिन्दू।
लगता है लेखक को दलित आंदोलन, जिसे वह अपने jargon में नव सामाजिक आंदोलन कहता है, के बारे में लेखक को ठोस जानकारी नही है ।अव्वल लेखक गैर दलित हिस्से को कई टुकड़ो में बंटे होने की सुविधा देता है । वह डाइवर्स है ।वहां बंकिम चन्द्र जैसा दकियानूस विचार वाला मूसल्मानो को असली दुश्मन मानने वाला भी है गांधी सा अहिंसावादी भी है , चन्द्रशेखर सा क्रन्तिकारी भी है ।गरज कि तरह तरह के लोग है लेकिन दलित समुदाय को मोनोलिथ मानता है। सब को एक ही कोटि में रिड्यूस करता है ।यह टिपिकल शोषक रेसिस्ट अप्रोच है ।अंग्रेज भी पूरे भारतीय को एक श्रेणी ब्लैक में रखते थे । यह essentialisation दलित को ख़ारिज करने का हथियार ही नही , उसके पीछे अवचेतन में छिपी घोर घृणा का सबूत है ।ऐसा ही संघी लोग मुस्लिम को आंतकवादी करार देते हुए करते है । अंसारी दर्जी से लेकर शेख पठान में बंटा मुस्लिम समुदाय एकाश्म बन जाता है ।एकहरा रेगीमेंटेड other। दलित एक वैविध्यपूर्ण समाज है ।वहां वर्ग को नकारने वाले लोग ही नहीं है बल्कि वर्ग को स्वीकारने वाले आनंद तेलटुम्बदे जैसे ढेरो लोग है । बीजेपी के दामन थामे उदितराज है तो हैदराबाद वि वि में संघियो को कट्टर टक्कर देते दलित छात्र भी हैं । वर्ग और जाति को एक दूसरे के खिलाफ न खड़ा कर जाति को भारतीय समाजार्थिक परिपेक्ष्य में विकसित वर्ग करार देने वाले भी है । पेरियार जैसे बुद्धिवादी है तो नारायण गुरु भी हैं ।ज्योति बा फूले अंग्रेजो और ब्राह्मणों में सांठ गाँठ देखते है ।आंबेडकर अंग्रेजो में कुछ हद तक सहयोगी देखते हैं ।अलोसियस जैसे लोग इंडिया की अवधरणा को ही ख़ारिज करते है इसे मिथ बताते है । मूलनिवासी अवधरणा वाले वामन मेश्राम भी है। इसलिए दलित को एक मोनोलिथ में रिड्यूस कर देना टिपिकल ब्राह्मणवादी उत्पीड़क वाली मानसिकता है

प्रफुल्ल कोलख्यान:-
दोस्तो, बिजूका पर मेरे इस लेख को लगाये जाने पर मुझे सचमुच बहुत खुशी हुई। खुशी इसलिए हुई कि गंभीर लोग इस पर जब अपनी राय देंगे तो मेरे लिए यह सीखने-समझने का अवसर है। जय जी ने बहुत ही गंभीरता से इस पर अपनी बात रखी, इसके लिए उनका आभार।

उन्हें फोकस का अभाव तो दिखेगा ही। लेख दलित या दलित आंदोलन पर नहीं, अस्मिता पर है। अब इसे, अपनी हड़बड़ी में, दलित या दलित आंदोलन का लेख समझकर पढ़ने की कोशिश की जायेगी तो फोकस का अभाव तो दिखेगा ही। नजर कहीं और हो और फोकस कहीं और तो फोकस का अभाव दिखना और भी बढ़ जाता है। वैसे फोकस का अभाव, हो सकता है हो। बिजूका के और साथी भी हैं जो बता सकेंगे।

आइंस्टीन ने सही कहा था, लेकिन सिर्फ मुझ पर लागू होगा ऐसा तो नहीं हो सकता है। स्पष्ट समझ का सख्त अभाव हो सकता है, सब कुढ को समझ लेनेवाला लाल बुझक्कड़ होने का दावा मेरा कभी नहीं रहा है। हाँ, सच है कि ।eclectic दृष्टिकोण है, और सिर्फ मुझ में नहीं है। ।eclectic दृष्टिकोण तो आइंस्टीन आदि को कोट करने में भी है। कोई लेखकीय डिप्लोमेसी नहीं है, डिप्लोमेसी से मुझे क्या हासिल होना है। विपिन चंद्र ने आरक्षण के औचित्य पर कुछ नागवार कहा है/ था इसलिए वे पूरी तरह दुत्कार दिये जायें यह मेरा मत नहीं, हाँ  मैं भी कई जगह और इस मुद्दे पर भी उन से भिन्न मत रखता हूँ। बंकिम चंद्र को उद्धृत करते हुए क्या कहा गया है यह भी नहीं देखा गया और इतिहासकार सुमित सरकार के संदर्भ को भी नहीं गिना गया! निराला जैसो की सांप्रदायिक सोच! क्या मतलब? लेख का मूल उद्देश्य वर्ग को न तो eraser की तरह से इस्तेमाल किया जाना है और न caste को लाउड बनाना, यह किसी और का हो सकता है, मेरा नहीं।

