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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल
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17 अक्टूबर, 2015

जब समाज बचेगा, तब ही साहित्य भी बचेगा : विमल कुमार

जब समाज बचेगा, तब ही साहित्य भी बचेगा
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विमल कुमार
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यह  देश के इतिहास में ही  नहीं, संभवतः विश्व के इतिहास  की यह पहली घटना है जब इतनी बड़ी संख्या में लेखकों ने अकेडमी पुरस्कार लौटाएं  और पदों से इस्तीफे दिए हैं. मेरी जानकारी में करीब  तैतीस लेखकों ने अबतक  अकेडमी पुरस्कार और करीब दस  से अधिक लेखकों ने राज्यों की अकेडमी के पुरस्कार लौटाएं हैं. संभव है कि अभी कुछ और लोग भी लौटाएं. बंगाल के करीब सौ लेखकों ने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर देश में बढ़ती साम्रदायिकता और अभिव्यक्ति  की आजादी के बढ़ते खतरे पर चिंता जताई है. उधर कोंकणी के लेखकों ने आन्दोलंन  करने की बात कही है. दो ज्ञानपीठ लेखकों केदारनाथ सिंह और कुंवर नारायण तथा व्यास सम्मान से सम्मानित विश्वनाथ त्रिपाठी तथा दो साहित्याकेद्मी पुरस्कार प्राप्त लेखक काशीनाथ सिंह और अरुणकमल ने भी पुरस्कार लौटनेवाले लेखकों का समर्थन किया है और इस लडाई में सबको शामिल होने की भी बात की है लेकिन मुझे नहीं लगता कि इस लडाई के तत्काल नतीजे निकलेंगे लेकिन मैं विष्णु खरे की तरह इस को खारिज भी नहीं करता हूँ.

ज्ञानेद्रपति ने भी कहा है कि वक़्त आने पर वे भी पुरस्कार लौटा देंगे फ़िलहाल वह  साहित्य अकेडमी को कमजोर नहीं करना चाहते हैं. गिरिराज किशोरे भी यही बात कह रहें हैं लेकिन वो ये आशंका भी व्यक्त कर रहे है कि अकेडमी को सरकार कब्जे में कर लेगी. यही आशंका काशीनाथ सिंह की भी है, पर उन्होंने आज अकेडमी पुरस्कार लौटा दिया है. नामवर जी का बयान हौसला अफजाई करनेवाला नहीं है. लेकिन उन्होंने विरोध के अन्य तरीके अपनाने की बात कही है लेकिन यही बात तो साहित्य अकेडमी के अध्यक्ष भी कह रहें हैं और सरकार के मंत्री. विनोद कुमार शुक्ल और अलका सरावगी तथा मृदुला गर्ग पुरस्कार लौटने के पक्ष में नहीं हैं कुछ ऐसी ही बात चंद्रकांत देवताले ने भी कही है पर ये सभी मोदी सरकार में व्याप्त स्थितियों की आलोचना भी कर रहे हैं अभी तक गोविन्द मिश्र, सुरेन्द्र वर्मा, रमेशचन्द्र शाह  और मंज़ूर एह्तशाम का कोई बयान मुझे देखने को नहीं मिला है. लेकिन मैं उनसभी लोगों को धन्यवाद देता हूँ जिन्होंने ये पुरस्कार लौटाए. उनके प्रति मेरे मन में इज्ज़त बढ़ गयी है यह जानते हुए कि उनमे से कई लेखक वामपंथी नहीं हैं और वे कलावादी या ढुलमुल स्टैंड लेते रहे हैं लेकिन वे सभी  हमारी लडाई में  सभी  साथी हैं. 

