image

सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल
डायरी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
डायरी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

05 मार्च, 2016

कविता गुप्ता के डायरी के दो पन्ने

आज कविता गुप्ता की कहानी "डायरी का पन्ना" आपके समक्ष रख रहे हैं।  कृपया पढ़कर अपनी निष्पक्ष प्रतिक्रिया दीजिएगा जिससे रचनाकार को अपनी रचना तराशने में मदद मिले।

डायरी का पन्ना
------------

शाम हो गयी उर्मी ( बेटी ) के घर में उसके कमरे की खिड़की का पर्दा हटा कर शाम को देख रही हूँ । अंधेरे का डेरा क़ब्ज़ा जमाता जा रहा हैं । मुझे वो नन्ही जान झटपटाती हुई दिख रही हैं । अब सोच रही हूँ की कितनी बेवक़ूफ़ हूँ उसका फ़ोन नम्बर तो क्या नाम तक भी नहीं पूछा । मेरे बाज़ू वाली सीट पर आकर बैठी बहुत बेचैन सी फ़ोन को उलट- पलट रही थी । उसने एक मुस्कान परोसी मैंने भी जवाब में होंठ फैला दिये ।

मेरे हाथ में अपने जैसा सेल फ़ोन देख कर "उसने पूछा आपके पास चार्जर हैं।" उसके मुँह से बासी मुँह की गंध आई । शायद उसने बड़े लम्बे समय से ना कुछ खाया ही था ना कुछ पीया ही था। शायद कुछ बोली भी नहीं थी। 
माफ़ी  माँगते हुए मैंने उसे बताया की यदि होता भी तो इस जहाज़ में फ़ोन चार्ज करने की सुविधा नहीं हैं । मैंने उसे कैबिन क्रू से सम्पर्क करने की सलाह दी । वो उठ कर गयी और आईं थोड़ी देर में ही उसने बैटरी बैंक ख़रीद लिया । 
"तुम मुंबई से हो " मैंने पूछा 
"न्यूजीलैंड से " उसने जवाब दिया 
"दिल्ली में कौन रहता हैं " मैंने पूछा
"कोई नहीं दरअसल मैं सीधा न्यूजीलैंड से आ रही हुँ । मुझे दिल्ली की टिकट नहीं मिली थी इसीलिए जल्दी में मुंबई की टिकट ली ।" उसने कहा लेकिन अचानक उसकी आँखें नम हो गयी।
"दिल्ली से रूद्रपुर पहुँचने में कितना समय लगता हैं ।" उसने अचानक पूछा लेकिन उसके होंठ कुछ विक्रत तरीक़े से मुड़े । जैसे कुछ कहना भी चाहते हो और नहीं भी । 
"मुझे ठीक से मालूम नहीं लेकिन शायद चार घंटे से कम तो नहीं लगेगें।" मैंने जवाब दिया

"मैं अपने बोयफ़्रेंड को खोजने भारत आई हूँ।" इतना कहते ही उसकी आँखों व होठों ने उसका साथ देना बंद कर दिया। आँसू उसकी नीली आँखों से झरने लगे। 
ख़ुद को सम्भालने की कोशिश करते हुए वो बोली "रिलीजन प्रॉब्लम हैं।" और थूक सटकते हुए एक लम्बा सा साँस भरा। लम्बे समय से कुछ भी नहीं खाने-पीने की वज़ह से उसके होंठ सूख कर पपडाएँ हुए थे।

मैं सन्न थी। मेरा हाथ ख़ुद ब ख़ुद उसके कंधे पर पहुँच गया । उफ़ ! इस तेईस चौबीस साल की लड़की का दिवनापन । अब मेरे पास कोई शब्द नहीं थे ना ही मैं कुछ भी सोच पा रही थी । 
मगर वो अब कुछ और भी शायद बहुत कुछ कहना चाहती थी " वो वर्क वीज़ा पर था । उसका वीज़ा ख़त्म हुआ तो उसकी फ़ैमिली ने उसे वापस बुला लिया । बहुत दिनों से कह रहा हैं की उसकी फ़ैमिली इस सम्बंध के लिए तैयार नहीं हैं।" उसने कहा साथ ही आँसू पौछे और नाक टीशु पेपर में सिड़की। 
"मेरी फ़ैमिली गुजरात ओरिजन से हैं। मैं अपना रिलीजन बदलने के लिए भी तैयार हूँ।" कह कर वो अपनी कलाई पर गुदे शोइब को सहलाने लगी उसकी ऊँगलियों पर भी एस एस लिखा था।अपने पपडाये होंठों की सूखी खाल वो दाँतों से कुतरने लगी। 
"मेरी फ़ैमिली भी तैयार नहीं हैं लेकिन मैं उन्हें मना लूँगी।" उसके स्वर में विश्वाश था । 
"मैंने कल ही ममा को कहा की मैं उसे खोजने इंडिया जा रही हूँ।" उसने बताया। वो ना जाने कब से किसी उस शक्स को ढूँढ रही थी जिससे वो कुछ बातें कह सके । अपने ही दाँतों से अपने ही होंठों की खाल कुतरते हुये उसके होंठों पर उसका अपना ख़ून झलक़ आया था।लेकिन मेरे दिमाग ने बिलकुल ही काम करना बन्द कर दिया । मैं तो बस यह सोच रही थी की अब बस ये छली ना जाये दुनिया के हाथों । ये उस इबादत के दौर से गुज़र रही हैं जब इसके ख़ुदा को इससे छीनने की कोशिश कर रही है ये दुनिया। पर ये पागल उसके पीछे देश दुनिया पहाड़ समुद्र लांघती चली आ रही हैं ।

