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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

लोकप्रियता और यथार्थवाद बेर्टोल्ट ब्रेष्ट (1938)

आज आपके लिए यह लेख प्रस्तुत है,  जो साहित्य में लोकप्रियता और यथार्थवाद की भूमिका और महत्व पर केन्द्रित है।  इस लेख पर आपके विचारों का स्वागत है..

▪लोकप्रियता और यथार्थवाद
बेर्टोल्ट ब्रेष्ट (1938)

⏺अगर हम एक ज़िन्दा और जुझारू साहित्य की आशा रखते हैं जो कि यथार्थ से पूर्णतया संलग्न हो और जिसमें यथार्थ की पकड़ हो- एक सच्चा लोकप्रिय साहित्य- तो हमें यथार्थ की द्रुत गति के साथ हमकदम होना चाहिए। महान मेहनतकश जनता पहले से ही इस राह पर है। उसके दुश्मनों की कारगुजारियाँ और क्रूरता इसका सबूत हैं।

कोई भी जो समकालीन जर्मन साहित्य में नारों को प्रयोग में लाना चाहता है, उसे अपने दिमाग़ में यह अवश्य रखना चाहिए कि जिसे भी साहित्य कहा जा सकता है, वह केवल व्यापक अर्थ रखता है, और केवल अपने व्यापक अर्थों में ही समझा जा सकता है। इस प्रकार ‘लोकप्रिय’ पद जिस रूप में साहित्य में प्रयुक्त हो रहा है, उससे यह एक विचित्र संकेतार्थ ग्रहण कर लेता है। इस सूरत में, लेखक से उन लोगों के लिए लिखने की उम्मीद की जाती है जिनके बीच वह नहीं रहता है। फ़िर भी यदि कोई इस मामले पर अधिक गहराई से विचार करे तो वह पायेगा कि लेखक और जनता के बीच का यह अन्तर इतना विशाल नहीं है, जितना कि इसे कोई सोचता है। आज यह अन्तर इतना विशाल नहीं है जितना कि यह प्रतीत होता है, और पहले यह उतना न्यून नहीं था जितना कि प्रतीत होता था। प्रचलित सौन्दर्यशास्त्र, पुस्तकों का मूल्य और सेंसर व्यवस्था ने लेखक और लोगों के बीच हमेशा ही एक विचारणीय दूरी सुनिश्चित की है। फ़िर भी इस दूरी के बढ़ने को पूरी तरह से “बाह्य कारक” के रूप में देखना गलत होगा- अर्थात अयथार्थपरक होगा। निःसंदेह आज लोकप्रिय शैली में लिखने के योग्य होने के लिए विशेष प्रयास करने होंगे। दूसरी तरफ यह ज़्यादा आसान हो गया है– ज़्यादा आसान और ज़्यादा ज़रूरी। जनता ऊपरी तबकों से ज़्यादा स्पष्टता के साथ दूर हुई है; उसके उत्पीड़क और शोषक खुले तौर पर सामने आ गये हैं तथा उसके ख़िलाफ़ व्यापक पैमाने के भयंकर खूनी युद्ध में संलग्न हैं। पक्ष लेना आसान हो गया है। कहा जा सकता है कि “जनता” के बीच खुली लड़ाई छिड़ चुकी है।

आज यथार्थवादी शैली में लेखन की माँग को और अधिक लम्बे समय तक आसानी से टाला नहीं जा सकता। इसने एक हद तक अपरिहार्यता ग्रहण कर ली है। शासक वर्ग पहले के मुक़ाबले प्रायः ज़्यादा और बड़े झूठ बोल रहा है। सच्चाई बताना, स्पष्टतः पहले से कहीं ज़्यादा ज़रूरी काम हो गया है। पीड़ा और इसके साथ पीड़ितों की संख्या भी पहले से कहीं ज़्यादा बढ़ चुकी है। जनता की अपार पीड़ा को दृष्टि में रखते हुए, छोटी-मोटी कठिनाइयों या कुछ छोटे से समूहों की कठिनाइयों की चिन्ता हास्यास्पद और घिनौनी महसूस की जाने लगी है।

