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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

कविताएँ : नितीश मिश्र

प्रिय साथियो...
     आज आपके लिए प्रस्तुत हैं समूह के साथी नितीश मिश्र की तीन कविताएँ।
अन्य कविताएँ व कवि परिचय कल प्रकाशित किया जाएगा,  जिससे आज आप कविताओं पर निष्पक्ष प्रतिक्रियाएँ रख सकें...

कविता :

1. मुझे केवल भिखारी पहचानता है
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इस शहर में
मैं सुबह -शाम की तरह जिन्दा हूँ
इसके बावजूद भी
तुम्हारे शहर में
मुझे केवल भिखारी पहचानते हैं…
कभी -कभी तुम्हारे शहर के
कुछ कुत्तों ने भी पहचानने की कोशिश की
इस कोशिश में कुत्ते
अपनी बहुत सारी ऊर्जा भी ख़त्म कर चुके हैं
लेकिन कुत्ते नहीं पहचान सके मुझे
कुत्तों ने मुझे उतना ही पहचाना
जिससे उनको मुझसे नुकसान न हो !
कभी -कभी सोचता हूँ
यदि मैं यहाँ नहीं आया होता
तो क्या तेरा शहर दूसरो के साथ ऐसा ही व्यवहार करता ?
तुम्हारे शहर के देवता भी
नहीं सुनते मेरी प्रार्थना
और न ही हवा भी
इस तरह मैं तुम्हारे शहर में
एक लोटे की तरह किसी अँधेरे में डूबा हुआ हूँ ....
कभी -कभी मैंने यह जानना चाहा कि
क्या मैं तुम्हारे शहर में खुद को कितना पहचानता हूँ
 मेरे धरातल से एक ही आवाज उठती है..
"यह समय खुद को पहचानने का नहीं हैं
यह समय अँधेरे का है"
और मुझे बचाना है अपने समय को
जिससे मेरा समय बच सके तुम्हारे रंग से
कभी कभी सोचता हूँ
लौट जाऊं अपने शहर
लेकिन वहां भी तो कोई नहीं हैं जो मुझे पहचान सके
मेरे समय के सभी दोस्त
अपने -अपने समय के रंग को नाले में छोड़कर
अपनी भूख पर कलई करने में लगे हुए हैं
मेरे शहर में
न तो अब वह हवा है
और न ही वह धूप
और न ही वह पेड़ जो मुझे कभी पहचानते थे
मैं तुम्हारे शहर में जिन्दा हूँ
एक मशीन की तरह
और एक समय के बाद
मशीन की तरह कबाड़ख़ाने का विषय हो जाऊंगा
यह समय 
शायद! कबाड़ख़ाने होने का हैं ॥
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2. वे मेरे रंग की हत्या कर रहे है

मैं बहुत खुश था
जितना आसमान अपने नीले रंग के साथ
उतना ही खुश मैं अपने हरे रंग के साथ था
मैंने, कभी आसमान से उसका हरा रंग नहीं मांगा
और न ही कभी ललक हुई कि 
अासमान से मैं कुछ रंग चुरा लूं
क्योंकि मुझे यह सिखाया गया था
हर व्यक्ति अपने- अपने रंग के साथ खुश रहता है
और अपने रंग में ही खोज लेता है
अपनी मुक्ति
लेकिन मेरा विश्वास टूट गया
जब उन्होंने मेरे सामने खड़ी हरे रंग की इमारत को
लाल रंग से रंग दिया
यह कहते हुए कि तुम अभी देश का इतिहास नहीं जानते हो
उसी दिन से मैं अपने रंग के साथ आसमान से दूर
और धरती के किसी कोने में सिमटा हुआ हूं
क्योंकि मेरे चारों ओर एक ही हवा बहती है
जिसमें सुनता रहता हूं
कि वे लोग कभी भी मेरे जिस्म के हरे रंग को
लाल रंग से रंग देंगे।
क्योंकि उनके पास लाखों हाथ हैं
और रंग बनाने वाली कई सारी मशीनें हैं
जबकि मेरे पास एक ही रंग है हरा
वह भी तबका, जब मैं पैदा हुआ था।
मुझे डर लग रहा है कि वे कभी भी मुझसे मेरा हरा रंग छीन लेंगे
और घोषित कर देंगे --
देखो मैंने हरे रंग को डर में मिलाकर गाढ़ा लाल रंग तैयार किया है।
क्योंकि अब धरती और पानी भी लाल रंग का होता जा रहा है।
मै अपने जिस्म पर पड़े हरे रंग से हर रोज माफी मांगता हूं
क्योंकि मैं इस रंग को अब बचा नहीं पा रहा हूं
क्योंकि आज की दिल्ली रंगों को बदलने वाली हो चुकी है।।