" हम लोगों ने शादी करके मेरे पासपोर्ट पर घर लेने का प्लान किया था । लेकिन उसके परिवार ने उसे कहीं और भेज दिया हैं वो आजकल मेरे टच में बिलकुल नहीं हैं । ईवेन फ़ेस बुक अकाउंट भी डीऐक्टिवेट कर दिया हैं । वहत्सप्प भी बंद फ़ोन भी नहीं आन्सर करता हैं ।" अब तक वो अपने आँसुओं पर क़ाबू कर चूकी थी । उसे यह अहसास हो चुका था की उसे लोग देखने लगे हैं ।

मेरे दिमाग़ में पूछने के लिये यह प्रश्न भी नहीं आ पाया की वो उसे कैसे खोजेगी । अब तक उसके फ़ोन में थोड़ी जान आ गई थी । अचानक कोई मेसिज आने का संकेत मिला । उसने फ़ोन उठा कर पढ़ा। तुरंत कॉल किया। बहुत धीमी आवाज़ में उसने बातें करी । इतनी धीमी की स्पष्ट कुछ समझ नहीं आ रहा था ।

फ़ोन काटने के बाद वो फिर बोली " "उसके फ़ादर से टच में हूँ । उनसे ही मिल कर उसे वापस न्यूज़ीलैंड ले जाने आयी हूँ।"

"मेरे पेरेंट्स का कहना की उसकी उम्र और मेरी उम्र में चार साल का अंतर भी हैं वो मुझसे चार साल छोटा हैं। इसीलिये अभी पूरी तरह से मैंचयोर नहीं हैं।मैं जानती हूँ यह बात बट वी आर इन लव।"उसने कहा। पर मैं उसकी प्रेम पगी नीली आँखें ही देखे जा रही थी।

मेरा दिमाग़ अभी तक सन्न हैं । उसकी दीवानगी के लिये। सच में प्रेम की कोई परिभाषा नहीं हैं । मीरा गली गली भटक रही हैं । एक ही नाम रटते रटते ये चली आई हैं पहाड़ों में भटकने।

जहाज़ से उतरते वक़्त मुझे अचानक ख़याल आया की ये बावरी तो इश्क़ में हैं इसे अपनी सुरक्षा का कोई ख़्याल नहीं।मेरा दिल चाहा की इसके साथ इसके प्यार की खोज में चली चलूँ। पता नहीं कहाँ कहाँ भटकेगी इस मेरे असुरक्षित देश में । परन्तु फिर वही जिस काम के लिये मैं दिल्ली जा रही हूँ उससे भी मुँह नहीं मोड़ सकती । 
कुछ सोचते हुये मैंने कहा " मैं एक सलाह देना चाहती हूँ उसके घर सीधे मत जाना। उसके फ़ादर को किसी पब्लिक प्लेस पर बुला लेना । जो भी डिसिज़न होना हैं,हो ही जाएगा। भारत इतना सुरक्षित भी नहीं की तुम इस तरह किसी के घर अकेली चली जाओ।" 
"आप सही कह रही हैं ।" उसने कह तो दिया मगर उसकी आँखों में साफ़ दिख रहा था की अभी वो कुछ भी कर गुज़रने को तैयार है।

अब इस ढलती शाम को देख कर सोच रही हूँ की क्या किया मैंने ? उसका फ़ोन नम्बर यदि ले लिया होता तो कम से कम अब पूछ तो लिया होता की सब ठीक है। फिर सोच रही हूँ की अच्छा हुआ नहीं लिया उसका नम्बर यदि वो कहीं किसी कोने में बैठी रो रही होगी तो ? मैंने तो उसका नाम भी नहीं पूछा।फिर दिल ही दिल दुआ करती हूँ की वो रो तो रही हो मगर  ख़ुशी के मारे रो रही हो वो बे नाम दीवानी।
०००

इसी पोस्ट में कविता जी की डायरी का एक पन्ना और  प्रस्तुत है..
आपकी महत्त्वपूर्ण टीप्पणी  इन पन्नों
को और बेहतरी प्रदान करेगी.
  ०००
             