दलित आंदोलन को अस्मिता कह के ख़ारिज करना न तो संभव है न मेरा उद्देश्य। दलित आंदोलन ब्राह्मणवादी दासता से मुक्ति की ही लड़ाई नहीं है पूँजीवादी दासता से भी मुक्ति की लड़ाई है। इसे अस्मिता में रिड्यूस करने की कोशिश अभय दुबे , बजरंग बिहारी तिवारी , बद्री नारायण तिवारी जैसे ब्राह्मणवादी लोगो ने की है, मुझे नहीं पता। लेकिन यह तो मेरे बारे में कहा जा रहा है कि यहाँ प्रस्तुत लेखक अस्मिता में रिड्यूस करने की कोशिश कर रहा है जो गलत है। हाँ, यह कहना आसान और बहुत निरापद है यहाँ, क्योंकि जन्म से मैं ब्राह्मण हूँ। जन्म से ब्राह्मण हूँ और जानता हूँ कि कहते हैं आंबेडकर ने जिन से अपना सरनेम लेने में सलाह ली वे ब्राह्मण थे। उनकी दूसरी पत्नी भी ब्राह्मणी थी। ज्योतिबा फूले के जीवन और संघर्ष के बारे में थोड़ा बहुत जानता हूँ। हाँ जो जानता हूँ वह बहुत ‘ठोस’ नहीं है। दलित को एक मोनोलिथ में रिड्यूस नहीं किया गया है लेख में। दलित एक वैविध्यपूर्ण समाज है, और यह नहीं भूलना चाहिए कि दूसरे समाज भी वैविध्यपूर्ण हैं। सबसे पहले तो हिन्दू /ब्राह्मणवाद को क्रिया और बाकी चीज़ों को प्रतिक्रिया किसने माना, इस लेख में या कहीं मैं ने माना है? मैं ने कब कहाँ कहा कि तुलसी की प्रतिक्रिया में कबीर साहित्य है! अत्याचारी को विक्टिम और विक्टिम को अत्याचारी के रूप में  कहाँ प्रस्तुत किया गया है।

लेखक नहीं कहता है कि ऐतिहासिक रूप से भारत तीन रहे है -ब्राह्मण भारत , बौद्ध भारत और हिन्दू भारत। लेखक ने तो बाबासाहेब को कोट किया है। कोट किया है और उस विचार से सहमति रखते हुए कोट किया है। अनैतिहासिक दृष्टि, वेदांती प्रत्ययवादि मानस आदि की बातों पर कुछ कहना यहाँ जरूरी तो है मगर मेरी अपनी कतिपय सीमाओं के कारण संभव नहीं है। हाँ, बाबा साहब ने तीन भारत की बात कही थी, रष्ट्र की नहीं, इतना ध्यान दिलाना तो बहुत ही जरूरी है। मैंने पहले भी कहा है, यह लेख दलित या दलित आंदोलन पर नहीं है। न मैं दलित आंदोलन का प्रवक्ता हूँ और न ब्राह्मणवाद का पैरकार। jargon ! नव सामाजिक आंदोलन New Social Movements (NSM) का हिंदी अनुवाद है। जो मानता है कि उत्तर औद्योगिक आर्थिक व्यवस्था नये सामाजिक आंदोलन का कारण है और यह पहले के आंदोलनों से भिन्न है।

कोई कहे कि टिपिकल ब्राह्मणवादी उत्पीड़क वाली मानसिकता है, तो कहे। वे सारे लोग मेरे लिए जरूरी हैं, जो भारत के लिए जरूरी रहे हैं या हैं। कोई चाहे तो दूसरे को टिपिकल ब्राह्मणवादी उत्पीड़क वाली मानसिकता का वताकर खुद ब्राह्मणवादी उपकरणों से खेलता रहे, उसकी मर्जी।

उन्हें मेरे अवचेतन में छिपी घोर घृणा का सबूत मिल गया है। सबूत बिजूका के सदस्यों के सामने है। बिजूका के सदस्य विचार करेंगे। इतना भरोसा है। भरोसा है, तभी तो हूँ।

आलोक बाजपेयी:-
बहुत दिनों बाद यहां पर एक विचारोत्तेजक आलेख आया है जिसमे गंभीर प्रश्नो की पड़ताल की गुंजाइश है।
फ़क़ीर की यह बात सही है कि लेख की भाषा और सरल हो सकती थी पर लेखक अपनी चिंता साझा करने में सफल है।
रही बात बिपन के मेरित्वादि होने की तो यह सरलीकरण है। और यह बहस उस पर केंद्रित नहीं होनी चाहिए। इसके लिए अलग से चर्चा ठीक रहेगी।
विस्तृत कमेंट्री बाद में समय होने पर करूँगा।
फिर भी शुक्रिया की आपने यह लेख साझा किया।

जय:-
इसे अस्मिता पर लिखे निबन्ध की तरह ही पढ़ा गया है । दलित पर निबन्ध की तरह नही । मगर अस्मिता पर इस निबन्ध का एक हिस्सा दलित पर भी है । आप जन्म से क्या है इससे मुझे मतलब नही ।आपका दृष्टिकोण typical ब्राह्मणवादी वाला है यह बताना मेरा अभिप्रेत था ।सच तो यह है कि आज खुल कर बताया तो आज मुझे पता चला कि आप जन्म से क्या है । वरना मैं इस तथ्य से अनभिज्ञ था । आप कूट भाषा में बोले होंगे लेकिन मैं नही समझ पाया होऊंगा । बात भारत को तीन भाग मानने की नही है उसे शाश्वत सत्य मानने की है ।बाबा हो या कोई भी , देवता नही है । उन्होंने खुद कहा कि उनकी दो बाते विरोधाभासी हो तो बाद वाली बात माननी चाहिए ।जैसे पहले वो मन्दिर प्रवेश के लिए आंदोलन करने को सोचते थे लेकिन बाद में उन्होंने कहा -हिन्दू धर्म धर्म नहीं , बीमारी है ।' 1956 में उन्होंने हिन्दू धर्म छोड़ दिया

