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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

कहानी : फ़हीम आज़मी अनुवाद : शम्भू यादव

सुप्रभात साथियो,

साथियो आज आपके लिये प्रस्तुत है फ़हीम आज़मी जी की उर्दू में लिखी कहानी जिसका अनुवाद किया है शम्भु यादव जी ने।

सभी साथी अपने विचार जरूर रखें ।
तो आइए पढ़ते हैं कहानी आर्ट का पुल-

आर्ट का पुल 
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पहले तो सारा इलाका एक ही था और उसका नाम भी एक ही था। इलाका बहुत उपजाऊ था। बहुत से बाग, खेत, जंगली पौधे, फूल और झाडियाँ सारे क्षेत्र में फैली हुयीं थीं। इसइलाके के वासियों को अपने जीवन की आवश्यकताएँ जुटाने के लिये किसी और इलाके पर आश्रित नहीं होना पडता था।खेतों से अनाज, पेसों से मकान बनाने और जलाने केलिये लकडियाँ, भट्टों से पकी हुयी इँटें, पास के बागों से फूल और साग-सब्जी, पास के तालाब से मछलियाँ ...अर्थात आवश्यकता के सभी पदार्थ उपलब्ध थे।

धीरे-धीरे पास के व्यापारिक नगर से व्यापारिक सभ्यता और विकास की लहरें इस इलाके की ओर बढ़ने लगीं और एक दिन इस इलाके में बहुत बड़ा नाला खोदा गया जिसने इस क्षेत्र को दो भागों में बाँट दिया। किसी ने कहा कि यह गङ्ढा बिजली के तारों को खम्भे के ऊपर से ले जाने के स्थान पर धरती के नीचे दबाने के लिए खोदा गया है। कोई कहता था कि इस इलाके में टेलीफोन आनेवाला है और यह टेलीफोन की लाइनें बिछाने के लिए खोदा गया है। अथवा जितने मुँह उतनी बातें बस सवेरे ही ट्रेक्टर और कुटियर और उसके साथ कुछ मंजदूर आ जाते थे, फावड़े और गेंती के साथ। ये लोग इस गङ्ढे को गहरा करना शुरू कर देते थे और शाम को चले जाते थे। यदि इनसे कोई पूछता था तो बस यही कहते थे कि ठेकेदार से पूछ लो, हमें नहीं मालूम कि यह गङ्ढा क्यों खोदा जा रहा है।

दिन-प्रतिदिन गङ्ढा गहरा होता गया और एक दिन उसने इलाके के बीच में एक सूखे नाले का रूप धारण कर लिया। अब इसको पार करना लगभग असम्भव-सा हो गया और इस प्रकार नाले के इस पार के लोगों तथा उस पार के लोगों का सम्बन्ध-विच्छेद हो गया। कभी-कभी नाले के इस पार के लोग उस पार के लोगों से नाले के दोनों ओर खड़े होकर वार्तालाप कर लेते थे और अधिकतर बात का विषय यह नाला ही होता था। उन्हें उन कोयलों, फांख्ताओं और मैनाओं से बहुत स्पर्धा होती थी, जो बिना किसी बन्धन के नाले के इस पार के पेड़ों से उड़कर उस पार के पेड़ों पर बैठ जाते थे और इस पार के खेत से उड़कर उस पार के खेत में दाने चुगने लगतेथे।

और एक दिन ठेकेदार के आदमी चले गये। नाला उसी प्रकार खुदा रहा। सम्भवत:, दूसरा ठेकेदार, जिसे तार बिछाना था या तीसरा ठेकेदार, जिसे गङ्ढा पाटना था, अभी तक निश्चित नहीं किया गया था। या वह किसी दूसरे इलाके में व्यस्त था। यह सूखा नाला यों ही पड़ा रहा, यहाँ तक कि वर्षा आयी और यह पानी से भर गया। धीरे-धीरे उसके दोनों ओर के किनारे टूटने लगे और उसने एक नदी का रूप धारण कर लिया, जो आगे चलकर एक बड़े नाले में मिल जाती थी और फिर उस दरिया में मिल जाती थी, जो इलाके के पास ही बहता था।