आन्दोलन

उन लोग कई दिनों से शांति पूर्ण धरने पर बैठे थे। उनकी ही संस्था के अन्य साथी शहर के अलग अलग स्थानों पर अलग अलग ग्रुप में धरने पर थे। जिन लोगों ने ये धरने प्रदर्शन शुरू किये उन्हें कोई जानता तक नहीं था। लेकिन धीरे धीरे लोगों को उनकी बातें सही लगने लगी। लोग उनसे जुड़ते गये।

कलाकार,लेखक,कवि,चित्रकार,समाज सेवक और अनेक बुद्धिजीवी कहलाया जाना पसंद करने वाले लोग भी शामिल होते गये।

कई रातों से बैठे थे।उनके साथ कुछ लोग जुड़ रहे थे। कुछ लोग छूट भी रहे थे।

धरना जिसे अब आंदोलन का नाम दिया जा रहा था जिसने शुरू किया वो अगुआ अब उनका नेता बन चूका था। उसकी आवाज की ठसक भी बढ़ती जा रही थी। खुद को स्थापित होते देख उसने कार्यशैली में थोडा बदलाव लाने की सोची।लोगों का उत्साह  बनाये रखने के लिये उसने हर धरने प्रदर्शन पर एक एक रात बिताने का फैसला किया।

उस रात टपरे वाले चौक की बारी थी। रात भर  कुत्ते भौकते रहें। उसके सोने के उपक्रम में कभी कभी कोई अड़ियल कुत्ता उसके मुँह की बोतलीय गन्ध लेने के लियें उसके मुँह से मुँह सटा देता। वो सो न सका। कचरे के ढेर पर कव्वे भी रात में भी काव काँव करते रहे। मच्छरों से उसे कोई खास परेशानी नहीं थी। उनकी उसे आदत रही थी हमेशा से। कुत्ते को उसने कई बार धिक् धिक् करते हुए भगाया। ब्रह्म महूरत के लगभग साढ़े चार बजे थे। कव्वों की काँव काँव और कुत्तों की बार बार की घुसपैठ से झल्लाया वो तैश में आ गया। उसने अंटी से पिस्तौल निकली। कुत्ते पर दागी। कुत्ता काय काय भी नहीं कर सका।

कुछ ही दिनों में उसके शांति पूर्ण आंदोलन में लोगों की संख्या बहुत बढ़ गयी।
००० कविता गुप्ता
------------------------------
टिप्पणियाँ:-

रेणुका:-
Kahani ka shuruati plot padhke ek Hindi film "pyar to hona hi tha" yaad aati hai...plot almost same..isliye    kuch nayapan nahi laga.

प्रगति कौशिक:-
Sach kaha aapne Renuka ji kahani me kuch maza nahi aaya. Plot to purana tha hi andaz me bhi kuch nayapan nahi hai.

23 नवंबर, 2015

डायरी के कुछ अंश : शालिनी बाजपेयी

आज पढ़ते हैं समूह के साथी की डायरी के कुछ अंश। अच्छा लगे तो रचनाकार का हौसला जरूर बढ़ाये।

भैय्या जैसे ही दूब को बकरे की गर्दन पर रखते हम लड़कियां मेंहssss...मेंहssss...कर मिमियातीं

हमारे यहां हर व्रत-त्योहार पूरे विधि विधान और परंपरागत रूप से मानाया जाता है। मझे तिल-गुड़ के लड्डू वाला वो व्रत-त्योहार आज भी याद आता है। सकट चौथ। मम्मी इस दिन व्रत रखती थी लेकिन हम बच्चों के लिए ऐसा हर कर्मकाण्डी दिन किसी त्योहार से कम नहीं होता था। और मेरी मम्मी, चाची और ताई जी ही नहीं मुहल्ले की सभी ऐसी शादीशुदा औरतें जो 'पुत्रवती' थीं वो सब इस दिन व्रत रखती थी। शाम होते ही एक बड़ी सी कढ़ाई चूल्हे पर रखकर उसमें गुड़ गरम किया जाता। काले तिल भूनकर उससे डाले जाते। इसके बाद हम सब बैठकर लड्डू बनाते। कोई गोल बनाता, कोई अंडाकार। मेरा छोटा चचेरा भाई बहुत खेल करता था, वो चौकोर लड्डू बनाता और हम सबको दिखाता। मम्मी, चाची सब उसे डांटतीं..... भागो यहां से तुम लड्डू ख़राब कर रहे हो....और वो सबको मुंह चिढ़ाता अपना लड्डू ले कर भाग जाता। वहां उसे ही बैठने की इजाज़त मिलती, जिसकी हथेली लड्डू को गोल बना पाती।

