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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

23 जनवरी, 2018

असंगघोष की कविताएं


 कवि असंगघोष 




गणेश! बताओ तो

गणेश!
तुमने दूध
क्या पिया
फासीवाद ने
मेरा दरवाजा
खटखटा दिया, और
घर में घुस आया
बताओ तो
अब तुम
क्या पीने जा रहे हो?




धर्म! तुम्हें तिलांजलि देता हूँ 

धर्म!
तुम भी एक हो
मेरे पैदा होने के बाद
जाति के साथ
चिपकने वाले।

कमबख्त जाति को
मैं नहीं त्याग सकता
यह सदियों पूर्व से
मेरे पुरखों के साथ
थोपी गई है।
यदि मैं
जातिबोधक शब्द न लगाऊँ तो
तुम्हारा घाघ पुरोधा
जासूसी कर
मेरी जाति खोज लाता है
लेकिन मैं
तुम्हें तो त्याग ही सकता हूँ
भले ही
तुम्हारा बाप बामन
घड़ियाली आँसू बहाए
लाख कहे हमारा दोष क्या है
हम बामन के घर पैदा हुए, पर
वह पीठ पीछे वार करना नहीं भूलता
तुम्हारा ठेकेदार जो है
फिर मैं
तुम्हें क्यों न छोडूँ
लो
मैं तुम्हें तिलांजलि देता हूँ।




रोको ब्राह्मण!

रोको ब्राह्मण!
यदि तुम रोक सको तो
उस हवा को जो
मुझे छूकर
तुम तक आ रही है
जिसमें मेरे द्वारा छोड़ी गई
साँस भी
घुलमिल गई है
तुम्हारा धर्म भ्रष्ट करने।

साफ कर सकते हो तो करो
नदी के उस पानी को
जिसमें नहाया है
पिता ने
पिछले गाँव में,
तो छोड़ दो
अपना यह ढकोसला
हर बहता पानी गंगा है।

रोक सको तो
रोको ब्राह्मण!
उस प्रकाश किरण को
जो तुम तक पहुँचने से पहले ही
मुझे छूकर गई है
तुम्हें अपवित्र करने।

रोक सको तो
रोको ब्राह्मण
मेरे हिस्से की धूप व चाँदनी
तुम्हारे खेत की मानिन्द
मेरे खेत में भी
समान रूप से
बरसता पानी।

तुममें हो हिम्मत तो
डालो गर्म-गर्म पिघला शीशा
मेरे कानों में
मैंने तुम्हारे ऋग्वेद की
ऋचाएँ पढ़ीं ‘औ’ सुनी हैं
रोको ब्राह्मण!
रोक सको तो।




महावीर वर्मा 



तुझे रौंदूँगा


मैंने झाँका
तेरे समाज के आइने में
वहाँ मेरा अक्श
मौजूद नहीं था
तेरी कुदृष्टि की मार से
आइना खण्ड-खण्ड विखण्डित हो
यत्र-तत्र फैला हुआ
दिखा

तूने बताया
एक बड़े टुकड़े के सामने
मेरा अक्श
मैं और तू
दोनों ही खड़े थे जहाँ

मैंने जानना चाहा तुझसे
तेरा बताया मेरा अक्श
किरचों-किरचों बिखरा
कटा-फटा धुँधलाया हुआ
क्यों है?
तू मौन रहा
अब भी मौन ओढ़े है, पर
तेरी आँख व हाथ का
इशारा बता रहा है
मेरा अक्श
तेरे निष्ठुर समाज में
धुँधलाया हुआ क्यों है
ठीक तेरे पाँवों के नीचे
इस तरह
तू सदियों से
मेरा जन्म अपने पाँवों से बता
मुझे रौंदता आया

अब समझ गया हूँ
तेरी करतूत
अब तू तैयार रह
मैं रौंदूँगा
तुझे अब अपने पैरों तले।




कहां हो ईश्‍वर !

ईश्वर!
तू है तो
है कहाँ?
स्वाद लोलुपों की जिह्वा पर
भव्य प्रसादों में बैठे
कपटी बामनों
धन्ना सेठों की तोंद में, या
सड़ाँध मारती मरी गाय की खाल में, या
मन्दिर-मन्दिर पुजाते पत्थरों
अष्टधातु की मूर्तियों,
मखमली वस्त्रों में लिपटी पोथियों,
गलाफाड़ गाते भजनों में, या
खाल पकाने की कुण्डियों के बसाते चूने में
कहाँ-कहाँ बसा है तू
अपनी तथाकथित
ज्ञानेन्द्रियाँ बन्द किए
आखिर तू है तो
है कहाँ?




