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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

मंटो के ख़त

आज हम आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं एक ऐसे लेखक द्वारा लिखी गई व्यंग्य शृंखला की दो कड़ियाँ,  जिन्होंने बेहतरीन नग़्मानिगार के रूप में बहुत अधिक ख्याति प्राप्त की। व्यंग्य, पाठक को गुदगुदाने में सक्षम होने के बावजूद एक गंभीर साहित्यिक विधा है। इसमें बहुत गंभीर मुद्दों पर कटाक्ष करते हुए गुदगुदी के माधुर्य का संतुलन बनाए रखना ही इसे शेष विधाओं से अलग करता है। तो पेश है आपको गंभीरता से गुदगुदाने की एक कोशिश।

व्यंग्य :

'चचा साम के नाम मंटो के खत'

चचाजान,
आदाबो-नियाज।
अभी कुछ दिन हुए, मैंने आपकी खिदमत में एक निवेदन खत भेजा था। अब यह नया लिख रहा हूँ बात यह है कि जैसे-जैसे आपकी पाकिस्तान को फौजी सहायता देने की बात पक्की हो रही है, मेरी अकीदत और आपके प्रति सआदतमंदी बढ़ रही है - मेरा जी चाहता है कि आपको हर रोज लिखा करूँ।
हिंदुस्तान लाख टापा करे, आप पाकिस्तान से फौजी सहायता का समझौता जरूर करें इसलिए कि आपको इस दुनिया की सबसे बड़ी इस्लामी सल्तनत को मजबूत करने की बहुत ज्यादा फिक्र है, और क्यों न हो, इसलिए कि यहाँ का मुल्ला रूस के कम्युनिज्म का बेहतरीन तोड़ है।
फौजी सहायता का सिलसिला शुरू हो जाए तो आप सबसे पहले उन मुल्लाओं की सजावट कीजिएगा। उनके लिए खालिस अमरीकी ढेले, खालिस अमरीकी जपमालाएँ (तस्बीह) और खालिस अमरीकी नमाज पढ़ने वाली चटाइयाँ रवाना कीजिएगा। उस्तरों और कैंचियों को भी लिस्ट में जरूर रखिएगा। खालिस अमरीकी खिजाबे-लाजवाब का नुस्खा भी अगर आपने उनको भेंट कर दिया तो समझिए पौबारह हैं, फौजी सहायता का उद्देश्य, जहाँ तक मैं समझता हूँ, इन मुल्लाओं की सजावट करना है - मैं आपका पाकिस्तानी भतीजा हूँ, आपकी आँख का इशारा समझता हूँ - अक्ल की यह भेंट भी आप ही की सियासी चाल है। खुदा इसे बुरी नजर से बचाए।
मुल्लाओं का यह फिरका अमरीकी स्टाइल से सज-धज गया तो सोवियत रूस को यहाँ से अपना पानदान उठाना ही पड़ेगा, जिसकी कुल्लियों तक में कम्युनिज्म और सोशलिज्म घुले होते हैं।
जब अमरीकी औजारों से कतरी हुई लबें होंगी, अमरीकी मशीनों से सिले हुए शरअई पाजामें होंगे, अमरीकी मिट्टी के अनटच्ड बाई हैंड ढेले होंगे, अमरीकी लकड़ी के स्टैंड होंगे जिस पर कुरान रखते हैं और अमरीकी चटाई होंगी, तब आप देखिएगा, चारों तरफ आप ही के नाम की माला जपने वाले मिलेंगे।
यहाँ के निचले और निचले दरमियानी तबके को ऊपर उठाने की कोशिश तो, जाहिर है, आप खूब करेंगे - भर्ती इन्हीं दो तबकों से शुरू होगी। दफ्तरों में चपड़ासी और क्लर्क भी यहीं से चुने जाएँगे। तनख्वाहें अमरीकी स्केल की होंगी - जब इनकी पाँचों उँगलियाँ घी में होंगी और सर कड़ाहे में, तो कम्युनिज्म का भूत दुम दबाकर भाग जाएगा।
भर्ती का, या कोई भी सिलसिला शुरू हो, मुझे कोई एतिराज नहीं। लेकिन आपका कोई सिपाही इधर नहीं आना चाहिए - मैं यह हरगिज नहीं देख सकता कि हमारी पाकिस्तानी लड़कियाँ अपने जवानों को छोड़कर आपके सिपाहियों के साथ चहकती फिरें।
इसमें कोई शक नहीं कि आप यहाँ खूबसूरत और सेहतमंद अमरीकी सिपाही भेजेंगे, लेकिन मैं आपको बताए देता हूँ कि हमारा ऊपर का तबका तो हर किस्म की बेगैरती कुबूल कर सकता है कि वह पहले ही अपनी आँखें आपकी लांड्रियों में धुलवा चुका है, मगर यहाँ का निचला और निचला दरमियानी तबका ऐसी कोई चीज कुबूल नहीं करेगा।