आरक्षण विरोधी और छोटी जाति को थर्ड रेट कहने वाला कांग्रेसी इतिहासकार बिपन चन्द्र आपके काम के हो सकते है हमारे लिए दुश्मन है क्योंकि जो हमे थर्ड रेट कहता हो उसको अपनाने की बेवकूफ आत्माहीन उदारता हम नही दिखलाते ।बाबा साहेब ने कहा है -अपने दुश्मन को प्रेम करना आत्मसम्मान के लिए detrimental है ।

बिपन चन्द्र ने न सिर्फ मण्डल कमीशन का पुरजोर विरोध किया उन्होंने अपने विभाग में दलित पिछडो की नियुक्ति व्यवहारिक स्तर पर भी नही होने दी जबकि खुद अपने जीजा के jnu ने उच्च पदस्थ होने का फायदा उठाया । परिणाम यह है कि संविधान की धज्जी उड़ाते हुए jnu में कभी आरक्षण रोस्टर लागू नही हुआ । दलित सवाल सिर्फ पहचान का सवाल नही है नौकरियों और pop में उनकी भागीदारी का भी सवाल है ।

आलोक बाजपेयी:-
फ़क़ीर,क्या आप यह कहना चाहते है कि बिपन अपनी सोच में दलित विरोधी थे?
यह भी देखने की जरुरत है कि अगर बिपन या दूसरे बुद्धिजीवियो ने मंडल कमीशन वी पी सिंह द्वारा लागू करने का विरोध किया था तो इसका कारण क्या यह था कि वे मूलतः दलित उठान विरोधी थे और नहीं चाहते थे कि ब्राह्मणवादी व्यवस्था को दलितों द्वारा चुनौती मिले या वो कुछ दूसरे मूलभूत प्रश्न उठाना चाहते थे?

जय:-
मैं इस सरलीकृत सोच के तहत नही कह रहा कि बिपन आरक्षण विरोधी तो ख़ारिज करने योग्य है ।इसके पीछे जो कारण वह वजह हैं ।इसके पीछे वह संघी लोगो जैसा मेरिट का तर्क देते हैं ।यह मेरिट के बारे में उनकी उथली समझ का पता देते है। क्योंकि निश्चित तौर पर उन्होंने पियरी बोर्दू को पढ़ा होगा । तब या तो वे सोशल कैपिटल की अवधारणा को समझे नही ।इसकी कम सम्भावना है ।फिर तो यही बचता है कि उनका जातीय स्वार्थ समझ के ऊपर भारी पड़ा।
अगर गोरे रंग को सुंदरता की परिभाषा बना दे तो सारे काले असुंदर हो जायेंगे ।इसलिए अहम यह है कि मेरिट को परिभाषित कौन करता है । गांधी नेहरू टैगीर को पढ़ना  ही जनरल स्टडीज है और यही जनरल स्टडी मेरिट है सत्ता के पदों पर प्रतियोगिता पास करने के लिए ।ऐसे में अम्बेडकर को पढ़ने वाला कम मेरिट वाला होगा ।एक उत्तर भारतीय  सवर्ण तुलसीदास को रटता हुआ बड़ा होता है ।एक छोटी जाति का लड़का लड़की लोरिक सवरु और चूहड़ मल को सुनता पढ़ता हुआ । सिलेबस तुलसीदास से भरा हुआ है ।यह structural bias  निश्चय ही सवर्ण को अधिक  मेरिट वाला सिद्ध करता है । इसलिए बिपन की बात सिर्फ आरक्षण विरोध की नही है । यह उनके अवचेतन में छोटी जाति के प्रति प्रच्छन्न डीप रूटेड सीटेड घृणा के बारे में है । यहाँ सिर्फ एक दींन हींन ओड़िया कवि हलधर नाग टाइप दलित स्वीकार है । बराबर की मनुष्यता का हामी दलित नही । बराबर को बेशी करके पढ़ने वाले लोग reverse castism की बात करने लग जाते है । यह शबरी निषाद हनुमान सिंड्रोम पुराना है।

दीपक मिश्रा:-
प्रफुल्ल के आलेख में बहुत haze है, जैसा कि नीलिमा जी ने लिखा है, कहना क्या चाहते है? अन्त अन्त तक साफ नही है। जय भाई ने चीजो को पर्सपेक्टिव में रखा है। बिपिन चन्द्र वाकई में कांग्रेसी इतिहासकार हैं। उन्हें पढ़ कर inc का ही इतिहास पता चलता है। जय भाई salute।

प्रफुल्ल कोलख्यान:-
मुक्तिबोध और कुछ हद तक नागार्जुन उनके प्रिय कवि है और डी डी कोसंबी प्रिय इतिहासकार। इसलिए वे जन्मवादी या रेसिस्ट नही हूँ ।रैशनल हैं। उनके लिए इतना काफी है।
कबीर, ज्योतिबा फूले आंबेडकर मेरे प्रिय हैं इस से कोई फर्क नहीं पड़ता मेरा दृष्टिकोण typical ब्राह्मणवादी वाला है, यह बताना उनका अभिप्रेत था और बता दिया, साबित करने की बात ही क्या। उन्होंने बताया यही प्रमाण है, कम-से-कम बिजूका के सदस्यों के लिए। आभार, बिजूका एक।

