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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

कहानी : रात भर बर्फ : संतोष श्रीवास्तव

कहानी: रात भर बर्फ

रात भर बर्फ गिरती रही।ठीक से सो भी नही पाई उर्मि।सुबह सुबह थोडी झपकी लगी थी कि डोर बेल ने जगा दिया।दरवाज़ा खोलते ही वह चौंक पडी थी-“ अरे तेजा ,इतनी बर्फ में ?”

”बर्फ तो इस मौसम में गिरना ही है जी,आप जल्दी से दूध की केतली खाली कर दो,और भी जगह जाना है।“

तेजा के जाते ही उसने दरवाजे के बाहर देखा।गिरते बर्फ में दूर तक बस सफेदी ही सफेदी नजर आती थी। ऐसी ही बेशुमार बर्फ.....बल्कि इससे कई गुना ज्यादा बर्फबारी हो रही होगी जब प्रशांत एवरेस्ट की चोटियों पर थे। एक सौ चालीस प्रतिघ्ंटे की रफ्तार से चलता बर्फीला अंधड, कोहरे की मोटी चादर और कडकती बिजली...मानो पहाडों का प्रलयकारी अट्टहास.....मेजर ने बताया था कि  -“प्रशांत के दल को होने वाले खराब मौसम की जानकारी तो मिल गई थी पर वे कुछ् कर भी नही सकते थे क्योंकि न तो हम लोग कोई मदद कर पा रहे थे और न ही उन्हें बर्फ में दबे रस्से मिल पा रहे थे। लोत्से फेस पर तब बर्फ का स्तूप सा उठता जा रहा था।“

”क्यों मदद नहीं कर पाए मेजर....जिन्दा दफन हो गये प्रशाँत?”उर्मि ने पूछना चाहा था पर बदन को काटती ठंडी बर्फीली दरांती उसके बदन में खुंपी जा रही थी।खुंप कर आग की तरह जली जा रही थी और आयोडीन का ठंडा फाहा भी बाँह पर चुभ रहा था।

मेजर के लिये सोफों पर बैठे प्रशांत के परिवार को,उसके पिता, छोटे भाई विवेक और बेटे चिंटू को झेल पाना कठिन हो रहा था। फिर भी उन्होने हिम्मत की –“हमारी सहायता टोली मौसम खराब होने की वजह से तीसरे कैंप तक नहीं पहुँच पाई थी। दूसरे दिन भी चाहकर भी तमाम प्रयासों के बावजूद हम लोग कुछ नहीं कर पा रहे थे। बडे बडे चिनार ,देवदारों तक को धराशायी करने वाले बर्फीले तूफान के आगे आदमी की क्या बिसात? एक कदम भी आगे बढा पाना मुश्किल था।एवरेस्ट एक विशाल दानव की तरह मुँह बाये था।“

अपनी डबडबाई आँखों के आँसू अन्दर ही अन्दर घोंटकर रखने वाले बाबूजी बिसूर उठे थे-“जिस दिन वह एवरेस्ट विजय के लिये रवाना हुआ थाउसी दिन उसकी नई कार आई थी। उसने वादा किया था कि वह लौटकर हम सबको जगन्नाथपुरी घुमाएगा” रोकते रोकते भी उनके आँसू गालों पर बह चले थे। मेजर ने उनकी पीठ थपथपाई थी। चिंटू धीरे से उनके पास सरक आया था-“अंकल, क्या सचमुच अपनी बर्थडे के दिन पापा ब्लैक होल मे गिरे थे?”

प्रशांत का जन्मदिन! कितनी खुश थी उर्मि उस दिन...तमाम घर में उसने जगह जगह सफेद गुलाब सजाये थे जो प्रशांत के पसन्दीदा थे।उसने क्रीम शिफॉन की गुलाबी फूलों वाली साडी पहनी थी। शाम छै बजे से पार्टी थी। प्रशांत के जन्मदिन के साथ मुख्य वजह थी उसके एवरेस्ट विजय में निकले अभियान के लिये सफलता की शुभकामनाओं की ।पार्टी देर तक चली थी। अचानक फोन रिसीव करते हुए बाबूजी का लडखडा कर सोफे पर गिर जाना देख विवेक उनकी ओर दौडा था-“अरे बाबूजी को क्या हुआ? बाबूजी आप बोलते क्यों नहीं ? क्या हुआ?”

विवेक ने उनके हाथ से फोन लेकर कान में लगाया। मेजर की आवाज़ थी-“विवेक कंट्रोल करना अपने आप पे.....प्रशांत इज़ नो मोर।“

”क्या?” एकबारगी जैसे बिजली का करेंट पूरे कमरे में फैल गया हो। उर्मि स्तब्ध थी ....उसे लगा जैसे उसकी साडी के गुलाबी फूल एक एक कर झरते चले जा रहे हैं....उसकी नसों में खून तेज़ी से दौडने लगा....वह बेहोश हो गई। होश आया तो खुद को अस्पताल में पाया....पूछा पास खडे विवेक से –“प्रशांत आये?”

