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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल
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01 मई, 2020

नॉट आउट ऋषि कपूर


विजय शर्मा





               कहते हैं वटवृक्ष के नीचे कोई और पेड़-पौधा नहीं पनपता है। कई बार अपवाद होते हैं। ऋषि कपूर ऐसे ही अपवाद थे। पृथ्वीराज कपूर वटवृक्ष थे फ़िर भी उनके तीन बेटों ने नाम कमाया। राज कपूर शोमैन कहलाए, शम्मी कपूर ने याहू अर्जित किया और शशि कपूर नाटक और फ़िल्म दोनों में सहज रहे। राज कपूर के बेटों के लिए आसान नहीं रहा होगा फ़िल्मी सफ़र। पर सिने जगत और सिने प्रेमियों के लिए चिंटु बहुत प्यारा रहा। शायद राज कपूर और ऋषि कपूर की जड़े विरासत में गहरे धँसी थीं अत: वे फ़ले-फ़ूले। फ़ूलना भी उनकी विरासत थी, अपने शरीर के वजन पर उनका नियंत्रण न था। कपूर खानदान के बिना भारतीय सिनेमा की बात नहीं हो सकती है।

               ऋषि कपूर ने बाल कलाकार के रूप में फ़िल्मों में प्रवेश किया और काफ़ी दिन लवर बॉय बने रहे। ‘बॉबी’ का प्रेमी असल जीवन में नीतू का प्रेमी-पति बना। ‘बॉबी’ में उनकी एक चॉकलेटी छवि बनी, एक मासूम छवि बनी, बाद में ‘अमर, अकबर, अंथोनी’ के अकबर, ‘मुल्क’ और कुछ साल पहले ‘102 एंड नॉट आउट’ में यह मासूमियत बरकरार रही। आज भी ‘मेरा नाम जोकर’ में किशोर का टीचर के प्रति प्रेम भाव न मालूम कितने दर्शकों को अपनी किशोरावस्था स्मरण करा देता है। तुलना कीजिए ‘दहन’ (ऋतुपर्ण घोष) के रीढ़हीन पति और ‘चाँदनी’, ‘दामिनी’ तथा ‘नगीना’ के मजबूत पति की। ‘हिना’, ‘प्रेम ग्रंथ’, प्रेम रोग’, ‘लैला मजनू’, ‘हाउअस्फ़ुल 2’, ‘सिंदूर’, ‘कर्ज’, ‘सरगम’, सागर’, ‘नमस्ते लंदन’ और न जाने कितनी और फ़िल्में ऋषि कपूर के खाते में हैं। मगर याद उन्हें ‘बॉबी’ के लिए किया जाएगा, ‘अमर, अकबर, एंथॉनी’ के लिए जाएगा। उनकी गीत प्रधान फ़िल्में – ‘कर्ज’, ‘लैला मजनू’, ‘सरगम’, ‘प्रेम रोग’, ‘चाँदनी’, ‘नगीना’, ‘हिना’, ‘दामिनी’’ जैसी  खूब लोकप्रिय हुईं। ऋषि कपूर ने ‘एक चादर मैली सी’ जैसी साहित्यिक ऑफ़बीट फ़िल्म में भी (हेमा मालिनी के साथ) काम किया।

                अपने पिता राज के नाम से ‘बॉबी’ (1973) में अवतरित होने वाले ऋषि कपूर की अंतिम फ़िल्म ‘मंटो’ (2018) है। हालाँकि ‘बॉबी’ के पहले वे ‘मेरा नाम जोकर’ और यादों की बारात’ में काम कर चुके थे। राज कपूर बहुत लोगों के आदर्श थे भला बेटे के लिए रोल मॉडल क्यों न होते। ऋषि कपूर के लिए उनके पिता सबसे बड़े आदर्श थे। पिता आदर्श थे तो उन्हीं के नक्शे कदम पर चलते हुए उन्होंने ‘आ अब लौट चलें’ फ़िल्म का निर्देशन भी किया।

                 जब ऋषि कपूर की आत्मकथा ‘खुल्लमखुला’ आई तो वे चर्चा में आए क्योंकि उन्होंने हिन्दी सिने जगत की पोल खोली थी। इसमें उन्होंने अपने परिवार की कई बातों को लिखा था जिन्हें लोग जानते थे लेकिन जब उन्होंने लिखा तो उसके अर्थ बदल गए।

                 ‘बॉबी’ फिल्म ने उन्हें बेशुमार सफलता दी साथ ही उन्हें साल 1974 का सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्मफेयर अवॉर्ड भी मिला। न जाने देश में कितने बच्चों का नाम बॉबी रखा गया। 2008 में उन्हें फ़िल्मफ़ेयर का लाइफ़टाइम अचीवमेंट सम्मान दिया गया। 4 सितंबर 1952 को जन्में ऋषि कपूर पत्नी नीतू तथा बेटा रणबीर कपूर और बेटी ऋद्धिमा कपूर साहनी को छोड़ कर 30 एप्रिल 2020 को इस दुनिया से आउट हो गए पर सिने प्रेमियों के लिए वे सदैव नॉट आउट रहेंगे।

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डॉ विजय शर्मा का इरफ़ान खान की फ़िल्म 'करीब-करीब सिंगल' पर लेख इस लिंक पर पढ़ा जा सकता है :
डबल सिंगल : विजय शर्मा





विजय शर्मा

      डॉ विजय शर्मा, 
      326, न्यू सीताराम डेरा, एग्रीको, 
      जमशेदपुर – 831009

      Mo. 8789001919, 9430381718  
      Email: vijshain@gmail.com

30 अप्रैल, 2020

डबल सिंगल



प्रतिभाशाली अभिनेता इरफ़ान खान ने भारतीय सिनेमा में अपनी एक अलग जगह बनाई थी उन्होंने टीवी धारावाहिकों से लेकर विश्व स्तर पर कई फ़िल्मों में भी बेहतरीन अभिनय किया आज वे हमारे बीच नहीं हैं उनके इस तरह चले जाने से पैदा हुआ खालीपन लम्बे समय तक बना रहेगा  साल 2017 में उनकी एक फ़िल्म आई थी, 'करीब करीब सिंगल' जिसका निर्देशन तनुजा चंद्रा ने किया था प्रस्तुत है, इस फ़िल्म पर डॉ. विजय शर्मा की टिप्पणी :





कुछ चेहरे परदे पर आते हैं, तो उजास फ़ैल जाती है। पार्वती उनमें से एक है। वही पार्वती जो मलयालम फ़िल्मों की प्रसिद्ध अभिनेत्री हैं। मलयालम फ़िल्मी परदे को उन्होंने बहुत बार उजास से भर दिया है। हिन्दी फ़िल्मी परदे पर जब पहली बार आई तो वह भी चमक उठा। लगता नहीं है कि वे पहली बार हिन्दी फ़िल्म में अभिनय कर रही हैं। हालाँकि जब उन्हें हिन्दी परदे पर पहली बार इस फ़िल्म में देखा था तब मालूम नहीं था ये पार्वती हैं और मलयालम फ़िल्मों की चमकदार अभिनेत्री हैं। अभी जब उनकी वही फ़िल्म दोबारा देखी तो और अधिक मजा आया क्योंकि इस बीच उन्हें पहचानना शुरु कर दिया था और मलयालम में उनकी बैंग्लोर डेज’, ‘चार्ली’, ‘टेक ऑफ़जैसी फ़िल्में देख चुकी थी और इन फ़िल्मों पर लिखा भी है।

