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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल
नाज़िम हिक़मत की कविताएँ

अँग्रेज़ी से अनुवाद: अनिल जनविजय



नाजिम हिकमत 

   


सबसे ख़ूबसूरत समुद्र


अभी तक सबसे ख़ूबसूरत समुद्र
किसी ने पार नहीं किया

सबसे ख़ूबसूरत बच्चा
अभी बड़ा नहीं हुआ

सबसे ख़ूबसूरत दिन
अभी हमने देखे नहींं

और...
सबसे ख़ूबसूरत शब्द
जो मुझे कहने थे तुमसे
मैंने अभी तक कहे नहीं...


तुम्हारे बारे में सोचते हुए


तुम्हारे बारे में सोचना अच्छा लगता है,
भरोसा होता है बहुत।
ऐसा लगता है जैसे कोई ख़ूबसूरत गीत बज रहा हो
कोई ख़ूबसूरत आवाज़ गूँज रही हो ज़मीन पर...।

लेकिन अब भरोसा ही काफ़ी नहीं है मेरे लिए,
अब मैं और गीत नहीं सुनना चाहता,
मैं ख़ुद गाना चाहता हूँ।


 मेरा नशा हो तुम


मेरा नशा हो तुम
जिसे छोड़ा नहीं मैंने
हालाँकि अगर छोड़ना जानता भी मैं
तो छोड़ता नहीं कभी

मेरे सिर में दर्द है,
मेरे घुटने भरे हुए हैं चोटों के निशानों से
मैं चारों तरफ़ से कीचड़ में डूबा हूँ
मैं कोशिश कर रहा हूँ
तुम्हारे संकुचित प्रकाश की ओर बढ़ने की।


 यह दुनिया


सिर्फ़ एक दिन के लिए
यह दुनिया
चलो, बच्चों को दे दें
खेलने के लिए
आकर्षक, चमकते गुब्बारे की तरह
सितारों के बीच खेलें वे गाते हुए
चलो, यह दुनिया दे दें बच्चों को

रोटी के एक गर्म टुकड़े की तरह
एक बड़े विशाल सेब की तरह
सिर्फ़ एक दिन के लिए काफ़ी होगा
चलो, दे दें यह दुनिया बच्चों को

सिर्फ़ एक दिन के लिए
दुनिया सीख जाए दोस्ती करना
बच्चों को मिल जाए हमारे हाथों यह दुनिया
और वे लगा दें दुनिया में सनातन वृक्ष


    तुम


तुम मेरी ग़ुलामी हो और मेरी आज़ादी
शुरू गर्मी की रात में मेरा जला हुआ गोश्त हो
मेरे देश हो तुम।

बादाम से हरी आँखों में
रेशमी हरापन हो
तुम विशाल हो,
ख़ूबसूरत हो, विजयी हो।
तुम मेरा दुख हो,
जिसे अभी महसूस नहीं किया था मैंने
जिसे महसूस कर रहा हूँ मैं
ज़्यादा से ज़्यादा।


समेट वुरगुन के लिए


मैं आख़िरकार तुम्हारे शहर में था
पर बहुत देर हो गई थी मुझे, समेट
हम मिल नहीं पाए एक-दूसरे से
हमारे बीच पसर चुकी थी मौत की दूरी
तुम्हारी रिकार्ड की हुई आवाज़
मैं नहीं सुनना चाहता था, समेट
मैं देख नहीं सकता था तुम मृतकों की तस्वीरें
बिना ख़ुद मरे हुए पूरी तरह

लेकिन एक दिन आएगा
जब मैं तुम्हें तुमसे पूरी तरह अलग कर लूँगा, समेट
तुम मेरी यादों की दुनिया में प्रवेश कर जाओगी
और मैं तुम्हारी क़ब्र पर फूल चढ़ाऊँगा
और मेरी आँखों में आँसू नहीं भरे होंगे

फिर एक दिन आएगा
जब मेरे साथ भी होगा वैसा ही
जो तुम्हारे साथ हुआ, समेट


 इतवार


आज इतवार है
पहली बार मुझे ले जाया जाएगा सूरज की रोशनी में।

और पहली बार मैं जीवन में हक्का-बक्का रह जाऊँगा
कि आकाश मुझसे इतनी दूर है,
इतना नीला है वो,
और इतना विशाल।

मैं वहाँ खड़ा रहूँगा बिना हिले-डुले।
फिर मैं बड़ी श्रद्धा के साथ बैठ जाऊँगा वहाँ ज़मीन पर
और उस सफ़ेद दीवार को पढ़ूँगा।

किसे परवाह है उन लहरों की
जिनमें लिपटना चाहता हूँ मैं
मेरे संघर्ष से, आज़ादी से और इस समय मेरी पत्नी से
किसी को क्या लेना-देना
किसे फ़िक्र मेरी ज़मीन की, सूरज की और मेरी...
मैं ख़ुश हूँ, कितना ख़ुश हूँ।


 हमारी औरतों के चेहरे


मरियम ने ख़ुदा को जन्म नहीं दिया था,

मरियम ख़ुदा की माँ नहीं थी,
सब माँओं की तरह एक माँ थी वह।
मरियम ने तो बेटे को जन्म दिया था
सब बेटों की तरह एक बेटे को।

इसीलिए मरियम
इतनी ख़ूबसूरत दिखाई देती है सभी तस्वीरों में,
इसीलिए मरियम के बेटे से हमारा इतना अपनापा है,
जैसे अपने बेटों से होता है।

