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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

'कानून के दरवाज़े पर' : फ़्रांज काफ़्का अनुवाद : सुकेश साहनी

नमस्कार साथियो..
आज आपके लिए प्रस्तुत है  जर्मनी भाषा के प्रमुख साहित्यकार फ़्रांज़ काफ़्का की कहानी का हिंदी अनुवाद। आशा है कहानी आपको पसंद आएगी। हमें अपनी प्रतिक्रिया से अवगत अवश्य कराएँ..

कहानी :

        'कानून के दरवाज़े पर' ( फ़्रांज काफ़्का)

कानून के द्वार पर रखवाला खड़ा है। उस देश का एक आम आदमी उसके पास आकर कानून के समक्ष पेश होने की इजाज़त मांगता है। मगर वह उसे भीतर प्रवेश की इजाज़त नहीं देता।

आदमी सोच में पड़ जाता है। फिर पूछता है- ‘‘क्या कुछ समय बाद मेरी बात सुनी जाएगी?

‘‘देखा जाएगा” --कानून का रखवाला कहता है- ‘‘पर इस समय तो कतई नहीं!”

कानून का दरवाज़ा सदैव की भाँति आज भी खुला हुआ है। आदमी भीतर झाँकता है।

उसे ऐसा करते देख रखवाला हँसने लगता है और कहता है-- ‘‘मेरे मना करने के बावजूद तुम भीतर जाने को इतने उतावले हो तो फिर कोशिश करके क्यों नहीं देखते ; पर याद रखना मैं बहुत सख़्त हूँ; जबकि मैं दूसरे रखवालों से बहुत छोटा हूँ । यहाँ एक कमरे से दूसरे कमरे तक जाने के बीच हर दरवाज़े पर एक रखवाला खड़ा है और हर रखवाला दूसरे से ज़्यादा शक्तिशाली है। कुछ के सामने जाने की हिम्मत तो मुझ में भी नहीं है।”

आदमी ने कभी सोचा भी नहीं था कि कानून तक पहुँचने में इतनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा। वह तो यही समझता था कि कानून तक हर आदमी की पहुँच हर समय होनी चाहिए। फर कोटवाले रखवाले की नुकीली नाक, बिखरी-लम्बी काली दाढ़ी को नज़दीक से देखने के बाद वह अनुमति मिलने तक बाहर ही प्रतीक्षा करने का निश्चय करता है। रखवाला उसे दरवाज़े की एक तरफ़ स्टूल पर बैठने देता है। वह वहाँ कई दिनों तक बैठा रहता है। यहाँ तक कि वर्षों बीत जाते हैं। इस बीच वह भीतर जाने के लिए रखवाले के आगे कई बार गिड़गिड़ाता है। रखवाला बीच-बीच में अनमने अंदाज़ में उससे उसके घर एवं दूसरी बहुत-सी बातों के बारे में पूछने लगता है, पर हर बार उसकी बातचीत इसी निर्णय के साथ ख़त्म हो जाती है कि अभी उसे प्रवेश नहीं दिया जा सकता।

आदमी ने सफ़र के लिए जो भी सामान इकट्ठा किया था और दूसरा जो कुछ भी उसके पास था , वह सब वह रखवाले को ख़ुश करने में खर्च कर देता है। रखवाला उससे सब-कुछ इस तरह से स्वीकार करता जाता है मानो उस पर अहसान कर रहा हो।

वर्षों तक आशा भरी नज़रों से रखवाले की ओर ताकते हुए वह दूसरे रखवालों के बारे में भूल जाता है! कानून तक पहुँचने के रास्ते में एकमात्र वही रखवाला उसे रुकावट नज़र आता है। वह आदमी जवानी के दिनों में ऊँची आवाज़ में और फिर बूढ़ा होने पर हल्की बुदबुदाहट में अपने भाग्य को कोसता रहता है। वह बच्चे जैसा हो जाता है। वर्षों से रखवाले की ओर टकटकी लगाए रहने के कारण वह उसके फर के कॉलर में छिपे पिस्सुओं के बारे में जान जाता है। वह पिस्सुओं की भी ख़ुशामद करता है ताकि वे रखवाले का दिमाग उसके पक्ष में कर दें। अंतत: उसकी आँखें जवाब देने लगती हैं। वह यह समझ नहीं पाता कि क्या दुनिया सचमुच पहले से ज़्यादा अँधेरी हो गई है या फिर उसकी आँखें उसे धोखा दे रही हैं। पर अभी भी वह चारों ओर के अंधकार के बीच कानून के दरवाज़े से फूटते प्रकाश के दायरे को महसूस कर पाता है।

वह नज़दीक आती मृत्यु को महसूस करने लगता है। मरने से पहले वह एक सवाल रखवाले से पूछना चाहता है जो वर्षों की प्रतीक्षा के बाद उसे तंग कर रहा था । वह हाथ के इशारे से रखवाले को पास बुलाता है क्योंकि बैठे-बैठे उसका शरीर इस कदर अकड़ गया है कि वह चाहकर भी उठ नहीं पाता। रखवाले को उसकी ओर झुकना पड़ता है क्योंकि कद में काफ़ी अंतर आने के कारण वह काफ़ी ठिगना दिखाई दे रहा था।

‘‘अब तुम क्या जानना चाहते हो” --रखवाला पूछता है-- ‘‘तुम्हारी चाहत का कोई अंत भी है?”

‘‘कानून तो हरेक के लिए है” --आदमी कहता है-- ‘‘पर मेरी समझ में ये बात नहीं आ रही कि इतने वर्षो में मेरे अलावा किसी दूसरे ने यहाँ प्रवेश हेतु दस्तक क्यों नहीं दी?”

रखवाले को यह समझते देर नहीं लगती कि वह आदमी अंतिम घडि़याँ गिन रहा है। वह उसके बहरे होते कान में चिल्लाकर कहता है-- ‘‘किसी दूसरे के लिए यहाँ प्रवेश का कोई मतलब नहीं था क्योंकि कानून तक पहुँचने का यह द्वार सिर्फ़ तुम्हारे लिए ही खोला गया था और अब मैं इसे बंद करने जा रहा हूँ।”

अंग्रेज़ी से अनुवाद: सुकेश साहनी

( प्रस्तुति: बिजूका)

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टिप्पणी:-

संतोष श्रीवास्तव:-
मार्मिक कहानी है काफ्का की।लेकिन उससे भी बेहतरीन सुकेश जी द्वारा किया अनुवाद जो पढ़ने की ललक जगाये रखता है।बधाई।आभार एडमिन् जी

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