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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

ग़ज़ल : हसन बरेलवी

हसन बरेलवी(1859-1908) जिस आला दर्जे के सुख़नवर थे, उतना नाम उनका नहीं हुआ। कम ही लोग उनका नाम जानते होंगे। शायद ज़्यादा लम्बी उम्र तक न जी पाना इसकी वजह रही हो। दाग़ के लगभग समकालीन ये बेहतरीन शायर उसी रंग की ग़ज़लें कहा करता था जिस रंग की दाग़ कहा करते थे।
आज हसन बरेलवी की चार ग़ज़लें(पूर्ण/आंशिक) पढ़कर इनके कहन की ख़ुसूसियात पर बात की जाए:

1.
मिल गया दिल, निकल गया मतलब
आप को अब किसी से क्या मतलब

हुस्न का रौब, ज़ब्त की गर्मी
दिल में घुट-घुट के रह गया मतलब
(ज़ब्त - बर्दाश्त; गर्मी - तीव्रता)

न सही इश्क़, दुःख सही नासेह
तुझ को क्या काम, तुझ को क्या मतलब
(नासेह - नसीहत देने वाला/समझाने वाला)

मुज़्दा ऐ दिल! कि नीम-जाँ हूँ मैं
अब तो पूरा हुआ तेरा मतलब
(मुज़्दा - अच्छी ख़बर; नीम-जाँ - अधमरा)

अपने मतलब के आशना हो तुम
सच है तुमको किसी से क्या मतलब
(आशना - दोस्त/साथी)

आतिश-ए-शौक़ और भड़की है
मुँह छुपाने का खुल गया मतलब
(आतिश-ए-शौक़ - प्रेम-अग्नि)

कुछ है मतलब तो दिल से मतलब है
मतलब-ए-दिल से उनको क्या मतलब
(मतलब-ए-दिल - दिल की इच्छा)

उन की बातें हैं कितनी पहलू-दार
सब समझ लें जुदा-जुदा मतलब
(पहलू-दार - घूमी-फिरी; जुदा - अलग)

उस को घर से निकाल कर ख़ुश हो
क्या 'हसन' था रक़ीब का मतलब
(रक़ीब - विरोधी)

2.
वो मुझसे बे-ख़बर हैं, उनकी आदत ही कुछ ऐसी है
मैं उनको याद करता हूँ, मुहब्बत ही कुछ ऐसी है

मैं किस गिनती में हूँ और इक मेरे दिल की हक़ीक़त क्या
हज़ारों जान देते हैं, वो सूरत ही कुछ ऐसी है

कोई आए ये आती है, कोई जाए ये जाता है
मेरा दिल ही कुछ ऐसा है, तबीयत ही कुछ ऐसी है

3.
उन का जल्वा नहीं देखा जाता
देख देखा, नहीं देखा जाता
(देख देखा - देख कर देखा)

क़त्ल करने की वो जल्दी थी तुम्हें
अब तड़पना नहीं देखा जाता

चश्म-ए-ख़ूँ-बार ख़ुदा रहम करे
तेरा रोना नहीं देखा जाता
(चश्म-ए-ख़ूँ-बार - ख़ून रोती आँखें)

उल्फ़त उनकी नहीं छोड़ी जाती
हाल दिल का नहीं देखा जाता
(उल्फ़त - मुहब्बत)

देखने ही के लिए हैं आँखें
इन से क्या-क्या नहीं देखा जाता

पर तेरी बर्क़-ए-तजल्ली का जमाल
ख़ूब देखा, नहीं देखा जाता
(बर्क़-ए-तजल्ली - बिजली की चमक; जमाल - ख़ूब-सूरती)

नामा पूरा वो 'हसन' क्या देखें
नाम पूरा नहीं देखा जाता
(नामा - ख़त/किताब)

4.
कौन कहता है कि आकर देख लो
हाल आशिक़ का बुला कर देख लो

पूछते क्या हो कि दिल में कौन है
लो ये आईना उठा कर देख लो

पूछना ये है कि पूछो मुझ से हाल
देखना ये है कि आ कर देख लो

वो अगर देखे तो आँखें फूट जाएँ
तुम 'हसन' को छुप-छुपाकर देख लो
प्रस्तुति : फ़रहत अली खान
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टिप्पणियाँ:-

बलविंदर:-
"फ़रहत" भाई वाक़ई "हसन" बरेलवी का कोई ज़्यादा तआरुफ़ हासिल नहीं है, लेकिन उन का कलाम ही उनका तआरुफ़ है, और ये भी बजा है कि उनका कलाम उस्ताद "दाग़" से मुतास्सिर है, इन ख़ूब-सूरत ग़ज़लों के लिए बहुत बहुत शुक्रिया।

फ़रहत अली खान:-
शुक्रिया बलविंदर जी।

हसन बरेलवी साहब की ग़ज़लों का प्रवाह वाक़ई दाग़ देहलवी साहब से मिलता है। दरअसल बहुत कम शायर इतनी प्रवाहमय ग़ज़लें कह पाए। वैसे तो हर ग़ज़ल बहर में होने के कारण एक नैसर्गिक प्रवाह रखती है, लेकिन ये मुहावरों, लोकोक्तियों का इस्तेमाल है जो इन्हें और अधिक प्रवाहमय बनाता है; ये ग़ज़लें(या दाग़, ज़ौक़ आदि की ग़ज़लें) पढ़ कर इस बात की पुष्टि की जा सकती है।

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