उभरती हुई बर्बरता के ख़िलाफ़ हमारी केवल एक मित्र है – जनता, जो कि इससे अत्यधिक पीड़ित है। सिर्फ़ वही (जनता) है जिससे कोई भी उम्मीद की जा सकती है। इसलिए यह स्पष्ट है कि जनता की तरफ रुख किया जाना चाहिए, और अब यह पहले से ज़्यादा ज़रूरी है कि उसकी (जनता) भाषा में बात की जाय। इस प्रकार लोकप्रिय कला और यथार्थवाद स्वाभाविक मित्र बन जाते हैं। यह जनता – विशाल मेहनतकश लोगों –  के हित में है कि उन्हें साहित्य से जीवन का सच्चा प्रतिबिम्ब प्राप्त हो, और जीवन का सच्चा प्रतिबिम्ब वास्तव में केवल जनता- व्यापक मेहनतकश – की सेवा करता है, और इसीलिए निश्चितरूप से यह उसके लिए बोधगम्य और लाभदायक – दूसरे शब्दों में लोकप्रिय – होनी चाहिए। फ़िर भी इन धारणाओं को प्रयोग करने या मिलाने का प्रस्ताव रखने से पहले इन्हें गम्भीरता से परिमार्जित किया जाना चाहिए। ऐसा सोचना एक भूल होगी कि ये धारणाएँ पूर्णत: पारदर्शी, इतिहास-रहित, अटल या असन्दिग्ध हैं। (हम सभी जानते हैं कि इनका क्या मतलब है – बाल की खाल न निकाली जाय)। लोकप्रियता की धारणा स्वयं विशेष तौर पर लोकप्रिय नहीं है। यह विश्वास करना यथार्थपरक नहीं है कि यह है। भाववाचक संज्ञाओं – जिनका अन्त “ता” में होता है – की एक पूरी श्रृंखला है, जिसको सावधानीपूर्वक परखा जाना चाहिए। उपयोगिता, सम्प्रभुता और शुचिता के बारे में सोचिये; और हम जानते हैं कि राष्ट्रीयता की धारणा काफी विशिष्ट, सांस्कारिक, गर्वित और सन्देहजनक संकेतार्थ रखती है जिनको हमें नज़रअन्दाज़ करने का दुस्साहस नहीं करना चाहिए। सिर्फ इसलिए कि हमें लोकप्रियता के विचार/धारणा की ज़रूरत है, हमें इन संकेतार्थों को नज़रअन्दाज़ नहीं करना चाहिए।

ये तथाकथित काव्य रूप ही हैं जिनमें “जनता” को रूढ़िवादी तरीके से प्रस्तुत किया जाता है, या यों कहें कि इस तरह से प्रस्तुत किया जाता है जो रूढ़िवादिता को प्रोत्साहित करता है। वे जनता को अपरिवर्तनीय गुणों, पवित्र परम्पराओं, कलारूपों, आदतों और रिवाजों, धार्मिकता, वंशानुगत शत्रुओं, अजेय शक्ति इत्यादि का रूप प्रदान करते हैं। उत्पीड़ित और उत्पीड़क, शोषित और शोषक, ठगों और जिनको ठगा गया है के बीच एक उल्लेखनीय एकता दिखाई देती है; किसी भी सूरत में यह “तुच्छ” मेहनतकश लोगों और उनके उपर बैठे लोगों के बीच के विरोध का प्रश्न नहीं रह जाता है।

“जनता” की इस धारणा के साथ जो धोखाधड़ी की गयी है, उसका इतिहास लम्बा और जटिल है- वह वर्ग-संघर्षों का इतिहास है। हम यहाँ इस विषय में नहीं जाना चाहते— हम यहाँ केवल धोखाधड़ी के तथ्य को निगाह के सामने रखने के  इच्छुक हैं, जब हम यह कहते हैं कि हमें एक लोकप्रिय कला की ज़रूरत है तो उससे हमारा मतलब होता है –  व्यापक जनता के लिए कला, उन बहुत से लोगों के लिए जिन्हें चन्द लोगों द्वारा दबाया गया है – स्वयं जनता  – उत्पादक जनता, जो अब तक राजनीति के लिए एक वस्तु थी जिसे अब राजनीति का कर्त्ता बन जाना चाहिए। हमें याद रखना चाहिए कि लोगों को शक्तिशाली संस्थाओं द्वारा, परिपाटियों द्वारा कृत्रिम तरीके से व बलपूर्वक प्रतिबन्धित करके पूर्ण रूप से विकसित होने से रोका गया है और यह कि लोकप्रिय की धारणा पर अनैतिहासिक, स्थिर व अविकासशीलता का ठप्पा लगा दिया गया है। हम लोकप्रियता के ऐसे विचार से सरोकार नहीं रखते– उल्टे हमें इससे लड़ना होगा।