लड्डू बनाने के साथ ही एक बड़ी सी पीतल की परात में तिल-गुड़ से बकरे की आकृति बनायी जाती। उस परात में उतने हो बकरे बनाए जाते जितने घर में लड़के होते। इसके बाद उसे दूर रख दिया जाता, ताकि कोई बच्चा गंदे हाथों से छूकर उसे 'अपवित्र' न कर दे। पूजा से पहले किसी को भी लड्डू खाने की इजाज़त नहीं होती थी।
घंटों ऐसे ही लड्डू बनाने के बाद फिर पूजा की तैयारी होती। चौक रखने के बाद लकड़ी के पाटे पर सकट चौथ बनाई जाती। मम्मी-चाची-ताई जी पूजा करती और हम लोग दूर से देखते।

पूजा करने के बाद समय आता उन तिल-गुड़ के बकरों को काटने का जो परात में बनाए गए थे। फिर मम्मी-चाची बकरे के सर की पूजा करतीं, उस पर चन्दन लगातीं। इसके बाद घर के लड़कों को बुलाया जाता। और वो सब राजकुमारों की तरह ऐंठते हुए आते। मम्मी उन्हें दूब (घास) देतीं। वे दूब को परात में जमे बकरे की गर्दन पर रखते। जैसे ही दूब बकरे की गर्दन पर रखी जाती, हम लड़कियां चिल्लातीं मेंहssss...मेंहssss...मेंहssss....। बारी-बारी से हर लड़का ऐसे ही बकरे की गर्दन पर दूब रखता और हम लड़कियां हर बार ऐसे ही मिमियातीं। इसके बाद बकरे का सर पूजा में चढ़ाया जाता और बाकी का उसका शरीर लड़कों को ही खाने को मिलता।

मुझे याद है दीपावाली के अगले दिन दादी अलसुबह ही घर में सूप बजाकर मम्मी-चाची-ताई जी को उठा देतीं थी। फिर वे सब नहाने के बाद रात को भिगोए गए नए चावल सिल पर पीसतीं। पीसने के बाद एक तरफ चावल की चिड़िया बनाई जाती, तो दूसरी तरफ गोबर से बने गोबर्धन रखे जाते। चिड़िया बनाने के बाद उसे भाप पर पकाया जाता। घर की हर स्त्री के लिए एक-एक चिड़िया बनानी होती थी। पकने के बाद चिड़िया को लाकर गोबर्धन की पूजा होती। उसके बाद चिड़िया के सर पर चन्दन लगाकर उसकी भी पूजा होती।

चिड़िया को पूजने के बाद मम्मी, चाची और ताई जी उस चिड़िया का सर तोड़कर पैर के अंगूठे के नीचे दबा लेतीं। इसके बाद में बिना बोले चीनी के खिलौने के साथ चिड़िया का बाकी का शरीर खातीं। हम लोग पास में बैठकर उन्हें हंसाने की खूब कोशिश करते, बोलने के लिए उकसाते, वो हमें आंखें दिखाती लेकिन एक शब्द नहीं बोलतीं। एकदम मौन रहकर पूरी चिड़िया खातीं। चिड़िया खाने के बाद वे पैर के अंगूठे से उसका सर निकालतीं और अपने सर के चारों ओर उसे घुमाकर छत पर फेंक देतीं। ...फिर हम लोगों को डांटना शुरू करतीं और हम बच्चा पार्टी वहां से फुर्र हो जाते।

मैं हमेशा सोचती थी कि जब हमारे घर में मांस-मछली का नाम लेना भी किसी अपराध से कम नहीं तो फिर पूजा में ये बकरा-चिड़िया बना कर उन्हे प्रतीकात्मक रूप से मारने और उन्हें खाने की रस्में क्यों होती हैं? जब मैं दादाजी से पूछती कि बाबा, भैय्या लोग बकरे को ऐसा क्यों करते हैं जैसे काट रहे हों जबकि हम लोग तो बकरा खाते ही नहीं और हम लड़कियों से मेंहssss....मेंहssss... करने को क्यों कहा जाता है। तब मुझे हर बार यही जवाब मिलता, अरे पगली, ये तो पूजा है....ये कोई बकरा थोड़े है, ये तो तिल-गुड़ का लड्डू ....,...तुम भी सीखो मम्मी कैसे करती हैं।

मेरे दादाजी संस्कृत के विद्वान थे। वे मुझे बहलाते थे या उनके पास मेरे सवालों के जवाब नहीं थे मुझे नहीं पता। लेकिन आज जब सकट चौथ और गोवर्धन पूजा के बारे में सोचती हूं तो लगता है इन प्रतीकों का कुछ तो अर्थ होगा। संभव है किसी काल में बकरे और पक्षियों की बली की प्रथा रही हो जो समाप्त हो गयी हो और ये प्रतीकात्मकता उसका अवशेष हो। अन्यथा मुझे कोई और कारण नहीं समझ आता कि व्रत-पूजा आदि में प्रतीक के रूप में भी गुड़-तिल के बकरे की आकृति बना दूब को उसकी गर्दन पर रखना, जैसे बकरे की गर्दन काट रहे हों, हमारा मेंहsss...मेंहsss... की आवाज निकालना, चावल से बनी चिड़िया की गर्दन मरोड़ना आदि का क्या अर्थ हो सकता है।

