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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

तीन लघुकथाएँ

सुप्रभात साथियो।
बिजूका पर आज प्रस्तुत हैं तीन लघुकथाएँ , तीन रचनाकारों की। आप इन्हें पढ़े और इनपर अपनी टिप्पणी अवश्य दें। साथियों से गुजारिश है वे कोई अन्य सामग्री इस बीच न लगाएं।

1. सरमाया
कुलविंदर कौशल

वह कई वर्षों बाद गाँव आया था। शाम को घूमता-घुमाता वह चौपालकी तरफचला गया। गाँव की चौपालके पास कभी उसने बहुत यत्न से गाँव के नौजवान शहीद का बुत लगवाया था। बुत के चारों ओर चारदीवारी कर फूल-बूटे लगवा दिए थे। शहीद के बुत को देख, उसे बहुत आघात पहुँचा। पक्षियों ने बीठ कर कर बुत का बुरा हाल कर रखा था। चारदीवारी के भीतर उगे घास-फूस ने अपना कद बहुत बढ़ा लिया था। बाहर कुछ बुजुर्ग लोग बैठे ताश खेल रहे थे।
“राम-राम जी!” वह बुजुर्गों के पास पहुँच कर बोला।
“राम-राम बेटा, कब आया?”
“आज सुबह ही आया था। बाबा जी, आपने गाँव के शहीद की यादगार का बहुत बुरा हाल कर रखा है…।”
“तुझे पता ही है बेटा, सरकार कहाँ देशभक्त सूरबीरों की कदर करती हैं। सरकार कोई ग्रांट-ग्रूंट दे तो इसे बैठने लायक बनाएँ।” एक बुजुर्ग ने उसकी बात बीच में ही काटते हुए कहा।
“ताऊ जी, क्या हम इतने गए-गुज़रे हैं कि अपने शहीदों की यादगार की देखरेख के लिए भी सरकार के मुँह की ओर देखें। हम लोग हर वर्ष यज्ञ करवाने पर लाखों खर्च देते हैं, पर अपने सरमाये की देखभाल के लिए कुछ समय भी नहीं दे सकते। शर्म आती है मुझे तो…।” कहता हुआ वह आगे बढ़ गया।
सारी रात उसे नींद नहीं आई। दिन निकलते ही वह कस्सी उठा चौपाल की ओर चल दिया। जब वह वहाँ पहुँचा तो उसने देखा उससे पहले ही कई बुजुर्ग सफ़ाई के काम में जुटे हुए थे।
०००

2. अवतार सिंह दीपक की लघु कथा

“आप! हैडमास्टर साहब! धन्य हो गए हम, भाग कुल गए! आओ, आ जाओ…ओए छोटू, कुरसी साफ कर के ला, यहाँ मेरे पास।… आप बताइए क्या लोगे? ठंडा या गर्म?” प्रकाशक कश्मीरी लाल हैडमास्टर साहिब का स्वागत करते हुए कह रहा था।
“मेहरबानी! किसी चीज की जरूरत नहीं।” हैडमास्टर साहिब ने जवाब दिया, “इधर से गुज़र रहा था, सोचा आपके दर्शन करता जाऊँ। और सुनाइए, काम-धंधा कैसा चल रहा है?”
“आपकी कृपा है जी। इस बार तो सब कुछ दाँव पर लगा दिया है। पुस्तकें छापना तो एक जूआ है, हैडमास्टर साहब। पर इस बार तो पासा सीधा पड़ता दिख रहा है। अच्छे लेखक भी तो किस्मत से ही मिलते हैं। इस बार विद्यार्थियों के लिए विज्ञान की चार पुस्तकें प्रकाशित की हैं। ये चारों पुस्तकें दुग्गल जालंधरी से लिखवाई हैं। लेखक ने बहुत मेहनत की है। छापने में हमने भी कोई कसर नहीं छोड़ी।” कश्मीरी लाल ने रौ में आते हुए कहा, “आफसैट पर छपे चार-रंगे चित्र देखकर पाठक की भूख उतरती है। सिनेमा संबंधी इस पुस्तक ‘बोलती तस्वीरें’ ने तो राष्ट्रीय पुरस्कार जीता है। सरकार ने इसकी पाँच हजार प्रतियां खरीदी हैं। ‘बिजली की बातें’ पुस्तक को तो राज्य सरकार ने आठवीं कक्षा में सप्लीमेंट रीडर लगा दिया है। कोई भी पुस्तक खोल के देखिए, विज्ञान के नीरस मैटर को भी जीवन की उदाहरणों से मनोरंजक बना दिया है। हर बात बच्चे के दिमाग में झट से बैठ जाती है। कोई पुस्तक खोल कर तो देखिए।”
“सच में ही पुस्तकें तो कमाल की हैं। ये पुस्तकें तो लाइब्रेरी का श्रृंगार बनेंगी। कीमत भी वाजिब है।” हैडमास्टर साहिब ने तारीफ की।
“हैडमास्टर साहब, ये बताओ पैप्सी लोगे या चाय? गर्मी बहुत है, पैप्सी ठीक रहेगी।” और उसने नौकर को आवाज लगाई, “ओए छोटू, भाग कर अमीचंद की दुकान से ठंडी पैप्सी लेकर आ।”
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पैप्सी आ गई तो कश्मीरी लाल बोला, “हाँ तो हैडमास्टर साहब आप आर्डर कब भेज रहे हो?”
“कैसा आर्डर?”
“अपने स्कूल की लाइब्रेरी के लिए पुस्तकों का।”
“पर कश्मीरी लाल जी, मैं तो पिछले सप्ताह रिटायर हो गया हूँ।”
‘रिटायर’ शब्द सुनते ही हाथ में पकड़ी ठंडी बोतल उसे गर्म लगने लगी।
  ०००