लोकप्रिय की हमारी धारणा उन लोगों से सम्बन्धित है जो न केवल ऐतिहासिक विकास में पूरी भागीदारी करते हैं बल्कि सक्रियता पूर्वक उसपर अधिकार कर लेते हैं, उसकी गति को बल देते हैं और उसकी दिशा निर्धारित करते हैं। हमारे दिमाग़ में वह जनता है जो इतिहास बनाती है, दुनिया को बदलती है और खुद को भी। हमारे मस्तिष्क में संघर्षरत लोग हैं और इसीलिए लोकप्रिय की एक जुझारू धारणा है।

लोकप्रिय का अर्थ है- व्यापक जनता के लिए बोधगम्य, उनके अभिव्यक्ति के रूपों को अभिग्रहण करना और उसे समृद्ध करना, उनके पक्ष को समझना, उसे प्रमाणिक करना और उसमें सुधार करना, जनता के सबसे प्रगतिशील हिस्से का प्रतिनिधित्व करना ताकि वह नेतृत्व ग्रहण कर सके, और इसीलिए जनता के दूसरे हिस्से के लिए भी बोधगम्य हो सके, परम्पराओं से सम्बन्धित करना और उन्हें विकसित करना। राष्ट्र के वर्तमान शासक वर्गों की “उपलब्धियों” को जनता के उस हिस्से तक ले जाना जो नेतृत्व के लिए प्रयासरत हैं।

अब हम यथार्थवाद की धारणा को लेते हैं। इस संकल्पना (‘कॉन्सेप्ट’) को भी प्रयोग से पहले परिमार्जित किये जाने की ज़रूरत है क्योंकि यह एक पुरानी संकल्पना है और बहुतों द्वारा इसे बहुत से उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किया गया है। यह ज़रूरी है क्योंकि लोग अपनी सांस्कृतिक विरासत को केवल स्वामित्वहरण द्वारा ही प्राप्त कर सकते हैं। साहित्यिक रचनाओं का अभिग्रहण फैक्ट्रियों की तरह नहीं किया जा सकता; अभिव्यक्ति के साहित्यिक रूप ‘पेटेण्ट’ की तरह अभिग्रहित नहीं किये जा सकते। यहाँ तक कि लेखन के यथार्थवादी तरीके – जिसके साहित्य ने बहुतेरे भिन्न उदाहरण प्रस्तुत किये हैं- में भी उसे कब, किस तरह और किस वर्ग के द्वारा इस्तेमाल किया गया है, इसके सूक्ष्मतम ब्योरों के निशान देखे जा सकते हैं। जबकि जनता हमारी आँखों के सामने संघर्षरत है और यथार्थ को बदल रही है, तब हमें कथा (कथावस्तु या कथा-रूपों) के “आज़माये” नियमों, पूज्य साहित्यिक नमूनों, शाश्वत सौन्दर्यशास्त्रीय नियमों के साथ चिपकना नहीं चाहिए। हमें यथार्थवाद को  मौज़ूदा विशिष्ट रचनाओं से यथावत व्युत्पन्न नहीं करना चाहिए बल्कि हमें प्रत्येक साधन का प्रयोग करना होगा- पुराना और नया, आज़माया और बिना आज़माया, कला से व्युत्पन्न और अन्य स्रोतों से व्युत्पन्न – ताकि यथार्थ को लोगों के लिए इस रूप में प्रस्तुत किया जा सके जिसमें (जिस कला रूप में) वे महारत हासिल कर सकें। हमें ध्यान रखना होगा कि किसी विशेष कालखण्ड के उपन्यास के किसी एक विशिष्ट ऐतिहासिक रूप को यथार्थवादी उपन्यास के रूप में वर्णित न किया जाय –जैसे की बाल्ज़ाक या तोल्स्तोय के उपन्यास – जिससे कि यथार्थवाद के औपचारिक शाब्दिक मानदण्ड न खड़े हों। हमें इस तरह से नहीं कहना चाहिए कि यथार्थवादी लेखन केवल तब होगा जब हम प्रत्येक चीज़ को सूंघ सकें, चख सकें और महसूस कर सकें, जब “वातावरण” हो और कथानकों को इस तरह से बनाया जाय कि वे पात्रों के मनोविश्लेषण की तरफ़ ले जायें। हमारे यथार्थवाद की संकल्पना व्यापक और राजनीतिक – सभी रीति-नीतियों से सार्वभौम – होनी चाहिए।