हमारे पूर्वज मांस-भोजी थे। यज्ञादि में पशु बलि भी दी जाती थी। इन बातों से इंकार नहीं किया जा सकता। हमारे ही धर्मशास्त्रों में मांसाहार और पशुबलि के संबंध में नियम दिए गए है। ये भी सच है कि समय के साथ हिन्दुओं में मांसाहार कम हुआ और पशुबलि में भी कमी आयी। जो प्रथाएं धार्मिक कर्मकाण्डों के साथ जुड़ी थीं, वे प्रतीक के रूप में आज भी विद्यमान हैं।

हमारे घर में मांस, मछली, अण्डे का नाम लेना मना है। पाप उस घर का पानी भी नहीं पीते जहां मांस, मछली और अण्डा पकाया जाता हो। हमारी बुआ ऐसी दुकान से कोई सामान नहीं लेती हैं, जहां पर अण्डा बिकता हो। वे ये बात मानने को तैयार नहीं होंगे कि उनके पूर्वज मांस भोजी थे। व्रत-पूजा आदि में हम आज भी कुछ ऐसी रस्मों का पालन करते है जो शायद इसी ओर इशारा करती हैं।
-----------------------------------
टिप्पणियाँ:-

निधि जैन :-:
तो क्या कहना चाहती हैं लेखिका
कि मांसाहार को पाप मानना गलत है?
अगर भूतकाल में हम कोई गलती करते रहे तो उसे आज भी जारी रखें
या जिस बात की आवश्यकता भूतकाल में थी उसकी आवश्यकता न होने पर भी उसे ही जारी रखें?

सुवर्णा :-
मेरे ख्याल से नहीं। यहाँ प्रतीकों के इस्तेमाल की चर्चा बस हुई है। मैंने और भी कई घरों में देखा है कि हलवे को जानवर की शक्ल देकर बलि को प्रतिस्थापित किया जाता है। मुमकिन है उन घरों में कभी पहले प्रथा रही हो बलि देने की जिसे महज़ प्रतीक के तौर पर रस्म अदायगी कर ली जाती है।

ब्रजेश कानूनगो:-
वो कौनसा भय है जिसके कारण छोड़ दी गयी बांते किसी और रूप में जारी रखना जरूरी  लगता  है?

जैन :-
कोई भी बात और जब वो आस्था से जुडी हो एकदम से छोड़ना कठिन होता है

खाते तो हमारे पूर्वज भी रहे ही होंगे

पर जैनियों में अब इस तरह का कहीं कोई विधान नही दीखता

इवन नारियल तक नही फोड़ा जाता बलि के नाम पर

शायद इसलिए भी कि जैन पंथ में अहिंसा मूलभूत रही

और जगह अहिंसा पूर्ण रूप से नहीं अपनाई गई?

सुवर्णा :-
जी मुझे भी यही लगता है। कि यह अंतर्मन का भय ही है कि लोग छोड़ नहीं पाते तो मोड़ लेते हैं और प्रतीकों का सहारा लिया जाता है। जैन धर्म नया है और अहिंसा उसका मूल रहा है इसलिए शायद वहाँ ऐसा कुछ नहीं मिलता। हाँलांकि हमारे घरों में भी ऐसा कुछ नहीं मिलता.....

ब्रजेश कानूनगो:-
हम तो दशहरे पर बिना भय के गिलकी के पकौड़े खाते हैं। न जाने कौनसी प्रथा का परिवर्तित रूप है।

प्रज्ञा :-
ये लेख उन धार्मिक रिवाज़ों की ओर ध्यान दिलाता हुआ बलि संदर्भ को सामने लाता है। वेदों में ब्राह्मणों के मांस भक्षण का उल्लेख है। भारतेंदु का नाटक पढ़ना बेहद ज़रूरी
वैदिक हिंसा हिंसा न भवति
जहाँ अग्नि में खूब मांस पकाया जा रहा है। ये प्रतीक आज भी धर्म और हिंसा के समीकरण की पुष्टि तो कर ही रहे हैं । वैश्विक संदर्भों में देखिये धर्म का अंधानुकरण और रूढ़िवादिता कितनी जघन्य हत्याओं की ज़िम्मेदार है। कितने लोग इस अग्नि में होम हो चुके तारीख गवाह है।

मनीषा जैन :-
प्रज्ञा जी से सहमत। हिंसा चाहे किसी भी तरह की हो दुख देती है। धर्म का अंधानुकरण हम सभ्य कहे जाने वाले प्राणी आज भी करते हैं। मानसिक हिंसा भी उतनी दुखदायी है जितनी शारीरिक हिंसा।

