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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

18 दिसंबर, 2016

कविता: गोडसे ‘गौड’ से / विनोद शाही

मित्रो, विनोद शाही जी हमारे समय के महत्त्वपूर्ण आलोचक हैं. उनकी आलोचना रचनात्मक व विचारोत्तेजक है. वे जितने महत्त्वपूर्ण आलोचक हैं,  उतने ही ख़ास चित्रकार और भले इंसान भी.....आज उन्हीं की एक कविता पढ़ते हैं. यह कविता श्री देश निर्मोही, आधार प्रकाशन की फेसबुक वॉल से साभार है.....              

कविता: गोडसे ‘गौड’ से / विनोद शाही

इतिहास की तरह मारे जाते रहे हम
रामधुन की तरह जीते रह सकने की खातिर

इतिहास की तरह खुल रहा चिट्ठा
दिल की तरह लहुलुहान होने का
उन की गोलियों की तरह धडकनों के पार होने का
और फिर भी रामधुन की तरह बजते हुए
मौत के बाद भी बजते सुने जाने का

रामधुन ऐसी कि जो रहती है
ठहरी हुई शिद्दत की तरह
मिलती है बेशक जो बस एक
आग से जलते पल की तरह
पल जो होता है हमेशा हमारा

इतिहास की तरह जैसे जब जब
दम तोड़ती सी दिखी वह रामधुन
कहते हे राम
ईस्वर से ले कर अल्लाह तक
फिरती रही मारी मारी
बाहरी तौर पर मौन हो जाने जाने से ठीक पहले तक
तब तब कहा दुनिया ने कि देखो !
कोई भी हो सकती है कहीं भी दुनिया भर में
कि जिसे कहा जा सकता हो यीशु की ज़ुबान
जैसे कोई ‘गौड’ से निकला फरमान

आ गए तभी दूसरे इतिहास की तरह
उसी इतिहास के खिलाफ
जो थे गोडसे की तरह

मौन हो गयी लगती थी रामधुन
लेकिन जो बचे रहे
अपने अपने गौड से
पाए फरमानों की तरह
गोलियां बरसाने के लिए
रामधुन की मद्धम पड़ती जाती लय को
दबाने के लिए
भूकम्पी नारे बुलंद कर
जय श्री राम  के

और फिर गोडसे की तरह
सलाखों के पीछे डाल दिए जाने पर भी
पूरे देश को हवालात बनाते
माफिया डौन की तरह
आम कैदियों पर हुक्म चलाते, राज करते

हालांकि जब कि एक तीसरे इतिहास की तरह
पूछते रहे देशवासी
किस जुर्म की सज़ा है जो खत्म नहीं होती
हवालात के बाहर की
कोई और दुनिया क्यों नहीं होती
और कैद की अवधि उम्र से छोटी
कभी भी क्यों नहीं होती

यों चौथे इतिहास की नाईं
उठे सवाल तो सुने गए पहली दफा
दफ्न कर गाड़े गए बोल भस्मीभूत से
कि जिन को रहे थे बोलते
उन्हीं के बीच मौजूद गांधी रामधुन में

कि छोड़नी होगी हमें
दूसरों की वकालत से मिली अपनी हिफाज़त

कि होना पड़ेगा हमें खुद अपने लिए भी
आप अपनी बात कहने को खड़ा

कि आप अपना वैद हो कर
खुद अपना ईलाज करने के लिए
मौत का भी दांव चल कर जीतना होगा

और यह कि आप अपना हो नुमांयदा
अब स्वयं को चुन कर जिताने के लिए
मैदान में आना ही होगा
और वो भी इस तरह
कि नेताऔं की कमी से जूझते
इस देश को राहत मिले

सुन रहे धै देशवासी अगन-वाणी
बंद करते कान उन के नज़र आए
गोडसे ऊद्धम मचाते
कि जैसे करते आए थे वे आज तक
संसद को ठप्प
रोकते इतिहास को
इतिहास बनने की किसी संभावना से

एकबारगी तो लगा कि वाकई उनका
इतिहास पर हो गया कब्ज़ा मुकम्मल
कि अचानक भेदती निस्तब्धता को
फूटती दी सुनाई रामधुन
लोक की तकलीफ सी
देखते ही देखते लो वह गयी फिर छोड़ पीछे
जेल को
जेल की दुर्भेद्य सुरक्षा पट्टियों को
रह गयी फिर देखती
इस्पाती प्राचीरों पर चमकती
जेल के अधीक्षकों की महा-पुछल्ली
नाम-पद की पट्टियां भी

रह गए पीछे यों पहली ही दफा
ईशवर, और उन के साथ रहते
अल्लाह से ऊंचे सभी
और वे भी जो यहां थे गौड-से
और दिखते थे बड़े जो गौड से भी

जाओगे सपनों में अपने तो सुनोगे
इतिहास के सीमांत के आते करीब
तुम भी वह
अगनधर्मी रामधुन
संपर्क: ए-563 पालम विहार गुरूग्राम-122017

1 टिप्पणी:

  1. विचारशील रचना विनोद शाही जी की .
    प्रस्तुति हेतु आभार!

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