यथार्थवाद का अर्थ है समाज के भीतर कार्य-कारण सम्बन्धों के समूहों का अनावरण करना/ चीजों के बारे में प्रचलित दृष्टिकोण जो कि सत्ताधारी वर्ग का दृष्टिकोण है – को बेनकाब करना/ उस वर्ग के दृष्टिकोण से लिखना जो कि उन गम्भीर समस्याओं का जिससे मानव समाज ग्रसित है का वृहत्तम समाधान प्रस्तुत करता है/  या विकास के तत्वों पर बल देना/ मूर्त को सम्भव बनाना और इससे अमूर्तन को सम्भव बनाना।

ये व्यापक नियम हैं और इन्हें विस्तारित किया जा सकता है। इसके अत्तिरिक्त इन नियमों का पालन करते हुए हमें कलाकार को उसकी ललित कल्पना, उसकी मौलिकता, उसके हास्य एवं उसकी खोजों को प्रयोग करने की इजाज़त देनी चाहिए। हमें अत्यधिक ब्यौरेवार साहित्यिक नमूनों से नहीं चिपकना चाहिए। हमें कलाकार को अति अनमनीय तरीके से पारिभाषित कथा-रूपों से बाँधना नहीं चाहिए।

हमें यह स्थापित करना होगा कि लेखन के तथाकथित भावात्मक (एन्द्रिक) तरीके- जहाँ कोई सूंघ सके, चख सके और प्रत्येक चीज़ को महसूस कर सके- को लेखन के यथार्थवादी रूप के साथ स्वतः जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए; हमें यह स्वीकार करना होगा कि ऐसी रचनाएँ हैं जो कि भावात्मक (ऐन्द्रिक) रूप में लिखी गयी हैं परन्तु यथार्थवादी नहीं हैं; और ऐसी यथार्थवादी रचनाएँ हैं जो कि भावात्मक (ऐन्द्रिक) शैली में नहीं लिखी गयी हैं। हमें ध्यानपूर्वक इस प्रश्न को जाँचना होगा कि क्या हम तभी वास्तव में एक उत्तम कथानक विकसित करते हैं जब हमारा सर्वोच्च उद्देश्य पात्रों के आत्मिक जीवन को प्रकट करना हो। हमारे पाठक अगर विभिन्न साहित्यिक युक्तियों से गुमराह किये जाने के कारण केवल नायकों के आत्मिक उद्गार ही महसूस करते हैं तो उन्हें शायद पता चले कि घटनाओं के अर्थों को समझने की कुंजी उन्हें नहीं दी गयी है। व्यापक रूप से परीक्षण किये बिना बाल्ज़ाक और तोल्स्तोय के रचनात्मक रूप को अपना लेने से हम अपने पाठक – जनता – को उतना ही उबा देंगें, जितना कि ये लेखक भी प्रायः करते हैं। यथार्थवाद रूप मात्र का प्रश्न नहीं है, यदि हम इन यथार्थवादियों की शैली की नकल करेंगे तो हम यथार्थवादी नहीं होंगे।