शालिनी बाजपेयी:-
दीपावली पर घर गई थी। गोवर्धन पूजा पर मम्मी ने वही सब किया जो मैं बचपन से देखती रही हूं। पहले दादी मम्मी और चाची होतीं थी अब मम्मी और मेरी भाभी। भाभी सीख रही हैं कि गोवर्धन पूजा कैसे की जाती है चावल की चिड़िया कैसे बनाई जाती है आदि आदि। मैनें देखा है कि कार्य कारण से किसी को कोई मतलब नहीं है। मेरी मां और भाभी जैसी घरेलू स्त्रियों के लिए ये एक सीखा हुआ व्यवहार है। एक रस्म है जो निभानी है। क्योंकि उनकी नज़र में ये धर्म है।

मांसाहार पाप है या पुण्य मैं इस बहस में नहीं पड़ती। हमारे पूर्वज मांसाहारी थे इस सत्य को स्वीकार करना चाहिए। सकट चौथ....गोवर्धन  पूजा आदि पर की जानी वाली क्रियाएं भी, जिन्हे आम लोग धर्म मान कर करते है, इसी ओर इशारे करती हैं। ऐसा मेरा मानना है। इन्हे समझना होगा।

आभार...

14 जुलाई, 2015

डायरी : मधु कांकरिया

मन जो इन दिनों फालतू बिल्ली बन गया है, बहलाऊँ बहल जाता है, भगाऊँ भाग जाता है। कल शाम एकाएक लोडशेडिंग हो गई थी। गर्म, सूनी और अँधेरी शाम में मोमबत्ती की रोशनी में रहना बहुत डिप्रेसिंग लग रहा था। यूँ भी इन दिनों पीछे की तरफ का हमारा घर भुतहा घर बन गया है। मकान से अधिकांश किरायेदार जा चुके हैं, इस कारण हर जगह घुप्प अँधेरा और साँय साँय करता सन्नाटा। न इनसान न इनसानी आवाज। खाली कमरों में प्रेतात्मा की तरह डोलती मेरी काया और धक् धक् करता मन जो एकाएक फिर मेरी गिरफ्त से बाहर जा चुका था। उत्पाती मन को ठिकाने लगाने के लिए बाहर निकलना जरूरी हो गया था। बाहर निकलने के लिए नीचे उतरने लगी कि तभी सुनी घुटी घुटी सी दबी दबी सी आवाज जैसे कोई मुँह बंद कर रो रहा हो। शायद मुझे भ्रम हुआ होगा। मैंने दो कदम आगे बढ़ाया पर नहीं फिर वैसी ही आवाज बल्कि इस बार कुछ और साफ। पूरी चेतना से सुनने लगी। आवाज ग्राउंड फ्लोर के घर से आ रही थी। ताज्जुब घर के बाहर ताला जड़ा हुआ था। टॉर्च की रौशनी में बाहर की तरफ खुली हुई इकलौती खिड़की से अंदर झाँका तो कलेजा धक् से रह गया। भीतर पड़ोसिन की चार वर्षीय लड़की खिली अँधेरे में दीवार से चिपकी डरी सहमी सुबक रही थी। चेहरा आँसुओं से तरबतर। क्या हुआ? सुबकते हुए बोली वह कि पापा अभी तक नहीं आए। खिली की कामकाजी माँ रात नौ बजे घर लौटती है। दोपहर दो बजे उसकी आया उसे स्कूल से लाकर, खाना खिलाकर घर को बाहर से ताला लगाकर चल देती है। शाम साढ़े छह बजे के लगभग उसके पापा ऑफिस से आकर उसे बंद घर से आजाद करते हैं। यह हर दिन की कहानी पर आज लोडशेडिंग ने बात बिगाड़ दी, घुप्प अँधेरे ने डरा दिया उसे।खिली का आँसुओं से तरबतर चेहरा मुझे सभ्यता और संवेदना की आदिम गुफा में धकेल गया। विकास की इस यात्रा में क्या हम सचमुच आगे बढ़े हैं? क्या हम सचमुच सभ्य हुए हैं? खरगोश सी नाजुक बच्ची और फटे अखबार की तरह पड़ा बच्चा जिन्हें पढ़ने वाला कोई नहीं। दुनिया में इससे ज्यादा कारुणिक दृश्य और क्या हो सकता है। मन करता है कि बात करूँ खिली की माँ से, कहूँ उससे कि जब घर में वैसा कोई आर्थिक अभाव नहीं तो फिर किस प्राप्ति की खोज में तुम इस नन्हीं कोंपल के बचपन को झुलसा रही हो? क्यों इनकी अंतहीन कल्पना की उड़ान पर बंदिश ठोक रही हो? क्या ऐसे ही बच्चे बड़े होकर चिड़चिड़े, अंतर्मुखी, बदमिजाजी, हीन भावना से ग्रस्त और अपराधी नहीं होंगे? क्या आधुनिकता और मुक्ति का मतलब मातृत्व का गला घोंटना है? और जो शैशव इतना असहाय, सहमा, खामोश और खौफ खाया होगा उसका यौवन कैसा होगा? याद आता है कि जब राजा स्कूल से आता था तो उसका पेट फूला रहता था बातों से। हर घटना, हर लम्हे को बताने को उतावला रहता था वह। एकबार मैं आते ही फोन से चिपक गई तो देखा वह काम करने वाली बाई को ही पढ़कर सुनाने लगा वह रिमार्क जो उसकी मैडम ने उसकी डायरी में लिखा था। किसको सुनाती होगी खिली अपनी दुनिया की अंतहीन बातें?ऐसे बच्चे अलग ढंग से ही विद्रोह करते हैं। एक बार चेन्नई में मैं एक दस वर्षीय लड़के को हिंदी सिखा रही थी। उसकी कहानी भी लगभग खिली जैसी ही थी। मैंने एक दिन उससे कहा कि वह 'मरने' के ऊपर कोई वाक्य बनाए। बच्चे ने वाक्य बनाया -मेरी माँ मर गई है। मैंने लड़के को कहा कि उसकी माँ इतनी स्वस्थ और छोटी उम्र की है फिर क्यों उसने ऐसा वाक्य बनाया? बच्चे ने जबाब नहीं दिया, बस मुँह बनाता रहा, पर उसकी माँ ने कहा, मेरे बेटे की यही छिपी हुई इच्छा है। मुझे पता है उसे मेरा बाहर निकलना पसंद नहीं है। लेकिन ये लोग यह नहीं जानते कि मैं इतना मर खप इन्हीं के लिए तो रही हूँ, इनके उज्जवल भविष्य के लिए। मैंने कहा भी कि वर्तमान को झुलसा कर आप कैसा भविष्य इन्हें देंगी। लेकिन उनका रिसीवर मेरे कहने के मर्म को ठीक ठीक पकड़ नहीं सका। 