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3.  मैं आज सुन्दर इसलिए हूँ

अब मैं सपना बहुत खूबसूरत देखता हूँ .... 
जंगलों में भी एक नया रास्ता बना लेता हूँ
अजनबी शहरों में भी
अपना कोई न कोई परिचय निकाल  लेता हूँ.... 
हामिद और मकालू में भी
अपना चेहरा ढूंढ लेता हूँ
मंदिर / मस्जिद से अलग होकर
अपना एक मकान  बना लेता हूँ …
क्योकि मेरी माँ बुड्ढी हो गई है ।
मैं अब गहरे पानी में तैर लेता हूँ
क्योकि माँ के चेहरे पर अब पसीने नहीं आते
अब मैंने हँसना भी सीख लिया है
अब मुझे कोई बीमारी भी नहीं होती
क्योंकि माँ के शरीर में
जगह -जगह जख्मों ने सुरक्षित स्थान बना लिया हैं
मेरी माँ उम्र के अंतिम सीढ़ियों पर खड़ी हैं
और मैं सुन्दर हो गया हूँ …… 

एक दिन शहर के बीचोंबीच
मुझे एक डॉक्टर ने रोक लिया
और धिक्कारते हुए मुझसे कहा --
तुम होशियार और सुन्दर इसलिए बने हो
क्योंकि कहीं बहुत दूर खटिये पर तुम्हारी माँ खांस रही हैं ॥

4.  बाप डाकिए का देखता रहता है रास्ता
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जब आसमान में सूर्योदय होता है
घर में बाप के साथ झाड़ू भी जागती है
बाप आसमान को पकड़कर
चौखट पर बैठ जाता है
और डाकिए का रास्ता देखता है
जबसे बेटी गई है शहर
बाप उदास होकर खड़ा है
बेटी की चिठ्ठी आती हैं
बाप बेटी की परेशानियाँ जानकर मौन है
फिर भी बेटी बाप की उम्मीद है
इसलिए बाप खुश है
यह सोचकर कि एक दिन बेटी की ऐसी चिठ्ठी आएगी
जिसमें लिखा रहेगा
पिताजी आज आपकी बेटी बहुत खुश है
यही पंक्ति पढ़ने के लिए
बाप इंतजार कर रहा है
और बेटी शहर में दौड़ रही किसी रेलगाड़ी की तरह ।।

5.  आईना ही बताएगा आगे का रास्ता
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जब हम नहीं होंगे
कहीं नहीं होंगे घर
न तो कविताओं में और न ही कहानियों में
जब कहीं कुछ नहीं बचा होगा
तब धरती पर जीवाश्म की तरह
आईने बचे होंगे
तब हमारे समय का सबसे बड़ा ग्रन्थ
आईना होगा
और लोग आईनों से पूछ कर
हरेक जख्मों का इतिहास लिखेंगे
उस समय का सबसे बड़ा धर्म आईना होगा
आईना जो बोलेगा
लोग वही लिखेंगे
आईना बोलेगा इंसान और देवता में कोई फासला नहीं होता
आईना बताएगा उजाले और अँधेरे में कोई अंतर नहीं होता
आईना बताएगा गरीब के पेट की सुंदरता कैसी होती हैं
आईना बताएगा एक औरत की आँख में कितने आंसू हैं
आईना बताएगा दिल्ली में यमराज रहता हैं
आईना ही तय करेगा कि
इस सदी में कौन ताजमहल बनवायेगा
आईना ही बताएगा कि किन लोगों ने भ्रूणों की हत्या की है
आईना यह भी बताएगा की रात में चीटियाँ कैसे गाती हैं
आईना ही बताएगा
नदी कितनी भूखी कर्जदार हैं
तुम क्या सोचते हो
हमेशा तुम ही रहोगे?
नहीं। धरती पर दो ही लोग जीवित रहेंगे
एक आईना
दूसरा पेड़
दोनों तुम्हारे साथ चलते नहीं हैं
इसलिए हम उन्हें कमजोर मानकर दरकिनार कर देते हैं
लेकिन यह चलते तो नहीं हैं पर इनकी नज़र बहुत दूर तक रहती है
यह बैठे -बैठे ही देख लेते हैं
कब किसकी हत्या होने वाली हैं
कब किसका रंग बदलने वाला हैं
आईनों को यह भी मालूम रहता हैं
चन्द्रमा आज कितना उदास हैं
आईना ही इस सदी का संत हैं
जो सब जानता है मगर चुप रहता है ॥
अब आईना ही बताएगा आगे का क्या रास्ता है