अलबत्ता आप वहाँ से अमरीकी लड़कियाँ रवाना कर सकते हैं, जो हमारे जवानों की मरहम-पट्टी करें, उनको डांस करना सिखाएँ, उनको खुल्लमखुल्ला चुम्मे लेने की शिक्षा दें, उनकी झेंप दूर करें - इसमें आप ही का फायदा है।
आप अपनी एक फिल्म 'बेदिंग ब्यूटी' में अपनी सैकड़ों लड़कियों की नंगी और गोल टाँगे दिखा सकते हैं - हमारे यहाँ भी ऐसी टाँगें भेज दीजिए ताकि हम भी अपने इकलौते फिल्म स्टूडियो 'शाह नूर' में एक ऐसी ही फिल्म बनाएँ और, 'अपवा' वालों को दिखाएँ कि उन्हें कुछ खुशी हो।
हाँ, हमारे यहाँ 'अपवा' एक अजीबो-गरीब चीज बनी हुई है, जो बड़े आदमियों की बड़ी बहू-बेटियों के शौक का दिलचस्प नतीजा है। यह 'अल पाकिस्तान वूमेंस एसोशिएशन' का संक्षिप्त नाम है। इसमें और ज्यादा छोटा करने की गुंजाइश नहीं - कोशिश जरूर हो रही है जो आपको उन छोटे-छोटे ब्लाउजों में नजर आ सकती है, जिनमें से उनके पहनने वालियों के पेट बाहर झाँकते नजर आते हैं, अभी शुरुआत है, लेकिन अफसोस इस बात का है कि यह ब्लाउज आमतौर पर चालीस बरस से ऊपर की औरतें इस्तेमाल करती हैं, जिनके पेट कई बार कलबूत चढ़ चुके होते हैं - चचाजान, मैं औरत के पेट पर, चाहे वह अमरीकी हो या पाकिस्तानी, और सब कुछ देख सकता हूँ, मगर उस पर झुर्रियाँ नहीं देख सकता।
'अपवा' वालियाँ छोटे-छोटे लिबास के बारे में हर वक्त सोचने के लिए तैयार हैं, बशर्ते कि उन्हें कोई आजमाए हुए नुस्खे बताए - आपके यहाँ पैंसठ-पैंसठ बरस की बुड्ढियाँ अपने पेट दिखाती हैं, मगर उन पर, मजाल है, जो एक भी झुर्री नजर आ जाए। मालूम नहीं, वह बच्चे मुँह से पैदा करती हैं या उन्हें कोई ऐसा गुर मालूम है कि साँप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे।
बहरहाल अगर आपको यहाँ छोटे कटे हुए लिबास चाहिए तो हालीवुड के कुछ एक माहिरीन यहाँ भेज दीजिए - आपके यहाँ प्लास्टिक सर्जरी का फन तरक्की पर है। फिलहाल ऐसे आधा दर्जन सर्जन यहाँ भेज दीजिए, जो हमारी बुड्ढियों को लाल लगाम के काबिल बना दें।
और सुनिए - तुकांत शाइरी का जमाना था तो हमारे यहाँ माशूक की कमर ही नहीं थी। अब तुकांत शाइरी का दौर नहीं रहा, मगर यह ऐसा उलटा पड़ा है कि अब माशूक की गायब कमर कुछ इस तरह पैदा हुई है कि उसे देखो तो सारा माशूक उसके पीछे गायब नजर आता है। पहले यह हैरत होती थी कि वह कमर बंद कहाँ बाँधती है अब यह हैरत होती है कि वह किस पेड़ का तना है जिसके गिर्द गरीब कमरबंद को बाँधने की कोशिश की गई है - आप मेहरबानी करके खुद यहाँ तशरीफ लाएँ और फौजी समझौता करने से पहले इस बात का फैसला करें कि यहाँ माशूक की कमर होनी चाहिए या नहीं, इसलिए कि फौजी नजरिए से यह बात बहुत अहमियत रखती है।
एक बात और - आपके फिल्मसाज हिंदुस्तानी फिल्मइंडस्ट्री में बहुत दिलचस्पी ले रहे हैं। यह हम बर्दाश्त नहीं कर सकते - पिछले दिनों ग्रेगरी पैक हिंदुस्तान पहुँचा हुआ था। उसने फिल्म स्टार सुरैया के साथ तसवीर खिंचवाई और उसके हुस्न की तारीफ में जमीन-आसमान कुलावे मिला दिए। पिछले दिनों सुना था कि एक अमरीकी फिल्म प्रोड्यूसर ने नरगिस के गले में बाजू डालकर उसका चुम्मा भी लिया था - यह कितनी बड़ी ज्यादती है। हमारे पाकिस्तान की एक्ट्रेसें मर गई हैं क्या?