5 .12 .07

गर्म गर्म हवा सी जिंदगी और बेरंग मौसम घर का। अपने अपने तहखानों में कैद सब, शायद भिड़ंत के डर से कोई बाहर नहीं निकलता। निकलता भी है तो बच बच कर। कई बार लगता है जैसे यहाँ लोग नहीं कुछ चुप्पियाँ रहती है जो प्रेतात्माओं कि तरह विचरण करती रहती है, कभी इधर कभी उधर। दोनों तहखानों के बीच कमजोर पुल की तरह है माँ जो चाहती है कि वातावरण थोडा हल्का हो। घर घर सा महके। इसलिए सभी चुप्पियों के बीच सायास कभी हलकी हँसी तो हलके संवाद के जीवंत चिह्न भी दिख जाते हैं। पर माँ भी क्या करे, खुद वह एक चलता फिरता अजायबघर है और जब तब अधूरी कामनाओं के टूटे पंख, अधबने स्वप्नों की किरचें, अनभोगे सुखों के सूखे पत्ते और अधूरे जीवन से उपजी कुंठाओं के चमदागड़ चीखने लगते है और बूँद बूँद जमा संतुलन गड़बड़ा जाता है।यह लगभग हर दिन की कहानी। पर इसी कहानी में आज आया एक नया ट्विस्ट।बाथरूम से नहाकर निकले छोटे भाई ने एकाएक देखा संगमरमरी हॉल में जगह जगह केसरया पदचिह्न। कैसे बने ये पदचिह्न? हम सोचने लगे कि तभी मंदिर से लौटी अम्मा ने जैसे ही यह सब देखा परम प्रमुदित हो दोनों हाथों को आसमान की ओर लहरा कर, आसमान की ओर ताकते हुए गदगद कंठों से घोषणा की कि ये केसरिया पगलिया ईश्वरीय चमत्कार है। जो उनके निरंतर धर्म में लगे होने के फलस्वरूप प्रकट हुए हैं। कुछ दिनों पूर्व ऐसे ही मंदिर में जमीन से केसर निकलने का चमत्कार भी माँ के ही मुँह से सुना था मैंने। मुझे डर लगा कि कहीं मीडिया को खबर लग गई तो वे न आ धमकें। आस्था अनास्था के बीच डोलते घर के दूसरे सदस्य भी भौंचक थे। सब कुछ एकाएक रहस्मय और अलौकिक हो गया था। पूरा घर बहुत दिनों बाद धर्म रूपी वृक्ष से एक डोर में बँधा इस चमत्कार से अभिभूत था। बदसूरती से घिरे फ्लैट में एकाएक रौनक आ गई। कोई इसे पूर्वजों का पुण्य बता रहा था तो कोई इसे साक्षात उनकी उपस्थिति के रूप में देख रहा था। तभी सब गुड़ गोबर हो गया। धर्म की धाक का हुक्का एकाएक धप से बुझ गया। काम करने वाली बाई ने झाड़ू लगाते वक्त कुछ फूटे हुए पुराने कैप्सूल लाकर दिए, किसी का पैर इन्ही कैप्सूलों पर पड़ गया था। केसरिया पदचिह्न उसी कैप्सूल से निकला द्रव्य था।सोचती हूँ कि यदि वे कैप्सूल किसी कारण कामवाली बाई के हाथ नहीं लगे होते तो?शायद अंधी आस्था ऐसे ही जन्म लेती है।