एक प्रतिभाशाली परिवार की माँ (कामना चंद्रा) ने काफ़ी पहले रेडियो के लिए कहानी लिखी थी और बेटी (तनूजा चंद्रा) ने उसे थोड़ा और बड़ा कर फ़िल्म में ढ़ाल दिया। जी हाँ, मैं बात कर रही हूँ, ‘करीब करीब सिंगल’ (Qarib Qarib Singlle) की। सिंगल एक एलके साथ नहीं बल्कि दो एलके साथ क्योंकि यहाँ एक नहीं दो सिंगल हैं। तनूजा ने पहले भी तमन्ना’, ‘दुश्मन’, ‘संघर्षजैसी शानदार, लीक से हट कर फ़िल्मे बनाई हैं। वे उन कुछ फ़िल्म निर्देशकों में से हैं जो संख्या में नहीं, गुणवत्ता में विश्वास रखते हैं। करीब करीब सिंगल’ ‘रोम-कॉम (रोमांटिक कॉमेडी) ले कर वे काफ़ी समय बाद फ़िल्म दुनिया में आई हैं। उनकी यह फ़िल्म बॉलीवुड की मसाला फ़िल्मों से हट कर है। यहाँ भी है तो यही लड़का लड़की से मिलता है, दोनों दूर होते हैं फ़िर मिलते हैं और सारी बाधाओं को पार करके अंत में एक हो जाते हैं। आपको एक साथ दिल वाले दुल्हनियाँ ले जाएँगे’, ‘एक-दूजे के लिएऔर कई इसी तरह की और फ़िल्में याद आ गई होंगी। मगर यहाँ फ़र्क है। पहली बात तो यह कि ये लड़का लड़की नहीं हैं। जया 35 साल की स्त्री है, जिसका पति सेना में था और मर चुका है। वियोगी चालीसवें साल में प्रवेश कर चुका है और बकौल वियोगी तीन-तीन प्रेमिकाएँ अब भी उसकी याद में घुल रही हैं। यह दीगर है कि तीनों में से कोई भी उसके लिए बैठी हुई नहीं है, सब अपनी-अपनी जिंदगियाँ जी रही हैं। जाहिर-सी बात है दोनों उम्रदराज हैं, तो दोनों के अतीत का बोझ उन पर है।

दक्षिण भारतीय जया और उत्तर भारतीय वियोगी, दोनों अपने आप में मुकम्मल हैं, मगर कई बार मुकम्मल होना काफ़ी नहीं होता है। दोनों एक-दूसरे के बिल्कुल विपरीत हैं। जया शांत, गंभीर, बिना किसी दिखावे के है। मेकअप नहीं थोपती है। उसके कपड़ों का चुनाव भी बहुत सादा है। दूसरी ओर वियोगी या योगी चमकीली पोशाक में बकर-बकर (जया के शब्दों में) करने वाला। जया की एक बँधी-बँधाई नौकरी है, वह अपने काम में डूबी रहने वाली है, अपनी दोस्तों की सहायता करती है, कुछ दोस्त उसका फ़ायदा भी उठाते हैं। और योगी क्या करता है, यह अंत तक पता नहीं चलता है, हाँ, खर्च करने में शाह दिल है। मस्त-मौला, हमेशा फ़ुरसत में नजर आता है। इस प्रौढ़ प्रेम कहानी में योगी यानि इरफ़ान खान चुहल करते हैं मगर इरफ़ान खान में शाहरुख खान जैसे मैनरिज्म नहीं हैं। इरफ़ान के व्यवहार से आप कभी इरिटेट नहीं होते हैं।

जया साउथ इंडियन है मगर कहीं भी न तो नायिका का एक्सेंट साउथ इंडियन है,  न ही खान-पान, शायद मिलिट्री बैकग्राउंड के कारण अथवा एमएनसी में काम करने, महानगर में रहने के कारण। मात्र उसका नाम दक्षिण भारतीय है। हाँ, एकाध बार परेशानी में उसके मुँह से मलयालम निकलती है। एक सहेली की सलाह पर जया जिंदगी दोबारा शुरु करने के लिए डेटिंग साइट, ‘अब तक सिंगलपर अपनी प्रोफ़ाइल डालती है, मगर उसे एक-से-एक बेहूदा प्रस्ताव मिलते हैं। इससे सोशल साइट्स की आस्लियत जाहिर होती है। लेकिन जया को अपने जैसा, उसे समझने वाला लाइफ़ पार्टनर चाहिए। इन्हीं घटिया उत्तरों के बीच उसे मनमौजी योगी की प्रोफ़ाइल मिलती है। जिंदगी को भरपूर जीने वाला योगी कवि है, मगर प्रसिद्ध नहीं। जया उससे मिलने का फ़ैसला करती है। मिलने के पहले उसके अंदर एक हिचक है, बेशक वह तैयार होती है, मगर बड़ी शालीनता के साथ। अपने परिचितों और परिवार से वह झूठ बोलती है, कहती है ऑफ़ीसियल ट्रिप पर जा रही है।

शुरु में लगता है योगी अच्छा इंसान नहीं है, क्योंकि वह चालाकी से जया के मोबाइल का पासवर्ड और नंबर हासिल कर लेता है। दोनों का व्यवहार, दोनों के कपड़ों के रंगों का कॉन्ट्रास्ट दोनों के स्वभाव की भिन्नता को दिखाता है। शुरु में जया योगी को बिल्कुल सहन नहीं कर पाती है। उनके कॉन्ट्रास्ट का एक नमूना है, एक को बिना नींद की गोलियाँ निगले नींद नहीं आती है, दूसरा फ़ोन पर बात करते-करते, रिसीवर पकड़े खर्राटे भरने लगता है। पूरी फ़िल्म में दर्शक भले ही टहाके नहीं लगाता है मगर उसके चेहरे पार मुस्कान बराबर बनी रहती है।

जल्द ही वह उसे अपने साथ घूमने का निमंत्रण देता है, एक यात्रा जिसमें वह अपनी पुरानी प्रेमिकाओं से मिलने, उनका हालचाल पूछने जा रहा है। पहले जया हैरान-परेशान होती है मगर शीघ्र राजी हो जाती है और यहाँ से लग्जरी ट्रेन, स्लीपर क्लास, प्लेन, हेलीकॉप्टर, एयर ट्रॉली और टैक्सी, जीप से उनकी यात्रा शुरु होती है। आप सोच रहे होंगे यह फ़िल्म है या पर्यटन उद्योग का विज्ञापन। वैसे राजस्थान के अलावा कैमरा किसी अन्य लोकेशन पर ज्यादा अटकता नहीं है। पहले ये लोग ऋषिकेश जाते हैं, योगी की प्रेमिका जो अब दो बच्चों की माँ है, से मिलते हैं और वहाँ राफ़्टिंग करते हैं। प्रेमिका अपने बच्चों को उनके मामा से मिलवाती है और उसका पति योगी को साला कहता है। वहाँ से ट्रेन के लग्जरी कोच का नजारा शुरु होता है जो पकौड़ों के चक्कर में दोनों को एक बार जुदा कर देता है।

जया आत्मसम्मानी है, वह खर्च साझा करने की बात कहती है जिसे योगी मान लेता है। दोनों मिल कर कॉफ़ी शॉप को फ़ायदा भी पहुँचाते हैं। मगर लग्जरी कोच, हवाई जहाज और टैक्सी के पैसे कहाँ से आते हैं यह कभी स्पष्ट नहीं होता है, जाहिर है जया के बस का तो यह सब है नहीं, और योगी की सोर्स ऑफ़ इनकम...। खैर छोड़िए इस माथापच्ची को और लुफ़्त उठाइए फ़िल्म का। इरफ़ान और पार्वती की केमिस्ट्री गजब की है। दोनों चरित्र में उतर गए हैं, कहीं भी अभिनय करते नहीं लगते हैं। जया के दिल के साथ-साथ योगी दर्शकों के दिल में भी उतरता जाता है। नवनीत निशान, नेहा धूपिया और ईशा श्रावणी ने अपनी-अपनी भूमिका बखूबी निबाही है। नेहा धूपिया का लुभावना व्यक्तित्व दर्शकों को लुभाता है। ईशा श्रावणी नृत्य के लिए जानी जाती हैं। ब्रिजेंद्र काला कुछ पलों के किए हैं, मगर अपने अभिनय का लोहा मनवा लेते हैं। ईशित नारायण का कैमरा लोकेशन यात्रा में पड़ने वाले से अधिक चरित्रों की निजी और आंतरिक यात्रा पर अधिक केंद्रित रहता है, क्लोजअप्स में भावनाओं को पकड़ता है। एक-दो बार पात्र कैमरे में सीधे देखते हुए दर्शकों से भी मुखातिब होते हैं।

