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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

शकूरबस्ती से उपजे कुछ सवाल : सुनील कुमार

शकूरबस्ती से उपजे कुछ सवाल

सुनील कुमार

विकास के नाम पर गांवों को उजाड़ा जा रहा है। गांव के कृषि, लघु उद्योग, हस्तशिल्प को देशी-विदेशी धनपशुओं को फायदा पहुंचाने के लिए नष्ट किया जा रहा है। किसानों, आदिवासियों की जमीन छीनकर देशी-विदेशी लूटेरों को सेज व औद्योगिक कॉरिडोर बनाने और खनन के नाम पर दिया जा रहा है। इससे गांव का पलायन बढ़ा है और भारत की करीब 35 प्रतिशत आबादी शहरों में निवास करने लगी है जिसे भारत के भूतपूर्व वित्तमंत्री पी चिदम्बरम 80 प्रतिशत तक बढाने की बात करते हैं। गांव से उजड़ कर जब वहां के किसान-मजदूर शहर को आते हैं तो उनकी शरणस्थली झुग्गी बस्ती होती है। आज के समय झुग्गी बस्ती मेहनतकश जनता के लिए वैसी ही है जैसा मछली के लिए जल। अगर झुग्गियां नहीं रहीं तो मजदूरों को रहने के लिए आवास की कोई सुविधा नहीं है। बहुत से रिक्शा चालक और मेहनतकश जनता कड़कड़ाती ठंड में बाहर सोने को मजबूर हैं जिससे उनकी जान तक चली जाती है। सरकार द्वारा की गयी व्यवस्था ऊंट के मुंह में जीरा है। हर साल ढंड में हजारों लोग मर जाते हैं। सरकारी डाटा के अनुसार प्रति वर्ष 781 लोगों की मौत ढंड से होती है। इस ठंड में भी वर्षों पुरानी झुग्गियों को उजाड़ा जाता है।

दिल्ली के शकूरबस्ती ईलाके में 12 दिसम्बर, 2015 को करीब 1000 झुग्गियों को तोड़ दिया गया। झुग्गियों को तोड़ने की कर्रवाई को सही ठहराने के लिए रेलवे ने कई तरह के तर्क दिए, जैसे तीन बार नोटिस दी जा चुकी थी, रेलवे को इस जगह की जरूरत है, झुग्गी वाले ट्रेन पर पत्थर फेंकते हैं, चोरी करते हैं आदि, आदि। शकूरबस्ती की झुग्गियां 1978 से है।  यह झुग्गी बस्ती रेलवे की जरूरत के हिसाब से वहां बसायी गयी। रेलवे  इनको रेलवे कॉलोनी के रूप में पुर्नवासित करने के बजाय उजाड़ रहा है। इस झुग्गी बस्ती में बिजली, पानी व शौचालय के नाम पर कोई सुविधा नहीं है। 300 रु. प्रति महीना पर कुछ लोग प्राइवेट बिजली लिये हैं जिससे  एक सीएफएल लैम्प जलता है। शौचालय के लिए खुले में जाना पड़ता है। वहीं पानी के लिए कुछ जगह पर लोगों ने पाईप लाईन को तोड़कर पाईप जोड़ा है। बस्ती के निवासी कहते हैं कि झुग्गी तोड़ने के लिए कोई नोटिस नहीं दी गयी। 11 दिसम्बर, 2015 को शाम 3-4 बजे एक बोर्ड पर नोटिस चिपकायी गयी थी कि झुग्गी तोड़ी जायेगी और दूसरे दिन लोग सुबह 10 बजे झुग्गी तोड़ने के लिये आ गये।

