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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

कविता : तिथि दानी

प्यारे साथियो आज पढ़ते हैं समूह के साथी की कुछ  रचनाएँ ।
रचनाकार का नाम शाम को बताया जाएगा
तब तक सभी साथी इन रचनाओं पर खुलकर अपने विचार रखे और रचनाकार का मार्गदर्शन करें ।

आएगी तुम्हें मेरी याद कहीं
                                                               आएगी तुम्हें मेरी याद कहीं
भीड़ से अलग
किसी तनहाई में ही सही
पर आएगी तुम्हें मेरी याद ज़रूर।
ट्रेन की गूँजती और खरखराती आवाज़ के साथ
या उसके बाद ही सही
पर आएगी तुम्हें मेरी याद वही
जब मिले थे पहली बार
नकारते अपनी भाषा का
संगीत, संवाद और लय,
कुछ और कहते हुए से लगते
अपनी आँखों से ।
तभी मैंने जाना था
कि होता है कितना सुखद
होंठों का चुपचाप रहना।

आएगी तुम्हें मेरी याद कहीं
जब भीड़ से ही कोई व्यक्ति
कह जाएगा तुम्हारी ही अनकही
भीड़ के कोलाहल में भी
फिर ढूँढोगे तुम
ऐसी जगह
जो कर दे तुम्हें
नितांत अकेला
ताकि कर सको तुम तलाश
एक ऐसी विधि की
जो रौशन कर जाए
तुम्हारे मस्तिष्क के
किसी कोने में पड़े
मेरी यादों के
मद्धिम पड़ते दिये।

आएगी तुम्हें मेरी याद ज़रूर
जब सुबह उठने पर
होगी नहीं कोई खलबली
पर बेचैनी सी
जो दिन भर से
रास्ता ताके बैठी रहेगी
फिर छुएगी तुम्हारा शरीर
लौटते हुए
पा कर अवरुद्ध
उन सभी शिराओं
और धमनियों को
जो भावनाओं और संवेदनाओं को
प्रवाहित किया करतीं थीं कभी
तुम्हारे हृदय तक,
इस मुग़ालते में कि
रात को ही शायद
बेजान पड़ चुके
तुम्हारे शरीर में
हलचल होगी तो सही

आएगी तुम्हें मेरी याद कहीं
जब इत्तिफ़ाकन ही सही
पर किसी और की सुगंध
तुम्हें मेरी सुगंध
के सदृश लगी
और किसी ज़रिए से
हवा में बहती
पहुँची तुम्हारे तंत्रिका तंत्र तक 
तब आएगी तुम्हें मेरी याद ज़रूर
दिन के उजाले में
तुम्हें अपने आग़ोश में लेती
छाया के साथ
और
रात के अंधकार में
पसरी प्रशांति में
शोर के साथ।

आएगी तुम्हें मेरी याद कहीं
जब भी मौसम के मिजाज़
जानने की कोशिश की
पीपल की ओट में खड़े हुए
बयारों की तपन से
बचते हुए ही सही
पर आएगी तुम्हें मेरी याद ज़रूर
फिर जब बारिश की बूँदों से
बढ़ेगा तुम्हारा बुखार कहीं
और
जाड़े की रातों में
तुम्हारी रजाई पर
होगा नहीं खोल कोई
तब आएगी तुम्हें मेरी याद ज़रूर।

यथार्थ का एहसास

लोग अक्सर बातूनी कहलाते हैं
दूसरे लोगों से बातें करते हुए
होती हैं वे बातें ऐसी
जो कुछ क्षणों के लिए ला खड़ा करती हैं
उन्हें उस खिड़की के नज़दीक
जो शहर की सबसे शानदार
गगनचुंबी इमारत की होती हैं
वहां से उनकी नज़रें
देखती हैं
वह सपनीली दुनिया
जो हमेशा से देखना चाहती थीं