गुलशन आरा मौजूद है। यह अलग बात है कि उसका रंग तवे जैसा काला है और लोग उसे देखकर यह कहते हैं कि गुलशन पर आरा चला हुआ है लेकिन है तो एक्ट्रेस ही। कई फिल्मों की हीरोइन है और अपने पहलू में दिल भी रखती है। सवीहा है। यह अलग बात है कि उसकी एक आँख थोड़ी-सी भैंगी है मगर आपके जरा-से ध्यान देने से ठीक हो सकती है।
यह भी सुना है कि आप हिंदुस्तानी फिल्म प्रोड्यूसरों को आर्थिक सहायता भी दे रहे हैं - चचाजान, यह क्या दोगलापन है। यानी जो भी लल्लू-पंजू आता है, उसको आप मदद देना शुरू कर देते हैं।
आपका ग्रेगरी पैक जाए जहन्नम में - माफ कीजिए, मुझे गुस्सा आ गया है - आप अपनी दो-तीन एक्ट्रेसें यहाँ भेज दीजिए, इसलिए कि हमारा इकलौता हीरो संतोष कुमार बहुत उदास है। पिछले दिनों वह कराची गया था तो उसने कोकाकोला की सौ बोतलें पीकर रीटा हैवर्थ को ख्वाब में एक हजार बार देखा।
मुझे लिपस्टिक के बारे में आपसे कुछ कहना है - वह जो किसप्रूफ लिपस्टिक आपने भेजी थी, हमारे ऊँचे तबके में बिलकुल पसंद नहीं की गई। लड़कियों और बुड्ढियों का कहना है कि यह केवल नाम ही की किसप्रूफ है, लेकिन मैं समझता हूँ कि उनका किसिंग का तरीका ही गलत है। मैंने देखा है लोगों को यह शौक फरमाते हुए। ऐसा मालूम होता है कि तरबूज की फाँक खा रहे हैं - आपके यहाँ एक किताब छपी थी, जिसका टाइटल 'बोसा लेने का फन' था, मगर माफ कीजिए, किताब पढ़कर आदमी कुछ भी नहीं सीख सकता। आप वहाँ से जल्दी हवाई जहाज द्वारा एक अमरीकी खातून भेज दीजिए जो हमारे ऊँचे तबके को तरबूज खाने और चुम्मा लेने में फर्क समझाए, सही और अच्छे तरीके सुझाए। निचले और निचले तबके को यह फर्क बताने की कोई जरूरत नहीं, इसलिए कि वह इन तौर तरीकों से हमेशा बेखबर रहा है और हमेशा बेदिल रहेगा।
आपको यह सुनकर खुशी होगी कि मेरी पाचन शक्ति अब किसी हद तक आपके अमरीकी गेहूँ की आदी हो गई है। अब आपकी गेहूँ को हमारे यहाँ की आवोहवा रास आनी शुरू हो गई है, क्योंकि अब इसके आटे ने पाकिस्तानी स्टाइल की रोटियों और चपातियों की शक्ल अपनाने का इरादा कर लिया है - मेरा खयाल है, कि खैरअंदेशी के तौर पर आप यहाँ के गेहूँ का बीज अपने यहाँ मँगवा लें। आपी मिट्टी बड़ी उपजाऊ है। इस मेल-जोल से जो अमरीकी-पाकिस्तानी गेहूँ पैदा होगा, बड़ी खूबियों से भरा हुआ होगा। हो सकता है, कोई नया आदम पैदा हो जाए जिसकी औलाद हम और आपसे बिल्कुल अलग हो।
मैं आपसे एक राज की बात पूछता हूँ - पिछले दिनों मैंने यह खबर पढ़ी थी कि नई दिल्ली में भारत की देवियाँ रात को अपने बालों में छोटे-छोटे कुमकुमे लगाकर घूमती हैं जो बैटरी से रौशन होते हैं। खबर में यह भी लिखा था कि बाज देवियाँ अपने ब्लाउजों के अंदर भी ऐसे ही कुमकुमे लगाती हैं ताकि उनका अंदर-बाहर रौशन रहे - यह फसल कहीं आप ही की तो भेजी हुई नहीं थी? अगर थी तो चचाजान, सुब्हानल्लाह - मेरा खयाल है, अब आप उन्हें कोई पाउडर तैयार करके भेजें, जिसके खाने से उनका सारा बदन रौशन हो जाया करे और कपड़ों से बाहर निकल-निकल कर इशारे किया करे।
पंडित जवाहरलाल नेहरू पुराने खयालात के आदमी हैं। वह उस बापू के शागिर्द हैं, जिसने नौजवानों को यह हुक्म दिया था कि वह अपनी आँखों पर ऐसा शेड या हुड इस्तेमाल किया करें जो उन्हें आँख मटक्के से रोका करे। पिछले दिनों उन्होंने अपनी देवियों को उपदेश किया था कि वह अपने अंगों का खयाल रखा करें और मैकअप वगैरा से परहेज किया करें, मगर उनकी कौन सुनेगा - अलबत्ता हालीवुड की आवाज सुनने के लिए यह देवियाँ हर वक्त तैयार हैं - आप पाऊडर वहाँ जरूर रवाना करें। पंडित जी का रद्देअमल काफी पुरलुत्फ होगा।
मैं इस लिफाफे में आपको एक तसवीर भेज रहा हूँ। यह एक पाकिस्तानी खातून की है, जिसने बंबई की मछेरनों की चोली जैसा ब्लाउज पहना हुआ है। इसमें से उसके पेट का थोड़ा-सा निचला हिस्सा झाँक रहा है। यह आपकी महिलाओं के नंगे पेटों को एक मात्र पाकिस्तानी गुदगुदी पेश करने के इरादे से है।
गैर-कुबूल अजतरफ जहे-अजो-शर्फ उम्मीद है, आपको मेरा सातवाँ खत मिल गया होगा। उसके जवाब का मुझे इंतजार है।
रूसी सकाफती वफद के तोड़ में कोई ऐसी ही सकाफती और खैरअंदेश दल यहाँ पाकिस्तान में भेजने का इरादा कर लिया है क्या आपने?