फ़िल्म की एक और विशेषता है इसमें गानों का उपयोग। यूँ तो हिन्दी फ़िल्में अपने गानों के लिए विशेष रूप से जानी जाती हैं। उस पर भी फ़िल्म यदि रोमांस हो तो गानों की भरमार, पेड़ों के इर्द-गिर्द उछल-कूद, नाच-गान तो होता ही है। मगर करीब करीब सिंगलमें हीरो-हिरोइन पेड़ों और बागीचों या एक्जोटिक लोकेशन पर नाचते-गाते नहीं हैं। उनकी उम्र भी नहीं है यह सब करने की। इस फ़िल्म में गाने हैं, मगर बैकग्राउंड में ही रहते हैं और कहानी में कुछ सार्थक जोड़ते हैं। जाने दोऔर खतम कहानीदोनों गानों का फिल्मांकन शानदार है। इसके लिए अतीफ़ असलम और राज शेखर को दाद देनी होगी। कहानी का हिस्सा दोनों गाने फ़िल्म के मूड को अभिव्यक्त करते हैं। गज़ल धालीवाल के संवाद फ़िल्मी न हो कर यथार्थ के अधिक निकट हैं।

धीरे-धीरे जया योगी को डिसकवर करती है साथ ही वह खुद को भी पहचानती है। अब वह अपने बारे में और अधिक श्योर है। दावे के साथ परिचितों को बताती है कि वह एक डेट के साथ घूमने आई है। अब वह लोगों के लिए मुफ़्त में उपलब्ध नहीं है। खुद के साथ-साथ वे एक-दूसरे को भी खोज निकालते हैं और पाते हैं कि वे एक-दूजे के लिए बने हैं। दोनों अपने अतीत का बोझ उतार कर वर्तमान और भविष्य के लिए नए सिरे से तैयार हैं।

दो घंटों से कुछ मिनट ऊपर की इस फ़िल्म में कहानी की माँग के अनुसार निर्देशिका तनुजा ने फिल्म की दिल्ली, अलवर, ऋषिकेश और गैंगटोक तक की लोकेशन पर शूट किया, और तनूजा का अपनी इस सरल-सी और अलग टाइप की प्रेम कहानी को इन खूबसूरत स्थानों तक मुख्य चरित्रों की यात्रा को पहुंचाना ही इस फिल्म की सबसे बड़ी यूएसपी बन गई है।

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डॉ. विजय शर्मा

डॉ. विजय शर्मा

326, न्यू सीतारामडेरा, एग्रीको, जमशेदपुर – 831009

मो.: 9430381718, 8789001919

ईमेल : vijshain@gmail.com

24 जून, 2011

समाज का चेहरा दिखाता गम्मत

विजय शर्मा


बहुत पहले रोहिंटन मिस्त्री का उपन्यास “सच ए लॉग जर्नी” पढ़ा था. उसमें इन्दिरा गाँधी की सभा की तैयारी, सभा और सभा के बाद का एक लम्बा दृश्य है. सत्यनारायण पटेल पाठकों को एक लम्बी यात्रा, “गम्मत” दिखाने ले चलते हैं. इस यात्रा में इतिहास, पुराण, मिथक, समाज और आज के समय की राजनीति, समाजशास्त्र, संस्कृति, रीति-रिवाज, शिक्षा, पर्यावरण के दर्शन होते हैं. इस यात्रा के दौरान दो फ़िल्में बन रही हैं. एक जो सब कुछ चैनल के मुताबिक बना कर बंशी को अपने चैनल देनी है. चैनल अपने मनमाफ़िक स्टोरी चाहते हैं. दूसरी ज्यादा स्वतंत्र जो बंशी के मन में बन रही है जिसे यदि मौका मिला तो वह उपयोग करेगा. बंसी की आँखें वह सब समेटती हैं जो उसका कैमर भी नहीं समेटता है. कहानी कहने के लिए कहानीकार पटेल ने दिमाग की स्क्रीन पर खिंची फ़िल्म और नजर से खींचे गए चित्रों का उपयोग किया है.

बंशी केवल कैमरे से ही फ़ोटोग्राफ़ी नहीं करता है, बल्कि जैसे कैमरा खामोशी से अपने भीतर, बाहर का शोरगुल समेटता रहता है, वैसे ही बंसी भी अपनी नजरों से बाहर का नजारा अपने भीतर समेटता रहता है. बंसी जन्म से है तो भील पर वह आम भीलों से थोड़ा अलग है. वह अलग सोचता भी है. असल में वह भिलाला यानि भील औरत तथा राजपूत पुरुष के संबंध से उत्पन्न संतान है. टिप्पणी है कि कभी सुना नहीं गया कि कोई राजपूत औरत और भील पुरुष की संतान हो. यहाँ संकेत है अत्याचार गरीब औरत पर होता है. बंसी प्रदेश के एक टीवी चैनल के लिए वीडिओग्राफ़ी करता है. इसी काम के लिए वह मुख्य मंत्री की प्रदेश बनाओ यात्रा पर काफ़िले के संग चल रहा है.

वीडियोग्राफ़र बंसी बहुत कल्पनाशील है. वह जीप में होकर भी जीप में नहीं है. उसके मगज की स्क्रीन पर समय-समय पर कई फ़िल्में चल रही हैं. कभी इतिहास साकार हो जाता है. कभी समाजशास्त्र, कभी वह राजनीति में उलझता है. कभी त्योहार की मस्ती में कुर्राटी भरने लगता है. इतिहास से निकल कर अलीया भील, बिरसा मुंडा, और चन्द्रशेखर आजाद उसके जोश को बढ़ा रहे हैं. सीधे-सादे भील विद्रोह पर उतारू हो जाते हैं. बाँसुरियाँ बन्दूक बन जाती हैं और तीर धनुषों ने खूँटी पर टँगे रहने से इन्कार कर दिया है.

चन्द्रशेखर आजाद आते हैं क्योंकि सी एम जी ने भाबरा में आजाद द्वार, आजाद मंदिर और जिले का नाम चन्द्रशेखर आजाद नगर करने की घोषणा कर दी है. कहानीकार बताता है कि कैसे राजा आनन्द देव राठौर ने अलीया भील को हरा कर अम्बिकापुर का नाम आनन्दवाली रखा जो लोगों की जुबान पर चढ़कर आली हो गया. वही आज पालीराजपुर (यह कुछ जमा नहीं आली भला कैसे पाली में परिवर्तित हो सकता है?) है. और इसी तक मुख्य मंत्री की शोभा यात्रा है. मुख्य मंत्री प्रदेश बनाओ के तहत कई फ़लिए की यात्रा पर हैं, जिसमें यह तमाम गम्मत हो रही है. जब एक युवक चन्द्रशेखर के वेष में स्टेज पर चढ़ता है और मंत्री के चरण छूता है तो बंसी खुद से संवाद करता है,
“क्या आज असली चन्द्रशेखर आजाद होते तो वह सी एम जी के चरणों में सिर झुकाते?
नहीं वह ऐसा हरगिज नहीं करते.
- फ़िर ?
- शायद यह गम्मत देख कर उसका खून खौल उठता.
- फ़िर ?
- शायद तिरसठ साल से इस क्षेत्र को अनपढ़, पिछड़ा बनाए रखने की साजिश करने वाली साम्राज्यवादी व्यवस्था के सी एम जी की फ़ालिए से गरदन उतार लेता.”
जीप में ड्राइवर सोमु भील और डामोर की बातचीत में अमेरिका की चौधराहट तथा नेताओं की खाली माली नौटंकी जिसमें करोड़ों का सत्यानाश होता है, पर व्यंग्य है. महुआ और ताड़ के रस के ड्रम के ड्रम भर कर भीलों के लिए रखे जाते हैं ताकि उन्हें गले गले तक रस में भर कर नेता की सभा में भीड़ दिखाने के लिए बैठाया जाए. यदि कोई भील कुछ पूछने का प्रयास करता है तो उसे नेता और पार्टी के कार्यकर्ता जबरदस्ती हाथ खींच कर बैठा देते हैं और कोई इसके बाद भी कुछ हिम्मत करता है तो इन्तजाम में लगे पुलिस वाले पिछवाड़े ले जा कर उसकी गत बना डालते हैं तो फ़िर वह कहीं नजर नहीं आता है. आखीर पुलिस को शान्ति व्यवस्था बनाए रखने के लिए रखा गया है.