जिन लोगों ने पुरस्कार नहीं लौटाए उन्हें मैं किसी नैतिक कठघरे में भी खड़ा नहीं करता हूँ. महज पुरस्कार लौटना ही विरोध दर्ज करने की  कोई कसौटी नहीं रचनाकार के लिए पर मैं अपने मित्र एवं प्रिय कहानीकार उदयप्रकाश  को विशेष धन्यवाद् देता हूँ जिन्होंने ये शुरुआत की. अशोक वाजपेयी भी धन्यवाद के काबिल हैं जिन्होंने अपनी वाम विरोधियों दृष्टि के बावजूद  एक अच्छा कदम उठाया लेकिन जिन लोगों ने पुरस्कार  लौतानेवालों का मजाक उड़ाया है  उनकी मैं घोर निंदा करता हूँ. फेसबुक पर ऐसी कई टिप्पणियां मैंने देखी  हैं जिस से उनलोगों की घटिया मानसिकता का पता चलता है. मैं मोरवाल को भी बधाई देता हूँ कि उन्होंने इंदु शर्मा कथा सम्मान लौटा कर एक जरूरी काम  किया है.

इस पूरे  प्रसंग में कुछ तथ्यों  को जान  लेना जरूरी है क्योंकि बहुत सारे तथ्य अभी मीडिया के सामने आये नहीं हैं. शायद इसलिए कई लोग गलत बयानी भी कर रहे हैं. कलबुर्गी की हत्या ३१ अगस्त को होती है और साहित्य अकेडमी की नींद एक महीने बाद टूटती है और उनकी स्मृति में धारवाड़ में  शोक सभा ३० सितम्बर को होती है जबकि उदयप्रकाश ४ सितम्बर को ही अकेडमी पुरस्कार लौटा देते हैं, क्या साहित्य अकेडमी की संवेदनशीलता ख़त्म हो गयी थी या वह वर्तमान सरकार से इतनी डरती है कि इतनी देर से वो शोकसभा करती है. आमतौर पर एक मैंने अबतक अकेडमी को एक हफ्ते  या दस दिन के भीतर ही शोक सभाएं करते देखा है  और ये तो हत्या से हुई मौत है. अकेडमी को तो और संवेदनशील होना चाहिए था. लेकिन जब  १६ सितम्बर को विश्वनाथ त्रिपाठी के नेतृत्व में ११ सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल साहित्य अकेडमी के अध्यक्ष से मिलकर कलबुर्गी की हत्या पर दिल्ली में शोक सभा की मांग करता है तो अध्यक्ष उनकी मांग को ख़ारिज कर देते हैं.

क्या साहित्य अकेडमी का कोई नियम है कि दिल्ली से बाहर रहनेवाले लेखकों की स्मृति में शोक सभा दिल्ली में नहीं हो सकती है. लेकिन साहित्य अकेडमी ने दिल्ली से बाहर  रहनेवाले लेखकों की स्मृति में भी सभाएं की है. आखिर अध्यक्ष किस बात से डरे हुए थे. अगर उन्हें भी डर था कि शोक सभा करने से  कलबुर्गी की तरह वे भी सांप्रदायिक ताकतों के शिकार हो जायेंगे तो वे यह आशंका जाहिर करते. क्या वो इसलिए नहीं करना चाहते थे कि  भाजपा सरकार  नाराज़ हो जायेगी. वे निर्वाचित अध्यक्ष हैं सरकार द्वारा नियुक्त तो नहीं कि उनकी नियुक्ति खतरे में पड़जाये. वे साहित्य अकेडमी की  स्वायत्ता  की बात कह रहे है लेकिन क्या शोक सभा  आयोजित होने से अकेडमी की  स्वायत्ता के भंग होने का कोई खतरा उन्हें नज़र आ रहा था. चलिए हम थोड़ी देर के लिए ये भी मान लेते हैं कि उनसे भूलचूक हो गयी पर वे तो अकेडमी पुरस्कार लौटाने वालों में से कुछ को आपातकाल का  समर्थक  बताने लगे ये भी कहने लगे कि अकेडमी ने लेखक की  किताब को भारतीय भाषाओँ में  अनुवाद करा कर उसे कीर्ति प्रदान की है. इस से तो ये भी पता चलता है वह  लेखकों का सम्मान करना नहीं जानते ..