इत्तिला करें ताकि इस तरफ से मुझे तसल्ली हो जाए और मैं यहाँ के कम्युनिस्टों को, जो अभी तक रूसी दल की शानदार कामयाबी पर बिगुलें बजा रहे हैं, यह खबर सुनाकर ठंडा कर दूँ कि मेरे चचाजान रूसी दल से भी कहीं बढ़कर ऐसा दल भेज रहे हैं, जिसमें मिलियन डालर टाँगों और बिलियन डालर जोबनोंवाली लड़कियाँ शामिल होंगी और जिनकी एक झलक देखकर ही उनकी राल टपकने लगेगी।
आपको यह सुनकर खुशी होगी कि हमारे सूबे के वजीरेआला जनाब फीरोज खाँ नून साहब मैदाने-अमल में कूद पड़े हैं। आपने पिछले दिनों धीमें आवाज में सिर्फ इतना कहा था : "हमें कम्युनिस्टों के षड्यंत्रों को दबाने की कोशिश करनी चाहिए…" मुबारक हो कि दाबने दबाने का यह काम शुरू हो चुका है। बिसमिल्लाह, मैं यह खत इसी खुशी में लिख रहा हूँ कि कम्युनिस्टों के दफ्तर पर पुलिस के छापे पड़े हैं।
हमारे आखबार कहते हैं कि बहुत जल्द कम्युनिस्टों की भरमार शुरू हो जाएगी -पुलिस ने गिरफ्तार किए जानेवालों की लिस्ट तैयार कर ली है। अल्लाह ने चाहा तो बहुत जल्द यह शरारती तत्व जेलों में ठूँस दिए जाएँगे - सबसे पहले अगर कामरेड फीरोजुद्दीन मनसूर को कैद किया गया तो मुझे बड़ी राहत होगी। उसको दमे की शिकायत है। मैंने सुना है कि जिसको यह मर्ज हो, वह मरने का कभी नाम ही नहीं लेता। यह मर्ज की अगर ज्यादती है तो कामरेड मनसूर की भी ज्यादती है। मेरा ख्याल है कि अगर अब उसे जेल में डाला गया तो वह जरूर मर जाएगा। खस-कम-जहाँ-पाक।
अहमद नदीम कासमी भी यकीनन कैद हो जाएगा। कियाँ इफ्तिखरुद्दीन ने उसको अपने अखबार 'इमरोज' का एडिटर बनाकर बहुत बड़ा जुर्म किया है। चाहिए तो यह कि मियाँ साहब गिरफ्तार किए जाएँ, मगर वह बड़े होशियार हैं। पुलिस हथकड़ियाँ लेकर उनकी कोठी पहुँचेगी तो वह मुस्कराकर बाहर निकलेंगे और स्टे आर्डर दिखा देंगे। पिछले दिनों 'अमरोज' और 'पाकिस्तान टाइम्स' के दफ्तरों का किराया ना अदा करने के कारण ताले लगने की नौबत आ गई थी कि उन्होंने एक स्टे आर्डर मदारी की तरह थैले से बाहर निकालकर पुलिस की हैरत भरी आँखों के सामने रख दिया था - हर हाल में अहमद नदीम कासमी भी कुसूरवार है। उसको जरूर सजा मिलनी चाहिए। कमबख्त 'पंजदरिया' का कलमी नाम रखकर आपकी तारों भरी टोपी उछालता रहता है - मेरी तो यह राय है कि आप छः अमरीकी लड़कियाँ, कुँवारी, उसकी बहनें बना दें। उसको राह पर लाने का यह नुस्खा बहुत कामयाब रहेगा, उसे बहनें बनाने का शौक है। इस सूरत में उसको जेलखाने में ठूँसने की जरूरत बाकी नहीं रहेगी। जब पाँचों उँगलियाँ घी में और सर कड़ाहे में होगा तो कम्युनिज्म उसके दिमाग से ऐसे गायब होगा जैसे गधे के सिर से सींग।
ज्यों ही यहाँ कम्युनिस्टों की गिरफ्तारियाँ शुरू होंगी, मैं आपको इत्तिला कर दूँगा। मेरी बरखुर्दारी और कामयाबियाँ नोट करते जाइएगा - अगर आप अच्छे मूड में हों तो मुझे तीन सौ रुपए बतौर कर्ज देना न भूलिएगा। पिछला तीन सौ तो मैंने दो दिन के अंदर-अंदर ही खत्म कर डाला था और आपकी यह इनायत करीब-करीब दो बरस पुरानी हो चुकी है।