कैसी विडम्बना है, इधर कार्यकर्ताओं द्वारा भीलों को शराब के नशे में धुत रखा जाता है, उधर नेता मंच से शराबबन्दी की अपील कर रहा है. पिछली पार्टी के नेता ने शराब बाँटी थी इसके उलट नेता को बोलना ही है. मगर जब उनको याद दिलाया जाता है कि शराबबन्दी से उनका नुकसान होगा जनता नशे में नहीं होगी तो अपने अधिकार माँगने लगेगी. भीलड़े अगर विद्रोही हो उठेंगे तो उन्हें सम्भालना मुश्किल होगा. दो ढ़ाई सौ जिलों में उन्होंने पहले ही नाक में दम कर रखा है. तो नेता सम्भल कर दूसरी बातों पर जोर देने लगते हैं. बड़ी लम्बी गम्मत है, सी एम कई जिलों का दौरा करने निकले हैं. आम जनता का दु:ख दर्द जानने पहचानने और बाँटने. जनता से मिलकर प्रश्न पूछते हैं मगर उत्तर सुनने के पहले आगे बढ़ जाते हैं. जनता का आशीर्वाद लेते, नहीं छीनते हुए नेता और उनके चमचों में से कोई नहीं देखता है कि डोकरी की पचास रुपए की बहुत मुश्किल से खरीदी गई दाल बिखर गई. उसका कोई गवाह नहीं है. उसे हर्जाना दिलाने की बात कोई नहीं सोचता है. ठीक वैसे ही जैसे तिरसठ सालों से गुड़कती विकास की गाड़ी के पहियों को सोमलाओं की गर्दन पर से गुजरते किसी ने नहीं देखा. कोई गवाह नहीं.

गाँव की गरीब, अनपढ़ आदिवासी जनता का उपयोग भीड़ जुटाने और मनोरंजन के लिए होता है. उनकी संस्कृति और वे खुद मात्र प्रदर्शन की वस्तु हैं. परम्परा को जीवित रखने के नाम पर जिन्दगी पर खतरा मंडरा रहा है. सी एम प्रदर्शनी देखते हैं. कला की तारीफ़ करते हैं, बाँसुरी बजाने का नाटक करते हुए फ़ोटो खिंचवाते हैं. उनकी लाड़ी (पत्नी) साथ हैं. वे भी प्रदर्शनी में रखे जंगली फ़ल कुतरती हैं. ज्यों-ज्यों यात्रा आगे बढ़ती है सी एम की सभा और उसमें कही उनकी बातों की लम्बाई कम होती जाती है. वे भ्रष्टाचार पर लगाम कसने, विकास दर ऊँची करने, बच्चों की शिक्षा के प्रति चिन्ता करने, लोगों से उन्हें योगदान करने की अपील करते हैं. हर सभा में जनता से प्रतिज्ञा कराते हैं, जिसका उनके कार्यकर्ताओं द्वारा आदिवासी भेष में बैठाए गैर-आदिवासी जोर-शोर से अनुमोदन करते हैं और नारों के शोर से धरती आसमान गूँज उठते हैं, नेता का काफ़िला आगे बढ जाता है. जनता उसी बदहाल हालत में पीछे रह जाती है.

कैसी सज-धज से सी एम जी का काफ़िला चल रहा है. उनकी कार के आगे पीछे सुरक्षा के लिए पाँच छ: गाड़ियाँ चल रही हैं. उसके पीछे करीब सौ सवा सौ कारों का काफ़िला दौड़ता आ रह है. वार्नर गाड़ी के आगे जन संपर्क कार्यालय की गाड़ी प्रदेश के विकास का गीत बजाती चल रही है. इन गाड़ियों से करीब एक किलोमीटर दूर कार्यकर्ताओं की गाड़ियाँ हैं जो आगे तमाशा जमाने का इन्तजाम करने, व्यवस्था जमाने जा रहे हैं. जब मत्री पर फ़ूलों की वर्षा की जाती है तो बंसी को माखनलाल चतुर्वेदी की कविता याद आती है, उसे फ़ूलों की अभिलाषा और उनकी दुर्दशा पर दु:ख होता है. उसे उनका सिसकना सुनाई देता है. कुछ दूरी मंत्री हेलीकोप्टर से पूरी करते हैं. तबका दृश्य बहुत विस्तार और सूक्ष्मता से चित्रित किया है सत्यनारायण पटेल ने. खूब भीड़ जुटी है. मगर ज्यादातर भील मंत्री नहीं उड़नखटोला देखने आए हैं. पूरी कहानी में मीडिया और मीडियाकर्मी की भी खासी खिंचाई की गई है. गौरतलब है कि पटेल साहित्यकार होने के साथ-साथ खुद एक मीडियाकर्मी हैं. वे मीडियाकर्मी को आज का नारद कहते हैं जो सत्ता के टुकड़ों पर पलता है. पूरे रास्ते डमोर सी एम का गुणगान करता रहता है, कारण है उसे सी एम के जीवन की डॉक्यूमेंट्री दिखाई गई थी. आज के नेता मीडिया का भरपूर उपयोग करना जानते हैं.

गम्मत में भीलों की उत्पत्ति और इतिहास, संस्कृति को उकेरा गया है. महादेव शिव के दो बेटों में से एक गरम मिजाज बेटे की संतति हैं. एक दिन गुस्से में वह पर तीर चला देता है और पिता महादेव उसे गुस्से में आकर अपने आश्रम से भगा देते हैं. बंसी सोचता है कि वह महादेव नहीं कोई ढ़ोंगी साधु या फ़रारी काटने वाला रहा होगा जिसने किसी सुन्दरी को अपने जल में फ़ंसाया होगा. बाल्मीकि जिसका नाम वालिया भील मान जाता है वह भी बंसी यानि भीलों के एक वंशज के रूप में चित्रित हैं. कृष्ण ने यादवों के साथ मिल कर गुजरात की ओर से भीलों पर हमला किया जिसके बदले में भीलों ने कृष्ण की जीवनलीला समाप्त कर दी. राम काल में वे निषाद के रूप में उपस्थित हैं. राम ने राजा बनने पर भील को सम्मान दिया और आज क्या होता है ? उन्हें ट्रक, बस या ट्रेन में भर कर हर समारोह में नचाने के लिए बुला लिया जाता है. राजनेता जरूरत पड़ने पर गधे को भी बाप कहते हैं और काम निकल जाने पर लात मार कर भगा देते हैं. आस्ल में नेताओं से ज्यादा उनके कार्यकर्ता दमन, शोषण और बेईमानी करते हैं. वे जनता को मंत्री तक पहुँचने नहीं देते हैं उसे अपनी सुरक्षा के घेरे में लिए रहते हैं. वही दिखाते करते हैं जिसमें उनका अपना स्वार्थ सधता है. वे चारण हैं. चापलूसी करके अपना स्वार्थ साधते हैं. गम्मत की पंक्ति है, इक्केसवीं सदी का/ देखो ठाठ/ खड़ी सोमला की खाट/ फ़ले फ़ूले चारण भाट. प्रजातंत्र चारण भाटों का राज्य बन कर रह गया है.

कहानी आज की शिक्षा व्यवस्था पर भी दृष्टि रखे हुए है. बंसी की बीबी और उसका दोस्त गोसेन कौन से अपने मनमाफ़िक पढ़ाते हैं...जो पिंजरा मैकाले ने बन दिया है... उसी में चक्कर काटते हैं...जो सिलेबस शिक्ष माफ़िया ने थोप दिया है...उसी का रट्टा लगवाते हैं... बंसी खुद ग्यारहवीं पास है उसने वीडियोग्राफ़ी का कोर्स किया हुआ है. इसीलिए उसने अपने दोस्तों की तरह गुलाल लगा कर लाड़ी नहीं चुनी बल्कि एक निमाड़न फ़ूलमती मास्टरनी से कोर्ट में शादी की है मगर अभी उसमें भीलों का काफ़ी कुछ बाकी है. उसका दोस्त सोमला भील स्कूल नहीं जाता है. सोमला अशिक्षित भीलों का प्रतीक है जिसे किसी भी दिशा में हाँका जा सकता है, जिनकी भूखी बीमार आवाज में मजबूत घेरे को भेदकर सी एम के कानों तक जाने की कूबत नहीं है. हिन्दी में बोली पूछी गई बातें उनके भीतर प्रवेश नहीं करती हैं. इसी कारण उनका यह हश्र है, कोई भी उन्हें रोंदता कुचलता हुआ आगे जा सकता है. ताड़ और महुए का रस देकर उनसे कुछ भी कराया जा सकता है. उनकी नशाखोरी का नेता फ़ायदा उठाते हैं. भीलों को घोषणाओं से कोई लेना देना भी नहीं है. वे तो नशे में धुत्त हैं और जैसे वे नाचने, ढोल, माँदल, बाँसुरी बजाने और कुर्राटी भरने को ही धरती पर पैदा हुए हैं. कहानीकार को चिन्ता है, सोमला की तन्द्रा कब टूटेगी? अशिक्षा का अंधेरा कब छँटेगा? जब बंसी मंत्री से प्रश्न और तर्क करने की हिम्मत करता है तो उसे इशारे से रोका जाता है और इस पर भी जब वह बाज नहीं अता है तो धमकी और भय दिखाया जाता है.

