image

सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

20 सितंबर, 2018

मैं क्‍यों लिखता हूं

संजीव बख्शी

संजीव बख्शी 


मैं अपनी बात मेरे उपन्‍यास भूलन कांदा और उससे जुड़ी बातों से शुरू कर रहा हूं। इस उपन्‍यास को पढ़ कर कई पाठकों ने मुझसे प्रश्‍न किया, अभी भी करते हैं कि आपके उपन्‍यास में सारे कैरेक्‍टर  पाजीटिव है कोई निगेटिव कैरेक्‍टर नहीं है। फिर भूलन कांदा का जो गांव है क्‍या छत्‍तीसगढ़ में ऐसा गांव हैॽ ऐसा गांव जहां निगेटिविटी नहीं है।

मैं क्‍यों लिखता हूं इसका उत्‍तर इन्‍हीं बातों में छिपा हुआ है। मैं प्रशासनिक अधिकारी के पद पर छत्‍तीसगढ़ में कुछ जिलों तहसीलों अनुविभागों में पदस्‍थ रहा। ज्‍यादातर आदिवासी इलाकों में मुझे कार्य करने का मौका मिला। सबसे ज्‍यादा बस्‍तर जिला में रहा लगभग 14 बरस। गरियाबंद के साल वनों के बीच के जंगलों में भी भ्रमण करने और रात्रि विश्राम करने का मौका लगा। कबीरधाम जिले के बैगा इलाके में एक बैगा के घर में अपने दल के साथ सात दिन रूक कर इलाके के काम धाम निपटाए। इन सबके बीच रह कर और नजदीक से देख कर मैंने पाजीटिविटी को उनके अंदर तक पाया है। कुछ गांव भी तब देखे थे ऐसे ही जैसे भूलन कांदा का गांव। यदि कमी बेशी रही भी होगी तो वह मेरे देखने और समझने में नहीं आई। जाहिर है ये सब बातें मेरे भीतर कहीं समा गई थी। लिखने को प्रेरित करती रही। कविताएं लिखने लगा और देखते ही देखते कई कविताएं पत्रिकाओं में आने लगी। मैं उत्‍साहित हुआ पर यह शुरूआती दौर था साफ साफ तय नहीं था मेरे भीतर कि मैं लिखता क्‍यों हूं। यह अनुत्‍तरित सा रहा। कभी कभी मैं ही अपने आप से प्रश्‍न करता कि मैं क्‍यों लिखता हूं। कोई उत्‍तर न पाकर खुद ही आधा अधूरा सा हो जाता। कविताओं को पढ़ कर लोग मुझे कहते या तारीफ में कहते कि पदुम लाल पुन्‍ना लाल बख्‍शी जी के परिवार से हैं आपमें उनका कहीं न कहीं से प्रभाव आया है यानी खानदानी जैसा कुछ। पर मैं इससे आश्‍वस्‍त नहीं था यह कोई उत्‍तर नहीं था कि मैं क्‍यों लिखता हूं। सच तो यह है कि मैं दिग्विजय महाविद्यालय राजनांदगांव में गणित में एम एस सी कर रहा था तो अक्‍सर कैंपस में स्थित प्रोफेसर क्‍वार्टर में चला जाया करता था जहां मास्‍टर जी यानी बख्‍शी जी रहते थे। उनके साथ उठना बैठना होता वे अक्‍सर हमसे कहते ‘’भैया तुमन होशियार हो गणित में’’। उनसे बताया भी नहीं कि डायरी में मैंने कुछ कविताएं लिखी है। शायद उन कविताओं को इस योग्‍य न समझा हो। गणित के होशियार ही बने रहे उनके सामने। छिटपुट कविताएं लिखते रहा पर छपने या किसी को दिखाने के लिए नहीं। काफी बाद में नौकरी में आने के बाद और बस्‍तर में रहते हुए सोचा गया कि इन्‍हें छपने के लिए भेजा जाए। धूसर रंगों के या दबे हुए रंगों को देखकर मुझे उनके बीच कोई चटख रंग या पीला या आसमानी की कल्‍पना करता तो अच्‍छा लगता इसी तरह से सब ओर अंधेरापन को देख कर लगता कि मैं कुछ उजला लिख दूं। शायद इससे कुछ अंधेरा दूर होने का या कुछ न कुछ उजले का अहसास तो बचा रहेगा। जो घट रहा है वही लिखता रहा तो सब ओर गलत ही गलत दिखने लगता है। फिर यही लगता कि क्‍या कुछ भी सही नहीं है। यदि कहीं कुछ सही भी है तो उसे लिखा जाए। क्‍यों लिखता हूं कुछ कुछ स्‍पष्‍ट होने लगा मेरे भीतर।





सरकारी नौकरियों में जो घूमना हुआ वही घूमना हुआ। वही मेरी यात्राएं हैं। लिखने पढ़ने के लिए लोग यात्राएं बहुत करते हैं उन्‍हें जानकारियां भी मिलती है और वे खुलते भी हैं पर मेरे साथ ऐसा नहीं हुआ। शुरू से बहुत जरूरी होने पर ही मैं यात्राओं में निकला। अपना घर, पास–पड़ोस और अपना शहर सबसे अच्‍छा लगा मुझे। मेरे जन्‍म स्‍थान को लेकर मेरा दूसरा उपन्‍यास है खैरागढ़ नांदगांव। संस्‍मरण भी है खैरागढ़ में कट चाय और डबलपान। मुझे आसपास देखना सबसे अच्‍छा लगता है। आसपास को ही लिखता हूं। कोशिश करता हूं किे उन्‍हें पूरा का पूरा लिख सकूं। उनके बीच जो अच्‍छा है उसे ढ़ूंढ़ू और लिखूं। सब तक पहुचाऊं। अंधेरे में टार्च लेकर जाने की तरह मैं कुछ लिख पाऊं तो लगेगा कि मैं सफल हो गया। अब मैं क्‍यों लिखता हूं इसका कुछ कुछ उत्‍तर साफ हुआ है पर यही नहीं है कि मैं क्‍यों लिखता हूं। अपने आप से पूछता हूं यह प्रश्‍न तो अनुत्‍तरित ही पाता हूं अपने आपको।लगता है काफी कुछ बचा हुआ है लिखने के लिए। अंधेरा बढ़ रहा है उसका घेरा भी बढ़ रहा है इसका अहसास भी जरूरी है लेखन में और टार्च की रोशनी भी।





