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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

ब्रेख्त की तीन छोटी कहानियाँ

सुभोर साथियो,
                     आइये आज पढ़ते है नोबेल पुरस्कार विजेता साहित्यकार बर्टोल्ट ब्रेख्त की तीन छोटी कहानियां... 

पढ़कर अपने विचार जरूर रखें
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1. "डबल आदर" 

साहित्यकार गुन्थर वाइजनबोर्ग को एक साहित्य पुरस्कार मिला। यह खबर सुनते ही महाशय 'ब' ने उन्हें फोन किया और कहा, 'बधाई देता हूं। कितनी रकम का पुरस्कार था भाई?'

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गुन्थर वाइजनबोर्ग ने रकम गिनाई - दस हजार मार्क।

महाशय 'ब' अति उत्साहित अंदाज में लपककर बोले, 'अच्छा!!! फिर तो हार्दिक बधाई।'

2. "सच बोलने का खतरा"

अमेरिकी फिल्म नगरी हॉलिवुड में एकबार संगीतकार हंस आइसलर महाशय 'ब' से मिले। उन्होंने उनके सामने रहस्योदघाटन किया कि एक प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक ने काफी तैश में आकर उनसे (आइसलर) कहा था कि अब वह कभी भविष्य में महाशय 'ब' के साथ काम नहीं करना चाहता।

महाशय 'ब' ने चकित होकर कहा, 'मैं समझा नही, वह मेरा साथी था और मैंने उनसे जो भी कहा, वह सब सच ही तो था। मैंने उनके सामने सच ही जाहिर किया था।'

संगीतकार हंस आइसलर ने सिर हिलाते हुए कहा, 'कहा तो सच था, लेकिन कितनी जोर से?'

3. "डायलेक्टिक" 

महाशय 'ब' जब लड़के थे, तब फ्रेंच की एक लिखित परीक्षा के सिलसिले में उन्हें तार्तिया जाना पड़ा। वहां पहुंचते ही परीक्षा शुरू हो गई। उनका एक सहपाठी यह परीक्षा लैटिन में दे रहा था। उस सहपाठी ने अपनी कुछ गलतियां रगड़कर साफ कीं और प्रफेसर के पास जाकर नंबर बढ़ाने की मांग की।

लेकिन उसके अंक और भी कम कर दिए गए, क्योंकि जहां-जहां गलतियां रगड़ी गई थीं, घिसट्टा पड़ने से वहां-वहां कागज छिछला पड़ गया था।

इस तरह की कारगुजारी के नुकसान से महाशय 'ब' खूब परिचित थे। उन्होंने लाल स्याही ली, अपनी कॉपी पर कई सही जगहों पर भी गलतियों के निशान बनाए और फिर प्रफेसर के पास जाकर बोले, 'यहां क्या गलती है?' प्रफेसर हैरान हो गए। लाल घेरे वाली जगहें सही थीं।

'प्रफेसर यदि गलतियां गिनने में ऐसी ही चूक करते हैं, तब निश्चित रूप से मेरे नंबर बढ़ने चाहिए।' 'ब' ने अपनी बात बढ़ाई।

इस तर्क के आगे प्रफेसर झुक गए और महाशय 'ब' के नंबर बढ़ा दिए गए।

(जिस किताब से ये कहानियां ली गई हैं, जर्मन से उसका मूल अनुवाद मोहन थपलियाल ने किया है।) 

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प्रस्तुति-बिजूका टीम
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टिप्पणियां:-

आलोक बाजपेयी:-
ब्रेख्त के रचना संसार की पृष्ठभूमि फासीवादी व्यवस्था है जिसमे अभिव्यक्ति के जानलेवा खतरे हैं और कुछ भी विरोध में बोलना राष्ट्रद्रोह है। एक खौफनाक सन्नाटे में जैसे फुसफुसा के सच बोल रहा हो कोई। व्यंग्य बहुत बारीक ढंग से  यहाँ बोला जाता है यहां लगभग subtle तरीके से। बिकाऊ बुद्धिधारकों का रीढ़ विहीन जीवन। एक त्रासद समय में मनुष्यता के कराह कर जीने की विविशीषा। यह सब ब्रेख्त को कालजयी बनाता है।

तितिक्षा:-
पल्लवी जी ,आलोक जी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद ।
संजीव जी पल्लवी जी की बात से सहमत हूँ यहां हर पाठक अपनी तरह से कहानी को समझता है ।

गीतिका द्विवेदी:-
इन कहानियों को पढ़ने के लिए एकाग्रचित्त होना पड़ता है ।तीसरी कहानी मुझे सबसे अच्छी लगी

पाखी:-
अच्छी लगीं कहानियाँ . जीवन में घटित छाेटी परंतु महत्वपूर्ण घटनाओं से उपजी ये कहानियाँ .. सचमुच सच काे हजम करने की हिम्मत है कितने लाेगाें में?

मज़कूर आलम:-
सच कहूं तो मैं अभी तक समझने की ही कोशिश कर रहा हूँ। वैसे मुझे दूसरी कहानी सबसे अच्छी लगी।

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