दबे पाॅंव
दबे पांव शाम की आड़ में
आती है उदासी
गहरा रंग लिए
लगभग रोज ही आती है
उदासी
जैसे आदमखोर आते हैं
मुंह अंधेरे
दबे पांव
रोज नही मिल पाता उन्हें शिकार
किसी एक ही दिन
आदमखोर उदासी
निगल जायेगी
सब कुछ
गहरे रंग में
मिलकर और
गहरा हो जायेगा लहू
किसी को कानोंकान
खबर नही होगी।
०००
वसंत के उजालों से
ढक गई हैं
शुष्क,उधड़ी काया
मुरझाए चेहरे
फूल हो गए हैं
खुशबू का हाथ थामे
आ रही हैं आहटें
कोई याद सी
खिलखिला रही है
मन में
ज़रा देह भी डूब_उतरा रही है
यौवन में
सूखे पत्ते कर रहे हैं नृत्य
हवा के संगीत पर
भाव_भंगिमाओं की
बनाते हुए विलग सी कतार
छलक कर बिखर गई
रंगों की गगरी
बटोरते हुए
पसंदीदा रंग
अपने हिसाब से
सज रही है हर कली
धरती ने पोंछ लिए
आंचल से
बचे खुचे सभी रंग
हरे लहंगे पर उभर आया
सरसों का पीला दुपट्टा
लहरा कर ढक रहा है
कलियों का मुख
चाल बदली है सूरज ने
सौम्यता की आंच पर पक रहे हैं दिन
उल्लास के अनसुने से स्वर
झंकृत पायल की रुनझुन
शांति में गुंजायमान
दर्जनों गीत
सुने जा रहे पृथक_पृथक
फिर भी
एक तुम्हारे होने से ही वसंत है मेरा जीवन
तुम आओगे न!
०००
तुम किसका वरण करोगे ?
मृत्यु के पास सबके पते हैं
घर-कमरा-संसार बदलते हुए भी
वह तुम्हें ढूंढने में सफल होगी
कौन नही डरता मृत्यु से ?
तुम तो प्रेम से भी डरते हो
मृत्यु शरीर ले जाएगी आत्मा मुक्त करेगी
प्रेम आत्मा ले जाएगा
शरीर मुक्त करेगा
तुम किसका वरण करोगे ?
०००
तुम और मैं
प्रेम में पाने की अभिलाषा में
बढ़ाते हुए हाथ
खाली लौटी हूं
तुम और मैं
बढ़ते रहे साथ-साथ
नदी और किनारों जैसे
जबकि हममें से एक को पत्थर होना था
दूसरे को होना था नदी
डूबे हुए पत्थर पर
पड़ता हुआ पानी
और पानी की गहराई में स्थिर छुपा पत्थर
जैसे प्रतीत होता है शून्य सा
जिसमें विलीन है तुम्हारा "मैं"
और मेरा "मैं"।
०००
तुमने सोचा होगा
टूटती रही हूं
बनती रही हूं
दुखों की टूटन में
आए जब भी पास
ढूंढते रहे दरारें
झांक सके जहां से
अंदर के बिखराव को
निकाल कर गिनवा सके कमियां
उड़ा सके उपहास
तुमने सोचा होगा
इस तरह हरा दोगे मुझे
उम्मीदों के पौधे उगाने पड़े
दरारों को ढकने को।
०००
तुम्हारा और मेरा समय भिन्न है
तुम्हें प्रेम में दिखा मोह
और मोह में दुःख
तुम छोड़ कर चले गए
दुनियां दुख का सागर है
ये कहते हुए
मैं तुम्हें बताती प्रेम मुक्ति है
और निर्वाण है
तुम्हारा और मेरा समय भिन्न है
वरना बुद्ध की जगह
प्रेमी के तौर पर होती तुम्हारी पहचान।
०००
आसक्ति
निकल गई बाहर
छोड़ती हुई घर,परिवार
विरक्ति के वेग में बही
चलते हुए पहुंची
निर्जन वन में
भय साथ चला आया
अकेला जान
कसने लगा शिकंजा
अनजाने चेहरे घूरते मिले
लिहाज के परदे फटे हुए
मीठी जीभों पर कांटे थे
ये घावों के बाद ही पता चला
उन हाथों में कसाव नही
जकड़न थी
गला दबा कर ही गले मिलते रहे
आंखों में भूख के चिह्न
स्पर्श की लालसा लिए
दौड़ जाती कंदराओं में
ऊंचाईयों पर पहुंच
बचने के क्षीण आसार
पैरों के नीचे बर्फ की फिसलन
कूद जाती सागर की तलहटी तक
यहां कौन नही खाता देह को?
भटकन के वन में रास्तों की किरणें
फैली तो थी
जरा ओझल सी
दुश्चिंताओं का जाल फेंक आई
अनजाने ही
इसी में उलझते
वापसी की बाट जोहते
घर इंतजार का स्टॉपेज बना रहा
आंखे पत्थर हुई
बर्फ बनी
नदी,समुंदर सब ही
लेकिन आँखें न रही
नेत्रहीन की आँखें देखना चाहती है लौटना
महसूसना चाहती है
देखे जाने का सुख
फेंकते है अपनत्व की डोर
लंबाई छोटी पड़ती हर बार
दूर जाना हो
तो उतने ही दूर
जहां तक पहुंच सके अपनत्व की डोर
वापसी की राहों पर
छोड़ते जाना निशान पैरों के
कि ढूंढे जाने पर मिल सको समय रहते
या लौटना चाहो और पहुंच सको इन रास्तों पर
तो अपने पदचिन्ह दिखाई दें स्पष्ट
बुद्ध नही होने देंगे तुम्हें
तुम बुद्ध की प्रकृति की नही
और क्यों होना है बुद्ध?