जय:-
इसलिए 'की जगह ' न लिखकर 'के सिवा ' लिखा । थ्योरी और समान्यीकरण का अपना महत्व है । मार्क्स की पद्धति का हामी हूँ ।generalisation को विवरण की दृढ़ता से जोड़ना । लेकिन प्रफुल्ल जी ने जो लिखा है पूरा metaphysical है । ideological (althusserian अर्थो में )

आलोक बाजपेयी:-
फिर से आलेख को पढ़ा। आलेख के भाषाई  गठन में कई समस्याएं हैं लेकिन आलेख कई स्तर पर विचारोत्तेजक है और महत्त्वपूर्ण है। इसके पाठ से कुछ बिंदु जो मेरी समझ में आये उन्हें साझा कर रहा हूँ जिससे कि मच मुख्य विचार बिंदु निकल सकें। जरुरी नहीं कि मेरा पाठ सर्व स्वीकृति तथापि या बिंदु वह हैं जिनसे अभी भी जूझ रहा हु।
1, यह आलेख मूलतः अस्मिता या identity और राष्ट्रवाद nationalism पर केंदित है।
2,राष्ट्रवाद कोई वक विशिस्ट प्रकार की केटेगरी नहीं है बल्कि भारत में राष्ट्रवाद की कई प्रवत्तीयां एक साथ आजादी की लड़ाई के दौरान विकसित हुई। कुछ सकारात्मक थी और कुछ नकारात्मक।
3 राष्टवाद भारत में जिस प्रकार विकसित हुआ उस कारण उसमे कुछ ऐसे gap रहे जिन्में उपनिवेशिक विमर्श हावी रहा और बाद के दिनों में भी उपनिवेश पोषित राष्ट्रवाद खूब फला फूला है।
4, अस्मिता बोध और संघर्ष का एक सकारात्मक पहलु यह है कि इस कारण जातीय शोषण के प्रश्नो को mainstream political discourse में जगह मिली और अमानवीय जाति प्रथा और ब्राह्मणवादी वैचारिक वर्चस्व को चुनौती मिली। ध्यान रहे यह केवल सांस्कृतिक पटल पर हुआ न कि किसी वैकल्पिक समाज संगठन या व्यवस्था के तौर पर।
5, identity focused obsession का नकारात्मक असर यह हुआ कि इसने समाज विश्लेषण और संघर्ष के विश्व भर में स्वीकृत वर्गीय संघर्ष और साम्राज्यवाद विरोधी चेतना और enlightenment values के लिए संघर्ष को कुंद किया।
6 अस्मिता बोध का विमर्श अपनी इच्छा में pre modern, traditional और culturally बदलाव के विरुद्ध और anthropological pereservation का है जो कि मानव सभ्यता की मूल प्रवत्ति के विपरीत में है।
चूंकि अस्मिता विमर्श स्व अनुभववाद पर ही टिक है इसलिए विभिन्न शोषित वर्गों या समुदायो की एक जुत नहीं किया जा सकता इस विमर्श द्वारा। यही कारण है की यह inclusive या बहु समावेशी नहीं है। मात्र हाय हाय में सिमट कर रह जाता है या फिर प्रतिक्रियावादी तत्वों द्वारा use हो जाता है।
7, भारत में अस्मिता विमर्श ज्यादातर राजनितिक रूप से केवल उसी ब्राह्मणवादी व्यवस्था में शामिल होने का स्वांग बन कर रह गया है जिसको वह नापसंद करता रहा है तथापि उसके वर्चस्ववादी आतंक से बुरी तरह प्रभावित भी है। इन अर्थो में यह उसी ब्रह्नवादि व्यवस्था का स्वयं उस अस्मिता के समावेश किये जाने के अभियान तक ही रह जाता है। इसका स्वरूप कार्य योजना व् मांगे कार्यक्रम उसी ब्राह्मणवादी सोच का असीमित विस्तार है। समाज के शोषण व् मूलभूत व्यवस्था परिवर्तन से इसका वास्ता नहीं बल्कि राह में रोड लगाने वाला ही साबित होता है।
8 इसके आलावा यह भी जानना जरुरी है की आइडेंटिटी पॉलिटिक्स साम्राज्यवादी बौद्धिक जुगाली का एक हिस्सा है जो उन्होंने क्रांतिकारी बौद्धिक विमर्श को भटकाने के लिए दुनिया को दिया।
9, एक टिपण्णी अंत में राष्ट्रीय आंदोलन और जाति के प्रश्न पर करना जरुरी है। भारत में जाती विरोधी आंदोलन मुकञ धरा के राष्ट्रीय आंदोलन में प्रखरता के साथ चले जिसकी परिणीति संविधान में दिखाई देती है। साथ ही अलग से जाती विरोधी आंदोलन हुए वह भी मुख्य धरा में शामिल हुए और बड़ा योगदान किया। तीसरी धरा उपनिवेशवाद सथित जातिवादी आंदोलन सोच की धरा थी जो की उपनिवेशवादी बांटो और राज करो से चली और उसने अन्य प्रतिक्रियावादी साम्प्रदायिक धाराओं से खूब गलबहियां की।आंबेडकर पेरियार फुले जाती विरोधी दूसरी धरा के शिखर थे । जस्टिस पार्टी युनितनिस्ट पार्टी तीसरी धारा रही।