आखिर लेखक ने तो पुरस्कार पाने के लिए कोई आवेदन नहीं किया था और न अपनी किताब का अनुवाद करने के लिए कोई अनुरोध किया था तो फिर उन्हें ऐसी बात नहीं कहनी चाहिए, फिर उन्होंने यह भी कहा कि लोग पुरस्कार लौटकर राजनीति कर रहे है लेकिन  उन्हें इस बात को समझना चाहिए कि देश के कोने-कोने से लोग संस्था के राजनीतिकरण के लिए पुरस्कार नहीं लौटा रहे थे.

और  वे अख़बार की सुर्ख़ियों के लिए पुरस्कार लौटा रहे थे जैसा कि नामवर जी ने यूनीवार्ता से बातचीत में यह बात कही. क्या नयनतारा सहगल और कृष्णा सोबती अख़बार कि सुर्ख़ियों में आने के लिए कदम उठा रही थी, अगर  अख़बार में नाम आने के लिए इन लेखकों ने ऐसा किया तो यशपाल की कहानी ‘अख़बार में नाम’ की याद आना स्वाभाविक है जिसमे एक बच्चा मोटर के नीचे  इसलिए आ जाता है को वो अख़बार में अपना नाम देखना चाहता है. यह सही है कि अंगरेजी के अख़बार हिन्दी के लेखकों को भाव नहीं देते हैं और उनके जीने मरने की खबर भी नहीं देते हैं. पुरस्कार लौटनेवाले कई लेखकों के नाम वे नहीं छापते पर मीडिया के लिए यह एक अनहोनी घटना थी शयद इसलिए उसने कुछ दिन तवज्जो दी लेकिन बाद में मीडिया भी ढीला पड़ गया. और भाजपा के मंत्रियों के उलटे सीधे बयां छापने लगा जिसमे पुरस्कार लौटानेवलों  पर हमले किये गए और ये कहा गया कि लेखकों ने ये पुरस्कार पहले क्यों नहीं लौटाए तब तो इस तर्क से ये भी कहा जा सकता है कि टैगोर ने जलियांवाला काण्ड की घटना पर सर की उपाधि क्यों लौटाई उस से पहले क्यों नहीं लौटाई. ये भी तर्क दिया जा सकता है कि भक्तिकाल के लेखकों ने भी कोई दरबार में विद्रोह क्यों नहीं किया, १८५७ की लडाई में  कितने लेखक आगे आये.

अरुण जेटली ने इसे कागजी क्रांति कहा लेकिन उन्हें भी कागजी नेता कहा जा सकता है क्योंकि वे जमीनी नेता तो नहीं. खुद तो चुनाव नहीं जीत पाते हैं. रविशंकर प्रसाद ने कहा कि आपातकाल में लेखकों ने पुरस्कार क्यों नहीं लौटाए जबकि उन्हें मालूम है कि रेणु जी ने पद्मश्री लौटाया कई लेखक जेल गए कई लेखकों ने विरोध में रचनाएँ लिखी जिसमे धर्मवीर भारती और भवानी बाबू शामिल हैं.

८४ के दंगों के विरोध में खुशवंत सिंह ने पद्मभूषण लौटा दिया था इसके अलावा तीन और लेखको ने भी विरोध में पुरस्कार लौटाए और यह ख़बरें मीडिया में आयीं लेकिन संस्कृति मंत्री ने तो लेखकों को लिखना बंद करने की बात की, फिर यह कहा कि ये कानून व्यस्था तो राज्य की जिम्मेदारी है. अगर सबकुछ राज्य की जिम्मेदारी है तो केंद्र ‘भूमि अधिग्रण’ कानून क्यों बना रहा था. विकास भी राज्य की ही जिम्मेदारी है लेकिन स्मार्ट सिटी से लेकर सफाई अभियान भी केंद्र चला रहा है.

इस पुरे प्रकरण में शशि थरूर भी लेखकों को नसीहत देने लगे कि पुरस्कार का सम्मान किया जाना चाहिए लेकिन जब अकेडमी खुद कलबुर्गी का सम्मान नहीं कर रही तो लेखक क्या करें अगर वे पुरस्कार नहीं लौटाते है तो लोग कहते है कि लेखक पुरस्कार से चिपके  हैं अगर वे लौटते हैं तो  उसने पुरस्कार का असम्मान किया, फिर यह भी कहा जाता है कि विरोध के और भी तरिके हैं.

