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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

कविताएँ : भास्कर चौधरी

आइये आज पढ़ते हैं एक कवि की कुछ रचनाएँ । सभी साथी पढ़कर अपने निष्पक्ष विचार रखें।

1.  "आजमगढ़ के भीतर
कोई गाँव"

इस गाँव में
नेता कोई नहीं आता
दरअसल यहाँ झगड़ा नहीं होता कोई

यहाँ घर हैं कई ऐसे
जहाँ एक ही है
बीच वाली दीवार
हिंदू की दीवार पर
खुदी है कोई तहरीर
और मुस्लिम वाली दीवार
जो सड़क की ओर है
पर बना है शिव का त्रिशूल
मस्ज़िद का दरवाज़ा
खुलता है हिंदू की ओर
और दोनों घरों की नालियाँ
खुलती है सड़क पर
बढ़ रहा है दोनों घरों की
लड़कियों का कद
और कम पड़ने लगी है
गोबर थापने की जगह...

2. "अम्मा के हिस्से का दूध"

मेरे गाँव में
भैंस ने बच्चा जना है
सुना है
भैंस के बच्चे से
बेहद प्यार करती है अम्मा
अकसर झगड़  लेती है पिता से
कि भैंस के बच्चे को
मिलना ही चाहिए
उसके हिस्से का दूध

याद है मुझे
जब तक रहा मैं गाँव में
मेरे ही हिस्से आता रहा
अम्मा के हिस्से का दूध !!

3. "चुप"

पिता के पिता ने कहा
पिता से
चोप्प
दुबक गए पिता
किताबों की अलमारी के पीछे

पिता ने मुझसे कहा
चुप
मैंने दरवाजा खोला
बाहर निकल गया घर से
और  बाहर ही रहा
खाने के वक्त तक
घूमता रहा इधर-उधर
बेमतलब

मैंने बेटी से कहा
चुप्प
उसने पलट कर जवाब दिया !!

4.  "हँसी"

वह बच्चा
जो मेरे पड़ोस में रहता है
हँसता रहता है सारा दिन
कभी नहीं  रोता है
और कभी रोता भी है तो
हँसने जैसा लगता है
कहती है बच्चे की माँ...

सोचता हूँ
बच्चे उधर
गाज़ा पट्टी में
या फिलीस्तीन में
या यज़िदी–
इराक की पहाड़ियों में
छुपे हुए माँओं की गोद में
हँसते हैं कब ?

5."थूक"

मुंह पर थूकना
थूक कर चाटना
थूक  गुटकना
हो सकते हैं कई और मुहावरे भी
भाषा और देश की सीमाओं से परे

बेहद ज़रूरी है थूक का होना जीवन में
थूक के होने का मतलब
आदमी के शरीर में
ज़रूरत भर पानी होना है
थूक का होना
आदमी के जीवित होने का सबूत है

पर उनका क्या
जिनके मुंह से लगातार निकल रहे हैं
छीटें थूक के
फव्वारे की तरह
और जो रोज़ पनप रहे हैं
कुकुरमुत्तों की तरह
और उनका क्या रामभक्त
जो सामने बैठे हुए हैं
हज़ारों की भीड़ में
छीटों को ग्रहण करते हुए भक्तिभाव से ।

6. "आर के लक्षमन का कोट"

जब मुस्कुरा रहा है
अमेरिका
तो क्या मुस्कुरा रहा है
भारत भी

या लटका हुआ है
आम आदमी
खूँटी में टंगे
लक्षमन के कोट की तरह
उपेक्षित ....?

7.

"एक"

अल्ला पेड़ की तनों में
पत्तियों पंखुड़ियों
मकबरों में अल्ला
जगह जगह अल्ला
हर जगह अल्ला 
अल्ला की ज़रूरत हर किसी को

बच्चों के उड़ रहे चिथड़ों में अल्ला
अल्ला को प्यारे बच्चे !
बच्चों को प्यारे अल्ला !!

"दो"

यज़ीदी यहूदी
ईसाई इस्लाम
तमाम धर्म
मान्यताएँ तमाम
कोई दिन में पाँच बार नमाज़ अता फरमाए
कोई रटे सर हिला-हिलाकर
धर्म की बातें
दिन में कम से कम पाँच बार
कोई छाती से चिपकाए रहे धर्म
कोई माइक पकड़कर चीखे धरम –धरम
कोई उठा ले बंदूक
ढांप कर आधा चेहरा
दोहराए धर्म की बात कोई
और कर दे खल्लास 
मर्दों को दूसरे धर्म के और
औरतों लड़कियों और बच्चियों को
जो बलात्कार के काम आए
बची रहने दे जीवित 
भूखी नंगी
मौत से बदतर... 