6. पतंग के पास एक कहानी है
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जब भी किसी पंतग को हवा से लड़ते हुए देखता हूँ
मुझे लगता है
अभी जमाने में लड़ाई जारी है
भले इंसान हाथ पर हाथ रख कर बैठ गया हो
लेकिन पंतग अभी भी लड़ रही है
बिजली के तारों से, तो कभी लोगों की निगाहों से
पंतग ने सबसे बड़ा सफर तय किया है
लेकिन क्या किसी को इस बारे में कुछ मालूम है
कि झूलती हुई पंतग के पास भी एक
कहानी है।
बिजली के तारों में जो पंतग उलझी है
वह आसमान की और धरती की सबसे खूबसूरत पंतग है
क्योंकि इस पंतग में
अभी तक सुरक्षित है
जमाने की सबसे मुलायम एक प्रेम कहानी
पंतग और उसमें लिपटी प्रेम कहानी
एक साथ हवा के खिलाफ और आसमान के खिलाफ
आवाज उठाती है।
जबकि इस कहानी के सूत्रधार जमाने में नहीं हैं
लेकिन उनकी प्रेम कहानी जमाने से बाते कर रही है।
जब पूरी दुनिया इतिहास के खाते में
अपना नाम दर्ज कराने के लिए मशगूल थी
उस वक्त केशवनगर गली का एक लड़का,
रेहानपुरी मोहल्ले की लड़की
इतिहास को छोड़कर अपने समय का एक ओर
अपने देह राग के इतिहास की खातिर
तोड़ रहे थे परंपराएँ
और लिख रहे थे हवा में अपनी प्रेम कहानी
उस दौरान पंतग इस कहानी को एक रंग दे रही थी।
जब इतिहास को वे लिए दिए अपने रंग से
और जमाना एक बार फिर देखना चाह रहा था कि धरती पर अभी कहां दाग रह गया है जो साफ नहीं हुआ है
तभी किसी ने बताया कि जमाने के इतिहास पर एक नया दाग लगने वाला है
उसी के बाद इतिहास को रंगने वालों ने
मार दिया केशवनगर को, रेहानपुरी मोहल्ले को
उसी दिन से पंतग जमाने के खिलाफ जिंदगी लड़ रही है।
जब भी इस पंतग को हवा के खिलाफ लड़ते हुए देखता हूँ
मुझे यह दुनिया की सबसे बेहतर कृति दिखाई देती है।
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कवि परिचय :

नाम -  नीतीश मिश्र 
जन्मतिथि - 01.3.1982
शिक्षा - इलाहाबाद विश्वविद्यालय
संप्रति - पत्रकार
निवास - इंदौर ( म. प्र.)
सम्पर्क - nitishmishra101@gmail.com
दूरभाष - 8889151029

(प्रस्तुति: बिजूका)

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टिप्पणियाँ:-

रेणुका:-

पहली कविता समझ नहीं पाई। दूसरी और तीसरी लेख जैसी प्रतीत हुईं। सीधे सीधे अपनी बात कहती हुईं। कविता की गहराई नहीं महसूस हुई।

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