जय:-
तथा कथित राष्ट्रिय आंदोलन उच्च जाति का आंदोलन था । वहां ब्राह्मण और उसकी पिछलग्गू जातियॉ के हित ही राष्ट्र के रूप में परिभाषित कर दिए गए थे ।

प्रदीप मिश्रा:-
आलोक भाई आभार। मित्रों अलोक के द्वारा उठे सवालों को सन्दर्भ में लेते हुए हम चर्चा करें। प्रफुल्ल जी इन सवालों को लेकर यदि आपको कुछ कहना है तो कहें। जय भाई आप जो कह रहे हैं वह अलोक जी की विवेचना में स्पष्ट है। अगर हो सके तो सरे बिंदुओं पर क्रम से प्रकाश डालें। तो हम सब लाभान्वित होंगे। आपकी metaphisical वाली बात को यहां पर इन सवालों के सन्दर्भ में या नए सवाल की तरह रखें।

प्रदीप मिश्रा:-
जय भाई क्या यह सही है राष्ट्रिय आंदोलन सिर्फ उच्च जातियों का आंदोलन था। यह वक्तव्य तथाकथित आंदोलन उठाने वाले मंच की भाषा में है। हम आम आदमी की भाषा में समझने की कोशिश करें और तथ्यों की प्रमाणिकता को सबसे बड़ा तर्क़ माने तो चर्च और बढ़ेगी।

आलोक बाजपेयी:-
जी कतई नहीं। आप किसी आंदोलन की समीक्षा उसके लीडर्स की जाति से करेंगे या उनके कार्यक्रमों विचारधारा और मांगों के आधार पर। हमें यह समझना चाहिए की मनुष्य में अपनी सामाजिक स्थिति से पर जाने की छमता है। मार्क्स  मध्य वर्ग के थे। पूरा इतिहास उदाहरणों से भरा है। यह कहकर नहीं बचा जा सकता की यह अपवाद है। जब हम लीडरशिप की बात करते है तो वह हमेशा एक माइनॉरिटी होती है। समाज पर उसके नैतिक असर के कारण वह नेतृत्व की भूमिका में आती है। भारत की जनता त्याग बलिदान और संघर्ष को महत्त्व देती है। वह इनमे प्रचुर मात्र में था।

जय:-
प्रूधों के खिलाफ मार्क्स के तर्क पढ़े हैं और गरीब का लीडर गरीब जैसे positivism को नही मानता ।लेकिन फ़र्ज़ करे भारतीय आज़ादी के सारे के सारे लीडर अंग्रेज होते तो अजीब नही लगता ?
अगर 'राष्ट्रिय आंदोलन ' ( यह अलग सवाल है कि यह कितना राष्ट्रिय था ?) में अगड़ो का घनघोर वर्चस्व किसी को प्रोब्लेमाटिक नही लगता तो लगता तो बात आगे नही बढ़ सकती ।यह differend की स्थिति है। यह उसी तरह का सोफिज्म है जो आरक्षण विरोधी यह कह के करते है कि फिर क्रिकेट शादी में भी आरक्षण हो ??? बुर्के के विरोध का अर्थ नगई का समर्थन नही होता । ब्राह्मणों के वर्चस्व के विरोध का अर्थ उनका एक्सलूसिव नही है ।यह सब रिवर्स रेसिज़्म जैसी बाते है ।
राष्ट्रीय आंदोलन देश को टुकड़े होने से न रोक पाया उसके पीछे ब्राह्मणों का यही वर्चस्व था । अगर नेतृत्व लोकतान्त्रिक और समवेशी होता तो ऐसी नौबत नही आती । इसलिए आज ही सवर्ण ही इसे राष्ट्रिय कहते है । india is essentially brahmIndia

प्रदीप मिश्रा:-
मैं अलोक से सहमत हूँ किसी भी आंदोलन की समीक्षा उसमें निहित उद्देश्य के आधार पर होनी चाहिए।

जय:-
निहित उद्देश्य और नेतृत्व की बनावट को अलग करके देखने की दृष्टि ही eclectic दृष्टि है ।dialectic दृष्टि चीजो के अंतरसंबंध को दरकिनार नहीं करती ।

प्रदीप मिश्रा:-
जय भाई सिद्धान्तों के बजाये कुछ ठोस उदाहरण दें। नाम सहित तो बात बने।

जय:-
राष्ट्रिय आंदोलन विभाजन को नही रोक पाया यह एक उधाहरण ही तो है कि वह कैसा था ।
इसे ऐतिहासिक अनिवार्यता बताने का मैं कायल नही । यह tautology है । इसे साफ़ साफ़ राष्ट्रिय आंदोलन की असफलता मानता हूँ

प्रदीप मिश्रा:-
आपकी सबसे ताजी टिप्पणी को सही मान लूँ तो हमसब खरिज क्योंकि हम सब किसी न किसी जाति से सम्बंधित हैं। और हमारा स्वप्न जाति विहीन समाज का है। जो कि इलेक्ट्रिक है। आपके अनुसार। यानि दलित की लड़ाई जब दलित लड़ेगा तभी सही है दूसरे लड़ेंगे तो गलत।

जय:-
किसी भी जाति में उतपन्न आदमी जाति को नष्ट कर सकता है ।लेकिन एक ही जाति के वर्चस्व को जातिवाद न समझने वाला व्यक्ति कतई नही

