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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

ग़ज़ल : रामनाथ अवस्थी

आज हम बात करेंगे रमानाथ अवस्थी जी की रमानाथ जी उन गीतकारों में से थे जिनको सुनते समय लगता था मानों समय ठहर गया है।
रमानाथ अवस्थी (1926-2002) का जन्म फतेहपुर, उत्तरप्रदेश में हुआ। इन्होंने आकाशवाणी में प्रोडयूसर के रूप में वर्षों काम किया। 'सुमन- सौरभ, 'आग और पराग, 'राख और शहनाई तथा 'बंद न करना द्वार इनकी मुख्य काव्य-कृतियां हैं।
रमानाथ जी की स्मृतियों के बारे में बताते हुये डा.कन्हैयालाल नंदन लिखते हैं:-
अजब रसायन की रचना लगते हैं मुझे पंडित रमानाथ अवस्थी,जिसमें पांच ग्राम निराला,सात ग्राम बाबा तुलसीदास,दो ग्राम कबीर और डेढ़ ग्राम रविदास के साथ आधा ग्राम ‘ठाकुरजी’ को खूब बारीक कपड़े से कपड़छान करके आधा पाव इलाचंद्र जोशी में मिलाया जाए तथा इस सबको अंदाज से बच्चनजी में घोलकर खूब पकाया जाए। रमानाथजी का मानसिक रचाव कुछ ऐसे ही रसायन से हुआ है।वे निराला के स्वाभिमान को अपने अंतर्मन में इतना गहरे जीते हैं कि अनेक लोग सकते मेंआ जाते हैं।
रमानाथ जी की कविता की खासियत है कि लगता है जैसे बतियाते अंदाज में वाक्य उठाकर कविता पंक्ति बना दिये गये हो।
प्रस्तुत है उन्ही की कविताएं  ।।।

1:
अँधेरे का सफ़र मेरे लिए है 

तुम्हारी चाँदनी का क्या करूँ मैं
अँधेरे का सफ़र मेरे लिए है

किसी गुमनाम के दुख-सा अजाना है सफ़र मेरा
पहाड़ी शाम-सा तुमने मुझे वीरान में घेरा
तुम्हारी सेज को ही क्यों सजाऊँ
समूचा ही शहर मेरे लिए है

थका बादल किसी सौदामिनी के साथ सोता है
मगर इनसान थकने पर बड़ा लाचार होता है
गगन की दामिनी का क्या करूँ मैं
धरा की हर डगर मेरे लिए है

किसी चौरास्ते की रात-सा मैं सो नहीं पाता
किसी के चाहने पर भी किसी का हो नहीं पाता
मधुर है प्यार, लेकिन क्या करूँ मैं
जमाने का ज़हर मेरे लिए है

नदी के साथ मैं पहुँचा किसी सागर किनारे
गई ख़ुद डूब, मुझको छोड़ लहरों के सहारे
निमंत्रण दे रहीं लहरें करूँ क्या
कहाँ कोई भँवर मेरे लिए है

2:
असम्भव 

ऐसा कहीं होता नहीं
ऐसा कभी होगा नहीं

धरती जले बरसे न घन
सुलगे चिता झुलसे न तन
औ' ज़िंदगी में हों न ग़म

ऐसा कभी होगा नहीं
ऐसा कभी होता नहीं

हर नींद हो सपनों भरी
डूबे न यौवन की तरी
हरदम जिए हर आदमी
उसमें न हो कोई कमी

ऐसा कभी होगा नहीं
ऐसा कभी होता नहीं

सूरज सुबह आए नहीं
औ' शाम को जाए नहीं
तट को न दे चुम्बन लहर
औ' मृत्यु को मिल जाए स्वर

ऐसा कभी होगा नहीं
ऐसा कभी होता नहीं

दुख के बिना जीवन कटे
सुख से किसी का मन हटे
पर्वत गिरे टूटे न कन
औ' प्यार बिन जी जाए मन

ऐसा कभी होगा नहीं
ऐसा कभी होता नहीं

3:
इनसान

मैंने तोड़ा फूल किसी ने कहा -
फूल की तरह जियो औ' मरो
सदा इनसान

भूल कर वसुधा का शृंगार
सेज पर सोया जब संसार
दीप कुछ कहे बिना ही जला
रात भर तम पी-पीकर पला
दीप को देख भर गए नयन
उसी क्षण -
बुझा दिया जब दीप किसी ने कहा
दीप की तरह जलो तम हरो
सदा इनसान

रात से कहने मन की बात
चंद्रमा जागा सारी रात
भूमि की सूनी डगर निहार
डाल आँसू चुपके दो-चार

डूबने लगे नखत बेहाल
उसी क्षण -
छिपा गगन में चाँद किसी ने कहा -
चाँद की तरह जलन तुम हरो
सदा इनसान

4:
ऐसी तो कोई बात नहीं 

तुमसे भी छिपा सकूँ जो मैं
ऐसी तो कोई बात नहीं जीवन में

मन दिया तुम्हें मैंने ही अपने मन से
रँग दिया तुम्हें मैंने अपने जीवन से
बीते सपनों में आए बिना तुम्हारे
ऐसी तो कोई रात नहीं जीवन में

जल का राजा सागर कितना लहराया
पर मेरे मन की प्यास बुझा कब पाया
जो बूँद-बूँद बन प्यास तुम्हारी पी ले
ऐसी कोई बरसात नहीं जीवन में

कलियों के गाँवों में भौंरे गाते है
गाते-गाते वह अक्सर मर जाते हैं
मरने वाले को जो मरने से रोके
ऐसी कोई सौगात नहीं जीवन में

5:
मेरे पंख कट गए हैं 

मेरे पंख कट गये हैं
वरना गगन को गाता

कोई मुझे सुनाओ
फिर से वही कहानी
कैसे हुई थी मीरा
घनश्याम की दीवानी
मीरा के गीत को भी
कोई विष रहा सताता

कभी दुनिया के दिखावे
कभी खुद में डूबता हूँ
थोड़ी देर ख़ुश हुआ तो
बड़ी देर ऊबता हूँ

मेरा दिल ही मेरा दुश्मन
कैसे दोस्ती निभाता

मेरे पास वह नहीं है
जो होना चाहिए था
मैं मुस्कराया तब भी
जब रोना चाहिए था
मुझे सब ने शक से देखा
मैं किसको क्या बताता

वो जो नाव डूबनी है
मैं उसी को खे रहा हूँ
तुम्हें डूबने से पहले
एक भेद दे रहा हूँ
मेरे पास कुछ नहीं है
जो तुमसे मैं छिपाता

चयनः कविता गुप्ता

प्रस्तुतिः रुचि गाँधी
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टिप्पणियाँ:-

सुवर्णा :-
बहुत अच्छी रचनाएँ। आदरणीय अवस्थी जी मेरे प्रिय गीतकारों में हैं। सादा ज़बान में बड़े सुंदर गीत रचे हैं। मैंने पहला गीत इनका पढ़ा था "चंदन है तो महकेगा ही...." बहुत प्यारा गीत है यह भी। आज की रचनाएँ भी बहुत अच्छी लगी।

सिया सचदेव:-
एक  से बढ़कर एकएक  एहसास को किस क़दर शब्दों में बयाँ किया है आपने  हैं सुन्दर भाव की रचनाओं के  लिए बहुत-बहुत बधाई ..

सिया सचदेव:-
एक  से बढ़कर एकएक  एहसास को किस क़दर शब्दों में बयाँ किया है आपने   सुन्दर भाव की रचनाओं के  लिए बहुत-बहुत बधाई ..

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