महाभारत के संजय की तरह बंसी और बंसी के माध्यम से कहानीकार सब समेटता, देखता दिखाता चलता है. उसे बचपन के खेल, किशोरावस्था में लड़के लड़की का एक दूसरे के प्रति आकर्षण, नाच गाना, तीज त्योहार, मेले, खेत-खलिहान, किस्से-कहानी, लोकगीत, लोक नृत्य, रीति रिवाज, राजनीतिज्ञों की चालबाजियाँ, देश की दुर्दशा, नेताओं का भ्रष्टाचार, स्त्रियों पर उनकी कुदृष्टि, मंच से किए गए उनके झूठे वायदे, सब चलचित्र की भाँति नजर आते हैं और वह इन रंग बिरंगे दृश्यों को पाठक को अपनी विशिष्ट बोली-बानी में दिखाता चलता है.

पटेल अपनी कहानियों में विद्रोह का मंत्र अवश्य देते हैं. एक और विशेषता है उनकी वे प्रतिरोध में स्त्री पुरुष दोनों को शामिल करते हैं. गम्मत इस मामले में थोड़ी अलग है. गम्मत कहानी का अंत भी क्रांति के दृश्य से होता है जहाँ निराला का मतवालापन है, शिव की मस्ती है और क्रांतिकारियों का बाना है. बंसी अपने भीतर देख रहा है, खुद के पैरों में भी घुँघरू बंधे हैं, बदन पर कपड़ों के नाम पर फ़ाटली चड्डी और बुशर्ट है. भीतर रोशनी का झरना झर रहा है....कुछ आदिवासियों ने अपने हाथ या फ़िर पैर के अँगूठे को तीर से चीर लिया है और केसरा भील, छीतू भील, भुवान तड़वी के वंशजों के भाल सुर्ख खून से तिलक कर रहे हैं. यह गद्दी पर बैठने की तौयारी है. पढ़कर फ़्रांस की क्रांति की याद हो आई जहाँ भूखी नंगी जनता ने तख्ता पलट डाला. यहाँ भी भील गद्दी पर बैठने की तैयारी में हैं. देखना है कब आएगा यह दिन. देश, समाज और दुनिया का जो हाल है उसमें किसी दिन ऐसा हो जाए तो कोई आश्चर्य नहीं होगा. जाने क्यों इस प्रतिरोध की गम्मत में उन्होंने भीलनियों को अंत में शामिल नहीं किया है. शुरु और मध्य में वे हैं, मगर अंत में नदारत हैं.
सत्यनारायण पटेल यहाँ अपनी पूरी धज में उपस्थित हैं. हिन्दी कहानी में आदिवासी समाज बहुत कम देखने को मिलता है जबकि भारत में उनकी खासी बड़ी संख्या है. मुझे यह कहानी इसलिए भी अच्छी लगी क्योंकि कई वर्षों से मेरे घर में “भील भारत” पर शोधकार्य चल रहा है. भील भारत व्यास रचित महाभारत से बहुत भिन्न मौखिक परम्परा का अंग है. भीलों का अपना रचा महाभारत है जहाँ सब वर्तमानकाल में चलता है. उसके नायक-नायिकाएँ मूल महाभारत से बहुत भिन्न हैं. जीवन्त हैं. गम्मत भी बहुत जीवन्त कहानी है. भीलों के जीवन से परिचित करा कर हिन्दी साहित्य को आगे बढ़ाने वाली उसे समृद्ध करने वाली. अपने समय और समाज पर अँगुली धरने वाली. कथन रस से सराबोर हाशिए पर पड़े लोगों को संवेदनशीलता के साथ कथा साहित्य के केन्द्र में लाती हुई. इसमें भीलों के इतिहास का रचनात्मक मूल्यांकन है. व्यवस्था का चेहरा नंगा करती गम्मत आजादी के इतने दशक बाद भी यहाँ की जनता का असली हाल वर्णित करती है. यह न केवल प्रतिकूलताओं की तस्वीर खींचती है वरन प्रतिरोध का स्वर और स्वप्न भी प्रस्तुत करती है.

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16 अगस्त, 2010

मटिल्डाः बचपन का करीश्मा



विजय शर्मा
बच्चे कई दुनिया में एक साथ रहते हैं या यूँ कहा जाए कि रहने को मजबूर होते हैं। एक ओर वे वयस्कों के साथ रहते हैं जिसमें क्रूरता, अत्याचार, धोखाधड़ी, चालबाजी होती है और होते हैं बच्चों को नियंत्रित करने के लिए नियम-कायदे तथा अनुशासन। दूसरी ओर बच्चे अपने हमजोलियों, अपने हम उम्र बच्चों के साथ रहते हैं, जहाँ मासूमियत, साझापन, कल्पनाएँ और हँसी-ख़ुशी होती है। वयस्कों की दुनिया से दूर एक और तीसरी दुनिया में बच्चे रहते हैं। यह है उनकी आंतरिक दुनिया जिसके विषय में वे स्वयं ज्यादा नहीं जानते हुए भी उसकी विभिन्न संवेदनाओं और शक्तियों का अनुभव करते हैं। उनकी इस दुनिया में न तो व्यस्कों को रुचि होती है न ही वे इसके विषय में ख़ास जानते-समझते हैं। मनोवैग्यानिक भले ही उनकी इस दुनिया में सेंध लगाने का प्रयास कर रहे हों पर कुछ ख़ास नहीं जान पाएँ हैं, क्योंकि हर बच्चे की यह दुनिया बिलकुल अलग है। ऎसी ही कई अनोखी दुनिया में जी रही है एक छोटी बच्ची मटिल्डा।
मटिल्डा एक छोटी-सी, प्यारी-सी और अति संवेदनशील एवं अति तीव्र बुद्धि की बच्ची है। दुर्भाग्य से उसका जन्म एक ऎसे परिवार में हुआ है, जहाँ वह पूरी तौर पर मिसफिट है। घर में उसका भाई उसके ठीक विपरित खाओ-पीओ और मस्त रहो का नमूना है। उसे बहन को तंग करने में ख़ास मज़ा आता है। माँ जिसे बच्चों की देखभाल करनी चाहिए और बच्चों में अच्छे सँस्कार डालने चाहिए, वह अपने आप में एक और नमूना है। दिन-रात बिन्गो खेलने, टीवी पर बकवास सीरियल देखने और तेलीफ़ोन पर गप्प मारने, गॉसिप करने से जीनिया वर्मबुड को फुरसत नहीं है। वह अपने और टीवी के परदे के बीच किसी तीसरे को सहन नहीं कर सकती है। मटिल्डा का पिता हैरी वर्मबुड भी है, मगर वह भी नैतिक-अनैतिक की चिंता से उपर एक धूर्त व्यापारी है, जो पुरानी कार धोखे से अपने ग्राहकों को बेचता है, जिसका भेद प्रशासन को मिल चुका है और एफ बी आई के जासूस जिसकी निगरानी कर रहे हैं। पढ़ने-लिखने को बेकार क काम मानते हुए वह लाइब्रेरी से लाई मटिल्डा की एक किताब सिर्फ़ इसलिए नष्ट कर देता है, क्योंकि इस किताब का नाम ‘मोबी डिक’ है। किताब प्रसिद्ध लेखक हरमन मेल्विल की है इसका उसे भान नहीं है, मगर शीर्षक का ‘डिक’ शब्द उसे अश्लील लगता है और वह उसे नष्ट कर देता है। मटिल्डा के माता-पिता वयस्क हैं, मगर प्रौढ़ता के कोई लक्षण उनके अन्दर नहीं हैं।
माता-पिता बच्चों के प्रति इतने लापरवाह हैं कि उन्हें मटिल्डा की उम्र याद नहीं है, वे बराबर उसे चार साल की कहते हैं और वह हर बार उन्हें सुधार कर कहती है कि वह साढ़े छः साल की है, इस पर उसे झूठा कहा जाता है और उसे मुँह बन्द रखने का आदेश मिलता है। चुपचाप अच्छे बच्चे की तरह जाकर टीवी देखने का आदेश दिया जाता है। और माता-पिता सोचने लगते हैं कि ज़रूर इस लड़की में कुछ गड़बड़ी है।