प्रदीप मिश्रा:-
कहीं का ईंट और कहीं करोड़ा मत जोड़ें। तो हम सार्थक बाय कर पाएंगे। बुर्के वाला प्रश्न कहाँ से आ गया।

आलोक बाजपेयी:-
मैंने जो कहा आपकी बात पर वो एक जवाब था। सच यह है की राष्ट्रीय आंदोलन एक multi class multi caste मूवमेंट था।

जय:-
मार्क्स ने अपने अपने मध्यम वर्गीय पन को नष्ट किया था और खुद को सर्वहारा से identify किया। यह तथाकथित भारतीय कम्युनिष्ट न कर सके

आलोक बाजपेयी:-
आपका इसे ब्राह्मण आंदोलन कहना वाही कोलोनियल सोच का परिणाम है जिसमे मध्य काल में राजा के धर्म के आधार पर उसे मुस्लिम काल कहा गया।

जय:-
मैंने इसे ब्राह्मण आंदोलन नही कहा ।यह आप कह रहे है ।इसे राष्ट्रिय आंदोलन ही कहा मगर यह राष्ट्रिय खण्डित थी क्योंकि इसपर जाति विशेष का वर्चस्व था । यह लोकतान्त्रिक नही था

प्रदीप मिश्रा:-
जय भाई सटीक और तथ्यों के साथ क्रम में  बात करें तो मज़ा आएगा।विषय कठीन है।

जय:-
त्याग वे अपनी जाति के लिए कर रहे थे ।मंत्री पद उनकी जाति को मिले । आज़ादी के बाद प्रधान मंत्री सहित लगभग सभी राज्यो के मुख्यमंत्री सवर्ण थे।

आलोक बाजपेयी:-
विषय अत्यंत जटिल है और हम सब कही न कही biased है। थोड़ी थोड़ी सच्चाई पकडे खुश हो रहे हैं। इसलिए नम्रता और जरुरी है।

प्रदीप मिश्रा:-
यह आंदोलन कब और कहाँ हुआ यह कोई बताएगा। और अगर यह आज़ादी की लड़ाई के बारे में है। तो जय भाई बहुत गलत संदरणः ले रहे हैं।

सत्यनारायण:-
जब हम किसी भी विषय पर बात करते हैं...बहुत उदार होकर यदि सिर्फ़ विषय और उससे जुड़ी बातों पर विचार करते हैं...तो शायद कुछ बेहतर विचार कर पाते हैं....लेकिन जब हम पार्टी बन जाते हैं.....तो फिर हमारे विचार कुछ सीमित होने लगते हैं.
कहीं न कही हम ख़ुद की समझ को बेहतर करने में जुट जाते हैं. जबकि होना यही चाहिए कि सामूह चिंतन से...सबकी समझ से कोई बेहतर बात...निकल कर आए.....कोशिश हो कि हम पार्टी नहीं बने....
बाक़ी बात अच्छी चल रही है....शुक्रिया सभी का

आलोक बाजपेयी:-
यह सही है की राष्ट्रीय आंदोलन में नेतृत्व के रूप में तमाम ऊपर से लेकर तालुका व् गाँव लेवल तक ब्राह्मण व् अन्य सवर्ण की बहुतायत थी। परंतु इसका कारण यह था कि राष्ट्रवादी चेतना, उपनिवेशवाद विरोधी राजनितिक समझ और आधुनिक राजनीति की व्यापक समझ व् जागरूकता इस वर्ग में सबसे पहले आई और लंबा संघर्ष कर सकने की स्थिति में यह तबका था। इसमें वह जातिया भी शामिल है जो भले ही वर्ण क्रम में सवर्ण  न हो और पिछड़े या दलित सोपान में हो और बौद्धिक रूप से आधुनिक राजनीति से रूबरू हो चुकी हो और आर्थिक रूप से भी सक्षम हो।
देखना यह होगा की क्या इन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन का नेतृत्व करते हुए अपने जातीय हित को संपुस्त किया या उदबोधन से प्रभावित होकर मानव समानता और मानव सम्मान के लिए कार्य किया।
अगर हम राष्ट्रीय आंदोलन का सर्वांग अध्यन करे तो निश्चित पाएंगे की औपनिवेशिक सत्ता के बावजूद समाज सुधार और अन्य फलक पर ऐतिहासिक संगठित कार्य हुए। बानगी के तौर पर गांधी के रचनात्मक कार्यक्रम को ले सकते है जिसके तहत लाखो कार्यकर्ताओ ने गाँव गाव जाकर वहा रहकर समाज को जगाया और ठोस कार्य किये।
याद रखिये यह सब करने के लिए उनके ऊपर कोई दबाव नहीं था।

जय:-
चलिए आप भी अरुंधति राय की तरह casteless निकले । जाति ड्रैगन की तरह एक काल्पनिक चीज़ है । उच्च जाति मेरिट वाली है पहले जागरूक हो गयी ।

आशीष मेहता:-
वाह, सत्य भाई। पर्चे मानवतावादी और विचार संतों के। कभी कभी 'पार्टी' और पक्षधरता में बहुत महीन अंतर ही रह पाता है।