3. भीतर का दुःख
सतिपाल खुल्लर

उसका दोस्त गुजर गया था। वैसे तो उसने ज़िंदगी में कइयों से दोस्ती की थी, पर अधिकतर से वह दोस्ती का निर्वाह नहीं कर पाया था। मुँह पर सच्ची बात कह देने की आदत ने उसे दोस्तों से दूर कर दिया था। उससे तो कई रिश्तेदार भी मुँह मोड़ गए थे। एक यही दोस्त रह गया था। आज इसकी मौत की खबर सुन कर तो उसके पाँवों के नीचे से जैसे जमीन ही खिसक गई थी।
वह बहुत ही भरे मन से पत्नी सहित दोस्त के घर पहुँचा था। पत्नी औरतों में बैठी मृतक दोस्त की पत्नी के गले लग कर रो रही थी। वह मर्दों में जा बैठा था। वहाँ दोस्त के ताऊ-चाचे, उनके बेटे व बाहर से आए लोग बैठे थे। वह सिर झुकाए बैठा आँसू बहाता रहा, किसके गले लगकर रोता? वहाँ बैठे लोगों की बातें सुन-सुनकर वह हैरान होता रहा। सब कारोबार की बातें कर रहे थे।
पिछले साल की बात है, इस दोस्त के पिता जी का देहांत हो गया था। तब वह दोस्त के गले लग कर बहुत देर तक रोया था। वहाँ बैठे लोगों खुसुर-फुसुर शुरू हो गई थी। यह कौन है? इसे हमसे ज्यादा दुख है क्या! किसी ने अपना दुख दिखाने के लिए बहुत ऊँची आवाज भी निकाली थी। दोस्त की माँ तो बहुत पहले ही मर चुकी थी।
दाह-संस्कार के पश्चात वह पत्नी के साथ घर लौट आया। मन भरा हुआ था। शाम को पत्नी जब भोजन के लिए पूछने आई तो मृतक दोस्त की बातें छिड़ गईं। मन को फोड़ा फिस पड़ा। उसने पत्नी के गले लग कर ऊँची चीख मारी, “हाय दोस्त! तू मुझे अकेला छोड़ गया…!”
पत्नी भी सिसकने लगी। कितनी ही देर तक वे एक-दूसरे के गले लग कर रोते रहे
०००
प्रस्तुतिः सत्यनारायण पटेल
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टिप्पणियाँ:-

मीना अरोड़ा:-: "भीतर का दुख " सच में दुखी कर गया  ।
अवतार जी की लघु कथा अच्छी लगी
"सरमाया"
"तुम्हारे भीतर" अति उत्तम

वासु कुमारी:-
"सरमाया" दिल को छूती हुई कथा ।
अवतार सिंह जी की कथा मौकापरस्त लोगों के चरित्र को उजागर करती हुई।
"भीतर का दुख" मानवीय संवेदनाओं से भरी सुंदर कहानी ।
तीनों रचनाकारों को बधाई

विद्या:-
तीनों ही लघु कथा प्रेरणा से परिपूर्ण है जहाँ सरमाया सरकारी नीतियों योजनाओ की कलाई खोलती हुई पारंपरिक ग्रमीण एकता को प्रदर्शित करती है वहीँ अवतार जी की लघुकथा शिक्षा में बाज़ारीकरण का प्रवेश एवम् इसमे अपनी गहरी पैठ बना चुके मौका परस्तो की चालाकियों को प्रभावी ढंग से उजागर करती है और भीतर का दुःख लघुकथा आधुनिक समाज में पल पल बदलते मानवीय मूल्यों सहित मानवीय संवेदना को व्यक्त करने में सफल हुई है

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