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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

ग़ज़ल : सिया सचदेव

सिया सचदेव की ग़ज़लें
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6 अगस्त 1969को लखनऊ के पास सीतापुर में जन्मी सिया सचदेव को बचपन से ही कला-संगीत का वातावरण मिला। उन्होंने कच्ची उम्र से ही कविताएं लिखना शुरू कर दिया।हिन्दी,उर्दू,अंग्रेजी व पंजाबी में
इन्होने कई    गीत,दोहे,कहानियां,लेख,भजन,नज्म तथा ग़ज़लें लिखी जो समय समय पर देश की स्थापित पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं..2011 में  उनकी ग़ज़लों का पहला मजमुआ ‘उफ़ ये ज़िन्दगी’ शाया हुआ। उस्तादों से ‘उफ़ ये ज़िन्दगी’ को भरपूर सराहना मिली उनकी चौथी किताब जल्द प्रकाशित होने वाली है। जिंदगी के तमाम मरहलों के साथ-साथ एक सदा-शांत सूफियाना भाव सिया की ग़ज़लों-गीतों का स्थायी भाव है। साहित्य की दूसरी विधाओं पर भी सिया की खूब पकड़ है। उनकी कहानियों पर दो लघु फिल्में बन चुकी हैं। जाने माने मंचों से सिया जी ने प्रस्तुति दी है।उन्हे निराला सम्मान,साहित्य मणि,साहित्य कलश,काव्य शिरोमणि इत्यादि कई सम्मान से नवाज़ा गया है।वर्तमान में बरेली (उ.प्र.) में रह रहीं सिया जी अनेक साहित्यिक व सामाजिक संस्थाओ में विभिन्न पदों पर रहते हुए सफल संचालन कर रही हैं।
                साथियों आज की पोस्ट सिया जी के नाम है,,,पेश है उनकी लिखी कुछ ग़ज़लें......

एक
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आईना रख के सामने बैठा न कीजिये
अपने को इतने गौर से देखा न कीजिये

यादों की ज़िंदगी का भरोसा न कीजिये
बिस्तर को आँसुवों से भिगोया न कीजिये

इस रोग का इलाज़ नहीं है कहीं जनाब
पहरों किसी की सोच में डूबा न कीजिये

एहसास यूँ करोगे तो दिल पे बन आएगी
ऐसे किसी के वास्ते रोया न कीजिये

कितने नक़ाब ओढ़े है हर आदमी यहाँ
आइना लेके शहर में घूमा न कीजिये

रिश्तों का कुछ तो आप भी रक्खा करे लिहाज़
हर बात को बढ़ा के उछाला न कीजिये

बरसों के बाद खुशियों की दस्तक सुनाई दी
इस घर में ग़म का कोई भी चर्चा न कीजिये

में'आर_ ए_इश्क़ आपने समझा नहीं है क्या ?
दुनिया के सामने हमें रुसवा न कीजिये

तंग आ गए है आपकी इन बंदिशों से हम
ऐसा न कीजिये कभी वैसा न कीजिये

फिरते है लोग मुट्ठे में अपनी नमक लिए
यूं ज़ख्म दूसरों को दिखाया न कीजिये

कुछ तो हमें सकूं से जीने भी दे ज़रा
सांसों पे मेरी आप यूँ क़ब्ज़ा न कीजिये

अपनी ज़बान पे भी कभी कायम रहे ज़रा
झूठा कभी भी आप यूँ दावा न कीजिये

आदाब ए दोस्ती का तकाज़ा है ये सिया
गैरों के सामने कोई चर्चा न कीजिये
०००

दो
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कैसे कह दूँ तुझे तू मेरा है
तेरा अपना अलग बसेरा है

मैं तुझे किस तरह दिखाई दूँ
तेरी दुनिया ने तुझको घेरा है

तेरे आँगन में रौशनी हरसू
मेरे चारो तरफ अँधेरा है

हम में इतना सा बस ताल्लुक़ है
मैं हूँ इक रात तू सवेरा है

हर तरफ शोर है क़यामत का
दिल में खामोशियों का डेरा है

देख कर तुझ में इतनी तबदीली
एक अनजान डर ने घेरा है
०००

तीन
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याद रह जायेगी बस फ़िक्र की फन की खुशबू
छोड़ जाएंगे यहाँ हम तो  सुखन की खुशबू

थरथाते  हुए लफ़्ज़ों से मेरे ज़ाहिर है
मेरे लहजे में उतर आई थकन की खुशबू

कुछ शहीदों ने बहाया है लहू सरहद पर
हर तरफ फैल गयी मेरे वतन की खुशबू

उसका पैकर है की इक इत्र का मजमुआ है
जैसे इक गुल में सिमट आये  चमन की खुशबू

खासियत है ये मेरे मुल्क की दुनिया वालो
मिलके रहती है यहाँ गंग ओ जमन की खुशबू

तेरे आमाल बता देंगे हकीकत तेरी
छुप  नहीं सकती सिया  चाल  चलन की खुशबू
०००

चार

मसाइब हमसफ़र रहते हैं मेरे
मरासिम दर्द से ग़हरे हैं मेरे
कोई जब पोंछने वाला नहीं है
तो फिर ये अश्क़ क्यों बहते है मेरे
सभी रस्ते हुए मसदूद जब तो
तेरी जानिब क़दम उट्ठे हैं मेरे
मुझे ग़ैरों से कब शिकवा है कोई
मुख़ालिफ़ आज तो अपने हैं मेरे
नहीं आती मुझे तख़रीब कारी
नज़रिये आपसे अच्छे है मेरे
कहा उसने सिया साँसो पे तेरी
तेरी हर फ़िक्र पर पहरे मेरे
०००