आपकी बात हमेशा की तरह अनुकरणीय है। उम्मीद है, राह सुगम होगी ।

जटिल विषय पर आपकी सरल टिप्पणी /विचार प्रार्थी

जय:-
आलोक भाई , बिपन जी की किताबो में तर्क पढ़ चूका हूँ ।कतई मुतासिर नही हूँ । क्योंकि यह सवाल को rephrase करने को जबाब के रूप में प्रस्तुत करती है । आखिर पढ़ाई लिखाई पर स्वर्णो का वर्चस्व क्यों था ?आखिर तिलक दलितों को पढने के विरोधी क्यों थे ?राजगोपाल चारि ने तो जाति आधारित शिक्षा तक शुरू की । किस तौर राष्ट्रिय हो गए ?
और यह पार्टीशन/पक्षपाय  जैसी संकीर्ण चीज़ से नही जुडी ।बात सिद्धांत और न्याय की है। दलित आंदोलन के सन्दर्भ में भी इसमें पुरुष वर्चस्व का विरोध करता हूँ ।और ऐसे तर्को का समर्थक नही कि पुरुष ज्यादा पढ़ा लिखा है तो वही नेता होगा /है। यह यथास्थिति वादी तर्क है । यथास्थिति के खिलाफ स्त्री के बराबर भागीदारी ही न्याय की मांग है।

आशीष मेहता:-
जय भाई, विमर्श का ओर छोर पकड़ने की कोशिश में हूँ। It is too academic  and theorist at times, and I am finding myself illiterate.

पर, आप बुद्धिजीवियों (तितिक्षाजी, आप की रायल्टी पक्की।) के विमर्श में यदि मदद मिले तो कुछ कहना चाहता हूँ।

श्री ज्योतिर्आदित्य सिंधिया को आज भी ७५ वर्षीय रंजी खिलाड़ी "महाराज" कह कर मानो खड़ी खम्बा करते हैं। कई बार लगता है मानो हम आदि हैं वर्ण व्यवस्था के, और चाहते हैं इसे बरकरार रखना।

ठीक, पलट। "महाराज" (चाहे कोई भी हो।) अक्सर सुव्यवस्थित, सुव्यवहारी एवं सौम्य होते हैं, मानो प्रशासनिक / राजकीय वरदान प्राप्त हों।

मेरिट, conditioning, opportunity का कुछ तो परस्पर संबद्ध होता है।

जातिगत आरक्षण संवैधानिक होने का इकलौता सकारात्मक पक्ष "उचित अवसरों का प्रावधान" है। फिर भी इसके पक्ष-विपक्ष / सामाजिक-राजनैतिक (भले ही नीतिहीन हों) सरोकार गाहे-बगाहे मिल जाते हैं।
ढ़ाई लिखाई पर सबका हक़ है यह सोच आधुनिक है। आधुनिक चेतना आये बिना यह प्रश्न ही नहीं आता। सर्व शिक्षा की मांग करने और उसके लिए जतन  करने वाले लोग राष्ट्रीय आंदोलन में हैं।
कृपया यह न समझे की मई भीतर छुपे जातीय पूर्वाग्रहओं की अनदेखी कर रहा। तिलक रजा जी में स्व जाती अभिमान मौजूद है।

जय:-
देखिये न्याय की मांग को मेरिट से नही काटा जा सकता । ब्रिटिश भी मेरिट और श्रेष्ठता को अपने शासन का आधार बता जस्टफाई करते थे । पुरुष भी ज्यादा मेरिट वाला है इससे पितृ सत्ता सही नही हो जाती । वे मेरिट के कारण सत्ता में नही है सत्ता में होने के कारण इतिहास ने उन्हें मेरिट वाला होने की स्थिति दी है । लेकिन materialism इस पर भारी पड़ता है ।परिवर्तन होता है ।न्याय इतिहास जनित मेरिट से हमेशा टकराता है

आलोक बाजपेयी:-
सहमत हूँ। पर क्या आपको नहीं लगता के आपके न्याय मराई के तर्क को भी कही न कही एडजस्ट करने accomodate करने और बहुत दूर अंतिम छोर तक नहीं दौड़ाया जा सकता? या यह अपने आप में ही अंतिम सत्य या साध्य या राजनितिक मंजिल है?

प्रदीप मिश्रा:-
इतने जटिल विषय पर इतनी आसानी से कोई सहमती नहीं बन सकती है। और बनानी भी नहीं चाहिए।

प्रदीप मिश्रा:-
लेकिन इसतरह की चर्चा हमारी चेतना पर दस्तक की तरह होती है। इस दस्तक के लिए तिथि और बिजूका का आभार।

जय:-
यही लोकतन्त्र है । एक न्यूनतम सहमति तो सदैव है ही फासिज्म के खिलाफ । यही न्यूनतम आगे बढ़ने का आधार है ।dialectical unity है ।

देवेन्द्र रिनावा:-
लगातार मुझ जैसे अनेक और भी बहस में सक्रीय हिस्सा लिए बगैर भी शमिल हैं/थे और इस बहस को जारी रखने वालों के प्रति आभार।