खा जाओ दीमको !

दीमको!
चाट क्यों नहीं जातीं
मनुस्मृति
पचा क्यों नहीं जातीं
अन्याय की प्रतीक
रामायण
खा क्यों नहीं जातीं
वेद-पुराण
क्यों नहीं
छेद देतीं तुम
उनकी खोपड़ी
जहाँ सिर्फ
और सिर्फ
कुटिलता भरी पड़ी है।




महावीर वर्मा 


भाड़ में जाए

हमारा
पिता होना
माँ होना
बेटा होना
बेटी होना
बहु होना
कोई मायने नहीं रखता
तुम्हारे लिए
हम केवल गुलाम हैं

तुम माई हो
बाप हो
हुजूर हो
मालिक हो

मुझसे चाहते हो
कि
मैं तुम्हें कहूँ
गोड़ पडूँ महराज,
और
तुम साले
पैदा होते ही
हो जाते हो
महाराज
पंडिऽऽऽऽऽजी

भाड़ में जाएँ
साहब...
सलाम
और
तुम्हारे पाँव

मैं
इन पर
मारता हूँ कुल्हाड़ी।





मैं दूँगा माकूल जवाब


समय
माँगता है
मुझसे हिसाब

पढ़े क्यों नहीं!

नहीं है इसका जवाब
मेरे पास

तुमने अपनी वर्जनाओं से
काट ली थी मेरी जिह्वा
मेरे होंठ ही
सिल दिए थे

मेरे कानों में
पिघला हुआ शीशा भी
उड़ेल दिया था
मेरी आँखों में
गर्म सलाखें भी
तुम्हारे ही कहने पर
घुसेड़ी गईं

तुम्हारी इस करनी पर
मेरी धमनियों में
खौल रहा है, बहता लहू

समय के साथ
इसका
मैं दूँगा माकूल जवाब
मेरी जगह
पढ़ेंगे मेरे बच्चे
जरूर।






तथागत तुम क्यों मुस्कराए ?  

ओ! गांधारकला की मूर्तियो
तुम्हारे वजूद पर
सब तरफ
अब हमले होने लगे हैं
बामियान का बुद्ध
आग के गोलों की मार से
खण्ड-खण्ड हो
बिखर गया है

यह देख
मेरा लहू खौलता है
तथागत!
जिसे देखकर भी
तुम चुप हो?
तुम्हारी अहिंसा
करुणा फिर दाँव पर है
और तुम हो
कि मुस्करा रहे हो
भंते!
गांधार के बाद मथुरा
मथुरा के बाद अमरावती
और अमरावती के बाद?
पोखरण!
पोखरण के काँपते ही
तुम्हारी मुस्कराहट के साथ
खत्म होती जाएँगी
तुम्हारी शिक्षाएँ ओ’ सभ्यता?

मेरी मानो
भंते!
तुम अब बार-बार
मुस्कराना छोड़ दो
तुम्हारे पीछे
एक अकेला मैं ही नहीं
पूरा समुदाय है
वादा करो
अब इस तरह नहीं मुस्कराओगे!





समय को इतिहास लिखने दो

मुझे
समय से
कोई शिकायत नहीं है
जिनसे शिकायत रही है
उनके कान में
मखमली पैबन्द लगे हैं
इसलिए
उन तक
पहुँच पाती नहीं
मेरी आवाज।

उनकी आँखों के सामने
छाई हरियाली से
उन्हें केवल
हरा-हरा दिखता है
कहाँ दिखाई देगा
उन्हें मेरा दलन।

वे कब तक
अंधे और बहरे बने रहेंगे
यह समय ही बताएगा

आओ इस नई भौर में
महाड़ के पानी से
आचमन कर
नई स्फूर्ति के साथ
अंकुरित हो
हम व्याप जाए
इस नभ में
दारुण दुःख छोड़
करें सामना
इन आतताइयों का,