मैंने अपने छटे खत के संबंध में, जो आप तक नहीं पहुँचा, जाँच पड़ताल की थी। जैसा कि मुझे शक था, यह सब उन बेअक्ल कम्युनिस्टों की शरारत थी - अहमद राही को आप जानते हैं? वही 'तिरंजन' का लेखक, जिसको हमारी हुकूमत ने पाँच सौ रुपया इनाम दिया था उसने पंजाबी जबान में बड़ी प्यारी नज्में लिखी हैं। इसमें कोई शक नहीं कि यह नज्में बड़ी प्यारी और नर्मो-नाजुक हैं, मगर आप नहीं जानते, यह अहमद राही बड़ा खतरनाक कम्युनिस्ट हैं। पार्टी ऑफिस में दूसरे मेंबर टूटे प्यालों में चाय पीते हैं, मगर यह छुप-छुपकर बीयर पीता है और पी-पाकर मोटा हो रहा है। मेरा दोस्त है। मैंने उसी को खत पोस्ट करने के लिए दिया था, मगर कम्युनिस्ट जो ठहरा, मेरा खत गोल कर गया और जाकर पार्टी के हवाले कर दिया - मुझे अभी तक पूरे तौर पर गुस्सा नहीं आया है और मेरे पास इतने पैसे भी नहीं है, वर्ना मैंने सोच रखा है कि एक दिन उसको इतनी बीयर पिलाऊँगा कि उसकी तोंद फट जाए - एक दिन कमबख्त मुझसे कहने लगा : "तुम अपने चचा साम को छोड़ दो और मालनकोफ से खतो-किताबत शुरू कर दो… आखिर मालनकोफ तुम्हारा मामूँ है…" मैंने कहा : "यह दुरुस्त है, लेकिन वह मेरे सौतेले मामूँ है… उनको मुझसे, या मुझको उनसे कभी मुहब्बत नहीं हो सकती। इसके अलावा मैं जानता हूँ कि उनका अपने सगे भानजों से भी कोई अच्छा बर्ताव नहीं… वह गरीब उन पर अपनी जान छिड़कते हैं, उनसे बेपनाह अकीदत रखते हैं, फटे-पुराने कपड़ों में अपनी खस्ताहालियों के बावजूद उनकी खिदमत करते हैं, और वह सिर्फ एक सूखी शाबाशी वहाँ से लाल मोहर लगाकर रवाना कर देते हैं… अंग्रेज, चचा और अंग्रेज मामूँ इस रूसी मामूँ से लाख दर्जे बेहतर थे। 'सर' 'खान बहादुर' और 'खान साहब' जैसे खिताब देकर टरखा देते थे, लेकिन मालनकोफ साहब तो यह भी नहीं करते… मैं जब मानूँ कि वह अब्दुल्लाह मलिक को, जो उनका सबसे वफादार भानजा है, कोई छोटे-से खिताब से ही खुश कर दें… अब्दुल्लाह मलिक के लिए जेल जाकर आराम व तसल्ली से किताबें लिखने में कितनी आसानी हो जाएगी।
कुछ भी हो, मैं आपका गुलाम हूँ। आपने तो पहले तीन सौ रुपयों ही में मुझे हमेशा-हमेशा के लिए खरीद लिया था। अगर आप तीन सौ रुपए और भेज दें तो मैं दूसरी जि़ंदगी भी आपके नाम कर देने का वादा करता हूँ, बशर्ते कि अल्लाह मियाँ, जो आपसे बड़ा है, मेरे लिए पाँच-छ: सौ रुपए माहवार का वजीफा न मुकर्रर कर दे। अगर अल्लाह मियाँ ने किसी हव्वा से मेरा निकाह पढ़वा दिया तो अफसोस है कि यह वादा उस सूरत में बिलकुल पूरा न हो सकेगा - मेरी साफ बयानी की दाद दीजिए। बात दरअसल यह है कि मैं अल्लाह मियाँ और उनकी हव्वा के सामने चूँ तक भी न कर सकूँगा।
आजकल हमारे यहाँ शाही मेहमानों का ताँता लगा हुआ है - पहले शाह ईरान आए, फिर शाह इराक : फिर प्रिंस अली खाँ, आपकी रीटा हैवर्थ के साबिक शौहर : फिर महाराजा जयपुर और अब शाह सऊद वालिए सऊदी अरब।
मैं शाह सऊद खलिदुल्लाह के आने पर आँखों देखा और कानों सुना हाल आपको लिख रहा हूँ।
शाह सउद अपने पच्चीस शहजादों समेत हवाई जहाज के जरिए से कराची पहुँचे, जहाँ उनका बड़ा शानदार स्वागत हुआ - उनके शहजादे और भी हैं। मालूम नहीं, वे क्यों नहीं आए। शायद इसलिए कि दो-तीन हवाई जहाज और चाहिए होंगे, या उनकी उम्र उम्र बहुत छोटी होगी और वे अपनी माँओं की गोद को हवाई जहाज पर तरजीह देते होंगे - बात भी ठीक है। अपनी माँओं और ऊँटनियों का दूध पीनेवाले बच्चे ग्लैक्सो या काउ-गोट के खु़श्क दूध पर कैसे जी सकते हैं।
चचाजान गौर करने वली बात है - शाह सऊद के साथ माशाअल्लाह उनके पच्चीस साहबजादे थे। लड़कियाँ, खुदा मालूम कितनी होंगी। मुझे बताइए कि आपकी सात आजादियों वाले देश में कोई ऐसा हुनरमंद मर्द मौजूद है, जिसकी इतनी औलाद हो -चचाजान, यह सब हमारे मजहब इस्लाम की देन है। नाचीज की यह राय है कि आप फौरन अपनी सल्तनत का सरकारी मजहब इस्लाम करार दे दें इससे बड़े फायदे होंगे। करीब-करीब हर शादीशुदा मर्द को तीन और शादियाँ करने की इजाजत होगी। अगर एक औरत चार बच्चे भी बड़े कंजूसी से काम लेकर पैदा करे तो इस हिसाब से सोलह लड़के-लड़कियाँ एक मर्द की मर्दानगी और उसकी चार बीवियों के उपजाऊपन का सुबूत होंगे। लड़के और लड़कियाँ जंग में कितनी काम आ सकती हैं। आप तर्जुबेकार हैं और खुद अंदाजा लगा सकते हैं।