कैसे कहे विवेक कि न तो अब प्रशाँत भाई लौटेंगे और न ही उनका पार्थिव शरीर। प्रशाँत सहित पाँच और पर्वतारोहियों के शवों को उनकी टीम आधारकैंप तक लाने में भी सफलता नहीं पा सकी थी। बर्फ और आँधी का तांडव तब भी जारी था। रस्सों की मदद भी काम न दे सकी। इसलिये वहीं हिमालय में ही उन्हें दफना दिया गया। लाशों को उठा उठा कर पहाडों की चोटी से नीचे सैंकडो मीटर गहरी खाईयों में ढकेल दिया गया था। लेकिन यह बात वह उर्मि से कहे कैसे ? इतना साहस कहाँ से जुटाए?

अपने अभियान को समाप्त कर जब मेजर लौटे थे तब तक उर्मि काफी सम्हल चुकी थी। स्थिति की सच्चाई झेलने लायक अपने को पा रही थी। मेजर ने बताया था कि कैसे एवरेस्ट की खडी चढाई और उतराई पर रस्सों का सहारा लिया जाता है।जब प्रशाँत का दल चढाई पर था तो  अचानक मौसम खराब हो गया था। बर्फ इतनी गिरी कि जगह जगह सफेद स्तूप बन गये।                       बर्फ के नीचे रस्से भी दब गये जिन्हें ढूँढ पाना बहुत ही जटिल था। रस्सों का गुमना मानो विनाश की पूर्व घोषणा थी। पूरा दल हाथों से बर्फ हटा हटा कर रस्से खोज रहा था मानो रस्से नही ज़िन्दगी की डूबती साँसें ढूँढ रहा हो। जब रस्से नहीं मिले तो सभी ने वापिस चौथे कैंप में लौटना चाहा। तीसरे कैंप से मदद माँगी गई पर मौसम की विभीषिका के आगे सब बेकार,दल के दो लोगों ने ही मिलकर टैंट तैयार किया और वहीं बर्फ की मार खाए पर्वतारोहियों को सुला दिया और मदद आने का इंतज़ार करने लगे। टैंट में सोये सभी लोगों के शरीर धीरे धीरे तन्द्रिल निद्रा में डूबते चले गये। मौत के कदमों की आहट सुनने के लिये सारी ताकत कानों में जुट गई। अब उर्मि का क्या होगा? कैसे पूरी ज़िंदगी का वैधव्य ढो पायेगी वह? फैसला मेजर ने किया –‘बाबूजी भाभी के हक में यही ज़्यादा सही है कि वे सर्विस करें,उनका बिज़ी रहना बहुत ज़रूरी है।चिंटू को आर्मी स्कूल में दाखिला दिलवा देते हैं। वहीं हॉस्टल में रहेगा।“

घर में सन्नाटा सा खिंच गया। हालांकि मेजर की बात माहौल के मुताबिक सही थी। कुछ ही महीनों में बाबूजी ने अपना परिवार बिखरते देखा। चिंटू हॉस्टल चला गया और उर्मि की शिमला में लैक्चरर शिप लग गई। यों टुकडा टुकडा बिखरकर ज़िन्दगी भले ही एडजस्ट हो गई थी पर मन के टुकडे कैसे जुडें?

पूरा साल गुज़र गया।लेकिन सब कुछ इतना साफ याद है जैसे कल ही उसने हादसे की खबर पाई हो । बस वही आखिरी स्पर्श,बाहों की वही आखिरी गर्मी उर्मि के अहसासों में आज भी ज़िन्दा है। कई बार बाबूजी ने,विकास ने चाहा था कि उर्मि शिमला की नौकरी छोडकर वापिस लौट जाये क्योंकि जब भी हिमालय की चोटियाँ उसे दिखेंगी वह उसी हादसे में फिर फिर डूबेगी पर वह नहीं मानी थी बल्कि सबको विश्वास दिलाती रही थी कि उसने प्रशांत की मृत्यु स्वीकार कर ली है और वह उस हादसे से उबर चुकी है। अब उसे चिंटू के लिये जीना है जो अपने पापा को बहुत मिस करता है। हालाँकि वह हॉस्टल में अपने दोस्तों के बीच रमा रहता है जो एक तरह से अच्छा ही है।

दरवाज़े के बाहर बर्फ की मोटी चादर की सफेदी उर्मि की आँखों में चुभने लगी । पल भर में कहाँ की कहाँ पहुँच गई थी उर्मि। अब अक्सर ऐसा होता है ....बर्फ गिरती है और उर्मि खुद को दोहराने लगती है । प्रशाँत आकर सामने खडे हो जाते हैं और वह दिल की धडकनें टटोलने लगती है। भारी हिमपात में शिमला की सड्कें,ढलानें बर्फ से भर जाती हैं तो उसके अन्दर भूचाल सा आ जाता है और वह खामोश रोने लगती है मानो बर्फ के फाहे ताप पाकर धीरे धीरे पिघल रहे हों। प्रशात तो एक ही मौत मरे ,पर वह रफ्ता रफ्ता मर रही है। रातों को चौंक चौंक पडती है...चारों ओर हिमालय की गहरी घाटियाँ ,खाईयाँ और ब्लैक होल नज़र आते हैं।भयानक बर्फीले झँझावात में बदन आरे सा चिरने लगता है। चमडी नीली पडकर उधडने लगती है और वह मानो चीख सी रही होती है...’प्रशाँत मत जाओ उधर ,ब्लैक होल है उधर ‘ और नींद खुल जाती है। गालों पर ठंडा ठंडा महसूस होता है। हथेलियाँ फिराती है तो आँसुओं की चिपचिपाहट....कब रोई? कुछ याद नहीं। हाँ सिर भारी है तो रोई ही होगी। कहीं ब्लड प्रेशर तो नहीं बढ गया जो सिर इतना भारी है? ब्लड प्रेशर की दवा तो प्रशाँत के जाने के साथ ही उसके जीवन का हिस्सा बन गई थी।