ऎसे परिवार में कुशाग्र बुद्धि मटिल्डा क्या करे ? वह पढ़ना चाहती है। चुटकी बजाते गणित के भारी भरकम सवाल हल करने में उसे मज़ा आता है। वह मिन्नत करती है कि उसे स्कूल भेजा जाए। उसका पिता एक स्कूल की हेड मिस ट्रंचबुल को एक पुरानी कार बेचने में सफल हो जाता है। बदले में मटिल्डा का उस स्कूल में दाखिला करा दिया जाता है। इलाके का यह क्रंचमहाल एलीमेंट्री स्कूल भी अपने ढंग का अनोखा स्कूल है। हेड मिस्ट्रेस ओलम्पिक की पूर्व खिलाड़ी है। उसे हैमर थ्रो में मेडल मिला है। वह इतनी क्रू है कि हैमर की भाँति ही वह बच्चों को भी बाल पकड़ कर घुमा कर खिड़की के बाहर फेंकती है। इस स्कूल में क्रूरतम सज़ा का प्रावधान है। बच्चों को एक संकरी अलमारी में सीधे खड़े करके बन्द कर देना, इस अलमारी की भीतरी दीवालों पर नुकीली कीलें और काँच के तीखे टुकड़े लगे हुए हैं। बच्चे के ज़रा भी हिलने-डुलने की गुंज़ाइश नहीं है। इसमें बन्द होने की कल्पना मात्र से बच्चों के भीतर होने वाली दहशत की कल्पना कठिन नहीं हैं।

वयस्कों की इसी क्रू दुनिया के बरअक्स बच्चों की एक और दुनिया है। वे बड़ों से भयभीत है, मगर उनमें आपस में बड़ा भाईचारा है। वे एक-दूसरे को बड़ों के अत्याचार से बचाने के लिए एकजुट हैं। सज़ा पाने की परवाहन करते हुए भी शरारत करने वाले अपने साथी का नाम बताने को राजी नहीं हैं। वे ज़िन्दगी की छोटी-छोटी ख़ुशियों का मज़ा उठाते हैं। बात-बात पर हँसते हैं। क्रूरता का सामना अपनी मासूमियत और शरारतों से करते हैं।

इसी स्कूल में मटिल्डा की क्लास टीचर मिस जेनीफर हनी है। यह प्यारी-सी टीचर बच्चों को बहुत प्यार करती है,मगर बच्चों को हेड मिस्ट्रेस की क्रूरता से नहीं बचा पाती है। कारण वह स्वयं उससे भयभीत है। वह बच्चों को समझाती है। उसे ही सबसे पहले मटिल्डा की प्रतिभा का पता चलता है। आगे चलकर मटिल्डा की बहादुरी मिस हनी में भी साहस का संचार करती है, इसलिए जब अंत में ट्रंचबुल उसकी कलाई मरोड़ कर दोबारा उसका हाथ तोड़ने की बात कहती है तो वह अपना हाथ छुड़ाकर कह पाती है, ‘अब मैं सात साल की नहीं हूँ आॉन्ट ट्रंचबुल’ और बच्चों को उनके संबंधों का पता चलता है। वे चकित रह जाते हैं। मटिल्डा मिस हनी को उसका जायज प्राप्य दिलाने में कामयाब रहती है।

हम सबके भीतर दुनिया की असीमित शक्ति है, मगर वयस्क होने पर हम उसे भुला बैठते हैं। ज़िन्दगी में हार मान बैठते हैं। मिस हनी भी मान बैठी है कि उसे इसी तरह निरीह जीवन बिताना है। मटिल्डा के रूप में उसे एक प्यारा साथी मिलता है, जिससे वह अपनी ज़िन्दगी के कै पहलू साझा करती है। इसी बीच मटिल्डा को अपनी टेलेकाइनेटिक (वह यह नाम नहीं जानती है) शक्ति का पता चलता है।पहले यह शक्ति आकस्मिक और मटिल्डा के हाथ के बाहर होती है। शीघ्र ही वह अभ्यास और दृढ़ इच्छा सक्ति से इसे वस में कर लेती है। अब वह अपनी इस आंतरिक शक्ति का मनचाहा उपयोग कर सकती है। अपनी, मिस हनी तथा स्कूल के अन्य बच्चों की कई समस्याओं का चुटकी बजाते समाधान कर देती है। मिस ट्रंचबुल को भी स्कूल से भागने पर मजबूर कर देती है। इस तरह यह छोटि बच्ची अपनी सूझ-बूझ और विशिष्ट सक्ति से परिस्थितियों को मनचाहा मोड़ देने में कामयाब रहती है। वैसे बाद में इस शक्ति का उपयोग वह मात्र छोते-मोटे कामों, जैसे अलमारी से किताब निकालने के लिए ही करती है।

नॉर्वीजियन माता-पिता की संतान रोअल डाल का जन्म 1916 में हुआ। द्वितिय विश्व युद्ध में घायल होने के बाद लीबिया में फाइटर पायलेट के रूप में भी काम किया। विंग कमांडर के पद तह पहुँचने वाले रोअल डाल ने सेना में रहते हुए ही कहानियाँ लिखनी शुरू कर दीं। ये कहानियाँ पहले अमेरिका की विभिन्न प्रमुख पत्रिकाओं में प्रकाशित हो रही थीं बाद में किताब के रूप में भी प्रकाशित ह्ने लगीं। जल्द ही वे बेस्ट सेलर होने लगीं। कई कहानियों का टेलीविजन पर नाट्यरूपांतर भी हुआ। ‘बॉय’ तथा ‘ गोइंग सोलो’नाम से दो भागों में उनकी आत्मकथा भी उपलब्ध है। उन्के सत्तरवें जन्मदिन पर उनके सम्मान में 1986 में वाइकिंग प्रकाशन ने ‘टू फेबल्स’ प्रकाशित की। उनकी मृत्यु 1990 में हुई परंतु अपनी कहानियों के साथ वे सदा पाठकों को याद रहेंगे।