शकूरबस्ती बस्ती में 90 प्रतिशत लोग बिहार से हैं जो मालगाड़ी से सीमेंट खाली करने का काम करते हैं। शकूरबस्ती में सीमेंट उतारने का काम होता है जो दिल्ली तथा अन्य ईलाकों में ट्रक द्वारा सप्लाई किया जाता है। 1978 में अजमेरी गेट से सीमेंट उतारने का काम शकूरबस्ती में शिफ्ट किया गया। तब जो मजदूर अजमेरी गेट में थे वे शकूरबस्ती में आ गये। उस समय मजदूरों की संख्या कुछ सौ में थी। मजदूरों पर काम का इतना लोड होता था कि उनको आराम करने का समय नहीं मिलता। 1978 से रह रहे कैलाश यादव बताते हैं कि बंधुआ मजदूर जैसा काम करना पड़ता था। मालगाड़ी एक निश्चित समय में खाली करना पड़ता है, नहीं तो डिस्ट्रीब्यूटर पर रेलवे द्वारा फाईन लगाया जाता है। मोहम्मद अजहर आलम मधेपुरा के रहने वाले हैं जो 1983 से शकूरबस्ती में रहकर सीमेंट उतारने का काम करते हैं। वे बताते हैं कि शुरूआती समय में मालगाड़ी समय से खाली हो इसके लिए डिस्ट्रीब्यूटर अराम करते मजदूरों से जबरदस्ती काम कराने के लिए जीआरपी पुलिस को पैसा देता था। खगडि़या के विजय मंडल कहते हैं कि यह ऐसा काम है जिसके लिए पास में ही रहना होगा।

झुग्गियां तोड़ते समय एक बच्ची की मौत हो गई जो मीडिया में न्यूज बनी। अरविंद केजरीवाल के रात्रि दौरे से यह मौत राजनीतिक मुद्दा बना और संसद में भी सवाल उठाये गये। राहुल गांधी और अन्य नेताओं के दौरे  हुये और मामला कोर्ट तक पहुंचा, जहां रेलवे ने झुग्गी तोड़ने के समय को लेकर अपनी गलती मान ली। इन सभी शोर-शराबा के बावजूद झुग्गीवालों की समस्याएं जस की तस रहीं। कई ऐसे सवाल भी हैं जो मीडिया  व राजनीतिक दलांे के लिए मुद्दा नहीं बन पाता।

झुग्गी टूटने के बाद आज भी वहां लोग प्लास्टिक शीट के नीचे या टेन्ट में रात गुजराने को विवश हैं। उनकी  किसी तरह की स्थाई समस्या का हल नहीं किया गया। झुग्गी टूटने के बाद वहां और लोगों की मौतंे र्हुइं जिनका संज्ञान नहीं लिया गया। वीरू (30 साल) नेपाल की रहने वाली थी। वह टीवी के ईलाज के लिए यहां अपने भाई के पास रूकी थी। झुग्गी टूटने पर वह रात भर खुले आसमान के नीचे रही जिससे उसकी तबियत ज्यादा खराब हो गई। उसको दूसरे दिन अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां 5 दिन बाद 18 दिसम्बर को उसकी मृत्यु हो गई।

मुख्तीर खातुन बिहार की सहरसा जिले की रहने वाली है। वह अपने बुर्जुग व विकलांग पति मुहम्मद इलियास के साथ 18-20 साल से शकूरबस्ती में रहती हैं।  उसने अपने बेटे मोहम्मद सबीर को बहुत ही मेहनत से पाली थी ताकि वह बुढ़ापे का सहारा बने। उसने मोहम्मद सबीर की शादी आइसा से कुछ साल पहले कर दी। सबीर भी अपने मां-बाप के सपनों को पूरा करने के लिए दिन-रात मेहनत करता रहा। 30 हजार रु. कर्ज लेकर मां का ऑपरेशन कराया। वह दिन में मालगाड़ी से सीमंेट उतारता, रात को ट्रक में लोड करता और जाकर उसे खाली करता। मोहम्मद सबीर अपने माता-पिता, पत्नी, भाई, दो बच्चे के साथ अपनी 8 बाई 10 गज की झोपड़ी में  हंसी-खुशी से जी रहा था। 24 सितम्बर, 2015 की वह मनहूस रात आई जब मोहम्मद सबीर सीमेंट से लदी गाड़ी को खाली करने के लिए जा रहा था। गाड़ी 4-5 किलोमीटर ही चली थी कि वह पल्ट गई। मोहम्मद सबीर गंभीर रूप से घायल हुआ। 1 बजे रात को उसे महावीर अस्पताल पहुंचा गया जहां 5 घंटे बाद उसकी मृत्यु हो गई। परिवार का इकलौता सहारा इस दुनिया से चला गया लेकिन मुख्तीन खातुन को 1 रू. भी सरकार या सीमेंट के डिस्ट्रीब्यूटर द्वारा नहीं दिया गया। आस-पास के लोगों ने 36,000 रु. चंदे इकट्ठे करके मोहम्मद सबीर के परिवार को सहायता पहुंचायी। डिस्ट्रीब्यूटर ने यह कह कर कि मोहम्मद सबीर उससे कर्ज लिया था, परिवार को किसी भी तरह का मुआवजा नहीं दिया। मोहम्मद सबीर की दुर्घटना का केस रोहणी कोर्ट में चल रहा है। कोर्ट डेट पर परिवार के सभी सदस्य इस आशा के साथ जाते हैं कि शायद उनको कोर्ट के डेट पर मुआवजा मिल जाये। मोहम्मद सबीर की मां झुग्गी टूटने से काफी परेशान हैं और गाली देते हुए नेताओं को कहती हैं कि झुग्गी टूट गई, उनको एक कम्बल या एक टेंट तक नहीं मिला है। मुख्तीर खातुन बताती हैं कि 16 साल का बेटा है जो जूता फैक्ट्री में काम करता है। वहां उसे 4,000 रू मिलता है और उसी से परिवार चलता है।