उर्मि देख रही है आसपास के घरों में दूध पहुँचाकर तेजा फुर्ती से बर्फ की फिसलन पर उतरने लगा। चारों ओर देवदार और चीड की डालियाँ बर्फ के बोझ से झुक गईं थीं। ढलान की रेलिंग भी बर्फ से ढककर गायब हो चुकी थी कि धीरे धीरे फिर हिमपात होने लगा । हवा भी तेज़ चलने लगी....उर्मि दरवाज़ा बन्द कर ही रही थी कि अचानक हलक सूखने लगा ...चक्कर सा आने लगा...सामने बर्फ ही बर्फ और तेज़ अँधड....ब्लैक होल...बेहोश होते होते वह चीखी –“ उधर मत जाओ तेजा...आगे ब्लैक होल है...लौट आओ तेजा.....

होश आया तो वह अस्पताल में थी। तेजा ने ही उसे अस्पताल पहुँचाया था और बाबूजी को अस्पताल से फोन करवाया था। दौडे आये थे वे। डॉक्टर से परामर्श के बाद वे उसे घर ले आये थे-“ ये क्या हाल बना रखा है उर्मि....अब मैं यहाँ तुम्हे एक पल भी नहीं रहने दुँगा।“ वह बाबूजी से लिपटकर रो पडी थी। बाबूजी फैसला नहीं कर पा रहे थे कि ब्लैक होल में फँसा कौन है....प्रशांत....या उर्मि?

प्रस्तुति- तितिक्षा
                
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टिप्पणियाँ:-

 
अल्का सिगतिया:-

कल ही  इससे मिलती। जुलती  कहानी सुनी थी।सिपाही। तो चला गया  पर पीछे। मानसिक। यातना। झेलती है पत्नी।कहानी। की चित्रात्मकता pictorial quality उसकी। शक्ति।कुछ सपाट बयानी कहीं। कहीं।पर यह मेरी। समझ हो सकती है ।

मनीषा जैन :-
बहुत सधी हुई कहानी।आज के ठंडे पड़ते रिश्तों के विपरीत संबधों की गरमाहट की कहानी मन में उम्मीद पैदा करती है कि रिश्ते कभी मरा नहीं करते।
कहानीकार को बधाई।

कुंदा जोगलेकर:-
दिल छू गयी कहानी। मर्मस्पर्शी। एक बार शुरू की तो पूरी  किये बिना रुक नहीं पायी। कथानक,शिल्प,शैली सब मिलकर एक अच्छी कहानी के लिए कथाकार का अभिनन्दन।

स्वाति श्रोत्रि:-
कहानी में चित्रात्मकता से सारे चित्र उभर कर आये बहुत सुंदर कहानी शिल्पकार को बधाई

किसलय पांचोली:-
कहानी अच्छी लगी। बर्फ मन और जीवन से जुड़ी मार्मिक कहानी। हर घटना/ दुर्घटना / खबर अपने में कितनी कहानियों के बीज सुप्तावस्था में समेटे होती है। पत्नी की मनस्थिति के बीज को कहानीकार माली ने खूब अच्छे से बोया और पेड़ बनाया है। बधाई।

मनीषा जैन :-
कल की कहानी समूह दो की साथी कहानीकार, उपन्यासकार व कई सम्मानों से सम्मानित  संतोष श्रीवास्तव जी की हैं। आज भी कहानी पर चर्चा जारी रहेगी। अन्य साथी भी कहानी पढ़े और बताएँ कहानी कैसी लगी ?

रेणुका:-
Kahani ek dukhad sthiti ko darshati hai...samvedansheel sthiti.......kintu yadi patni apne bete Ko dekhe...uske liye jine ko apna lakshy bana le...to shayad is Tara se na bikhre...

फ़रहत अली खान:-
वक़्त यूँ तो लगभग हर ज़ख़्म का मरहम होता है, ब-शर्त-ए-कि उसे किसी घटना द्वारा कुरेदा न जाए।
बहुत ही उम्दा कहानी है। मर्म को छूती हुई। एक-एक चीज़ का बहुत ख़ूबी के साथ वर्णन किया गया है। बार बार टाइम डोमेन में एक बिंदु से दूसरे बिंदु तक जाने पर भी रवानी कहीं नही खोती। संतोष जी को बधाई।

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