पाँच
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दम उसकी झूठी मोहब्बत का भर रही हूँ मैं
खुद अपने आप को बर्बाद कर रही हूँ मैं

मेरी अना की गया है वो किर्चियां करके
चुभन सी हर घड़ी  महसूस कर रही हूँ मैं

यक़ीन प्यार का  अब आँधियों की जद में हैं
मुझे संभाल लो आकर बिखर रही हूँ मैं

मैं अपने क़दमों की आहट भी सुन नहीं पाती
ख़ुदा  ही जाने कहाँ से गुज़र रही हूँ मैं

तेरे ख़ुलूस ने इतना किया मुझे मोहतात
खुद अपने जिस्म के साये से  डर रही हूँ मैं

लगाओ अब मेरी कमज़ोरियों का अंदाज़ा
जो वादा करके भी तुमसे मुकर रही हूँ मैं

मेरी हयात में दो चार लम्हे बाक़ी है
ठहर जा मौत ज़रा सा संवर रही हूँ मैं
०००
सभी ग़ज़लः सिया सचदेव
प्रस्तुतिः रुचि गाँधी
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टिप्पणियाँ:-

राहुल वर्मा 'बेअदब':-

बहुत उम्दा सिया जी
तेरे आमाल बता देंगे हकीक़त तेरी
छुप नहीं सकती 'सिया' चाल-चलन की ख़ुशबू
बेहतरीन

फ़रहत अली खान:-
कुछ मसरूफ़ियत थी, सो सिया जी की ग़ज़लें अभी अभी पढ़ीं।
बहुत उम्दा ग़ज़लें कही हैं। पहली और पाँचवीं ग़ज़ल सबसे ज़्यादा पसंद आयीं। हालाँकि सभी ग़ज़लें क़ाबिल-ए-दाद हैं।
पहली ग़ज़ल का दसवाँ शेर,
दूसरी ग़ज़ल का दूसरा शेर,
तीसरी ग़ज़ल का पाँचवाँ शेर,
चौथी ग़ज़ल का तीसरा शेर
और पाँचवीं ग़ज़ल का छठा शेर
हासिल-ए-ग़ज़ल शेर हुए हैं।

सत्यनारायण:-
मित्रो आज का दिन भी इन्हीं ग़ज़लों पर चर्चा का दिन है...इसलिए बातचीत ज़ारी रहे....सिया जी अपनी ग़ज़लों की रचना प्रक्रिया के बारे में कुछ कहना चाहें तो कहें...अच्छा लगेगा....और कोई ग़ज़ल भी साझा करना चाहें तो कर सकती...सोमवार को नयी पोस्ट साझा होगी.....

सिया सचदेव:-
Farhat saheb aapne jis moHabbat aamez aur pur khulooS andaaz se mere kalaam ko saraha hai us ka shukriya adaa karne ke liye mere paas alfaaZ nahiN haiN. Allah ka martaba buland kare, tah e dil shukr guzaar hooN aapki main shukrguzar hoob bizoka group ki jo unhone  mujh jaise  adna se Qalamkaar  ko itna maan diya ..behad aabhari hoon main
Farhat saheb aapne jis moHabbat aamez aur pur khulooS andaaz se mere kalaam ko saraha hai us ka shukriya adaa karne ke liye mere paas alfaaZ nahiN haiN. Allah aapka ka martaba buland kare, tah e dil shukr guzaar hooN aapki

मेरी शायरी की उम्र बहुत मुख़्तसर है।  टूटे फूटे लफ़्ज़ों ने कब शायरी का रूप  धरा  पता ही  नहीं  चला .और  सिया नए सफर पे गामज़न हो गई।देखा जाए तो आप इससे कुल 5  बरस की मुददत  पर   आंक  सकते हैं ,,, लेकिन इंसान  को  उसका गुज़रा  हुआ  माज़ी कभी नहीं भूलता। । शायद  बचपन से ले कर आज तक जो कुछ मेरी ज़िन्दगी   ने देखा ,समझा ,जाना ,, उसी की अक्कासी मेरी शायरी में दर  आई  … अपने  संस्कार से मज़बूती से जुड़ी  एक घरेलू औरत . अपने दर्द का इज़हार कैसे करती होगी , मैं ने शायरी के माध्यम से उन् लाखों औरतों के दर्द को महसूस किया ,ये मुझे मेरी शायरी की देन  है. सोचती हूँ जिन को अपना दुःख कहने का कोई जरिया नहीं मिलता हो  कैसे अपना जीवन बिता पाती होंगी।
aap sabhi ne is qadar mohbbaton se nawaz diya to  hausla badh gaya कृतज्ञभाव धन्यवाद देती हूँ आप सभी आदरणीय गुणीजनों का आप इसी तरह हौसला देते रहें और  मैं आपके स्नेह को सार्थक सिद्ध कर सकूँ. आपकी इन नेक शुभकामनाओ के लिए आभारी हूँ !आपका स्नेह ही मेरा  सामर्थ्य है. सादर और ससम्मान नमन

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