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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

झुग्गियों पर दिल्ली सरकार की दोहरी नीति : सुनील कुमार

मेहनतकश जनता के लिए तो यह व्यवस्था ही बुरी है लेकिन कुछ मौसम ऐसे होते हैं जो उनके जीवन को और बदहाल कर देते हैं। ठंड में हर साल हजारों लोगों की मौत होती है और मरने वाले सभी मेहनतकश समुदाय के लोग होते हैं। ठंड में मेहनतकश जनता का अशियाना तोड़ दिया जाये या जल जाये/जला दिया जाये तो उनके लिए और दुखद होता है। दिल्ली में मेरा अनुभव है कि जब भी गरीबों के अशियाने उजाड़े जाते हैं तब  ठंड या बारिश के मौसम या बच्चों के स्कूल में पेपर चल रहे होते हैं। इस बात का प्रशाासन ध्यान ही नहीं रखता कि इससे इन बस्तीवालों को कितनी परेशानी होगी और उनके भविष्य पर क्या प्रभाव पड़ेगा। दिसम्बर माह में ऐसी ही कुछ घटनाएं दिल्ली में हुई हैं।
पहली घटना 1 दिसम्बर, 2015 को हुई। उस दिन यमुना पुस्ता के किनारे खेती करने वाले परिवारों के घरों पर बुलडोजर चला दिया गया। वेे 100 साल से वहां रह रहे हैं और जिसकी चार-चार पीढि़यां यहीं मर खप गयीं। इन किसानों के फसलों को रौंद दिया गया, घरों को तोड़ा गया और उनके सामने गड्ढ़े खोदे दिये गये। दूसरी घटना शकूरबस्ती की है, जहां 12 दिसम्बर को रेलवे ने झुग्गियां तोड़ दी और लोगों को बेघर कर दिया। इस घटना का संज्ञान दिल्ली हाईकोर्ट ने भी लिया और दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल ने उसको राजनीतिक मुद्दा बनाया।
तीसरी घटना समयपुर बादली की है। 18 दिसम्बर को समयपुर बादली की 102 झुग्गियां जल कर राख हो गयीं।  उस दिन शुक्रवार था और लोग काम पर गये थे। जो कुछ बचे थे वेे नमाज अदा करने पास के ही मजिस्द में गये थे। कुछ बच्चे बाहर धूप में खेल रहे थे तो मुनी जैसे कुछ बच्चे कूड़े बीनने गये थे। महिलाएं काम पर गई थीं और जो घर पर थीं बच्चों के साथ बाहर धूप सेंक रही थीं। अचानक उनकी झुग्गियां धू-धू कर जलने लगीं। लोगों ने समान बचाने की नाकाम कोशिश की। दमकल की गाडि़यां आईं और आग पर काबू पाया गया। तब तक 102 झुग्गियंा जल कर खाक हो चुकी थीं। लोगों के घर के समान, कपड़े, बर्तन, पहचान पत्र, राशन कार्ड, सब कुछ जल चुके थे। बस बचे थे तो तन पर पहने हुए कपड़े और आंखों में आंसू। लोगों का मानना है कि आग बिजली के शार्ट सर्किट से लगा होगा। बिजली विभाग ने यहां सभी घरों में मीटर लगाया है और वह हर माह बिजली का किराया वसूल करता है। बिजली विभाग द्वारा लगाये गये पोल लकड़ी के हैं जो मुश्किल से 7-8 फीट ऊंचे हैं। लोगों द्वारा लगातार बिजली के इस पोल को ऊंचा करने को कहा गया लेकिन बिजली विभाग ने उनके इस मांग पर ध्यान नहीं दिया।
यहां झुग्गियों की काफी संख्या है। उसी झुग्गी के एक बाहरी साईड में यह आग लगी जिसमें रहने वाले लोग यूपी के लखमीपुर, हरदोई, पीलीभीत, सीतापुर के मुस्लिम समुदाय के लोग हैं। ज्यादतर लोग संजय ट्रांसपोर्ट और दुकानों व फैक्ट्रियों में काम करते हैं। महिलाएं फैक्ट्रियों में तथा कूड़े बीनने का काम करती हैं। इस आग ने ठंड में लोगों के केवल रिहाईश ही नहीं छीना बल्कि कईयों के 20-22 साल से जोड़-जोड़ कर इकट्ठे किये गये समान को स्वाहा कर दिया। उनके दिल्ली की नागरिकता को ही मिटा दिया। छोटे बच्चों के साथ माताएं आग के पास बैठ कर रात गुजारती हैं। कुछ घरों में कुछ माह बाद बेटियों की शादी होने वाली थी और शादी के लिए एक-एक समान जुटाये जा रहे थे । इस आग ने उनके इस सुहाग के समान को भी स्वाहा कर दिया। अब उनको चिंता सताये जा रही है कि बेटियों की शादी को पूरा कैसे करेंगे। इन लोगों में से ज्यादातर के पास अपने पैतृक गांव में भी कोई जमीन या घर नहीं है।