इसी ब्रिटिश उपन्यासकार, कहानीकार तथा स्क्रीनप्ले लिखने वाले रोअल डाल ने बच्चों के लिए बहुत सारी बेस्टसेलर किताबें लिखीं है। ‘जेम्स एंड द जायन्ट’, ‘चार्ली एंड द चॉकलेट फैक्टरी’, ‘द विचेज’, ‘मटिल्डा’ आदि बच्चों के लिए उनकी प्रसिद्ध किताबें हैं। उनकी किताबें मनुष्य के श्याम पक्ष को बड़ी शिद्दत से उभारती हैं और हँसी-हँसी में बड़ा सन्देश दे जाती हैं। वग डार्क ह्यूमर के लिए जाने जाते है। ‘चार्ली एंड द चॉकलेट फैक्टरी’ तथा ‘मटिल्डा’ पर लोकप्रिय फ़िल्में बनी जिन्हें दर्शकों के साथ-साथ फ़िल्म समीक्षकों ने भी सराहा । उन्हीं की किताब ‘मटिल्डा’ पर इसी नाम से डैनी डेविवो ने फ़िल्म बनाई है। डैनी डेविटो एक प्रतिभाशाली बहुगुण सम्पन्न कलाकार हैं। उन्होंने बड़ी ख़ूबसूरती से मटिल्डा किताब को रूपहले पर्दे पर रूपांतरित किया है। पहलि बार देखने पर यह भले ही एक सामान्य-सी फ़िल्म लगे, लेकिन दूसरी बार ध्यान से देखने पर मनोवैग्यानिक सूझ और गहराई तथा ख़ूबसूरती का अन्दाज़ा होता है। एक क्लासिक की यही विशेषता होती है। उसए जितनी बार पढ़ा या देखा जाए उसमें निखार आता जाता है। नई-नई बातें दिखाई पड़ती हैं, इसीलिए इस किताब और फ़िल्म को क्लासिक का दर्जा दिया जा सकता है। मटिल्डा के किरदार में मारा विल्सन ने कमाल का अभिनय किया है। इसके लिए उसे यंग स्टार अवार्ड प्राप्त हुआ। बच्ची तथा अन्य बच्चों से इतना बेहतरीन अभिनय करा ले जाने के लिए डैनी डिविटो तारीफ़ के काबिल हैं। फ़िल्म में वे पिता हैरी तथा कथावाचक की भूमिका में भी सर्वोत्तम प्रभाव डालने में सफल हुए हैं। माँ जीनिया की भूमिका में रिया परमैन ने बहुत प्रमाणिक अभिनय किया है। भोली सुकुमार और सुन्दर मिस हनी के लिए एम्बर्थ डेविट्ज का चुनाव सटीक है। मटिल्डा के भाई माइकेल ‘मिकी’ वर्मवुड के लिए ब्रायन लेविनसन अन्य चरित्रों के लिए भी अनुकुल अभीनेताओं का चुनाव इस फ़िल्म की विशेषता है।

मटिल्डा के आसपास के वयस्क हमें अपने जीवन में ख़ूब देखने को मिलते हैं। हम स्वयं भी अक्सर जाने अनजाने में वैसा ही व्यवहार करते हैं जैसा इस फ़िल्म के विभिन्न वयस्क क़िरदार करते हैं। यह बात दीगर है कि फ़िल्म में इसे फ़िल्म और हॉलीवुड की शैली में बढ़ा-चढ़ाकर प्रदर्शित किया है। साथ ही इसमें हास्य और व्यंग्य की चासनी भी मिलाई गई है। यह हास्य व्यंग्य कहीं भ भोंडा, भदेस और फूहड़ नहीं होता है। हमारे आसपास ऎसे शिक्षक-शिक्षिकाओं की कमी नहीं है जो मिस ट्रंचबुल की भाँति छात्रों को मुसीबत मानते हैं। भले ही अपनी इस दिली भावना को वे सार्वजनिक रूप से उजागर न करते हो।

ट्रंचबुल को वही स्कूल अच्छा लगता है, जिसमें बच्चे न हों, वह न देखने में भयानक है, वरन उसका एक एक काम-चलना, बोलना, खाना पीना सब भयानक और राक्षसी जैसा है। उसका पक्का विश्वास है कि गुरू से ज्यादा उसका सोटा पढ़ाता है। वह मानती है कि वह वयस्क है, बच्चे छोटे हैं अतः वह सही है.. वे ग़लत हैं। उसे सज़ा देने का अधिकार है और सज़ा झेलना उनका कर्तव्य। पाम फेरिस काफी समय तक अपना रूप नहीं बदलती थी और बच्चों को तंग किया करती ताकि वे उससे भयभीत रहें और जब अगली बार शूटिंग हो तो वे उसके संग वैसे भी डरता हुआ अभिनय करें।
इस फ़िल्म को मात्र मनोरंजन का नाम देकर नहीं छोड़ा जा सकता है। ऎसे माता-पिता की भी हमारे समाज में कमी नहीं है जिनके पास अपने बच्चों के लिए समय नहीं है और जो बच्चों के कौतुहल, उनकी जिग्यासा से उकताए रहते हैं वे यह भूल जाते हैं कि सीखने की प्रक्रिया तभी तक चलती है जब तक कोई व्यक्ति जिग्यासू है, प्रश्न पूछता है। जिस दिन आदमी प्रश्न पूछना बंद कर देता है उसका कौतुहल मर जाता है। उसी पल से उसका सीखना समाप्त हो जाता है। एक तरह से उसकी मृत्यु हो जाती है। हम व्यस्क बच्चों की इस मृत्यु के ज़िम्मेदार हैं। कुछ समय न होने का बहाना और कुछ स्वयं की अग्यानता हमें बच्चों के प्रश्न पूछने की आदत से खिजाती है। उनके मासूम प्रश्नों के उत्तर वयस्कों को मालूम नहीं होते हैं और वे चिढ़ जाते हैं और उनकी प्रश्न करने की इच्छा मर जाती है, उनका सीखना दम तोड़ देता है।
मटिल्डा भाग्यशाली है उसे मिस हनी जैसी हमदर्द टीचर मिली है और वह किताबों से प्रेम करती है। उसके आसपास के वातावरण को देख कर आश्चर्य होता है कि वह किताबों की ओर कैसे मुड़ी। किताबों का चस्का बचपन में लगता है और ताउम्र साथ देता है। अक़्सर किताबों की रुचि रखने बच्चों को कोई गाइड करने वाला नहीं होता है कि वे क्या पढ़े और क्या न पढ़े। इस तरह किताबों के जंगल में घुस कर राह बनाने का अपना सुख है, मगर समय भी बरबाद होता है। जिन बच्चों को कोई सही दिशा निर्देश मिल जाता है वे कम समय में ज्यादा अच्छी किताबों का आन्नद उठा सकते हैं। मटिल्डा ने बहुत कम उम्र में व्यस्कों की किताबें भी पढ़ डाली है, लेकिन फ़िल्म के अंत में मिस हनी और वे मिल कर बच्चों की किताबें ही पढ़ती दिखाई गई है। इससे दोनों के मासूम होने को प्रतीकात्मक ढंग से दिखाया गया है। बड़े-बड़े काम करने वाली मटिल्डा अंततः छोटी बच्ची ही है। उसे लाड़ प्यार दुलार की आवश्यकता है। उसे सही देखभाल चाहिए। उसे एक साथी की आवश्यकता है। कितने बच्चे ऎसे होते हैं जिन्हें यह सब मिल पाता है ?

फ़िल्म कटाक्ष करती है कि वयस्क चाहे वह अभिभावक हों अथवा स्कूल के लोग बच्चों के संग कैसा व्यवहार करते हैं यह शिक्षा विमर्श उत्पन्न करती है। शिक्षा के नाम पर बच्चों को क्या मिलता है ? कैसे मिलता है ? इस पर प्रकाश डालती है। पिता की ठगी की सज़ा बेटी को मिलती है। हेड मटिल्डा से बदला लेती है.. क्या आये दिन हम ऎसी घटनाएँ देखते-सुनते और उनके बारे में पढ़ते नहीं हैं ? क्या इसी डर से हमारे यहाँ पेरेंट टीचर एसोशिएशन या मीट दिखावा मात्र बन कर नहीं रह जाते हैं जो संस्था बच्चों के विकास और प्रगति के लिए कायम होनी चाहिए वह मात्र मखौल बन कर रह गयी है। मटिल्डा फ़िल्म के कथ्य और संवाद दोनों जहाँ मनोरंजन करते हैं वहीं सोचने विचारने को प्रेरित भी करते हैं। फ़िल्म का संगीत पक्ष बड़ा मनोरम है। इसमें कॉमेडी के साथ-साथ एडवेंचर का भरपूर मसाला है। कल्पना की उड़ान है तो जादूई और करीश्माई तत्व भी हैं। इस साफ़ सुथरी फ़िल्म को परिवार की दो-तीन पीढ़ियाँ एक साथ बैठ कर देख सकती हैं और आनन्द उठा सकती हैं।