सर्दी आयी तो लोगों ने सोचा कि नाले का पानी खुश्क हो जाएगा और शायद ठेकेदार के आदमी उसको पाट दें। कुछ ऐसे भी लोग थे जिन्होंने उसे स्वयं पाटने का विचार किया, परन्तु जैसे ही सर्दी समाप्त हुई और गर्मी आयी, आस-पास की पहाड़ियों पर बर्फ पिघलने लगी। यह बर्फ पहले भी पिघलती थी, परन्तु छोटी-छोटी नालियों के रूप में फैल जाती थी और तेजी से ढलान की ओर बहकर उनका पानी बड़े दरिया में मिल जाता था। यदि कहीं पानी फैला भी तो अधिक समय तक नहीं रुकता था, किन्तु अब सारा पानी बहकर इलांके के उस नाले में आ गया। गर्मी बीती, वर्षा आयी, नाला और विस्तृत हो गया। फिर सर्दी आयी और पानी उसी प्रकार बहता रहा। फिर पहाड़ियों पर बर्फ पिघली और नाला अधिक विस्तृत हो गया। किनारे और टूटे तथा यह नाला हर बरस चौड़ा होता गया और फिर एक बड़े दरिया ने इलांके को दो भागों में बाँट दिया। इलाके के निवासियों को दो भागों में बाँट दिया। रिश्तेदार कुछ इधर और कुछ उधर रह गये और जब मुहम्मद खान की पुत्री के विवाह की समस्या सामने आयी, तो मुहम्मद खान की पत्नी ने कहा, ''तो फिक्र काहे की है? तुम्हारे भाई के बेटे के साथ तो बचपन में रिश्ता हो चुका है।''

मुहम्मद खान पहले तो चुप रहे, फिर उन्होंने एक ठंडी साँस ली और बोले, ''क्या बात करती हो? अरे, वे लोग उस पार के हैं। अब हमारा उनसे क्या वास्ता! अपने इलांके में रिश्ता खोजो।''

''तो ऐसी कौन-सी बात है, हम एक ही तो हैं। वह उस पार रहता है, तो क्या हुआ! तुम्हारा भाई ही तो है।''

''नहीं, अब वह उस पार रहता है, बीच में दरिया है। इस पार के लोग उस पार के लोगों से अलग हैं। वह मेरा भाई था, लेकिन तब, जब दरिया नहीं था।''

''तो दरिया खून के रिश्ते को तो नहीं तोड़ सकता।''

''हाँ, तोड़ सकता है। दरिया सरहदें (सीमाएँ) बना देता है। मुल्कों को अलग कर देता है। इनसानों को अलग कर देता है।''

''यह तुम कह रहे हो।''

''मैं तो वही कह रहा हँ जिसे और लोग कहते हैं। और फिर यह भी तो नहीं कि दरिया को पार करके आसानी से इधर से उधर जाएा जा सके। दरिया पर पुल भी नहीं है। उसमें नाव भी नहीं चलती।''

और हुआ भी यही था। पुल बनाने के सारे प्रयत्न व्यर्थ हो गये थे। जब भी पुल बनता था, एक मौसम भी नहीं निकालता था। सर्दी में बनता था, तो गरमी में टूट जाता था। पहाड़ों से आनेवाले पानी का वेग बहुत तेज होता था। दरिया के किनारे भी टूट जाते थे। मिट्टी बह जाती थी। लोग मिट्टी भरकर लकड़ी का पुल बनाते थे। कोई सीमेंट का पक्का पुल तो बनता ही नहीं था। भला मिट्टी का पुल कैसे टिका रहता। और नाव, उसका भी प्रयास किया गया। कुछ लोगों ने सोचा कि पुल नहीं बनता और लोग दरिया को पैदल भी पार नहीं कर सकते, तो नाव ही बना लें। उसी पर चढ़कर दरिया पार कर लिया करेंगे। परन्तु हुआ यों कि जब पहली नाव बनी तो मंगू दूधवाला सवेरे-सवेरे आया और मुहम्मद खान से बोला, ''खान साहब! सुना आपने, वह जो चार घड़ों को उलटा करके और ऊपर कीकर तथा सरपत का मचान बनाकर नाव बनायी गयी थी, उसके दो घड़ों में जहरीले साँप घुस गये और दो मुसांफिरों को डस लिया। अब मुखिया जी ने कहा है कि नाव नहीं चलेगी।''

''क्यों नहीं चलेगी! अरे ऐसे हादसे (दुर्घटनाएँ) तो होते ही रहते हैं। आइन्दा (भविष्य में) एहतियात (सावधानी) से काम लिया जाएगा।''

''क्या एहतियात (सावधानी) होगी? घड़ा तो उलटा होता है। पानी के अन्दर से साँप निकलकर बैठ जाए, तो वह दिखाई भी नहीं देता और इतना वक्त किसके पास है कि वह मचान को पीटता रहे और साँप को भगाता रहे।''

''अरे हर मुश्लि काम में एहतियात (सावधानी) रखनी पड़ती है। अगर हम कुछ दिन तक मचान पीटते रहेंगे और नाव चलती रहेगी, तो साँप खुद ही डर कर भाग जाएगा।''

''मगर चलेगी कैसे? मुखिया ने तो रोक दिया है, घड़े तोड़ दिये गये हैं?''