मुहम्मद असीम (22 साल) विकलांग है। वह अपनी बहन के पास रह कर ही बस्ती में दुकान चलता है। बहन घरों में साफ-सफाई करने का काम करती है। वह परिवार के भरण के लिए 14-15 साल की उम्र में दिल्ली आ गया था और शकूरबस्ती झुग्गी में बहन के पास रहकर लारेंस रोड फैक्ट्री में काम करता था। 2008 में रोज की तरह एक दिन वह काम से लौटकर घर आ रहा था। मालगाड़ी खड़ी थी। वह मालगाड़ी के नीचे से क्रास कर रहा था कि अचानक गाड़ी चल पड़ी और उसके दायें हाथ के पैर व बांह कट गये। सफदरजंग में लम्बे समय तक ईलाज चला जिससे उनकी जान बच गई। मुहम्मद असीम हमेशा के लिये विकलांग हो चुका था। उसे कोई मुआवजा नहीं मिला। लेकिन असीम और विकलांगों जैसा किसी के सामने हाथ नहीं फैलना चाहता था। उसने बस्ती में ही एक छोटी सी दुकान खोल कर जीविका चलाने की ठानी। उसकी दुकान भी तोड़ दी गई। उसे किसी सरकार या नेता पर कोई भरोसा नहीं है। वह बताता है कि कई जगह दौड़ने के बावजूद आज तक उसकी विकलांगता का पेंशन भी लागू नहीं हुआ। उसका व्हीलचेयर भी टूटा हुआ है। पैसे नहीं है कि वह व्हीलचेयर खरीद पाये। उसकी सरकार से बहुत बड़ी मांग नहीं है। उसकी चाहत है कि उसके लिए एक व्हीलचेयर मिल जाये और उसकी विकलांगता का पेंशन लागू कर दिया जाये।  

शकूरबस्ती पंजाबी बाग का वही ईलाका है जहां पर प्रदूषण की मात्रा बहुत अधिक है। उसका मुख्य कारण है शकूरबस्ती में सीमेंट का गोदाम, जहां पर लाखों बोरी सीमेंट रोज उतारे जाते हैं और उसको दिल्ली के अलग-अलग ईलाके में छोटे-बड़े ट्रकों में भरकर पहुंचाया जाता है। इतने प्रदूषित ईलाके में रहकर मजदूर बस सीमेंट की बोरी अनलोडिंग-लोडिंग का काम करता है। इससे बचने के लिए मजदूर अपने तरीके निकालते हैं जो बहुत कारगर नहीं होता है। विजय मंडल बिहार के खगडि़या जिले के रहने वाले हैं और 15 साल से सीमेंट उतारने का काम करते हैं। विजय बताते हैं कि 4-5 महीने काम करने के बाद मजदूर एक-दो माह के लिए घर चला जाता है। सीमेंट के गरदे से बचने के लिए मजदूर तीन-चार पैंट और कमीज पहनते हैं। अन्दर वाले पैंट और कमीज को वह रस्सी से बांधते हैं जिससे कि वह शरीर में पूरा चिपका हो और सीमेंट से शरीर का बचाव हो। चेहरे पर तौलिया (गमछा) बांधते हैं ताकि नाक के द्वारा सीमेंट अंदर नहीं जाये। ठंड में तो यह कपड़ा पहनना चल जाता है लेकिन 40-45 डिग्री के तापमान में जब लोग वातानुकुलि घरों, गाडि़यों, दफ्तरों में रहते हैं, उस समय भी वो इन तीन-चार कपड़ों में लिपटे होते हैं और सिर पर 50 किलो का वजन लेकर दौड़ लगाते हैं। कई कपड़े पहनने से कुछ बचाव तो होता है लेकिन 100 प्रतिशत नहीं। इस बस्ती में सांस की बीमारी के कई मरीज हैं।