छोड़कर कर भी छोड़ना नही सीख पाती
दुत्कार पर भी प्रेम करना नही छोड़ती
क्रूर बनाने की प्रक्रिया बेअसर रहने दो
मुंह मोड़ने की आदतें नही है तुम्हारी
ऐसा कोई कहे तो मत मानना
तुम जन्मजात ऐसी ही हो
लौट आओगी
आसक्ति विरक्ति पर हावी रहेगी
तब तक दुनिया चलती रहेगी।
०००
अनुराधा मैंदोला जी कविताएं बहुत अच्छी हैं। उन्हें प्रतिष्ठित बिजूका पत्रिका में छपने के लिए बधाई ❤️❤️❤️
जवाब देंहटाएंसभी रचनाएं भावपूर्ण हैं।
जवाब देंहटाएंआभार 🙏
हटाएंपाठक जी
तुम्हारा और मेरा समय भिन्न है
हटाएंवरना बुद्ध की जगह
प्रेमी के तौर पर होती तुम्हारी पहचान।
Congratulations Beta.
You are a great Poetess.
Each and every poem is with a great Depth.
It's always a treat to read your writings.
Keep it up.
Proud of you.
Blessings
वाह
जवाब देंहटाएं1.उदासी को प्रतीकात्मक रूप से निबिड़ अंधकार में आदमखोर और उसके स्वभाव से देखना उफ्फ बस...
जवाब देंहटाएं2. यक्ष प्रश्न का ध्रुवसत्य उत्तर विदेह करेगा लेकिन आत्मा की मुक्ति सम्भव और प्रेम आत्मा को ले जाकर प्रेमी को सदेह छोड़ देने को अभिशप्त रखेगा .... इस तत्व दर्शन से भयाक्रांत वह प्रेम से डरता मन...... यह विरोधाभास कविता में मुखरित करना कविता को ऋचा सा बनाता और वरण वह मृत्यु का हो या प्रेम का महबूब /महबूबा तो दोनों ही पाकीजा शफ्फाक संगमरमर से नम्ब और ऊष्ण दोनों विलग पर एकसार भी...
3. उथले किनारों और सतही नदी के बनिस्पत जो डूबो सो पार हुआ वह गहनतम गहनता में बूड़ा पाषाण और उस पर न्यौछावर बलिहारी जाता सा अम्बु की प्रेमिल प्रतीकता झलकाती कविता यह...अनाओं का विसंगम विसर्जन तर्पण करता... प्रेम उपलब्धि को जितना हाथ बढ़ाया तुम का मै और मै का मै बढ़ता गया फलित हुए खाली हाथ हर बार....
4. टूटने दरकने और बंनने के व्यतिक्रम में छिद्रान्वेषणी प्रवृत्ति से जनित उपहास से निवृति न मिलते देखने से आशाओं के पादप उगाने जरूरी हो जाते स्वप्रेरित रहने को...
5. *संसार* से भागे फिरते हो.... की अनुगूंज को गुंजायमान कर गयी यह लघु कविता प्रेम मोह दुःख *संसार* असल बुद्धत्व और प्रेमी के सांज्ञिक पहचान के अंतर् को पाटती भिन्न -भिन्न समयान्तरों में... साधुवाद...
6. विरक्ति वेग से निर्जन वन में पहुंची देख एकाकी जान घूरते चेहरे अलिहाजी फटे पर्दे और कंटकाकीर्ण मीठी गिराओं के कसाव नहीं बल्कि जकड़न के भय के शिकंजे से त्रस्त भूखी आँखों........ आसक्ति का विरक्ति पर हावी होना लम्बी स्व्प्रकट अर्थों भरी यह कविता अति संवेदी और सुंदर.... मसलन... वापसी की राहों पर पदचिन्ह छोड़ते जाने की बात
7. खुशबू के हाथ संग आहटें, जरा देह का अजरा नृत्य, रंगो के चुनाव की स्वतंत्रता कली कली को , सूरज की बदली चाल, सौम्यता भरी आंच पर पकते दिन जगूड़ी जी की पृथ्वी पका फल स्मृत कराती उपमा, लोकगीतों के सामूहिक गुंजन में भी एकतारा पर झंकृत वासंती गीत मन के मनुहार को आने की अभ्यर्थना करता सा....
साधुवाद बिजूका का, अनुराधा मेंदोला का और सार्वत्रिक व्याप्त वसंत प्रेम और कविता
[कंडवाल मोहन मदन बेनामी अकाउंट से ही ]
बहुत उम्दा भावप्रवण कवितायें हैं। अच्छी लगीं।
जवाब देंहटाएंआप जमीन से जुड़े हुए जनमानस को लेकर बहुत ही सुंदर लेखन करती हो....✍️✍️✍️
जवाब देंहटाएंआप यूं ही लिखती रहे
Heartiest congratulations Beta.
जवाब देंहटाएंAmazing Poems.
Each and every poem is with great Depth.
Keep it up.
Blessings.
Best wishes for your future endeavours.
तुम्हारा और मेरा समय भिन्न है
वरना बुद्ध की जगह
प्रेमी के तौर पर होती तुम्हारी पहचान।