मुहम्मद खान ने मुखिया को धीरे-से एक मोटी-सी गाली दी और चुप हो गया। वह और कर ही क्या सकता था! मुखिया से कौन झगड़ा मोल लेता! परन्तु मुहम्मद खान का दिल नहीं माना। उसने सोचा कि पंचायत बुलायी जाएे। हो सकता है पंचायत के कहने से मुखिया मान जाए। तब मुहम्मद खान ने लोगों के घर जा-जाकर उन्हें समझाना आरम्भ कर दिया, ''देखो ना। आखिर इसमें क्या हर्ज है। दुनिया का निजाम (व्यवस्था) तो मुहब्बत पर चलता है। नंफरत से तो कोई मसला (समस्या) हल नहीं होता। फिर तुम तो जानते ही हो कि तुम्हारे भी रिश्तेदार, दोस्त उस पार रह गये हैं। अगर हमारे बीच यह दरिया रुकावट है, तो क्या हुआ। नाव चलाने से हम अपना मेल-जोल तो कायम रख सकते हैं। अरे घुस गया होगा साँप। साँप तो घरों में भी घुस जाते हैं। उससे कोई घर थोड़े ही छोड़ देता है।''

कुछ लोगों ने मुहम्मद खान की बात मानी, कुछ चुप रहे और कुछ ने उसका कड़ा विरोध किया।

''तुम क्या रिश्तेदारों की बातें करते हो। उस पार के लोगों से कैसा रिश्ता? इतने दिनों में सब कुछ तो बदल गया। देखते नहीं हो, उनकी सलवारों के घेरे कितने बढ़ गये हैं। चादरों में कितना फर्क है। खाने में खटाई भी बहुत ज्यादा होती है। रोटी भी कितनी पतली होती है। मकान की ईंटें कितनी बड़ी होती हैं। और वे लोग तोता भी तो नहीं पालते। उनकी मिट्टी बिलकुल नमकीन है। इधर हमें देखो, हम मिट्टी के कितने सुन्दर बर्तन बनाते हैं। हमारी धरती भी तो कितनी जरखेज (उपजाऊ) है। नहीं जी, अब हमारा उनसे क्या रिश्ता! तुम अपनी सरहदों में लोगों से रिश्ता जोड़ो। अब तो उनकी जुबान भी तुम्हारी समझ में न आएगी।''

पंचायत हुई। लोग बोलते रहे। धीरे-धीरे, जोश से। बूढ़े और जवान सब बोले, लेकिन मुखिया ने बस एक बात कह दी, ''तुम नाव बनाने की बात कहते हो। तुम तो बस यही समझते हो कि नाव में बैठकर लोग इस पार से उस पार जाएँगे। देखो अपनी धरती की तरफ। देखो अपने लहलहाते खेत। हम कितने खुश हैं। क्या हमारे खेतों का अनाज और हमारे पेड़ों के फल नाव से उस पार न जाने लगेंगे? फिर तुम क्या करोगे, किसको रोकोगे। नहीं जी, हम अपनी इलाके में खुश हैं। अपनी रोटी उनको दे देंगे, तो खुद क्या खाएँगे। पेट से बढ़कर भी कुछ और हो सकता है?''

और मुखिया पंचायत में अकेला तो आया नहीं था, हाथों में लाठियाँ और बल्लम लिए हट्टे-कट्टे जवान साथ थे। मुखिया तो अपनी जगह पर बैठ गया। परन्तु ये जवान भीड़ के चारों ओर खड़े हो गये। अपनी लाठियों और बल्लमों को यों उठाये रखा कि सबको दिखाई दें।

मुखिया बोल चुका, तो लोगों में काना-फूसी होने लगी। फिर लोग ऊँचे स्वर से बोलने लगे। फिर विवाद और प्रतिवाद आरम्भ हो गया। हाथापाई की नौबत आ गयी और पंचायत समाप्त हो गयी।

आज मुहम्मद खान के भाई के बेटे का विवाह था। दरिया के पार शहनाई की आवांज सुनाई दे रही थी। वह आवाज बहुत सुरीली लग रही थी। मुहम्मद खान दरिया के किनारे बैठ आवांज को सुन रहा था और सोच रहा थाकाश! यह बारात उनके घर में आयी होती। परन्तु यह कैसे सम्भव था। बीच में दरिया था और बारात को तो उसी ओर जाना था। दरिया को कैसे पार किया जा सकता था।