समय प्रवाहमान है, और अगर ऐसा नहीं होता तो उनके लिए बहुत बुरा होता जो मुँह में चांदी का चम्मच लेकर पैदा नहीं हुये हैं। तरीके चूक जाते हैं, उद्दीपन काम नहीं करते। नयी समस्याएँ पैदा होती हैं और नयी विधियों की माँग करती हैं। यथार्थ बदलता है; इसको पेश करने के लिए प्रस्तुति का तरीका भी बदलना चाहिए। शून्य से कुछ पैदा नहीं होता, नया पुराने से पैदा होता है, और केवल इसी कारण यह नया है। दमनकर्ता प्रत्येक युग में समान तरीके से काम नहीं करते। उन्हें हमेशा एक ही तरीके से परिभाषित नहीं किया जा सकता। उनके पास पकड़े जाने से बचने के लिए बहुत से साधन हैं। वे अपने सैन्य मार्गों को यातायात मार्ग कहते हैं, उनके टैंक इस प्रकार से रँगे है कि वे मैकडफ के जंगल (विलियम शेक्सपीयर के नाटक मैकबेथ में मैकडफ की सेना पेड़ों की शाखाओं के पीछे छिपकर मैकबेथ को घेरती है) जैसे दिखते हैं। उनके एजेण्ट फफोले भरे अपने हाथ दिखाते हैं मानों कि वे मजदूर थे। नहीं, शिकारी को शिकार में बदलना आविष्कार की माँग करता है। जो कल लोकप्रिय था आज नहीं है क्योंकि लोग आज वे नहीं हैं जो कि वे कल थे।

कोई भी जो रूपवादी पूर्वाग्रह का शिकार नहीं है जानता है कि सत्य को कई तरीकों से दबाया जा सकता है और वह कई तरीकों से अभिव्यक्त होना चाहिए। [… ]

मैं यह अनुभव से कह रहा हूँ कि सर्वहारा के लिए साहसपूर्ण और असाधारण चीजों को रचने के लिए डरने की ज़रूरत नहीं है, जब तक कि ये उसकी वास्तविक परिस्थितियों से सम्बन्धित होती हैं। सुसंस्कृत लोग व कला के कद्रदान हमेशा ही होंगे जो टोकेंगे- “साधारण जनता इसे नहीं समझती”; लेकिन साधारण जनता व्याकुलता से उन्हें किनारे धकेल देगी और कलाकारों के साथ सीधे तारतम्य स्थापित कर लेगी। कुछ आडम्बरपूर्ण ऊँची बकवासें हैं जो कि कुलीन गिरोहबाजों के लिए हैं और और जो नये कुलीन गिरोह बनाने में प्रवृत्त हैं – पुराने नमदे के टोप को दो हजारवीं बार फिर से बनाना, पुराने सड़े हुए मांस पर मसाला लगाना – इन्हें सर्वहारा सन्देह लेकिन फिर भी सहिष्णु तरीके से सिर झटकते हुए खारिज़ करता है (वे कितनी बुरी हालत में होंगे!)। यह कोई मसाला नहीं था जिसे खारिज किया गया था बल्कि सड़ता हुआ मांस था: दो हजार बार बनाया जाना नहीं, बल्कि एक पुराना नमदा था। जब वे स्वयं रंगमंच के लिए लिखते थे और उसका मंचन करते थे तो वे आश्चर्यजनक रूप से मौलिक थे। तथाकथित उद्वेलानात्मक-प्रचारात्मक कला, जिस पर लोग –  हमेशा अच्छे  लोग  नहीं –  अपनी नाक भौं सिकोड़ते थे, नयी कलात्मक विधियों और अभिव्यक्ति के रूपों की खान थी। यहाँ से असली लोकप्रिय कला के युगों से लम्बे समय से विस्मृत भव्य तत्व पैदा हुए; जिनमें नये सामाजिक उद्देश्यों के लिए बड़े परिवर्तन किये गये थे, लुभावना आरोह और अवरोह, खूबसूरत सरलीकरण, जिसमें प्रायः विस्मयकारी लालित्य (सुरुचि या सुघड़पन) और शक्ति तथा जटिलताओं के लिए निडर दृष्टि थी। इसमें से बहुत कुछ आदिम हो सकता है, लेकिन उन अर्थों में नहीं जिन अर्थों में बुर्जुआ कला का आध्यात्मिक परिदृश्य, जोकि सिर्फ़ आभासी तौर पर सूक्ष्म, आदिम होता है। प्रस्तुति की एक शैली को इसलिए खारिज़ करना कि उसकी कुछ रचनाएँ असफ़ल रही, एक गलती होगी; ऐसी शैली को जो आधारभूत तथ्यों के लिए गहरायी तक जाने और अमूर्तन को सम्भव बनाने के लिए – अक्सर सफलतापूर्वक – प्रयासरत है।