अगर लेखक  धरना दे तो  पुलिस उसे उठा लेती है पकड़ लेती है लाठी से पिटाई करती है आमरण अनशन करे तो गिरफ्तार कर लेती है, साहित्य अकेडमी के सामने नारेबाजी करे तो यह लेखकों का अशिष्ट व्यवहार  माना  जता है. विरोध में कविता कहानी लिखों तो सरकार के कानों   पर जू तक नहीं रेंगती. नक्सली कह कर पुलिस जेल में डाल  देती है इसलिए साहित्य अकेडमी को यह बताना चाहिए कि लेखक किस तरह विरोध प्रकट करे, फिर ये भी तर्क दिया गया कि साहित्य अकेडमी को बचाना जरूरी है लेकिन किसी ने या नहीं कहा कि संवेदनशीलता को बचाना अधिक जरूरी है.

जब देश और समाज ही नहीं बचा तो साहित्य अकेडमी के बचने से क्या लाभ होगा. कुछ लोगों को अकेडमी से पुरस्कार, यात्रा, सेमीनार आदी की उम्मेदे हैं कुछ को किताबों के प्रकाशन की उम्मीद है शायद वे इसलिए इसे कमजोर नहीं करना चाहते हैं. मैं भी चाहता हूँ कि अकेडमी बचे लेकिन  इस अकेडमी को अब गंभीर लेखकों की जरूर नहीं है. पिछले दस पंद्रह सालों में अकेडमी की साख काफी गिरी है. इस पूरे प्रकरण में कई लोगों की कलई भी खुल गयी और पता चल गया कि उनके क्या दृष्टिकोण हैं. मैं भी यह नहीं मानता हूँ कि पुरस्कार लौटकर लेखकों ने कोई शहादत दी है पर इन लेखकों ने कम से कम आवाज़ तो बुलंद की. मुझे केकी एन दारूवाला की अध्यक्ष को लिखी गयी चिठ्ठी अच्छी लगी जिसका आशय यह है  कि मैं  भ्रष्ट युपीए- दो  का प्रशंसक नहीं हूँ पर इस देश में एम. ऍफ़ हुसैन और तसलीमा नसरीन के संदर्भ में कट्टरपंथी ताकतों के आगे भाजपा और वाम दलों को झुकते देखा है. 

दरअसल इस देश को खतरा इन्हीं कट्टरपंथी ताकतों से है और चुनावी राजनीति ने समाज का जाति और धर्म के आधार पर बुरी तरह ध्रुवीकरण कर दिया है. मोदी सरकार ने इसे और बढ़ने का काम किया है. लेखकों के प्रतिरोध को व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने की जरूरत है. यह केवल कलबुर्गी की हत्या का मामला नहीं. पिछले डेढ़ वर्षों में जिस तरह का माहौल बना है वो बहुत घुटन भरा है लेकिन ये कहने का अर्थ ये नहीं कि कांग्रेस के कार्यकाल में सब कुछ अच्छा था. आज जैसे ही आप भाजपा कि आलोचना करो वे आपको कांगेसी बता देते है जैसे पहले कांगेस की आलोचना करो तो वे आपको साम्रदायिक और  भाजपाई बता देते थे. मुझे लगता है कि आनेवाले दिन और अंधेरों से भरें होंगे और फासीवाद ताकतें बढेंगी क्योंकि अब विपक्ष के नाम पर कोई तीसरी ताक़त दिखाई नहीं देती. ऐसे में लेखकों को एकजूट होने की जरूरत है. बीस तारिख को जलेस-प्रलेस-जसम-प्रेस क्लब -भारतीय महिला प्रेस कोर- दलित लेखक संघ आदि ने एक सम्मलेन रखा है और २३ को मौन मार्च. बेहतर होगा हम अपने मतभेदों को भुलाकर इस लडाई में शामिल हो और फेसबुक पर हलकी टिप्पणियां न करें .
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16 अक्टूबर, 2015