समय को
अपना
काम कर लेने दो
उसे अब हमारा भी
इतिहास लिखना है।



महावीर वर्मा 


तू मौन क्‍यों है ॽ

तुम्हारे!
तमाम तरह के हथियार
मेरे बैरी क्यों हैं?
तुम्हारी कुपित दृष्टि
मुझ पर ही मेहरबान क्यों हैं?
तुमने मेरे पुरखों का ही वध क्यों किया?
इक्कीस बार धरा से
क्षत्रियों का नाश करने वाला
वह तेरा ही पुरखा क्यों था?
और कहाँ से पैदा हुआ
बार-बार मरने के लिए क्षत्री?
कौन थे वे क्षत्री?
क्या थी उनकी वंशावली?
जिन्हें तेरे पुरखे ने मारकर
इस धरा को इक्कीस बार
क्षत्रियों रहित किया
कौन थे वे?
कैसे बार-बार पैदा होते रहे?
इस पर तू मौन क्यों है?
तेरी इस शौर्य गाथा का बखान
तेरे ही मुख से है
यह भी बता
तेरे ग्रंथों में उल्लेखित
सभी राक्षस मार कर
कहाँ दफनाए गए?

किस सत्ता के लालच में?
तेरे पुरखे ने ऐसा जघन्य कृत्य किया
इन प्रश्नों पर तू मौन क्यों है?
बोल स्याऽऽऽऽऽले बोल
कुछ तो बोल!




इज्ज़त वाली जात

मुझे
अपने भविष्य का
कोई डर नहीं है
मेहनत करना जानता हूँ
पेट भरने लायक कमा लूँगा
मुझे नहीं जानना
अपना भविष्य
तू सोच अपनी
क्या करेगा
माँग खाएगा?
कौन डालेगा
महँगा अनाज
तेरी झोली में
इसलिए कहता हूँ
पोथी-पतरा
समेट
चूतिया बनाना छोड़
कुछ काम कर
चल दरांती उठा
घास काट कर लाते हैं
बाजार में बेजेंगे,
चल आर उठा
बैलों को हाँक
खेत जोत
फसल उगाएँगे
उससे दो पैसा कमाएँगे
इसके बाद जिस दिन
तू छोड़ आए अपने घर
अपनी इज्जत वाली जात
तब मिलकर चमड़ा गलाएँगे
और जूते बनाएँगे।




वराह अवतार

वह सुअर का बच्चा
अपनी थूथनी उठाऐं
निर्बाध चलता था
भीड़ भरे रास्तों पर
लोग छिटक कर
दूर हो जाते थे
कहीं छू ना जाएँ।
उनके बस में नहीं था
इसके गले में घण्टी बांधना
इसलिए खुद ही भागते रहे
सुअर से दूर।

थूथनी उठायें
वह दोड़ता रहा
सरेआम
दौड़ते
लूटते-खाते
काफी मोटा हो गया
फिर मंथर गति से
चलने लगा
इधर-ऊधर मूँह मारता हुआ
आखिर सूअर था
नालियों-गड्डों में पड़ा
गंदगी से सराबोर हो घूमता रहा,
मोहल्ला-मोहल्ला
गाँव-गाँव
शहर भर
को
थूथनी पर उठाता
जहाँ चाहे चला जाता
उसके लिए कोई रोक नहीं थी
न ही कोई वर्जना
समय बीतते
उसके निकल आए
एक जोड़ी ढड्डे
जिसे तुम कहते हो खींसें
दाँत !
देखते-देखते खींसे
इतने बड़े हो गए
कि अपनी धूरी पर घूमना छोड़
उन पर जा टिक गई धरती
तबसे वहीं टिकी है
और यह सुअर कमबख्त!
वराह अवतार हो विष्णु का
तुम्हारें पुराणों और मंदिरों में
बिराजमान है।




मैं बनाता रहूँगा वसूले की धार

मैं
वसूला लिए
अपने हाथों छिलता हूँ
तुम्हारी गांठ
बार-बार
कि वह छिलती नही
चिकनाते हुए
बहुत गहरे पैठ गई है
उस पर किंचित खरोंचें आती है
मेरे किए वार से
हर बार
मेरे वसूले की ही धार
भोथरी हो जाती है
किन्तु मैं कतई विचलित नही हूँ
ना कभी विचलित होऊंगा
रोज लगाऊँगा
इस वसूले पर धार
तेरी गांठ
कब तक
अपनी जड़ों से बिंधी रहेगी
एक ना एक दिन
कटना ही होगा इसे
और उस दिन के इंतजार में ही
बार-बार
मैं घिसता रहूँगा वसूला
करता रहूँगा
इसकी धार
तेज ओर तेज....





