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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

कविता : बिनय सौरभ

स्मृतियाँ |

कई दिनों से पानी बरस रहा है
कई सालों के बाद मेड़ों से उतरते पानी की आवाज़ सुनी है

बस रुकी है एक छोटे से गाँव में 
इसी गाँव में माँ ने 
लकड़ी के कोयले पर पके भुट्टे खिलाये थे
बचपन में एक बार किसी शादी में जाते हुए

नारियल बेचने वाला बस से उतरकर जा चुका है
अभी पिछले कई सालों की बारिश के क़िस्से सुना रहा था

अन्दाज़ा करता हूँ , जब यह बस नोनीहाट पहुँचेगी
रात के दस बज चुके होंगे
माँ सो चुकी होगी
बड़े भाई को गली की तरफ़ से आवाज़ देकर आऊँगा

शुक्र है पानी थोड़ा धीमा हुआ है 
बस स्टॉप पर उतरा हूँ घुप्प अँधेरा है
और पानी भरे खेतों में मेंढकों की टर्राहटें

बहुत टोह-टोहकर रखता हूँ पाँव
हज़ारों बार जिन सकड़ों पर गुज़रा हूँ
कई बरस बाद रात के अँधेरे में 
उन पर थम रहा हूँ

कौंधती बिजलियों के बीच 
ग़ायब पाता हूँ चौक बाज़ार पीपल

कब कट गया 
पीपल की स्मृति से भारी हो चुका है मन
देखता हूँ वहाँ कतार से बनी दुकानें !
घर पहुँचता हूँ भीग भागकर एकदम सरगद ! 
बरामदे में लालटेन जलाये बैठा है बड़ा भाई 
मेरा रास्ता देखता |

पाँव छूता हूँ 
और पूछता हूँ उनकी चोरी गयी साइकिल के बारे में 
फिर पूछता हूँ - माँ सो गयी क्या ?

भाई भौचक हो उठता है 
-माँ !!
माँ कहाँ है ? 
पिछले फागुन में माँ चली गयी- 
सपने में हो क्या माजे !!
ººº
| कोई-सा दिन |
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सीमू के लिए
---------
एक पूरा दिन 
तुम्हारे साथ ख़र्च करना चाहता हूँ
वो कौन सा महीना होगा कौन सा दिन !

क्या धूप बहुत तेज़ होगी उस रोज़
या बादल काले हो रहे होंगे
बारिश का संकेत देते हुए

क्या हवा अपनी पूरी ठंडक के साथ
तुम्हारे कमरे में फैली होगी
बेतरतीब काग़ज़ों और किताबों के बीच

क्या तुम्हारा कमरा वैसा ही है 
जैसा पन्द्रह साल पहले था ?

तुम्हारी आदतें कितनी बदली है 
तुमने ठीक से रसोई बनाना सीख लिया है 
कपड़े अब भी तह करके करीने से रखती हो वार्ड रोब में

किराये का मेरा वो कमरा और गुलमोहर 
क्या अब भी दिखते हैं तुम्हारी छत से
और हाँ, क्या भाई आज भी सुनता है 
वैसे ही डूबकर पंडित रविशंकर को

माँ के घुटने का दर्द कैसा है 
तुम्हारे पिता अब कैसे दिखते हैं

क्या धूप अब भी आती है तुम्हारे बिस्तर पर

एक  पूरा दिन तुम्हारे साथ ख़र्च करना चाहता हूँ 
वह कौन सा महीना होगा
जाने कौन सा दिन ? 
०००
| इसी राग पर |

कबूतर
गन्दा कर देते हैं पूरा घर-आँगन

रोज़-रोज़ धोओ पखारो
उनकी गन्दगी साफ़ करो

रोशनदान, मुंडेर सभी गन्दे हो गये हैं
-भगाओ इन्हें !
कई बार घर आए लोगों ने कहा है
हमने भी सोचा है कई बार !