मैं अमृतसर का रहने वाला हूँ - मिस्टर रैड क्लिफ की मेहरबानी से यह अब भारत में चला गया है - इसमें एक हकीम थे, मुहम्मद अबू तराब। आपने अपनी जिंदगी में दस शादियाँ कीं। चार-चार करके नहीं, एक-एक करके। इन बीवियों से उनकी बेशुमार औलाद थीं। जब उन्होंने नब्बे बरस की उम्र में आखिरी शादी की तो पहली बीवी से उनके सबसे बड़के की उम्र पिचहत्तर बरस की थी और सबसे छोटे लड़के की उम्र, जो उनकी नौवीं बीवी के पेट से पैदा हुआ था, सिर्फ दो बरस की थी। एक सौ बारह बरस की उम्र में आपका देहांत यहाँ लाहौर में एक शरणार्थी की हैसियत से हुआ। किसी शाइर ने उनकी तारीखे़-वफात इस मशहूर मिस्रे में निकाली थी :
'हसरत उन गुंचों पे है जो बिन खिले मुरझा गए।'
यह भी अल्लाह तबारक तआला और उसके मंजूरशुदा मजहब इस्लाम की बरकत है - अगर आपके शादीशुदा मर्दों को शुरू-शुरू में चार बीवियों को एक समय में एक साथ सँभालने में किसी किस्म की दिक्कत महसूस हो तो आप शाह सऊद को वहाँ बुलाकर उनकी सेवाओं से लाभ उठा सकते हैं। आप उनके दोस्त हैं। उनके मरहूम वालिद से तो आपकी गाढ़ी छनती थी। मैंने सुना था कि आपने उनके और उनके जनानखाने के लिए बड़ी आलीशान गाड़ियों का एक कारवाँ तैयार करके उनको उपहार स्वरूप पेश किया था -मेरा खयाल है, शाह सऊद आपको अपने तमाम सदरी नुस्खे बता देंगे।
हमारे पाकिस्तान के साथ आजकल सिवाय हिंदुस्तान और रूस के करीब-करीब हर देश दिलचस्पी ले रहा है। यह सब आपकी मेहरबानियों का नतीजा है कि आपने हमारी तरफ दोस्ती और सहयोग का हाथ बढ़ाया और हम इस काबिल हो गए कि दूसरे भी हम पर नजरे-कायम रखने लगे।
हम पाकिस्तानी तो इस्लाम के नाम पर मर मिटते हैं - एक जमाना था, जब हम मुस्तफा कमाल पाशा और अनवर पाशा के भक्त थे। अनवर पाशा के मरने की खबर आती तो हम सब लोग सोग मनाते और सचमुच आँसुओं से रोते। जब यह पता चलता कि अनवर पाशा खु़दा के फज्ल से जिंदा हैं तो हम खु़शी से नाचते, कूदते और घर में चिरागाँ करते - मुस्तफा कमाल और अनवर, दोनों एक-दूसरे के जानी दुश्मन थे। हमें इसका कुछ इल्म नहीं था - तुरकों को हिंदी मुसलमानों से कोई दिलचस्पी नहीं थी। वह हमको तीन में समझते थे न तेरह में। इसका हमें कुछ-कुछ पता था, लेकिन हमें उनसे मुहब्बत थी - हम ऐसे निहायत शरीफ और सादा हैं कि हमें आमले और चंबेली के उस तल से भी मुहब्बत है, जो यहाँ 'इस्लामी भाइयों का तैयार किया हुआ' मिलता है। उसको हम अपने सिरों में डालते हैं तो ऐसा सकून मिलता है कि मौजूदा जन्नत की तमाम लताफतें उसके सामने हल्की पड़ जाती हैं। हम सब बड़े बुद्धू, मगर बड़े प्यारे लोग हैं। खु़दा रहती दुनिया तक हमारी तमाम अच्छाइयाँ कायम रखे।