तू और तेरी श्रैष्ठता 

कड़े पत्थर पर
अशोक के शिलालेख
मैनें ही खोदे
छैनी-हथोड़े से
एरण में
रूपनाथ में
सारनाथ में
केवल यहीं नहीं
हर कहीं
अशोक ही क्यों
सारे के सारे
शिलालेख
खोदते वक्त
हर जगह
मैं था
तू नहीं था
कहीं भी।
हाँ हमारे हाथ काटते समय
कुटिल मुस्कराहट के साथ
हाथों में मनुस्मृति लिए
खड़ा था तू

सारे एैतिहासिक ध्वंसावशेष
हमारे श्रम की श्रैष्ठता के साक्षी है
जिनका गाते है गुणगान
इतिहासकार
तत्कालीन आश्रयदाता
राजा-महाराजाओं का
उसमें तू कहीं श्रैष्ठ नहीं था
फिर भी
तू खुद को
श्रैष्ठतम कहता है।



महावीर वर्मा 




गीला माल 

रंग बिरंगे फूलों से लबरेज
अफीम के इन खेतों की मेढ़ां पर
खेत-सड़क के बीच बची जमीन पर
बसे बाछड़ा1 डेरों में
सड़क किनारे
दिन-रात चलते ढाबों के पीछे की
अधबनी कोठरी में
आधी रची-बसी! स्त्री
सोचती है
खुद को कब और कैसे ॽ
असमय कन्या से
स्त्री हो जाने के बारे में

रात के घने अंधेरे में
कोई खटखटाता है
अधबनी कोठरी की साँकल
जोर से पुकारता हुआ
ए कुड़ी कोई खाली हैॽ
कुड़ी कहाँ से खाली होगी
वह तो कब की चली गई है
बड़े शहरों में
अपनी आजीविका के लिए
बार बाला बनने
नाचने

जो रह गई यहीं
उन्हें बसों में आते-जाते
चढ़ते देख
तुम्हारे लौण्डे
अभी-अभी जिनकी मूंछों की
हल्की सी रेखाऐं आई है
फुसफुसाते हुए कहते हैं
गुरू !  बस में गिला माल लदा है।
उसको साफ सुनाई देता है
और उसके फलक पर
बिजली कौंधती है

क्या वह स्त्री नहीं है!
किसी की पत्नी नहीं है!
उसकी कोई भावना ही नहीं है।
लुच्चों के शब्दों में
वह हैं सिर्फ गीला मालॽ
ऐसे ही कई - कई
प्रश्नों से घिरी-बंधी
मात्र बाँछड़ा स्त्री होने से ही अभिशप्त!
वह आहत मन की गहराई से
चिल्लाती हुई कहती है
घर जा
अपनी माँ से पूछ!
कि मैं क्या हूँॽ
स्त्री ॽ
पत्नी ॽ
बहन ॽ
बेटी ॽ
या
गीला माल ॽ
जा यह तेरी मां बताएगी


1- राजस्थान-मध्यप्रदेश के सीमावर्ती इलाकां में बसी एक दलित जाति जिसमें औरतें वैश्यावृति करने को अभिशप्त है  





ईश्वर की मौत!

ईश्‍वर के पाँव में
तीर लगा
अछूत बहेलिए के
धनुष से छूटकर सीधे
और
एक अनाम अछूत के तीर से
ईश्‍वर मर गया।

एक अछूत के हाथों
बनी रस्सी से
ईश्‍वर ने
अपने पाँव में
पत्थर बांधे
जिन्हें किसी अछूत ने
खोदकर खदान में से निकाला था
और लगा दी छलांग
नदी में
आत्महत्या कर
वह भी मर गया!
अछूत की रस्सी
अछूत के पत्थर के सहारे।

दोनों ही जगह
यदि वो सचमुच
ईश्‍वर था
तो
कैसे मर गया ॽ
वह तो
अजर-अमर था!
किन्तु तेरी कुटिलता के मारे
परिणित हो जड़-पत्थर में
तुम्हारे हाथों प्राणप्रतिष्ठा पा
पुजता हुआ
वह क्यों भकोसता है
छप्पनभोग!
जबकि करोड़ों को
नसीब नहीं
एकजून की रोटी भी
यह भी उस पेटू को
दिखाई नहीं देता

अरे! वह तो
कभी का मर गया है!