8."जिजीविषा"

कहते हैं
विकट परिस्थितियों से घिरा है वह
ऐसे में मर जाना चाहिए उसे
पर वह ज़िंदा है

और वह जिसके रास्ते आसान है
परिस्थितियाँ अनुकूल
आखिरी सांसें गिन रहा है ।

परिचय :

नाम- भास्कर चौधरी
जन्मतिथि - 27/08/1969
निवास -छत्तीसगढ़                         
                                
प्रकाशन -
सौ से अधिक कविताएँ, संस्मरण, समीक्षा आदि देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं ( वागर्थ, समकालीन भारतीय साहित्य, समावर्तन, कथादेश, ज्ञानोदय, कृतिओर आदि) में प्रकाशित।

सम्मान - काव्य संकलन ‘कुछ हिस्सा तो उनका भी है’ को पटना (बिहार) का लब्ध प्रतिष्ठित अमृता प्रीतम साहित्य सम्मान देने की घोषणा की गई है।

मोबाइल : 9098400684
E-mail id: bhaskar.pakhi009@gmail.com
प्रस्तुति-बिजूका टीम

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टिप्पणियाँ:-

अर्पण कुमार:-
काव्यात्मकता का पुट कम होते हुए भी कविताएँ संप्रेषणीय हैं। राजनीति की आग में सांप्रदायिकता का 'दशानन' जलता नहीं, बल्कि चारों ओर अपना विध्वंसक खेल खेलता है। उससे बचे रहे समाज में बंधुत्व और परस्पर साहचर्य का बिगुल निरंतर बजता रहता है। पहली कविता इस तथ्य को अपने तईं पुष्ट करती है। पीढ़ियों के परिवर्तन को रेखांकित करती है 'चुप' शीर्षक कविता। विश्व के हिंसा-प्रभावित क्षेत्रों में बच्चों की चुप होती या चुप करा दी जा रही हँसी की कारुणिक और अमानवीय स्थिति पर टिप्पणी करती अंतिम कविता।

दीपक मिश्रा:-
कविताएँ एकरेखीय हो गयी हैं और लघु कथाओ सरीखी बन गयी हैं। कथ्य दमदार हैं पर कहन की वजह से कोई असर नही छोड़ पाती हैं।

मनीषा जैन :-
आज के हाहाकार वाले समय में रचनाकार की पहली कविता धार्मिक कट्टरता के विरूद्ध समन्वयात्मक कविता।  दूसरी कविता घरों में स्त्रियों को न जाने किस किस तरह के त्याग करके घर चलाने पड़ते हैं उसी तरफ इशारा है । मार्मिक कविता
तीसरी कविता बेटी के पलट कर जबाव देने में बेटी से बिना बात चुप कह देना आज की बेटी को शायद अच्छा न लगे वही पिता जो चुप कहने पर छुप जाया करते थे अलमारी के पीछे आज की स्त्री को इस तरह चुप रहना गवारा भी नहीं।
और चौथी कविता में दुनिया में अन्य स्थानों पर बच्चों पर हो रहे अत्याचारों के प्रति संवेदनशीलता । मुझे अच्छी लगी कविताएं।

राजेन्द्र श्रीवास्तव:-
जो मैं कहना चाहता था इन कविताओं को पढ़कर
और जिस रूप में कहना चाहता था
बिलकुल वही  और उसी रूप में कहा है मनीषा जी ने
मुझे भी अच्छी लगी कविताएं

पूनम:-:
आदरणीय
उपरोक्त चारो कविताएँ
ऐसी लगी जैसे कि मानव का अपना मन ।मिसाल के तौर पर
आजमगढ के भीतर कोई गांव
और हंसी ।
रचनाकार को मेरा करबद्ध निवेदन है कि आप इसी तरह के
बिम्ब लेकर काव्य सृजन कीजिएगा
काश कि कोई भयंकर भौतिकतावादी
जरा जरा सी
संवेदनशीलता को ग्रहण कर सके ।क्या पता कि किसी का जीवन दर्शन साकारात्मक हो जाये ।

प्रदीप कान्त:-
तीसरी और चौथी कविता (चुप और हंसी) मेरे जैसे पाठक को अपने मंतव्य तक नहीं पहुंचा पा रही है

बाकी कविताओ में भी कविताई की कमी है

गरिमा श्रीवास्तव:-
भास्कर जी की कविताये अच्छी हैं।थोड़ी लक्षणा व्यंजना के प्रयोग से कविताओं में बांकपन बढ़ जाता।

परमेश्वर फुंकवाल:-
कम शब्दों में असरदार बात कहती कविताएँ। भास्कर जी को बहुत बहुत बधाई।

सरिता सिंह:-
समकालीन कविता में शानदार  उपस्थिति दर्ज कराते भास्कर....बहुत ही वैचारिक कविता ...बधाई.....

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