आलोक बाजपेयी:-
जब आज यह चर्चा चल ही रही है तो दो बिन्दुओ पर कुछ कहना चाहुगा। पहला कि बिपन कांग्रेसी इतिहासकार थे?दूसरा सवर्णजाति वाद राष्ट्रीय आंदोलन और जाति विरोधी आंदोलन।
मैं बिपन का आखिरी छात्र हु। फ़क़ीर भाई जानते हैं। घंटो बिपन से इस आरोप पर चर्चा हुई व्यक्तिगत।तो जो बातें उन्होंने कही और मैं जैसा समझ उसे साझा कर रहा हु।
बिपन ने हमेशा कहा और गर्व से कहा की उनके सारे व्यक्तिगत मित्र कम्युनिस्ट रहे हैं । लिस्ट लंबी है फिर भी बताता हूँ। अजय घोष पी सी जोशी ईएमएस रणदिवे डांगे राजेश्वर राव मोहित सेन हरकिशन सुरजीत रणधीर सिंह इरफ़ान हबीब कुछ नाम जो तुरंत याद आते है। बाद में जब नक्सलवादी उभार आया तब भी बिपन इस आंदोलन के नेताओ छात्रो और नौजवानो से लंबे वैचारिक संपर्क में मित्र की हैसियत में रहे। उन्होंने कहा कि मेरा कांग्रेस में कोई मित्र नहीं रहा कभी और ना ही कभी खुद मिलने गया किसी से। एक बार इंदिरा गांधी ने मिलने की इच्छा की खालिस्तान मूवमेंट के दौरान तो बात चीत के लिए गया। एक बार राहुल गांधी ने मिलने की रिक्वेस्ट की तो गया कुछ स्टूडेंट्स के साथ। मैंने हजारों शामें कम्मुनिस्ट दोस्तों के साथ बितायी। बिपन कहते थे कि एक सामान्य सा कम्मुनिस्ट भी दूसरी पार्टियो के शीर्ष नेतृत्व से ज्यादा अकल्मन्द होता है।
बिपन मार्क्सवादी जरूर थे लेकिन पार्टी लाइन से बांध के सोचने वाले नहीं थे। सही को सही और गलत को गलत कहने में न तो झिझकते थे और न डरते थे। 1970 के मध्य से उनका कम्मुनिस्ट पार्टियो से मतभेद हुआ तमाम मुद्दों पर। जो साथी भारत में कम्मुनिस्ट पार्टियो की कार्य पद्धति जानते है वो जानते है की किसी को गिराने के लिए क्या क्या षड्यंत्र किये जाते रहे हैं। बिपन पर भी तमाम षड्यंत्र चलाये गए हालांकि उनका लिहाज करते हुए । व्यक्तिगत मित्रताये हमेशा चली आखिर तक।
बिपन ने आज़ादी से पहले की कांग्रेस और बाद की कांग्रेस में अंतर किया। रणनीति के तौर पर भारतीय वामपंथ की समझ अन्य पार्टियो के बारे में क्या रहनी चाहिए इस पर उनका स्पष्ठ मानना था देश में साम्प्रदायिक फासीवाद का आसन्न खतरा है और वामपंथ को ऐसी पार्टियो के साथ सम्बन्ध नहीं रखना चाहिए। वो अंध कांग्रेस विरोध के खिलाफ थे और कम्मुनिस्ट पार्टियो की इस सोच के खिलाफ भी की कांग्रेस का अंध विरोध करके उसे मिटा के जो स्पेस निकलेगा उसे हम भर लेंगे।
इस सोच के कारण और गांधी के पुनर्मूल्यांकन के कारण उन पर ठप्पा लगा दिया गया कांग्रेसी होने का।
बिपन हंस के कहते थे की अगर कांग्रेस के प्रति झुकाव के कारण मैं कांग्रेसी हो गया तो फिर हमारे कामरेड जो अलग अलग समय में जातिवादी छेत्रवादि और साम्प्रदायिक दलो के साथ मिलकर चले हैं तो वो भी अपने ऊपर ठप्पा लगवा लें और फिर मार्क्सवादी ढंग से बहस करें की किसका ठप्पा कम खराब है।
भारत में सवर्ण जाती आंदोलनों को समझने के लिए उन्नीसवी सदी में जाना होगा। 1825 के आस पास।
जब से भारत में प्रतिनाधित्व आधारित और सार्वजनिक सांस्कृतिक गतिविधियों शुरू हुई तब से ही जमींदार समर्थित ब्राह्मणवादी कट्टर संगठन बनने शुरू हो गए जो हर तरह की प्रगतिशीलता के खिलाफ थे। इन्ही में तमाम अन्य जातीय संगठन भी बने कायस्थ सभा वैश्य सभा धर्म सभा छत्रिय सभा सनातन सभा आदि आदि। यह संगठन चुपपुत स्तर पर सक्रीय रहे और हर जाती सुधार स्त्री प्रश्न दलित प्रश्न सबका विरोध किया। इनके अपने प्रेस थे अपनी पत्रिकाये थी अपने कट्टर कार्यक्रम थे। दूसरी और राममोहन राय वाली धरा थी जो सीमित संसाधनों और घोर विरोध के बावजूद समाज सुधार धर्म सुधार के लिए प्यायास रत रहती थी।
बाद में जो पहली कट्टर धरा थी वह हिन्दू साम्प्रदायिकता की वाहक पोषक बानी या मुस्लिम साम्प्रदायिकता की।
इनके खिलाफ लड़ने वालो में राष्ट्रीय कांग्रेस और तमाम जाति विरोधी संगठन थे। इन सबका आपस में बहुत जटिल और संसलिस्थ सम्बन्ध था लेकिन इतना भी नहीं कि हम समझ न सके की कौन प्रगतिवादी था और कौन प्रतिक्रया वादी।
1920 के बाद यह डिवीज़न तेज होता गया। उपनिवेशी शाशन इन्हें हवा देता था सरक्षण देता था और कांग्रेस के खिलाफ इस्तेमाल भी करता था।
बाकी बाद में अगर साथी चाहेंगे तो।

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