मोहम्मद मोह 14-15 साल तक सीमेंट उतारने और लोड करने का काम करते रहे। वे डयबटीज, के मरीज हैं।  उनका पेट हमेशा खराब रहता है जिसके कारण वे सीमेंट उतारने का काम छोड़ दिये। झुग्गी टूटने के बाद वहीं रास्ते में बैठकर एक छोटे से बाक्स में तम्बाकू, गुटखे बेचने का काम शुरू किये हैं। उनको उम्मीद है कि दिन में वे 40-50 रु. कमा सकते हैं।

सरकार जिस तरक्की (फ्लाई ओवर, ऊंची-ऊंची ईमारतें, सड़कंे) को दिखा कर विकास का ढोल पिटती है तो उस विकास में बड़ा योगदान शकूरबस्ती के लोगों का भी है। इस विकास का भी खामियाजा इन बस्ती वालों को बीमारी के रूप में भुगतना पड़ता है। रेलवे ने चोरी करने और गंदगी फैलाने का आरोप लगाकर झुग्गी तोड़ने को सही ठहराया है। क्या वह बता सकता है कि शकूरबस्ती रेलवे से क्या चोरी हुआ है जो बस्ती वालों ने चुराया है ? या किसी की कभी गिरफ्तारी हुई है ? इसका उतर है एक भी नहीं। फिर रेलवे चोरी का आरोप इन पर कैसे लगा सकता है ? रेलवे में चोरी और गंदगी कौन फैलाता है हम सभी जानते हैं। शकूरबस्ती की झुग्गियां टूटने और उसे राजनीतिक मुद्दा बनाने के बाद भी इन बस्ती वालों का क्या हुआ ? बस यही कि उनको कुछ दिन और उसी हालत में रहने की मुहलत मिल गयी। क्या यही काफी है, इसी के लिए इतना हो हल्ला मचा था ?

2012 के दिल्ली शहरी विकास प्राधिकरण के आंकेड़े के अनुसार दिल्ली के 685 झुग्गी बस्तियों के 4,18,282 झुग्गियों में 20,29,755 लोग रहते थे। 2014 में दिल्ली शहरी विकास प्राधिकरण के आंकड़े के अनुसार झुग्गी बस्तियों की संख्या 675 हो गयी, जिसमें 3,32,022 झुग्गियों में 16,17,239 लोग रहते हैं। आखरी दो साल में 10 झुग्गी बस्तियों के 4,12,516 लोग कहां गये। उनको कहां पुनर्वासित किया गया है, सरकार के पास कोई आंकड़ा है ? असल में सरकार जिन लोगों को उजाड़ती है उसमें से ज्यादातर लोग दूसरी जगह की झुग्गी में जाकर रहना शुरू कर देते हैं। इसलिए झुग्गी बस्तियों की संख्या कम होती है लेकिन जनसंख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। गांव से उजड़े नये लोग भी इन बस्तियों में आकर ही शरण लेते हैं। दिल्ली सरकार के आंकड़े के अनुसार दिल्ली के आधा प्रतिशत जमीन में 16,17,239 लोग रह रहे हैं जबकि वास्तविकता यह है कि इससे भी कम जमीन पर करीब 40 लाख लोग इन बस्तियों में रहते हैं। इतनी कम जमीन पर रहकर भी ये लोग देश के विकास में बड़ी भागीदारी करते हैं और उनको ईनाम के रूप में बीमारी और मौत मिलती है। सामाजिक रूप से उन्हें चोर, गंदगी फैलाने वाले बताकर उजाड़ा जाता है। क्या सरकार के पास दिल्ली के 25 प्रतिशत लोगों के लिए दो प्रतिशत भी जमीन नहीं है ताकि उनको बसाया जा सके ?

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