अब क्या करें ! 
इनके साथ जीने की आदत जो पड़ गयी है हमारी 
तीन पीढ़ियों का साथ निभाया है कबूतरों ने 
ऐसे कैसे छोड़ दें ?
आँगन है - इन्हीं से तो पता चलता है 
बहुत प्यार से देखो
तो कैसे चले आते हैं तुम्हारे पास
उन पर अपनी पलकें सटाओ तो 
एक राग पैदा होता है मन में ! 
इसी राग की ख़ातिर 
तो जीते हैं हम
इसी राग पल तो अभी तक क़ायम है यह पृथवी !!
०००
| और अन्त में |

जिसके पास विज्ञापन की सबसे अच्छी भाषा थी
...वह बचा ! 
वह और बची 
जिसके पास सात सुन्दर देह थी
और जो दूसरे के इशारे पर रात-रात भर नाचती रही ! 
कुछ औरतें और मर्द 
जिनमें ख़रीदने की हैसियत थी ?
और वे सारे लोग बचे 
जो बेचने की कला जानते थे |
०००
चयनः सत्यनारायण पटेल
प्रस्तुतिः तितिक्षा
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टिप्पणियाँ:-

मनीषा जैन :-

मित्रो
समूह में कल पोस्ट की गयी कविताएँ
युवा कवि बिनय सौरभ की है....एक समय बिनय ने अपनी कविताओं से काफी ध्यानाकर्षित किया था...लगभग हर पत्रिका में बिनय कविताएँ छप रही थी..ऐसा भी एकाधिक बार हुआ कि संपादकीय की जगह उनकी कविताएँ प्रकाशित हुई...फिर बिनय ने लम्बी रचनात्मक ख़ामौशी अख्तियार कर ली...अब फिर उनकी कविताएँ पत्र पत्रिकाओं में आने लगी है.....
आज का दिन भी बिनय की कविताओं पर बातचीत के लिए ही है...उम्मीद है कि आप खुलकर कविताओं पर अपनी बात रखेंगे
बिनय सौरभ झारखंड के रहने वाले हैं..दुमका उनका ज़िला है और नौनिहाट उनका गाँव है...

अल्का सिगतिया:-
हमारी कुछ स्मृतियाँ ऐसी। होती। हैं। जिनसे हम कभी। अलग नहीं। होना चाहते।छुढलाते रहते हैं  कि वो बीत चुका  वो रीत चुका।बीते दिन अक्सर याद आते हैं।इक कसक पैदा कर जाते। हैं।विनय जी की वो पंक्ति  दिल को छू। गई, माँ नहीं। पर माँ को आवाज़। देते हैं,जैसे मैं। जब भी। पिछले एक साल में। अपने पीहर गई,बार बार उठे कदम मेरे पापा से बतियाने को पापा के कमरे की ओर,याद ही। नहीं। रहता,वो तो चले गये।मम्मी का जब फोन आता है। अक्सर ये फूछते पूछते रह जाती  हूँ  पापा कैसे हैं।अतीत के कुछ सच शायद हम स्वीकार। ही। नहीं। कर पाते हैं।दिल को छू लेने वाली। कविताएँ

मनीषा जैन :-
ऐसा ही होता है अलका जी। मैं जब भी माँ के घर जाती हूँ अब जब वो नहीं हैं तब भी लगता है अभी कहीं से मुझे पुकारेंगी। वो आवाज़ आज भी कानों में गूँजती हैं। कभी न भूलाई जाने वाली स्मृतियाँ।पहली कविता बहुत मन को छूती है।

वसुंधरा काशीकर:-
क्या कविताएँ है। माँ की कविता ने तो आँखो में पानी लाया। भगवान की दया से मेरी माँ है। विज्ञापन, एक पुरा दिन भी बहुत सुंदर है।

स्वाति श्रोत्रि:-मैने आज पढ़ी सारी कविताये। बहुत सुंदर भाव पूर्ण कविताये माँ तो मन में बस ही गई माँ ना हो तो बेहद  सूनी सी होती है जिंदगी ये तब जाना जब माँ नहीं थी।
कवि को बहुत बधाई।

फ़रहत अली खान:-
बहुत सुन्दर कविताएँ हैं। सरल भाषा में दिल को छू लेने वाला बयान।
धन्यवाद मनीषा जी।

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