इसीलिए लोकप्रिय कला और यथार्थवाद की कसौटी को उदारतापूर्वक और सावधानी से चुना जाना चाहिए, इसे केवल मौजूदा यथार्थवादी तथा लोकप्रिय रचनाओं से ग्रहण नहीं करना चाहिए, जैसा कि प्रायः होता है, इस तरह से करते हुए कोई रूपवादी मानदण्ड पर पहुँच जायेगा और वह केवल रूप में ही लोकप्रिय कला और यथार्थवाद होगा।

कोई रचना यथार्थपरक है या नहीं यह केवल इस बात से निर्धारित नहीं हो सकता कि यह उन मौजूदा रचनाओं की तरह है या नहीं जिन्हें यथार्थपरक कहा जाता है, या यह उनकी तरह है या नहीं जो अपने समय में यथार्थवादी थीं। कलाकृति की किसी अन्य कलात्मक चित्रण से तुलना करने की बजाय प्रत्येक मामले में कलाकृति में जीवन के चित्रण की स्वयं उस जीवन के साथ, जिसका चित्रण किया गया है, से तुलना करनी चाहिए। जहाँ तक लोकप्रियता का सम्बन्ध है, इसकी एक अत्यधिक रूपवादी प्रक्रिया भी है जिससे सावधान रहना चाहिए। साहित्यिक कृति की बोधगम्यता केवल इस बात से सुनिश्चित नहीं की जा सकती है कि यह ठीक उसी तरह से लिखी गयी है जैसे कि वे रचनाएँ जिन्हें उनके समय में बोधगम्य समझा जाता था। वे दूसरी कृतियाँ भी जो अपने समय में बोधगम्य थीं हमेशा अपने से पहले की कृतियों की तरह नहीं लिखी गयीं। उन्हें बोधगम्य बनाने के लिए कदम उठाये गये थे। उसी तरह हमें आज नयी रचनाओं की बोधगम्यता के लिए कुछ अवश्य करना चाहिए। लोकप्रिय होना ही सिर्फ़ एक चीज़ नहीं है, लोकप्रिय बनना भी एक प्रक्रिया है।

अगर हम एक ज़िन्दा और जुझारू साहित्य की आशा रखते हैं जो कि यथार्थ से पूर्णतया संलग्न हो और जिसमें यथार्थ की पकड़ हो- एक सच्चा लोकप्रिय साहित्य- तो हमें यथार्थ की द्रुत गति के साथ हमकदम होना चाहिए। महान मेहनतकश जनता पहले से ही इस राह पर है। उसके दुश्मनों की कारगुजारियाँ और क्रूरता इसका सबूत हैं।

अनुवाद – ऋषि और प्रेम प्रकाश
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साभार-आह्वान

प्रस्तुति-बिजूका समूह
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टिप्पणियाँ:-

संजीव:-: ब्रेख्त के पढना एक शानदार अनुभव होता है। यथार्थवाद की नई परिभाषा जो भारतीय संदर्भ में तो एकदम अलग है। हमारी चिन्तन परंपरा इस तरह से नहीं सोचती है। हम अनुकरणमूलक अधिक हैं मौलिक कम। हम बडप्पन के आतंक से इतने आतंकित हो जाते हैं कि नया और अलग नहीं देख और सोच पाते हैं। टाल्स्टाय और बाल्जाक के यथार्थ के अनुकरण और उसे यथार्थ की कसौटा मानने के संदर्भ में ब्रेख्त के विचार क्रांतिकारी हैं। "जनता को प्रयास पूर्वक पूर्ण मानव के रूप में विकसित होने से रोका गया है।" यह गंभीर बात है। इस पर लंबा और सतत विमर्श होना चाहिए। भारत में तो जनता को जनसंख्या में बदल दिया गया है। " we are people not population " हमें ताे जनता होने के लिए भी संघर्ष करना होगा। जनता से पूर्ण मनुष्य बनना तो भविष्य के गर्भ में है।

प्रदीप मिश्रा:-
संजीव भाई से सहमत। आज के आलेख के लिए बिजूका का आभार।तितिक्षा जी का विशेष आभार।