प्रस्तुति- मनीषा जैन
साभार- हिन्दी समय
------------------------------
टिप्पणियाँ:-

सुषमा अवधूत :-
Pahla panna aaj Ki hakikst bayan Karta hai sahi hai bhoutik sukho ke pichhe bhagte hue masumiyat dam todti hai ,dusra panna batata hai kaise andhvishwas janm leta hai ,bahut achha likha hai badhai

कविता वर्मा:-
महिलाओ का करिअर बनाना गलत नहीं है लेकिन अपने बच्चे के मासूम बचपन की कीमत पर नहीं ? बेहद मार्मिक है उस बच्ची का यूं अकेले घुटना लेकिन कई माता पिता सिर्फ भौतिक सुख सुविधा को ही लाड प्यार समझते हैं ऐसे बच्चे फिर कभी किसी से भावनात्मक रूप से जुड़ नहीं पाते। दूसरा पन्ना अन्धविश्वास के पैदा होने को रोचक ढंग से प्रस्तुत करता है लेकिन ये अन्धविश्वास पूरे परिवार को जोड़ता भी है। इसलिए शायद हमारे पूजा पाठ व्रत उपवास जैसे धार्मिक आयोजन प्रचलित हैं।  दोनों ही पन्ने अच्छे लगे भाषा सधी हुई और कलात्मक होते हुए भी क्लिष्ट नहीं है।  आभार

राजेन्द्र श्रीवास्तव:-
दोनों ही प्रसंग महत्वपूर्ण और मार्मिक भी। पहला प्रसंग कुछ और विस्तार की मांग करता है।
मधु कांकरिया और मनीषा जी को साधुवाद

फ़रहत अली खान:-
पहला पन्ना शुरुआत में ख़ासा रोचक लगा; यूँ लगा गोया कोई भूतिया फ़िल्म चल रही हो। फिर बात मार्मिक हो गयी, बच्ची का दर्द महसूस होने लगा। पति-पत्नी का एक साथ नौकरी करना आजकल अक्सर घरों के ज़रूरत हो गयी है; लेकिन बच्चों और बुर्जुर्गों की ज़रूरियात के साथ तालमेल बिठाकर चलना चाहिए; ऐसा न कर पाने की सूरत में घर के माहौल और ज़हनों पर बुरे असरात पड़ते हैं, जो आगे नज़र आने लगते हैं।
दूसरा पन्ने में जिस घटना का ज़िक्र आया है, उसे मैं 'अंध-विश्वास' के बजाए 'ग़लत-फ़हमी' और 'कम-इल्मी' वाली बात कहना ज़्यादा बेहतर समझता हूँ।
'अंध-विश्वास'(यानी बिना-जाँचे-परखे या बिना-सोचे-समझे-देखे विश्वास) हम किस पर करते हैं? ये विचार करने योग्य प्रश्न है।
एक मासूम बच्चा जिसने दुनिया में अच्छा-बुरा समझना अभी-अभी शुरु ही किया है, अपने पिता की उंगली पकड़े कहीं भी चल देता है, जहाँ चाहे उसका पिता उसे ले जाए।
एक शख़्स जो बरसों से किसी डॉक्टर से इलाज कराता आ रहा है, डॉक्टर से ये नहीं पूछता कि डाक्साब आपने ये जो दवा पर्चे पर लिखी है ये कहीं मुझे नुक़्सान तो नहीं दे जायेगी? बिना-जाँचे-परखे वो वही दवा घर जाकर खाना चालू कर देता है। हाँ अगर कोई जानकार(इल्म वाला, ज्ञानी) शख़्स हुआ तो ये ज़रूर देख लेता है कि डाक्साब ने फ़लाँ-फ़लाँ दवाएँ दी हैं, जिनके फ़लाँ-फ़लाँ कंटेंट हैं; ये है ज्ञान का फ़ायदा जो जाँचने परखने की सलाहियत भी देता है और आरज़ू भी।
लेकिन अपने 'रब' की तुलना किसी भी हाल में हम किसी इंसान से नहीं कर सकते; हरगिज़ नहीं, हरगिज़ नहीं, हरगिज़ नहीं।
इसलिए मुझे 'अंध-विश्वास', 'सच्चा-विश्वास' और 'विश्वास' जैसे लफ़्ज़ों पर गहन विचार करने की ज़रुरत है; बात अगर निकलेगी तो बहुत लम्बी हो जायेगी।