जैतू विधवा है जिनकी उम्र 50 से अधिक है और एक आंख भी खराब है। जैतू अकेली ही रहती हैं और मजदूरी करके अपना भरण-पोषण करती हैं। उसने घर मंे जले हुए समानों को इकट्ठा करके एक प्लास्टिक के बोरे में रखा है। पानी से भींग गये लकड़ी के बुरादे को भी वह इकट्ठा कर रही है ताकि उसे सुखा कर खाना बना सके।  जैतू बताती है कि उनकी उम्र ज्यादा हो गई है इसलिए उनको कोई काम भी नहीं देता है। उनको काम तब ही मिल पाता है जब उसको गंदगी के कारण कोई करना नहीं चाहता है। जैतू को ज्यादातर गंदे प्लास्टिक छांटने का काम मिलता है जिसमें उन्हें 150-200 रु. मिल जाते हैं।
शकूरबस्ती को राजनीतिक मुद्दा बनाने वाले दिल्ली के मुख्यमंत्री के लिए इन गरीबों के आशियाने जलना कोई मुद्दा ही नहीं है। दिल्ली सरकार का कोई मंत्री घटनास्थल पर नहीं गया। दिल्ली सरकार की तरफ से 102 झुग्गियां जलने पर 10 बाई 6 के 30 टैन्ट लगाये गये और पानी के टैंकर लाये गये। चार रोज बाद 25-25 हजार के चैक दिल्ली सरकार द्वारा बंाटे गये। सरकार ने उसी दिन टैन्ट और टैंकर को हटा लिया। अभी 15-20 लोगों को चेक नहीं मिला है क्योंकि चेक में नाम गलत था। जिन लोगों के चैक नहीं आये हैं वे अभी एसडीएम ऑफिस का चक्कर लगा रहे हैं। उनको कोई स्पष्ट बात नहीं बताई जा रही है। लोग अभी भी खुले असमान या प्लास्टिक शीट के नीचे ठंड में रात गुजारने को विवश हैं। काफी कोशिश करने के बाद भी 4 जनवरी, 2016 तक विधायक से उनकी मुलाकात नहीं हो पाई थी। इस आपा धापी के कारण झुग्गी वाले अपने रोजमर्रा की कमाई नहीं कर पा रहे हैं।
गरीबों की रहनुमा बनने वाली दिल्ली सरकार को यह भी नहीं लगा कि इनको ठंड तक टैन्ट और विस्तर दिया जाये ताकि वे अपने आप को ठंड से बचा सकंे। छोटे-छोटे बच्चे एक-एक कपड़े में आग के सहारे रात गुजार रहे हैं। कई लोगों के बैंक एकांउट नहीं है और जिनके हैं वे भी जल चुके हैं। ऐसे में इनको चेक से पैसा लेने में कठिनाईयों का सामना करना पड़ रहा है। राशन कार्ड जल जाने के कारण इनको राशन नहीं दिया जा रहा है। इनके अन्य दस्तावेज भी जल चुके हैं। वे दस्तावेज कैसे और कहां से मिलेगंे, उसके लिए प्रशासन द्वारा इनको किसी तरह की सहायता नहीं की जा रही है। स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के कॉपी-किताब जल चुके हैं, इसे भी प्रशासन ने मुहैय्या नहीं कराया है।
शकूररबस्ती पर मानवीय दृष्टिकोण दिखाने वाली दिल्ली सरकार की मानवीयता समयपुर बादली अग्निकांड पर क्यों नहीं दिखी? क्या यह दिल्ली सरकार की दोहरी नीति का परिणाम नहीं है? जहां दूसरांे पर जिम्मेदारी डालना हो वहां जोर-जोर से चिल्लाओ और जहां खुद की जिम्मेदारी हो वहां पर शांत हो जाओ - यही दिल्ली सरकार का आचरण है।

000 सुनील कुमार

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