नयनतारा सहगल की नैतिका का दोहरा रूख : ब्रेजेश कुमार

देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू की भानजी नयनतारा सहगल ने साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने का फैसला किया है। दादरी की घटना से नयनतारा व्यथित हैं। इस मामले में प्रधानमंत्री की चुप्पी से भी वे परेशान हैं। उन्हें यह भी क्षोभ है कि भारत में विविधता की जो संस्कृति रही है, उस पर गहरा खतरा मंडरा रहा है।
नयनतारा सहगल को ये पुरस्कार वर्ष 1986 में तब मिला था, जब उनके भतीजे राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री थे। सवाल ये उठता है कि उन्हें उस वक्त ये पुरस्कार लेने में झिझक क्यों नहीं हुई, खासकर उस प्रधानमंत्री के रहते हुए, जिनकी मां और नयनतारा की ममेरी बहन इंदिरा गांधी की मौत के बाद संगठित तौर पर कांग्रेस नेताओं की अगुआई में हजारों सिखों को मारा गया। नरेंद्र मोदी दादरी की घटना पर चुप हैं, इसे लेकर नयनतारा परेशान हैं, लेकिन 1984 में तो उनके भतीजे और तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने सिखों की दंगे में हुई हत्या को सामान्य और न्यायोचित ठहराते हुए ये विवादास्पद बयान दिया था कि ''बड़ा पेड़ जब गिरता है तो कंपन तो होता ही है।"" सिख दंगों में मारे गए लोगों के परिवार आज भी न्याय के लिए भटक रहे हैं। लेकिन नयनतारा की अंतरात्मा को शायद इससे कोई परेशानी नहीं हुई थी।
नयनतारा की अंतरात्मा को तब भी कोई परेशानी नहीं हुई, जब राजीव गांधी ने मुस्लिम कट्टरपंथियों के आगे झुकते हुए शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को संवैधानिक संशोधन के तहत उलट दिया था और एक मुस्लिम महिला को उसका वाजिब हक मिले, इसमें सबसे बड़ा अड़ंगा लगाया था। विधि का विधान तो ये था कि नयनतारा की मां विजयालक्ष्मी पंडित जब विधवा हुई थीं (14 जनवरी 1944 को पति रणजीत पंडित की मौत के बाद), तो ससुराल वालों ने पुश्तैनी संपत्ति में हक देने से मना कर दिया था और एक मामूली-सी रकम जीवन-बसर के लिए मंजूर की थी। विजयालक्ष्मी के लिए ये रकम डेढ़ सौ रुपए प्रतिमाह थी, जिसका जिक्र खुद नयनतारा ने अपनी पुस्तक 'जवाहरलाल नेहरू : सिविलाइजिंग अ सेवेज वर्ल्ड" में विस्तार से किया है।
बहन की ये पीड़ा भाई (नेहरू) पर इतनी भारी गुजरी थी कि देश को आजादी हासिल होते और सत्ता की कमान हाथ में आते ही उन्होंने तमाम विरोध और सहमति के अभाव के बावजूद हिंदू कोड बिल लाना मंजूर किया और इसके जरिए हिंदू परिवारों में महिलाओं को भी बराबरी का अधिकार मिले, ये सुनिश्चित किया। ये वही नेहरू थे, जो उस वक्त समान नागरिक संहिता लाने के लिए इसलिए तैयार नहीं हुए, क्योंकि उन्हें भय था कि मुस्लिम समुदाय इसे बर्दाश्त नहीं करेगा। अगर नेहरू ने उस वक्त हिम्मत का परिचय देते हुए समान नागरिक संहिता को लागू कर दिया होता, तो शायद इस देश में मुस्लिम तुष्टीकरण जैसा शब्द इस्तेमाल नहीं किया जाता।