इन बातों के बीच
जब आता है
एक लंबा अंतराल
तो
लोगों को लगता है
अचानक
उनके पंजों के तीन सिरे हो गए हैं
और
तब्दील हो गए हैं वे
पिंजरे के पालतू परिन्दों में
जिनके सपनों में अक्सर
लंबी उड़ान के दौरान
मंज़िल खो जाने के बाद पैदा हुई
थकन और नैराश्य के साथ
धरती पर उतरना होता है।

ये सच्चाई उन्हें दुश्मन लगती है
वे नहीं मानते
कि
पिंजरे में हर एक अकेला है
और जिस दिन
वह पिंजरा खुलेगा
उनके पर भूल चुके होंगे उड़ना
फिर किसी सहारे की उम्मीद में
उनकी रूहें ढूंढेंगी
ऊपर उठने का रास्ता । 

कश्वी संतुलन की

शब्दों से नहीं तौला मैंने तुम्हें/तुमने मुझे शब्दों से तौला/इन हालातों के दरमियां
शब्दों की कुछ मणिकाएं एक-एक कर/इकट्ठी कर ली थीं मैंने
सोचा मनमाफिक पिरो लूंगी उन्हें /जैसा आकार देना चाहूंगी...दूंगी
उस वक़्त चलने वाली समीर भी भरपूर उम्मीद भर रही थी मुझमें
लेकिन हो गए थे शब्द इतने ज़्यादा/कि निकल आए थे उनके पंख
और रह नहीं सकते थे वे/केवल मणिकाएं बन कर
उड़ने लगे थे वे/एक दूसरे से आगे निकलने के लिए
या यूं कहूं कि/ लांघने लगे थे/ वो ज़ुबां की उस धरती की सीमा
बुनियाद से जिसकी... निकले थे वे/ ख़ूबसूरत हार बन कर सुशोभित होने को
जबकि थे कुछेक ऐसे/ जो नहीं लांघा करते थे सीमा /वहीं बसती थी वह कश्वी/
जिसका अक्स/ पानी पर पड़े चांद सा नज़र आ जाता था
कलाकार को देता था अवसर चांद/ खुद को कैनवस पर उतारने का
कवि को शब्दों के ज़रिए ज़ेहनों में अंकित करने का
जबकि संभव नहीं था /लहर के बिना चांद का सबकी आंखों में सजना
इस कश्वी को पाने और संतुलन को बनाने की चाहत में
छोड़ दिया था मैंने अपनी रूह को लावारिस
तुम्हारे शब्दों के तराजू से तौले जाने/ और एक परिमाण में आ जाने को 

सपनों की वजह

कुलाँचे मारता एक हिरण
बढ़ता जाता है,
बढ़ता जाता है,
अचानक वह मुड़ जाता है,
उस दिशा में
जहाँ से मैं उसे
चोरी छुपे देखकर
ख़ुश हो रही हूँ।

उसके शरीर के चकत्तों में
मुझे दिख रहे हैं
आसमान के तारे,
और भी ख़ूबसूरत होकर

इस क़दर वह मेरे नज़दीक आया,
कि अपनी आँखो से
नामुमक़िन हो गया
उसे देख पाना,
क्योंकि मेरे आज्ञा चक्र को चीरता,
समा गया था वह मुझमें।

मुझे दिखने वाले
रंगीन, अलौकिक अवास्तविक
सपनों की वजह
समझ आ रही थी अब मुझे
मालूम हो चुका था मुझे
इन सपनों का साकार ना होना

000 तिथि दानी
प्रस्तुति- तितिक्षा
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टिप्पणियाँ:-

स्वाति श्रोत्रि:-
सुन्दर कविताये याद आयेगी और अहसास दो विशेष अच्छी लगी बधाई

रूपा सिंह :-
Mai dilli lout aai hun.ab net ki problem n hone se jtada sakriy rah sakungi.

फ़रहत अली खान:-
अच्छी कविताएँ हैं; कल्पनाओं की उड़ान काफ़ी दूर तक ले जाती है।
अंतिम कविता सबसे अच्छी लगी; छोटी और स्पष्ट।

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