और मुहम्मद खान सोचने लगा यहूदियों ने कहा था कि खुदा इस्राईल का खुदा है। फिर इस्राईल बारह कबीलों में बँट गये। फिर उनके बीच सरहदें खिंच गयीं फिर उनकी जबानें बदल गयीं। फिर वे एक-दूसरे के दुश्मन हो गये मगर खुदा एक ही रहा, सबका खुदा।

और फिर अरब से आवांज आयी। हमारा भी खुदा वही है। पूरब का खुदा वही है, पश्चिम का खुदा वही है और आज सब कहते हैं, हम सबका खुदा वही है। फिर दरिया ने क्या बदला, खुदा हो तो बदला नहीं।

शहनाई की आवांज फिर गूँजी। और मुहम्मद खान ने सोचा दरिया उस आवांज को तो रोक नहीं सका और रोक भी नहीं सकता। यह तो दरिया के पानी से टकराकर और भी अच्छी लगती है।

और फिर देखते-ही-देखते कुछ और लोग मुहम्मद खान के पास आ बैठे और सोचने लगेक्या अच्छी आवांज आ रही है, दरिया के उस पार से। हमारी सरहदें अलग हैं और बीच में दरिया है, मगर यह गाने-बजाने की आवांज कितनी मधुर लग रही है। शादी हो गयी और शहनाई की आवांज भी बन्द हो गयी,परन्तु अब तो लोगों को चस्का पड़ गया था। दरिया के किनारे पर प्रतिदिन सायंकाल को मेला लगने लगा। उस पार के गीत और सितार की मधुर आवांज सुनते रहते और फिर उस पार के लोग भी अपनी तरफ के किनारे पर बैठने लगे, इस पार के गीत सुनने के लिए। दरिया के पानी से छनकर आनेवाली मधुर आवांज कितनी दर्द भरी थी, कितनी सुरीली। और फिर इन आवांजों के साथ और बहुत कुछ आया। दरिया के किनारों पर पिकनिक होने लगी। पकवान पकने लगे। वर्षा से बचने के लिए छप्पर बन गये। बैठने के लिए चबूतरे और भोजन की सुगन्ध और गाने की महक और शरीरों की झलक। अब दोनों तरफ के इलांकों में नंफरत का एहसास समाप्त हो गया था। और एक दिन इस इलाके का मुखिया आया और कहने लगा, ''तुम्हारे यहाँ गानेवालों और शायरों की क्या कमी है कि तुम उस पार के गानों की आवांज इतने शौक से सुनते हो। अरे, अपने इलांके के गाने गाओ! अपने इलाके वालों की आवाज सुनो। बस्ती में जाकर बैठो। वे तो उस पार के लोग हैं।''

परन्तु मुहम्मद खान बोला, ''मुखिया जी! अब यह तुम्हारे बस की बात नहीं है कि इनको रोको। इन्हें अब नाव की जरूरत नहीं। ये तो आसानी से उस पार चले जाते हैं आर्ट के पुल पर से...।'' और इस बार किसी ने मुहम्मद खान की बात को नहीं काटा।

मुखिया अपनी आँखों पर दायें हाथ की हथेली से साया करके और उचक-उचककर दरिया पर बना हुआ पुल तलाशने लगा।

चयन व प्रस्तुतिः तितिक्षा
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टिप्पणियाँ:-

अल्का सिगतिया:-
वाह वाह वाह।ये कहानी  बार बार सुननी और सुनानी चाहिए।भीतर तक जैसे बज उठा अनहद नाद।प्रशंसा के शब्द। बौने होंगे।साधुवाद  अप्रतिम। चयन हेतु

चंद्र शेखर बिरथरे :-
बेहतरीन कहानी । इन्सान तो सहज ही होता है सीधा साधा मगर भौतिकता उसे भ्रष्ट कर देती है । बाजारवाद का दंश उसे तिजारती बना देता है । कला को से सरहदों में नहीं बांधा जा सकता है । भावनाओं की कोई जात नहीं होती है । इसीलिए साहित्य और अन्य कलाएँ अमर हो जाती है । चंद्रशेखर बिरथरे

फ़रहत अली खान:-
बहुत उम्दा कहानी है। पहले दिल उदास हुआ और फिर ख़ुश हो गया। काश कि ऐसा ही हो जाए।

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