निर्देशक फ़िल्म विधा की माँग के अनुसार कहीं-कहीं पर किताब से विचलित भी होता है, मगर मूल आत्मा को नहीं छेड़ता है, वह ज्यों कि त्यों सुरक्षित है। छोटे-मोटे परिवर्तन हुए हैं जैसे किताब में मटिल्डा की जिस किताब को उसका पिता नष्ट करता है वह हरमन मेलविल कीमोबी डिक न होकर जॉन स्टीनबेक की रेड पोनी है। इसी तरह मिस ट्रंचबुल के स्कूल से पलायन के बाद फ़िल्म में मिस हनी स्कूल की प्रमुख बनती है, मगर किताब में ऎसा नहीं है, वहाँ एक अन्य शिक्षिका यह पद सम्भालती है। जब मिस ट्रंचबुल मिस हनी की क्लास ख़ुद लेने का फ़ैसला करती है तो जो सारा कुछ वहाँ बच्चों और उसके बीच होता है वह किताब में इतने विस्तार से नहीं है, मगर यहाँ वह मिस ट्रंचबुल और मटिल्डा के बीच एक लम्बी प्रतिद्वंद्विता बन जाता है। इस द्वंद्विता में मिस ट्रंचबुल का शारीरिक बल और मटिल्डा की मानसिक शक्ति के बीच मानो प्रतियोगिता हो रही है, ऎसा लगता है। जब मिस ट्रंचबुल एक बच्ची को उसकी चोटी से उठा कर, नचा कर फेंकती है तो वह किताब में ज़मीन पर गिरती है और उसे चोट लगती है जबकि फ़िल्म में उसे चोट नहीं लगती है। वह फूलों पर गिरती है और फूल लाकर अपनी टीचर को देती है। किताब में नीग्रो बच्ची को नीग्रो नहीं कहा गया है, वहाँ वह सिर्फ़ छोटी-सी निन्फ है। कथानक में हेरफेर फ़िल्म की माँग है। यह एक फंतासी फ़िल्म है अतः किताब की ग़रीब मिस हनी फ़िल्म में बहुत धनी न होते हुए ग़रीब भी नहीं है और भोतिक रूप से एक आरामदायक ज़िन्दगी बिताती दिखाई गयी है। मटिल्डा को जब मिस ट्रंचबुल सज़ा देने के लिए अलमारी में बंद होने का आदेश देती है तो मिस हनी उसे बचा लेती है, मगर किताब में उसे बंद किया जाता है। किताब में मटिल्डा कई क्लासिक किताबें पढ़ती है और बहुत अच्छा खाना बनाती है। लिखित कहानी ब्रिटेन में घटित होती है जबकि फ़िल्म अमेरिका में। एफबीआई की कहानी फ़िल्म में कई फ्रेम घेरती है जबकि किताब में वह महत्त्वपूर्ण नहीं है। फ़िल्म चाक्षुस कला है अतः इसमें स्पेशल इफेक्ट्स का भरपूर उपयोग किया गया है। वह दृश्य मनमोहक है जब मटिल्डा अपनी शक्ति का ज़श्न मनाती है और गाना गाकर नाचती हुई विभिन्न वस्तुओं को उनकी जगह से उठाती हटाती है।

1996 में बनी इस फ़िल्म ने जमकर पुरस्कार बटोरे। मारा विल्सन को यंग स्टार अवार्ड, डेनी डिविटो को बेस्ट डायरेक्टर अवार्ड (ओडियंस अवार्ड, स्टारबॉय अवार्ड), डेनी डिविटो को स्पोर्टिंग रोल अवार्ड आदि कई पुरस्कार मिले। इसे अन्य कई श्रेणियों में नामित किया गया था। रोअल डाल की किताब पर आधारित स्क्रीनप्ले निकोलस कज़ान ने तैयार किया है।
इस फ़िल्म के संवाद के क्या कहने ट्रंचबुल का विचार स्कूल के विषय में बताया जा चुका है। आ ज़रा मटिल्डा की माँ की बात भी सुनें। जब मिस हनी उसे बताती है कि आपकी बेटी बहुत इंटेलीजेंट है वह कहती है, एक लड़की इंटेलीजेंट होकर कहीं नहीं पहुँच सकती है। फिर वह मिस हनी और अपनी तुलना करते हुए कहती है ख़ुद पर और मुझ पर नज़र डालो। तुमने किताबें चुनी और मैंने सुन्दरता। मेरे पास एक अच्छा घर, एक वंडरफुल पति है और तुम रेंटा बहाते बच्चों को ए बी सी पढ़ाने की ग़ुलामी कर रही हो। तुम चाहती हो कि मटिल्डा कॉलेज जाए.. और हँसती है।

पिता-पुत्री के संवाद का नमूना देखें
हैरीः किताब ? तुम्हें किताब क्यों चाहिए ?
मटिल्डाः पढ़ने के लिए..।
हैरीः पढ़ने के लिए..? तुम किताब क्यों पढ़ना चाहती हो जब तुम टी वी के सामने बैठी हो ? ऎसा कुछ नहीं है जो किताब से मिलता है और टी वी से तेज़ी से नहीं मिल सकता है।
इसी तरह जब मटिल्डा पिता को ठगी करने से रोकना चाहती है उसका पिता कहता है, ‘मैं स्मार्ट हूँ तुम डम हो.., मैं बड़ा हूँ.. तुम छोटी हो.., मैं सही हूँ… तुम ग़लत हो.. और इसके विषय में तुम कौछ नहीं कर सकती हो..’ बस बात ख़तम। ट्रंचबुल के लिए बच्चे पैदा करना ग़लती है और उसने यह कभी नहीं किया। उसके लिए बच्चे गन्दी चीज़ हैं। स्कूल में क्लास के बोर्ड पर उसके द्वारा लिखा हैः यदि तुम मज़े कर रहे हो तो तुम सीख नहीं रहे हो। ’ उसकी समझ में नहीं आता है कि बच्चे बड़े होने में इतना समय क्यों लगाते हैं। उसे लगता है कि शायद जानबूझ कर उसे तंग करने के लिए वे ऎसा करते हैं। वह मिस हनी को धमकी देते हुए कहती है तुम्हें स्पेलिंग सिखाने के लिए कहा गया है, कविता नहीं। मिस ट्रंचबुल की भाषा सुन कर मुझे स्कूल टीचर्स के एके सेमीनार की याद आती है। इस सेमीनार के दौरान सेमीनार संचालक ने एक एक्टीविटी के दौरान टीचर्स से कहा कि वे ईमानदारी से उन शब्दों की लिस्ट बनाएँ जो वे बच्चों के साथ प्रयोग करते हैं उन्हें यह भी कहा गया कि इस सूची को किसी से शेयर करने की बाध्यता नहीं है। लिस्ट बनाने के बाद कुछ शिक्षकों ने शेयर किया और क़रीब-क़रीब सब शर्मिन्दा थे कि वे इस तरह की शब्दावली का प्रयोग करते हैं कि जिन शब्दों का उच्चारण करने से आज उनका माथा झुक रहा है।

इस फ़िल्म से संबंधित कुछ बातें जानना मज़ेदार होगा। फ़िल्म में मिस हनी के पिता मैग्नस का फोटो असल लेखक रोअल डाल का फोटो है। मिस हनी के बचपन की अपनी गुड़िया का नाम लिसी डॉल है असल में यह नाम कहानीकार की पत्नी का नाम है डाल ही डॉल बन गया है। मारा विल्सन जब मटिल्डा की भूमिका कर रही थी उसी दौरान उसकी असली माँ कैंसर से गुज़र गयी परंतु वह शूटिंग करती रही और इसे देख कर सब चकित थे। पहले केयली और ईटन टाईडॉल को मटिल्डा के रोल के लिए चुना गया था, मगर दोनों को फ्लू और बुखार हो गया और यह भूमिका मारा विल्सन की झोली में आई। अगर किसी ने यह फ़िल्म अभी तक नहीं देखी है तो उसे यह फ़िल्म अवश्य देखनी चाहिए। ख़ुद भी देखें अपने बच्चों को दिखाएँ अपने मित्रों को दिखाएँ और तो और उनके बच्चों को भी दिखाएँ। सब स्कूलों और सब शिक्षक-शि़क्षिकाओं और स्कूल प्रमुख को अवश्य दिखाएँ।

फ़िल्मः मटिल्डा (1996)
निर्देशकः डैनी डिविटो
निर्माताः डैनी डिविटो, माइकेल सीगल तथा अन्य
लेखकः रोअल डाल
स्क्रीन प्लेः निकोलस कज़ान
कथावाचकः डैनी डिविटो
अभिनयः मारा विल्सन,डैनी डिविटो, पाम फेरिस, रिया पर्लमैन, एम्बर्थ डेविड्ट्ज़
संगीतः डेविड न्यूमैन
समयः 98 मिनट