मैं बात शाह सऊद के दरूद मसऊद की कर रहा था, लेकिन जज्बाती होकर इस्लाम के गुण गाने लगा। बात यह है कि इस्लाम के गुण गाने ही पड़ते हैं। मजहब, ईसाई रिलीजन, बुद्ध मत आखिर यह क्या हैं - क्या इनके माननेवालों में कोई एक बेमिसाल मर्द पच्चीस लड़कों का बाप होने का दावा कर सकता है। इसीलिए मैंने आपको मश्वरा दिया था कि आप यू.एस.ए. का सरकारी मजहब इस्लाम स्थापित कर दें ताकि आपको कोई जापान फतेह करके हरामी-बच्चे पैदा करने की जरूरत महसूस न हो। चचाजान, क्या आपको हरामीपना पसंद है, मैं मुसलमान हूँ। मुझे तो खुदा और उसके रसूल की कसम, इससे सख्त नफरत है। बच्चे ही पैदा करने हैं तो इसका कितना सहज तरीका इस्लाम में मौजूद है - निकाह पढ़वाइए और बड़े शौक से बच्चे पैदा कीजिए। चचीजान अगर जिंदा हैं तो भी कोई बात नहीं। आप इस्लाम धर्म अपना कर तीन और शादियाँ कर सकते हैं। यहाँ पाकिस्तान में आप मशहूर एक्ट्रेस इशरतजहाँ बिब्बो को अपनी शादी कर ला सकते हैं, उन्हें कई शौहरों का तज्रबा है।
शाह सऊद बड़े पुरअज सहर शख्सियत के मालिक हैं। जहाज से बाहर निकलते ही आप हमारे लाहौर के मोची दरवाजे के गवर्नर जनरल जनाब गुलाम मुहम्मद खान से गले मिले और इस्लामी भाइयों की रजिस्टर्ड अखूवत व मुहब्बत का प्रदर्शन किया, जो बड़ा धार्मिक भेद-भाव मिटाने वाला था। आपकी अज्जत अफजाई में कराची के मुसलमानों ने अपनी हैसयित से बढ़कर नारे लगाए, जलसे किए, जुलूस निकाले, दावतें कीं और इस्लाम की चौदह सौ साला रवायात को कायम रखा।
सुना है, शाह सऊद अपने साथ एक सोने से भरा हुआ बक्स लाए थे, जो कराची के मजदूरों से बहुत मुश्किल से उठाया गया। आपने यह सोना कराची में बेच दिया और पाकिस्तान को बतौर मेहरबानी दस लाख रुपए मर्हमत फरमाए। फैसला हुआ कि इस रकम से गरीब शरणार्थियों के लिए एक कॉलोनी बनाई जाएगी, जिसका नाम सऊदआबाद होगा - रहे नाम अल्लाह का।
मोतबर जराए से मालूम हुआ है कि शाह सऊद खैरअंदेशी के तौर पर अपने दो साहबजादों की शादी हमारे पाकिस्तान में करना चाहते हैं। जहे नसीब।
सुना है, कराची में बेगम शाहनवाज को जब अरब शहजादों के लिए कोई मुनासिब रिश्ता न मिला तो उन्होंने बेगम बशीर को टेलीफोन किया कि वह लाहौर में रिश्ता ढूँढ़ना शुरू करें, इसलिए कि लाहौर आखिर लाहौर है और लाहौर में शहजादों के लाइक कुँवारी लड़कियों की क्या कमी है - चुनांचे सुना है कि बेगम बशीर ने बेगम जी.ए. खान और बेगम सलमा तसद्दुक के साथ मिलाकर रवायती नायन के फर्ज को निभाया और बड़े-बड़े घरानों में शाह सऊद के दो होनहार बेटों के लिए पैगाम लेकर गईं, मगर अफसोस है कि उन्हें कामयाबी नसीब न हुई। इसकी वजह यह बताई जाती है कि हमारे ऊँचे तबके की जवान और कुँवारी लड़कियों को अरब के यह 'ऊँट' एक आँख नहीं भाए। मैं समझता हूँ, यह उनकी गलती है। इससे पहले, जब कि पाकिस्तान नहीं बना था, सऊदी अरब से हिंदुस्तान के मुसलमानों का इस किस्म का रिश्ता हो चुका है। मौलाना दाऊद गजनवी और मौलाना इस्माइल गजनवी के खानदान की एक दोशीजा शाह सऊद के मरहूम बालिद बुजुर्गवार जनाब अब्दुलअजीज इब्ने सऊद की शादी में जा चुकी हैं। आपको शायद मालूम हो कि मौलाना इस्ताइल गजनवी ने इसी सिले में सत्ताईस हज किए थे, हालाँकि एक ही हज काफी था - में दिल बदस्त आवर के हज अकबर अस्त - गो बेगम बशीर, बेगम जी.ए.खान और बेगम तसद्दुक को इस नेककरम में नाकामी का सामना करना पड़ा है, लेकिन मुझे यकीन है, कोई-न-कोई राह निकल आएगी। हमारे पाकिस्तान में दो ऐसी लड़कियाँ बरामद हो जाएँगी, जिनको सरजमीने-हिजाज के शहजादे सरफराज फरमाएँगें।