हमारी औरतों के चेहरे हमारे दर्दों की क़िताब हैं।
हमारे दर्द, हमारी ग़लतियाँ, और ख़ून जो हम बहाते हैं
जैसे हल से अपनी औरतों के चेहरों पर उकेरते हैं निशान।
हमारी ख़ुशियाँ झलकती हैं औरतों की आँखों में
जैसे सूरज चमकता है सुबह-सुबह तालाबों में।

हमारी कल्पनाएँ झलकती हैं उन औरतों के चेहरों पर
जिन्हें हम प्यार करते हैं।
हम उन्हें देखें या नहीं,
वे हमारे साथ होती हैं,
हमारी हक़ीक़तों और कल्पनाओं के एकदम क़रीब।





तुर्की के विश्व-प्रसिद्ध कवि नाज़िम हिक़मत का जन्म 15 जनवरी 1902 को हुआ था। लेकिन तब तुर्की ओस्मान साम्राज्य कहलाता था। फिर प्रथम विश्व-युद्ध में तुर्की की भारी हार हुई और इसके बाद मुस्तफ़ा कमाल अतातुर्क (तुर्की के राष्ट्रपिता) के नेतृत्व में तुर्की गणराज्य की स्थापना हुई। अपनी किशोरावस्था में ही नाज़िम हिक़मत सूफ़ी काव्य से बेहद प्रभावित हुए, जिसने उनके नैतिक और सौन्दर्यशास्त्रीय विचारों का निर्माण किया। बाद में वे रूस में हुई समाजवादी क्रान्ति से प्रभावित होकर 1922 में मास्को आ गए और  कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बन गए। मास्को में उन्होंने पूर्वी श्रमिक कम्युनिस्ट विश्वविद्यालय में दाख़िला ले लिया। फिर 1924 में वापिस तुर्की लौट गए और वहाँ एक पत्रकार के रूप में काम करने लगे।


1927 में वे फिर सोवियत संघ पहुँचे, जहाँ 1928 में बाकू, अज़रबैजान में उनकी पहला कविता-संग्रह ’सूरज ढालने वालों का गीत’ प्रकाशित हुई। 1928 में वे वापिस तुर्की लौट गए। इसके बाद हर साल उनका एक कविता-संग्रह प्रकाशित होने लगा। 1931 में उनके कविता संग्रह का नाम था -- गूँगा शहर। 1932 में उनका काव्य उपन्यास प्रकाशित हुआ, जिसका नाम था -- बनर्जी ने आत्महत्या क्यों की। फिर 1932 में ही नाज़िम हिक़मत ने नाटक लिखने शुरू कर दिए। उनका पहला नाटक था -- खोपड़ी (1932)। उनका दूसरा नाटक था -- लाशघर (1932)। फिर तीसरा नाटक था -- भुला दिया गया आदमी (1935)।


  तुर्की की सरकार को नाज़िम हिक़मत के कम्युनिस्ट विचार पसन्द नहीं आए और उसने उन्हें पाँच साल के लिए जेल में ठूँस दिया। इसके बाद 1935 में उनके दो कविता-संग्रह एक साथ प्रकाशित हुए। पहले संग्रह के नाम था -- शबीहें और दूसरे संग्रह का नाम था -- तारन्ता बाबू के नाम ख़त। तारन्ता बाबू उनकी पत्नी का नाम था। 1936 में नाज़िम हिक़मत की किताब आई -- जर्मन फ़ासिज्म और उसका जातिवादी सिद्धान्त। हर किताब प्रकाशित होने के साथ ही उनकी क़ैद की सज़ा बढ़ती चली गई। फिर 1938 में उनपर ’कम्युनिस्ट’ होने के लिए मुक़दमा चला और उन्हें 28 साल की क़ैद की सज़ा दी गई। लेकिन बाद में 1950 में विश्व जनमत के दबाव में 17 साल की क़ैद के बाद उन्हें जेल से रिहा कर दिया गया। जेल से बाहर आते ही उन्हें पता लगा कि सरकार उन्हें फिर से जेल में ठूँसने की साज़िश कर रही है। इसके बाद मछुआरों की एक नौका में छिपकर उन्होंने तुर्की छोड़ दिया। रोमानिया जाने एक जहाज़ ने बीच समुद्र में उनको बचाया। फिर 1951 में तुर्की ने उनकी तुर्की की नागरिकता ख़त्म कर दी।


वे सोवियत संघ आ गए और यहाँ आकर शरण ली। सोवियत संघ में उन्होंने वेरानिका तुलिकोवा नामक एक फ़िल्म-समीक्षक से विवाह कर लिया और मास्को में रहने लगे। मास्को में ही उन्होंने अपनी लम्बी कविता ’इनसानी मंज़र’ लिखी। नाज़िम हिक़मत की पटकथाओं पर मास्को में दो फ़िल्में भी बनाई गईं, जिनके नाम थे -- प्रेम में डूबा बादल (1959) और ख़ुशहाल घर (1961)। 3 जून 1963 को मास्को में नाज़िम हिक़मत का देहान्त हो गया। मास्को के नवोदेविच क़ब्रिस्तान में उनकी क़ब्र बनी हुई है, जहाँ 1985 में उनकी रूसी पत्नी के साथ यह अनुवादक भी उनको श्रद्धांजलि अर्पित करके आया था।


अनुवादक: अनिल जनविजय 


अनिल जनविजय 

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