साहित्य अकादमी पुरस्कार लेने के तीन दशक बाद उसे लौटाने की उनकी नैतिकता पर अब सवाल खड़े किए जा रहे हैं। साहित्य अकादमी के मौजूदा अध्यक्ष का कहना है कि अपनी किताब के तमाम भाषाओं में हुए अनुवाद और हर किस्म का फायदा उठाने के बाद अब इस पुरस्कार को लौटाने का क्या मतलब है। नयनतारा की नैतिकता पर सवाल और कारणों से भी उठेगा। 1986 में शाहबानो मामले में जब राजीव गांधी ने घुटने टेके, उस वक्त कैबिनेट मंत्री आरिफ मोहम्मद खान ने विरोध में इस्तीफा दे दिया था। एक तरफ आरिफ का नैतिकता के आधार पर इस्तीफा तो दूसरी तरफ नयनतारा का राजीव सरकार से साहित्य अकादमी पुरस्कार लेना, चर्चा तो इसकी होगी ही। राम जन्मभूमि का ताला खुलवाने का काम भी राजीव ने तब किया, जब उन्हें ये लगा कि शाहबानो मामले में मुस्लिम कट्टरपंथियों के आगे घुटने टेकने के कारण हिंदू समाज नाराज है और भाजपा इसका फायदा उठा सकती है। तब लोकसभा में भाजपा के महज दो सांसद थे, लेकिन राजीव ने राम जन्मभूमि का ताला क्या खुलवाया, भाजपा को जोर मिला और आज वो पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में बैठी है।
नयनतारा को आलोचक ये भी याद दिलाएंगे कि अभिव्यक्ति की आजादी को बाधित करने का काम भी उनके मामा के प्रधानमंत्री रहते ही शुरू हुआ था। नेहरू ने देश के संवैधानिक प्रमुख राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद के दो भाषणों को सरकारी संचार माध्यम के जरिए प्रसारित नहीं होने दिया था। विपक्षी पार्टियों की सरकारों को बर्खास्त करने का सिलसिला केरल की नंबूदरीपाद सरकार की बर्खास्तगी के साथ नेहरू के ही राज में शुरू हुआ था।
नयनतारा इमरजेंसी तो नहीं ही भूली होंगी, जो असहमति की स्वतंत्रता के दमन का सबसे बड़ा उदाहरण है इस देश में। संजय गांधी ने नसबंदी अभियान और तुर्कमान गेट कांड में मुस्लिम समुदाय को खूब परेशान किया था। राजीव गांधी ने प्रेस पर सेंसरशिप लाने की कवायद कर डाली थी और वीपी सिंह जैसे ईमानदार मंत्री को असहमति दिखाने के चक्कर में ही सरकार से बर्खास्त कर दिया था। जाहिर है, नयनतारा के विरोधी इन सवालों को खड़ा करेंगे और इसी बहाने उनकी नैतिकता भी कठघरे में खड़ी की जाती रहेगी।
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-लेखक टीवी मीडिया से जुड़े पत्रकार हैं |