मैंने अपने किसी पिछले खत में अपने यहाँ की ख्वातीन के बारे में आपको कुछ लिखा था, गालिबन उन ब्लाउजों के बारे में जो बड़ी उम्र की औरतें पहनती हैं और अपने कलबूत चढ़े पेटों की नुमाइश करती हैं। इस पर हमारी युनीवर्सिटी के शोबा-ए-फारसी के सदर जनाब डॉक्टर मुहम्मद बाकर साहब बहुत नाराज हुए। आपने मुझे कई इज्जतकश किस्म की गालियाँ दीं और इसलिए बहुत बुरा करार दिया कि मैंने अपने यहाँ की औरत का अपमान किया है - लाहौल वला - मैंने जो कुछ बयान किया था, महज यह था कि बूढ़ी औरतों को अपनी उम्र से इस किस्म के आधे नंगे चोंचले शोभा नहीं देते। मुझे डर है कि डॉक्टर साहब जब मेरा यह खत पढ़ेंगे तो मुझ पर फिर इल्जाम धरेंगे कि मैंने फिर अपनी 'औरत' का अपमान किया है।
बात असल में यह है कि हम लोग स्वाभाविकतः सादा लोह और बुद्धू हैं। हमारी औरतें तो भौंदी मुर्गियाँ हैं। जिधर हवा चलती है, हम उधर चल पड़ते हैं - शाह ईरान तशरीफ लाए तो ऊँची सोसाइटी की लड़कियों ने तरह-तरह से खु़द को सजाया कि शाह ईरान उन दिनों फुरसत पाए हुए थे। वह फरिया को तलाक दे चुके थे, मगर उन्होंने हमारी लड़कियों में सिर्फ रस्मी दिलचस्पी दिखाई और ईरान जाकर सुरैया अस्फदयार से शादी कर ली। इसके बाद प्रिंस अली खाँ आए। वह भी फरिग थे, इसलिए कि आपकी रीटा हैवर्थ उनसे तलाक हासिल कर चुकी थी। हमारी ऊँची सोसाइटी की लड़कियों ने एड़ी-चोटी का जोर लगाकर अपनी माँग-चोटी दुरुस्त की, नोक-पलक निकाली, मगर प्रिंस अली खाँ ने उनकी सारी उमंगों पर ठंडा बर्फ पानी फेर दिया और आपकी हालीवुड की एक और एक्ट्रेस जेन टर्नी से इश्क शुरू कर दिया खुदा - आपकी सात आजादियों वाले देश को कायमों-दायम रखे, फिर हमारे यहाँ शाह इराक आए, मगर हमारी ऊँची सोसाइटी की कुँवारी लड़कियाँ उन्हें देखकर बहुत मायूस हुईं, इसलिए कि वह कम उम्र थे। एक ने कहा : "हाए, इस बच्चे का तोखूल-कूद का जमाना है... क्यों इस बेचारे पर सल्तनत का बोझ डाला गया है..." इसी तरह एक बूढ़ी ने, जिसका पेट बहुत ज्यादा नंगा नहीं था, शाह इराक पर तरस खाकर कहा "बुड्ढों से इस गरीब को क्या दिलचस्पी हो गर... जाओ इन्हें इनके हम उम्रवालों से मिलाओ..." शाह इराक भी गए और अब शाह सऊद तशरीफ ले आए, अपने पच्चीस शहजादों समेत गवर्नमेंट हाऊस में उनकी शानदार दावत हुई, जिसमें ऊँची सोसाइटी की तमाम शादीशुदा और कुँवारी औरतों और लड़कियों ने शिरकत की। सिगरेट पीने की इजाजत नहीं थी, 'अब्दुल्लाह' की भी नहीं। वह सिगरेट के धुएँ के बगैर बहुत खु़श हुए और यह हिज उन्हें खालिस इस्लामी मेहमान नवाजी की बदौलत नसीब हुआ। उनके दो दर्जन से ज्यादा शहजादों ने अनारकली में सैकड़ों पाकिस्तानी जूते खरीदे और अपनी शुभकामनाओं का सुबूत दिया। अब यह जूते अरब के रेगिस्तान की रेत पर चलेंगे और अपने टिकाऊपन के जल्द खत्म हो जाने वाले कदमों के निशान अंकित करेंगे...
यह खत अधूरा छोड़ रहा हूँ, इसलिए कि मुझे पब्लिशर से अपनी नई किताब की रायल्टी वुसूल करनी है। वह दस रोज से वादे कर रहा है। मेरा खयाल है, आज वह दस रुपए तो जरूर देगा। यह मिल गए तो मैं यह खत पोस्ट कर सकूँगा, वर्ना ...
जैन टर्नी को एक उड़ता हुआ चुबंन

आपका खु़शनसीब
सआदत हसन मंटो
1954
31, लक्ष्मी मैन्शंज, हॉल रोड, लाहौर

(प्रस्तुति: बिजूका)

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टिप्पणियाँ:-

पाखी:-
अमेरिकी भोंडापन, भारतीय और पाकिस्तानी उच्च वर्ग के लिजलिजे चरित्राें की धज्जियां उड़ाता मंटाे का यह धारदार व्यंग्य.. बिजूका टीम को बधाई इस बेहतरीन प्रस्तुति के लिए .. भास्कर

प्रह्लाद श्रीमाली:-
अमर साहित्यकार मंटो की सदाबहार धारदार व्यंग्य रचना के लिए हार्दिक बधाई धन्यवाद शुभकामनायें बिजूका परिवार को ।

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