अवधेश:-
ब्रेख्त का एक जरूरी आलेख । आज हिन्दी में जब लोकप्रियता और यथार्थ को लेकर जबर्दस्त विभ्रम की स्थिति है ,  यह आलेख आंखें खोलता है । खासतौर पर शोषक और शोषित के साहित्य के बीच बने या कि बनाये गये भ्रम के बरक्स  जैसे गाइडलाइन । सन् 1938 में लिखा यह आलेख आज भी प्रसांगिक है । ब्रेख्त के इस बेशकीमती आलेख को यहां उपलब्ध कराने के लिए सत्यनारायण पटेल को शुक्रिया ।🏽

कैलाश बनवासी:-
वाह कॉमरेड ब्रेख्त!
यथार्थवाद और लोकप्रियता पर इससे बेहतर,इतने धार के साथ कोई लेख मेरी नजर से नहीं गुजरा.यथार्थ के परिवर्तनशीलता की बात हिंदी में अरसे से ' गुनीजन' करते रहे हैं,लेकिन मजाल है कि उन्हें अपने तयशुदा मानदंडों के अलावा किसी और किसम का यथार्थवाद स्वीकार हो.ब्रेख्त यहाँ उन सब बाड़ों को तोड़ते खड़े हैं जो हिंदी जगत की रूढ़ियाँ बनकर आज स्यापे कर रही है.ऐसा क्रांतिकारी लेख अब तक किसी पत्रिका में क्यों नहीं आ पाया, यह भी एक सवाल है.
आवहान,ऋषि,प्रेमप्रकाश के साथ बिजूका का हृदय से आभार इसे लाने के लिये.
  इस शक्तिशाली लेख ने अपने पहले ही स्ट्रोक में कितने सारे जाले साफ़ कर दिये,पुराने क़िले ढहा दिये,जबकि 1938 का लिखा हुआ है.इस लेख की जरूरत हर सच्चे लेखक/ कलाकार को हर समय रहेगी,दोस्त की तरह.
शानदार!जबरजस्त!!इंकलाब जिन्दाबाद!!!

अवधेश:-
कैलाश भाई , आपने सही कहा । कितने जाले साफ कर दिये । आज हिन्दी में लेखन के सरोकारों को लेकर जो गुंजलका छाया हुआ है, ब्रेख्त उसे तार- तार करते हैं ।
शुक्रिया कैलाश भाई ।
मित्रों मुझे बिजूका के फाॅर्मेट की कोई जानकारी नहीं है । कहीं कुछ अन्यथा हो तो चेता देंगे ।

आशीष मेहता:-
अवधेश जी, सर्वप्रथम आपका हार्दिक स्वागत, समूह पर ।

ब्रेख्त का १९३८ का लिखा मूल आलेख भी पढ़ा  (आभार तितिक्षाजी का)....  एक खास उथल-पुथल के दौरान लिखा मूल रूप से रचना-धर्मोन्मुखी आलेख लगा। इसीलिए भी शायद समूह पर उपस्थित 'रचनाकर्मी' अधिक साम्य देख पा रहे हैं। उस कालखंड (नाजी उत्पीड़न) एवं अपने राजनैतिक रुझान (मार्क्सवाद) के चलते ब्रेख्त ने 'लोकप्रियता' और 'यथार्थ' दोनों ही अवधारणाओं में 'mass', ( 'class' which offers the broadest solution) की बात कही है।

इस विचार में, मैं 'समतावाद' और 'सामाजिक विषमता एवं व्यवहारिकता' का संतुलन देखता हूँ। वाकई घटना काल में तो यह आलेख 'क्राँतिकारी' ही है। खास तौर पर जब 'किताबों' / "पढ़ने" पर ही पाबंदी हो। पर इस आलेख को 'सर्वहारा-शोषक' के चश्मे से ही देखना संकीर्णता होगी। किसी भी कला (साहित्य भी अपवाद नही) के आर्थिक पक्ष को नकारा नहीं जा सकता। बाजार के बढ़ते प्रभाव एवं नैतिक पतन के चलते 'लोकप्रियता' के अपने मापदंड स्थापित है, न सिर्फ भारतीय (हिन्दी साहित्य जगत तो और छोटा हुआ) बल्कि विदेशी बाजारों में भी । यह भी सच है कि प्रतिभासंपन्न एवं जुझारू रचनाकार इन बाजारू मापदंडों के आगे हारते नहीं हैं।

मेरे विचार एक पाठक बतौर ही हैं।

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