पाखंडी  

तुम।
खुदवाओ इन टीलों को
अपनी भूख मिटाने
मजदूर ही खोदेंगे
इन टीलों-ढूहों में छिपी
स्वर्णिम रेत के लिए
खुदवाते रहो नदी के सारे किनारे
वहाँ से निकलेगी तथागत की कई मूर्तियाँ
उसके बाद भी इन टीलों को खोदवाते रहना
किसी दिन इन टीलों के नीचे दफ्न
अनेक मानव कंकाल निकल आएंगे बाहर
फिर पता लगाना
उनकी जात का
उनके धर्म का
कि किस जात के थे वे ॽ
कि किस धर्म के थे ॽ
वे कंकाल!
शायद मिले देखने
उन पर किसी ऐरे-गैरे देवता के
अस्थि-चिन्ह
संभव है उस देवता के भी
जिसने कभी की होगी
इस नदी में डूबकर
आत्महत्या!
फिर बांट देना
इन सारे कंकालों की अस्थियाँ
अपने धर्म भीरुओं में

इस तरह पूजा-पाठ और कमाई का
एक और स्थायी रास्ता खुल जाएगा।


परिचय 
असंगघोष
जन्म: 29 अक्टूबर  1962 को पश्चिम मध्‍य प्रदेश के कस्‍बा जावद के एक दलित परिवार में
शिक्षा:
एक वर्ष नीमच शासकीय महाविद्यालय में पढ़ाई उसके अलावा स्नातक तक की शिक्षा अपने कस्बे में ही पूरी की फिर आगे की पढ़ाई लंबे अंतराल के बाद रानी दुर्गावती विश्‍वविद्यालय जबलपुर से स्वाध्यायी छात्र के रूप में तथा  कुछ इग्नू के जबलपुर सेंटर से भी पढा, इस तरह बी.कॉम., एम.ए.(इतिहास) एम.ए.(ग्रामीण विकास), एम.बी.ए. (मानव संसाधन), पीएच.डी. की पढाई पूरी की।

प्रकाशन:
हिन्‍दी साहित्‍य की दलिता धारा में लेखन कार्य, कविता संग्रह ‘‘खामोश नही हूँ मैं’’, हम गवाही देंगे’’, ‘‘मैं दूंगा माकूल जवाब’’, ''समय को इतिहास लिखने दो'',  तथा ''हम ही हटाएंगे कोहरा''
कुछ कविताएं एवं कहानियां विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित,
 देश के कई शहरों एवं श्रीलंका, चीन व मिश्र में कविता पाठ।
'मध्‍य प्रांत में ब्रिटिश राज' एवं छठे कविता संग्रह पर संपादन कार्य जारी साथ ही 'दलित विमर्श के आलेखों' पर संपादित पुस्‍तक शीध्र प्रकाश्‍य।

संपादन: त्रैमासिक ‘‘तीसरा पक्ष’’
पुरस्कार: म.प्र.दलित साहित्य अकादमी, उज्जैन का पुरस्कार (2002)
‘‘सृजनगाथा सम्मान वर्ष 2013’’

संप्रति : बचपन से पिताजी के जूता बनाने के काम में सहयोग कर काम सीखा बाद में लगभग 10 वर्ष स्‍टेट बैंक की नौकरी की और अब शासकीय सेवा में कार्यरत।

उल्‍लैखनीय : मेरी कविताओं पर देश के कुछ शोघ छात्रों/स्‍कॉलरों द्वारा एम.फिल./पीएच.डी का कार्य
अन्‍य लेखकों के साथ शामिल कर किया गया। वर्तमान में कविताओं पर पीएच.डी का एक कार्य परभणी महाराष्‍ट्र में जारी ।

अन्‍य :-  विभिन्‍न लेखकीय एवं सामाजिक संगठनों से जुडाव,
संपर्क:- D-1, लक्ष्मी परिसर, निकट हवा बाग महिला महाविद्यालय, कटंगा, जबलपुर (म.प्र.)
पिनकोड 482 001,

1 टिप्पणी:

  1. प्रतिरोध से प्रतिशोध की ओर जाती बेधडक अभिव्यक्ति | कुछ कवितायेँ नई और प्रभावशाली हैं कुछ 'ईश्वर की मौत' से पुनः पुनः बधाई घोष जी

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