सबके साथ लिखने की अलग स्थिति होती है। किसी का रोजाना लिखने का समय तय होता है वे नियमित लेखन किया करते हैं। ऐसा मैं किसी को देखता हूं तो ईर्ष्या होने लगती है। मेरे साथ ऐसा बिलकुल भी नहीं रहा। जब कोई कविता,कहानी या उपन्‍यास पर काम चल रहा हो तो दिन रात उस पर लगा रहता हूं। रात देर से सोता हूं। मेरा देर से सोने का अर्थ होता है रात को अधिकतम बारह बजे। वैसे रोजाना मैं दस से साढ़े दस के बीच सोने चला जाता हूं। लिखने का समय दिन में ज्‍यादा हुआ करता है। सुबह शाम भी लिखने बैठ जाता हूं। काम पूरा हुआ उसके बाद सारा कुछ स्‍थगित सा हो जाता है। कई कई दिन कुछ भी लिखना नहीं हो पाता जब तक कोई दबाव न हो। ऐसा ही बिलकुल खाली समय चल रहा था। क्रिकेट मैच,टीवी के कार्यक्रमों फेस बुक आदि के साथ पूरा समय निकल रहा था। मेरी बात दूरभाष से वरिष्‍ठ कवि मलय जी से हुई। मलय जी राजनांदगांव में दिग्विजय महाविद्यालय में हिंदी के प्राध्‍यापक रह चुके हैं जहां से मैंने एम एस सी की पढ़ाई की। इन्‍हीं संदर्भों में और रचनाओं को लेकर उनसे मेरी समय समय पर बात होते रहती है। वे मेरी रचनाओं पर अपनी सहमति या असहमति स्‍पष्‍ट रूप से व्‍यक्‍त करते हैं। मैं बिलकुल कविताएं नहीं लिख पा रहा था, मैंने मलय जी को बताया कि मैं कई दिनों से कविताएं नहीं लिखा पा रहा हूं। इसका कारण यह भी हो सकता है कि इस बीच गद्य पर काम चलता रहा और कविता लेखन स्‍थगित सी रही। दो उपन्‍यास और एक संस्‍मरण की किताबें इस बीच आ गई। अब मैं कविता लिखना चाहता था पर लिख नहीं पा रहा था। मलय जी ने इसका बड़ा ही अच्‍छा जवाब दिया कि कविता स्‍वांस लेने की तरह लिखना चाहिए। स्‍वांस जैसे बिना रूके लगातार लेते हैं वैसा ही कविता लेखन करते रहो। कविता लिख लेने के बाद देखो कि कौन सी कविता ऐसी है कि वह ठीक है उन्‍हें अलग कर लें, कुछ कविताओं में संभावना दिखती है कि और काम करने से वह ठीक कविता बन जाएगी, उन्‍हें भी अलग कर लें। अब बचत की सारी कविताओं को कम्‍प्‍यूटर से हटा दें।






लिखना स्‍वांस लेने की तरह जारी रखें। मैंने मलय जी की बातें ध्‍यान से सुनी और कुछ दिनों तक नियमित कुछ न कुछ लिखता रहा। इससे हुआ यह कि एक कविता संग्रह के लिए कविताएं तैयार हो गई। प्रकाशक को कविताएं भेजने के बाद मैं फिर खाली खाली हो गया। मलय जी की बातें भूल गया। बाद में छिटपुट एक दो कहानियां लिख डाली पर कविता फिर एक सिरे से गायब। कुछ लोग कहते हैं कि ऐसा अवकाश भी जरूरी होता है। लंबे अवकाश के बाद लिखने से अपना खुद का बना हुआ फार्म तोड़ कर कुछ और लेखन की संभावना बन जाती है। इसी उम्‍मीद से मैं अवकाश का समय भी अपने भीतर व्‍यवस्थित कर लेता हूं पर अवकाश का समय ज्‍यादा लंबा होने से एक तरह से छटपटाहट होती है और अपने आपको कुछ लिखने के लिए ऐसे समय में ढकेलने लगता हूं। जब तक कोई खास प्रोजेक्‍ट दिमाग में न हो कुछ लिखना नहीं होता और किसी प्रोजेक्‍ट के दिमाग में आने का कोई समय काल या मुहूर्त नहीं हुआ करता। यह दिमाग में कभी भी आ जाता है। रात को सोने के लिए बिस्‍तर पर चले गए है,बिजली बुझ गई है और आ गया कुछ दिमाग में, आ गई कोई पंक्ति। यदि तुरंत उठ कर बिजली जला कर कागज कलम लेकर उसे लिख न लिया जाए तो चैन नहीं पड़ता। अन्‍यथा दूसरे दिन सब कुछ भूल जाने की प्रबल संभावना रहती है। मैं क्‍यों लिखता हूं के बारे में अब क्‍या कहूं कभी तो लिखने के लिए ढकेला जाता हूं और कभी सब कुछ छोड़ कर दूसरी दिनचर्या में लग जाता हूं।
संजीव बख्‍शी