बुद्धिजीवियों को गुस्सा क्यों आता है? : भवदीप कांग

बुद्धिजीवियों को गुस्सा क्यों आता है?

भवदीप कांग

साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाकर या साहित्य अकादमी से इस्तीफा देकर अब तक 15 से भी अधिक लेखकों द्वारा 'देश में बढ़ती असहिष्णुता" पर विरोध जताया जा चुका है। लोकसभा चुनावों से पहले भी इसी तरह एक हस्ताक्षर अभियान चलाया गया था और नागरिकों को आगाह किया गया था कि नरेंद्र मोदी सत्ता में न आने पाएं। लेकिन सवाल उठता है कि आखिर उन्हें गुस्सा किस बात पर आ रहा है?

हाल ही में तीन बेहद व्यथित कर देने वाली घटनाएं हुई हैं। पहली, जिसमें गोमांस खाने की अफवाह के बाद एक व्यक्ति की आक्रोशित भीड़ द्वारा हत्या कर दी गई। दूसरी, जिसमें एक चार वर्षीय बालिका के साथ इतनी नृशंसता से दुष्कर्म किया गया कि उसकी आंतें बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गईं। तीसरी, जिसमें कपास की फसलें बरबाद होने के बाद सोलह किसानों द्वारा आत्महत्या कर ली गई। इनमें से केवल एक घटना की वजह से हमारे वामपंथी उदारवादी बुद्धिजीवियों का खून खौला है। बताने की जरूरत नहीं कौन-सी घटना।

हमारे वामपंथी बुद्धिजीवी वैसे भी पक्षपातपूर्ण आक्रोश प्रदर्शन के लिए जाने जाते हैं। मौजूदा दौर में दादरी की घटना के बहाने मोदी विरोध की जैसी लहर बह रही है, वह इसका एक और उदाहरण है। नृशंस लैंगिक अपराध उन्हें पितृसत्तात्मक समाज के प्रति विरोध प्रदर्शित करने के लिए प्रेरित नहीं करते। न ही देश में किसानों के प्रति जिस तरह का आर्थिक आतंकवाद जारी है, वह उन्हें विचलित करता है। एक बच्ची के साथ हुआ जघन्य कृत्य 'आइडिया ऑफ इंडिया" को क्षति नहीं पहुंचाता, केवल और केवल सांप्रदायिक आधार पर होने वाली हिंसा से ही उसे ठेस पहुंचती है?

निश्चित ही, जिस तरह इखलाक की जान ली गई, वह घोर निंदनीय है। इतनी ही निंदनीय नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पानसरे और एमएम कलबुर्गी जैसे बुद्धिजीवियों की हत्या की घटनाएं भी हैं। गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने उचित ही इस पर कदम उठाते हुए तमाम राज्य सरकारों को आगाह कर दिया है कि आगे से इस तरह की घटनाओं के प्रति जीरो टॉलरेंस का रवैया अपनाया जाए। संबंधित राज्यों के मुख्यमंत्रियों को गृह मंत्री की इस बात को गंभीरता से लेते हुए दोषियों को उचित सजा दिलवाने के लिए कमर कस लेनी चाहिए।

लेकिन क्या जरूरी है कि हर बार हर चीज के लिए नरेंद्र मोदी को ही दोषी ठहराया जाए? इस बहस के ब्योरों में जाए बिना कि क्या आज देश के धर्मनिरपेक्ष और बहुलतावादी माहौल को क्षति पहुंचाई जा रही है या नहीं, इतना तो कहना ही चाहिए कि हर चीज को मोदी से जोड़कर देखने की हमारी जो आदत बनती जा रही है, वह अनुचित है। कहीं भी कोई उग्र दक्षिणपंथी कोई बेतुका बयान दे तो हम मोदी को इससे जोड़ देते हैं। हर चुनाव को हम मोदी पर देश का निर्णय घोषित कर देते हैं। वामपंथी बुद्धिजीवी अपने कॉलमों में मोदी की लानत-मलामत करने में इतने खोए हुए हैं कि वे इस बात को नजरअंदाज ही कर देते हैं कि मोदी ने हिंदुओं और मुस्लिमों दोनों से ही अपील की है कि वे आपस में लड़ने के बजाय गरीबी से संघर्ष करें।

अति तो ये है कि नई दिल्ली के नेहरू मेमोरियल म्यूजियम और लाइब्रेरी में पं. दीनदयाल उपाध्याय की जन्मशती समारोहपूर्वक मनाए जाने को भी 'सेकुलर स्पेस" में दक्षिणपंथियों की बेजा घुसपैठ के रूप में देखा जा रहा है। इस संस्था के निदेशक वामपंथी उदारवादियों के चहेते माने जाते रहे हैं और उन्हें पद से हटाए जाने के बाद विरोध का कोलाहल शुरू हो गया है, लेकिन कोई भी यह उल्लेख नहीं कर रहा है कि अव्वल तो उनकी नियुक्ति ही नियमों को ताक पर रखकर की गई थी। गत वर्ष ही कांग्रेस द्वारा पं. जवाहरलाल नेहरू की 125वीं जयंती बेहद धूमधाम से मनाई गई थी, लेकिन भाजपा द्वारा पं. दीनदयाल उपाध्याय की जन्मशती मनाना उन्हें हजम नहीं हो रहा है।

वास्तव में सच्चाई यह है कि देश को आजादी मिलने के बाद सात दशकों में पहली बार ऐसा हुआ है, जब वामपंथी उदारवादी खुद को राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक विमर्श के दायरे में हाशिए पर महसूस कर रहे हैं। यही बात उन्हें रह-रहकर खल रही है। चूंकि वे इस कड़वी हकीकत को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं, इसलिए उनमें गुस्से का प्रदर्शन करने की होड़ लगी हुई है। देशहित में दक्षिणपंथी धारा के उदारवादी स्वरों के साथ मिल-बैठकर बात करने और समस्याओं का समाधान खोजने में उनकी दिलचस्पी नहीं है। अगर उनके खेमे का कोई व्यक्ति इस आशय की पेशकश रखता भी है तो वे उसे अपराधियों से मिलीभगत करने की संज्ञा दे देते हैं। एक विवेकपूर्ण रवैया अपनाने के बजाय वे केवल नैतिक आक्रोश और बौद्धिक दंभ के प्रदर्शन को ही पर्याप्त मान रहे हैं। अगर दक्षिणपंथ को असहिष्णु, एकांगी और पूर्वग्रहग्रस्त माना जाता है तो आज वामपंथी उदारवाद भी तो वैसा ही बनता जा रहा है।

यह सच है कि समाज-विज्ञान की दिशा में दक्षिणपंथी चिंतकों की बौद्धिक परंपरा बहुत समृद्ध नहीं रही है, लेकिन अब जब पहली बार अकादमिक दुनिया में उनका दबदबा कायम हुआ है तो यह स्थिति धीरे-धीरे बदल सकती है। आपको गंभीरता से लिया जाए, इसके लिए आपका अंग्रेजीभाषी होना और टीवी-सेमिनारों में मुखर होना जरूरी मान लिया जाता है। समय के साथ यह धारणा भी बदलनी चाहिए।

अभी तो ये स्थिति है कि जहां भी बुद्धिजीवियों को लेशमात्र भी भगवा नजर आता है, वे भड़क उठते हैं। उदारवाद की रक्षा करते-करते वे खुद बेहद अनुदार हो गए हैं। दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद की भी अगर वे खिल्ली उड़ाते हैं तो किसी ठोस वैचारिक आधार पर नहीं, बल्कि केवल इसलिए कि वह दक्षिणपंथी वैचारिकी का हिस्सा है। एक पिछड़े-गरीब परिवार के व्यक्ति के प्रधानमंत्री पद तक पहुंचने को भी वे भारतीय लोकतंत्र की ताकत के रूप में स्वीकार नहीं कर पाते। वे तो नरेंद्र मोदी को मिले जनादेश को भी यह कहकर नकारने की कोशिश करते हैं कि उन्हें केवल 31 प्रतिशत वोट मिले। इस तर्क के आधार पर तो कांग्रेस को भी कभी पूर्ण जनादेश नहीं मिला है!

वास्तव में नरेंद्र मोदी सामाजिक बदलाव के एक नए दौर की उपज हैं। कांग्रेस का 'माई-बाप राज" अब समाप्त हो चुका है। साथ ही कांग्रेस द्वारा जिन बुद्धिजीवियों को प्रश्रय दिया जाता था, वे भी हाशिए पर चले गए हैं। हालांकि इसका ये मतलब नहीं कि वे अप्रासंगिक हो गए हैं, क्योंकि किसी भी विमर्श का आधार बहुलता ही होता है। लेकिन उन्हें अपनी आत्मतुष्ट महानता के दुर्गों से नीचे उतरकर तू-तू-मैं-मैं करने के बजाय संवाद करने को तैयार होना पड़ेगा। अगर वे किसी राजनीतिक पार्टी के सदस्य नहीं हैं तो जनधन योजना, अटल पेंशन योजना, स्वच्छ भारत या खादी प्रोत्साहन कार्यक्रम जैसे अच्छे कदमों की सराहना करने से उन्हें क्यों हर्ज होता है? हाशिए पर चले जाने से तो बेहतर है कि रचनात्मक संवाद करें और समाज में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखें।
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(लेखिका पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं )