image

सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल
कुमार मंगलम की कविताएं लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
कुमार मंगलम की कविताएं लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

28 जून, 2018


कुमार मंगलम की कविताएं



कुमार मंगलम



अविचलित

सर्जक अपने सृजन में
रचते हैं, गढ़ते हैं प्रतिमाएं कई

नीचताएँ, कटुताएँ और तिक्तताएँ
धरी की धरी रह जाती हैं
कोई कडुआहट नहीं बचती
एक सहज सुंदर प्रेम बचता है अंततः

धोखेबाज शब्द भी धोखा नहीं देते
भाषा के अनंत आकाश में
अचरज से विचरते हैं अभी तक

एक शुद्ध सृजन
और बहुत भव्य भाव लिए बचे रहते हैं

जबकि जो नियम बनाते हैं
वे नहीं चाहते कोई उच्चारित करे
एक भी शब्द उनके खिलाफ
उनके नियमों में वे गायब कर दिए जाते हैं

एक हताश रचनाकार भी
गायब होते पृष्ठ की तरह अविचल
फड़फड़ाता रहता है

रचनाकार जिद्दी आदमी है
जो सदियों से खड़ा है
अपने एक टांग पर
भाषा के गह्वर में नजर गड़ाये
दूसरे टांग से अनभिज्ञ ।




इंतज़ार

तुम्हारे जाने के बाद
याद आती रही एक संगीतमय महफ़िल
और उसकी उत्तेजना

अंतहीन बहसों का
किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचना

भोर की मद्धम आवाज
और सूर्योदय से पहले की विदाई
मैंने सोचा था
तुम वापस आओगे
रास्तों से परे
आसमान के विस्तार जैसा किया इंतज़ार

लौटते वक्त जब हम
आलिंगन में बद्ध होते
क्षितिज पर या किसी पहाड़ी की चोटी पर
मिलते निर्वस्त्र और अशरीरी ।




माटी

हमारे दादा परदादा
हमारे पूर्वज
जब कभी कहीं गए
अपने साथ ले गए माटी
और
माटी के गीत

जब माँ आई नानी के घर से
ले आई नानी के घर की माटी
और वहां के गीत

जब मेरी बेटी हुई विदा
ले गयी माटी मेरे घर की

माटियों से बना एक देश
मैं बनजारा
मुझे कोई एक माटी नहीं
समूचा देस मिला ।









राजन जय हो
(कवि श्रीकांत वर्मा को समर्पित)

राजन जय हो
विजयी हुए आप
विरोधी परास्त हुए

मंत्री जी का सुझाव है
आप विश्व भ्रमण कीजिये ।

2.
राजन जय हो
आपकी प्रजा आपको राजा मान चुकी है
किंतु एक भय है
वह सोचती है
वह सोच सकती है
आपके अच्छे दिन के बरक्स
अंधेरे में धकेल दिए जाने की योजनाओं के बारे में...

आप आश्वस्त रहें
प्रजा के एक बड़े वर्ग के दिमाग में भांग भरा जा चुका है

मंत्री जी का सुझाव है
पहला हमला सोचने वाले निकाय पर हो ।

3
राजन जय हो
आपके इच्छा के अनुसार
इतिहास बदलने का समय आ गया है
किंतु एक भय है
इस देश का इतिहास लिखित नहीं वाचिक भी है

मंत्री जी का सुझाव है
आप जोर जोर से चिल्लाते रहिये ।

4
राजन जय हो
आपके साम्रज्य को सुरक्षित किया जा रहा है ।
आने वाले वोटरों को
मंत्री जी के अतिविशिष्ट उपाय द्वारा
उन्हें भ्रमित किया जा चुका है ।
उनके दिमाग में भूसा भरा जा चुका है
लेकिन एक गड़बड़ी है
कुछ युवा नौकरी-नौकरी चिल्ला रहे हैं

मंत्री जी का सुझाव है
उनपर अनवरत लाठियाँ बरसायी जाए ।

5
आधी रात

पंखे की घर्र-घर्र,
पत्तों की सरसराहट,
तन्हा और चुप-चुप रात
चाँद सिसकता हो जैसे







तन्हाई

चाँद आज अकेला है
तेज हवाएँ
बादलों को उड़ा ले जा रहीं हैं
फिर भी उसके संगत में नहीं है कोई तारा
अकेले चाँद को देखकर
सिसकती है एक बिल्ली
और लंबे तान की तरह भौंकता है कोई कुत्ता




याद

तुम्हारे स्मृतियों में
बहुत कुछ था
थे बहुत-बहुत लोग
थीं बहुत अलग व्याख्याएं उनकी

कुछ था
जिसे स्मृति होना था
उनका गला घोंट दिया गया
नैतिक और अनुशासनबद्ध होकर

उनमें मैं कहीं न था
और यही मेरी अंतिम पराजय थी ।



बनारस 

श्मशानी शांति और
मृत्यु से आत्म साक्षत्कार कराता
आत्मा में कील की तरह
ठुका है बनारस

हिय को हेरता बनारस
मौका दे ही देता है
पीर को गाने का

तमाम सुंदरताओं और
असुन्दरताओं का यह शहर
अपनी शाश्वत सुंदरताओं में ही नहीं
अपनी विद्रूपताओं में भी जिंदा है

बनारस नाउम्मीद नहीं करता किसी को
श्मसान से चुप लौटाता यह शहर
बहुत देर तक चुप नहीं रहने देता
अपने तामझाम और शोर का यह शहर
जीवन का उत्सवधर्मी प्रवेशद्वार है ।




लौटना

लौट रहा हूँ
आनंद कानन से
इसके बहुत गहरे में
बीज है विषाद का

लौटता हूँ
अपने दुःख के अनंत कोटर में
दुःख जो छलावा नहीं है
अपने अवसाद के भरम में
बनारस का आनंद नहीं
श्मशानी भाव का बढ़त है

यह भरोसा भी टूटता है अब
कि नाम, स्पर्श और सानिध्य का स्वर्गिक सुख है
बनारस की प्राणवायु गंगा अब क्षीण है
सुकून शोर है अब
लौटना बनारस से
जैसे श्मशान से जीवन में लौटना है ।








बेरंग है होली

सबरंग है तेरे पास
बेनूर है दिवाली
नूर भी दीपित है तुमसे

तुम्हें मेरा रंग होना था जानां

2
तुम्हें
पारिजात होना था

झर जाना अगर तुम्हारा गुण-धर्म था
तो तुम नीम क्योंकर हुई

3
अतृप्त अधरों की प्यास
बुझती नहीं है
चुम्बनों से

प्यास बढ़ जाती है गर्म पानी से
चुम्बन जो मैंने टांके थे
तुम्हारे जिस्म पर
वो भांप बन कर उड़ गये

3.1
तुम्हें जब भी चूमा
अतृप्त ही रहा
ठीक वैसे ही
जैसे तुमसे प्यार करके
कभी पूरा नहीं हो पाया

हरेक बार प्यार करते हुए
याद आये वे चुम्बन
जो लिए थे चोरी से, जल्दबाजी में
प्यार और चुंबन दोनों मदिरा से अधिक
नशीले हैं ।

4
तुम्हारा शरीर
सितार है
और मेरी उंगलियाँ
तुम्हारे कटि पर फिरते हुए
जैसे तीव्र मध्यम लगातीं हों

सप्तक
जैसे तुम्हारे शरीर के
अधोअंग हैं
षड़ज से ऋषभ, गांधार
पंचम, धैवत और निषाद
तक आते-आते
भूल जाता हूँ
सुर लगाना ।

5
ये जो तेरी आंखें हैं न
खंजन के समान
और उसपर
तुम्हारा यूँ काजल लगाना

मन करता है
वहाँ से काजल चुरा कर
तुम्हारे कटि पर एक टीका लगा दूँ
नजरबट्टू का

6
जब तुम सो रहीं थीं
बेफिक्र
बच्चों सी नींद
तुम्हारी सुसुप्त मुस्कान
में जैसे रहस्य हो ब्रह्मांड का

दुनियावी छल में बंध गयी तुम
तुम्हारे मुस्कान का
भरम टूट गया है








मेरे मरने से किसको फ़र्क़ पड़ेगा

1.
मैं वो सड़ांध हूँ
जिसे बहुत दिनों तक साथ नहीं रखा जा सकता
कुछ दिनों बाद ही बजबजाने लगता हूँ
तुम्हारे विकास की अवधारणाओं में
मेरा अस्तित्व बिना वजह है
अधिक से अधिक एक झरेंगा की तरह
जो तुम्हारे इरादों के कंक्रीट जंगलों में
हरियाली बोता है ।

2.
जो तुम खाते हो
जिसे तुम बेचते हो

मैं उसे उगाता हूँ

तुम्हारी भूख बढ़ती ही गई
और हम मरते रहे भूख से

3.
जिसे हमने वोट दिया
उसने बदले में दिया
अंधकार

सदियों तक भेस बदल कर
आते रहे वोट मांगने

दरअसल वे सभी एक जैसे थे
एक जैसे थे उनके उपहार
उन्होंने उजाले के शक्ल में अंधेरा बांटा ।




समंदर मर गया है...

दूर कहीं विहाग बजता है
कोई हुक का हरकारा
रह-रह कर
तोड़ देता है
आत्मबल

साबुत घर पाने की
उत्कट इच्छा का
हो गया है गर्भपात

बातों की गौरैया
कहीं कोने में गिरकर
मर गयी है

उसके साथ ही कहीं
टूटा है कुछ
मैं जिसके लिए गाता था
पता है तुम्हें
वह समंदर मर गया है ।





रूप-अरूप
1.
शुभ
अचानक बदल जाता है
अशुभ में

और
शुभचिंतक बन जाते हैं ठेकेदार
ठेकेदार काम पूरा होने पर
लग जाते हैं किसी और काम पर ।

2.
जब कभी
किसी ने किसी को
पहचानने से किया है इंकार

उसनेअपने आप को छला है ।

3.
नाहक ही
टूट जाते हैं बड़े से बड़े बंधन

जो दिखने में सबसे विश्वसनीय होता है
सबसे पहला घात वही करता है ।

4
यादें
छतनार हैं
और तुम रौशनी
जब भी याद आती है तुम्हारी
धूप और छांव का तारामंडल बनता है ।

अर्धरात्रि में
तुम्हारी यादों की तुर्शी से ही
महक उठता है छितवन सा
मेरे मन का जंगल

5
पलाश, टेसू, गुलमोहर,
नीम, पारिजात, छितवन
कचनार, आम्र-बौर
और रजनीगंधा
मुझे प्रिय है
इनका झरना प्रिय है

इनके जैसा हो जाना प्रिय है
क्योंकि मुझमें इनके जैसा
वियोग का स्थाई भाव है ।







अफ़साने प्रेम के

दरख़्त अफ़साने सुनायेंगे
प्रेम के

सदियों तक गवाही देते रहेंगे
कि हमने जो किया वह
प्रेम नहीं
विद्रोह था ।


2
सफर के गवाह
केवल प्रतीकों में नहीं

छवियों में
कैद हैं

कुछ घटनाएं
अनकही हैं
उन्मुक्त मन की उड़ान में
याद आयेंगी कभी

3
जमाना गुजरा
कदमों के निशान
बहुतेरे होंगे
पत्थर कुछ मुलायम जरूर हुए होंगे

प्रस्तर और मूर्तियों में
जो बचा
वो अठखेलियां होंगी हमारी ।





आदमखोर लोकतंत्र

जो बड़ा हो रहा था
बढ़ रहा था
वह लोकतंत्र था

वह पहले भीड़ में बदला
फिर शोर में
और फिर हत्याओं में

वह आदमकद था
और देस लघुमानव
फिर वह आदमकद
आदमखोर में तब्दील हो गया

इस तरह लोकतंत्र
आदमखोर लोकतंत्र में प्रतिष्ठित हुआ ।





मौन-संवाद
1.
हलचल
और शोर
से भरी हुई
दुनिया में
बुलबुल ने चहकना छोड़ दिया

एक चुप
रच रही है
मृत्यु का महाआख्यान

2
अचानक बोलते हुए
का चुप होना
संकेत नहीं है
मरण का

कुछ ऐसा घटित हुआ है
जो अवांक्षित है

3
चुप्पी
एक उदास कविता है

4
उदासी
तन्हाई
और
चुप्पी
एकांत के साथी नहीं हैं

यह एक फरेब है
जिसे रचता हूँ मैं
अपने को ही छलने के लिए

5
घबरा कर हो जाता हूँ
चुप
हर चुप्पी छलावा है
कि तुमसे दूर हूँ मैं

6
लंबे अंतराल के
बाद
संक्षिप्त संवाद

जैसे
मेरे मौन का पारन हुआ हो आज

7
मौन का टूटन
बोलने का उत्सव नहीं है
अतिरेक
मौन का अधिक वाचाल होता है

8
बहुत बोलने के बाद
की चुप्पी
आत्मग्लानि से उपजती है

9
अनिर्णय का चुप
निर्णायक शोर से अधिक
वाचाल होता है

10
कई बातें हैं
कहने को
मेरे शब्द जो
अकहे रह गए
चुप हैं

जिसे कहा
वो शोर थे
मेरा कहा हर बार
मेरे आधिपत्य से उपजा था
मेरे कहे का मैं अधिकारी हूँ

मेरी चुप्पी
मेरी करुणा का पर्याय है ।







हाथ

अनमने खाली बैठे
हाथों को चैन नहीं मिलता
दिलो-दिमाग तो वैसे भी
कभी आराम न पा सका

जब कभी हाथों और
दिलो-दिमाग को दौड़ाते थकने लगता हूँ
कंपकपाते हाथों से पकड़ता हूँ
कलम को
और हाथ बनाने की कोशिश
करता हूँ
खाली कक्षाओं में
बोझिल व्याख्यानों में
पढ़ाई के वक्त पढ़ते-पढ़ते तुम्हारी याद आने पर भी
बनाता हूँ हाथ
देखा था सबसे पहले तुम्हारे हाथों को ही
केदारनाथ सिंह कहते हैं
दुनिया को हाथ की तरह गर्म और मुलायम होना चाहिए

कहते हैं हाथों को बनाना सबसे कठिन काम है
एक अभ्यस्त हाथ
जैसे कि
सितार, सारंगी या सरोद के तारों पर
उंगलियां रगड़ता हुआ
तबले पर आघात करता हुआ
या कि सर्जिकल ब्लेड से चीरा लगाता हुआ
या फिर सब्जी में नमक डालता हाथ
अगर थोड़ा भी इधर उधर हुआ तो
सुर गड़बड़
जान का खतरा
या फिर गुस्साए पति द्वारा थाली फेकने
और लोटा खींच के सर पर दे मारने का खतरा

मैं बनाना चाहता हूँ
एक हाथ जिसमें नसों-नाड़ियों और
हड्डियों के ऊबड़-खाबड़पन का सौंदर्य हो
वो नर्म और मुलायम नहीं
कठोर हो
कुदाल चलाते हाथ में पड़े घट्ठे वाले हाथ
भाप से बार बार जला हाथ
कलम या सर्जिकल ब्लेड को
मजबूती से पकड़े हाथ
वाद्ययंत्रों पर रगड़ खाये हाथ
छेनी हथौड़ी पकड़े हाथ
स्वेटर बुनते, मटर छीलते हाथ
सजीव, सधा, मजबूत और स्पन्दित हाथ

मैं एक हाथ की आकृति बनाना चाहता हूँ
तुम्हारी हाथों के स्पंदन को महसूसने से अधिक
उन हाथों की आकृति को महसूसना चाहता हूं
जो कई दिन भूखे रहने के बाद पहले निवाले के
साथ उठा हो
वह हाथ जो ट्रैफिक रुकने पर फैलाये गए हों
एक कुपोषित बच्चे का गुब्बारे फुलाते हाथ
श्मशान जाते शव के हाथ
दोस्त के गले मिलते
उसके पीठ पर लगातार वार करता हाथ
एक चुनावी वादे में उठा हाथ
जिसे आकाशकुसुम हो जाना है
एक हाथ हत्यारे का
एक हाथ हत्या को निर्देशित करने वाले का
एक हाथ दुनिया को संवारने वाले का
एक हाथ रोते हुए के आँसू पोछने वाले का
एक हाथ बढ़ा हुआ
एक हाथ खींचा हुआ
एक हाथ जो खींच लिया गया
एक हाथ जो बोझा उठाने के लिए बढ़ाया गया

हाथ जो पतनशील नैतिकता, मनुष्यता और लोकतंत्र की तरफ इशारा करे
और अंत में मैं एक हाथ और बनाना चाहता हूँ
जो हमारे निहात्थेपन को भी बताती रहे ।





बेहया

मैं बेहया हूँ
मुलायम और लचकदार
पर बिल्कुल निकम्मा
सदियों से अलक्षित
मेरे पुष्प अस्वीकार्य हैं सबको
न रस न गंध

अकहा ऐसा कि किसी ने नहीं कहा
कि तुम बेहया की फूल जितनी सुंदर हो
पर जीवन के सबसे विपरीत परिस्थिति में भी
लहलहाता रहा हूँ

नज़र फेर लो
फिर भी
जहां नमी पाऊंगा
उग आऊंगा
जैसे प्यार का पौधा हो बेहया

बेहया हूँ
अनायास ही उगता रहा हूँ
लेकिन जब याद आऊंगा
खटकूँगा किसी परपराते चोट की तरह ।





पुरखे
(केदार जी की स्मृति में)

ओ हमारे पुरखे !
अंतिम बरगद हमारे समय के
विदा...!

...पर लौटना
स्मृतियों में नहीं,
चिन्हों में नहीं,
अपने समय के शब्दों में नहीं,
खौफ़नाक क्रियाओं में नहीं,

लौट आना
सकुशल
उम्मीदों में अंकुआना
आते रहना महाकवि
कविता में

पचखियाँ फेंकते बने रहना
नवजात तुम्हारी ही ऊँगली पकड़कर
सीखेंगे ककहरा कविता की ।






मांडू की ओर

मांडू के रास्ते में
मांडू की ओर जाने वाले
अथक सहचर होते हैं प्रेम के

हरेक जर्रे से सुनाई देता है
अलाप, सम और
सांसों का आरोह-अवरोह

मांडू में नहीं
मांडू जाने वाले के मन में
बसती है रूपमती और
बाजबहादुर की आत्मा

किसी बाजबहादुर सा
कोई प्रेमी करता है इंतज़ार रूपमती का
बनवाता है जहाज-महल
और झरोखा
उसके मन में भी कहीं एक झरोखा
बना होता है
अपनी रूपमती के लिए

स्वदेश की मायाविनी ने
प्रणय निवेदन नहीं किया था स्वदेश से
मायाविनी चाहती थी
स्वदेश के साथ प्रेम को झरोखे से देखना
तभी तो कहा था उसमें
"मैंने मांडू नहीं देखा है"
और स्वदेश पागल हो गये
और मांडू हो गया शापित
और किसी अनजान डगर पर
चल पड़े बाज बहादुर और रूपमती
तब से कहाँ कोई देख पाया
मांडू

मांडू में नाकाम प्रेमियों का मज़ार लगता है ।
००



कुमार मंगलम की कुछ कविताएं और नीचे लिंक पर पढ़िए 

https://bizooka2009.blogspot.com/2018/01/blog-post.html?m=1

01 जनवरी, 2018

कुमार मंगलम की कविताएं


कुमार मंगलम 



कविताएँ

मायाविनी 

(स्वदेश दीपक की मायाविनी की एक याद)


गहरे स्वप्न में
आती है मायाविनी
हिरणी सी कुलांचे भरती

मायाविनी चीर विरहिणी है
कुलधरा के खंडहरों में
करती है इंतज़ार उस पालीवाल का
जो भागते भागते मर गया था
सालम सिंह के जुल्मों से

उसकी सखी है रूपमती
और बाज बहादुर दिखता है उस
पालीवाल सा
मायाविनी ने कहा था
मैंने मांडू नहीं देखा है


मायाविनी अथक सहचरी है
वियोग के क्षणों में
स्पर्श होता है उसके आत्मा का
मन के सुने में विचरती है
कि अचानक आत्मा का जासूस कमजोर
पड़ जाता है और वो बन जाती है
आत्मा की परछाईं

फासले ऐसे हो जाते हैं कि
शरीर से आत्मा की दूरी बढ़ने लगती ह
कि सब अपना बेगाना हो जाता है

उसकी छुवन है काला जादू
छुवन जो मानसिक है
और स्मृतियों का सहचर है
मैं उसे पा लेना चाहता हूं
जिसे मैंने ही रचा है

उसे पकड़ने का करता हूँ
अंतहीन निरर्थक प्रयास
वह मुझसे उतनी ही दूर है
जितनी मेरी अभिव्यक्ति ।




रात : कुछ दृश्य


एक 

दो पहर रात बीत जाने के बाद
खड़ा हूँ अपने बालकनी में
सामने देखता हूँ
चांद को

कुछेक तारों के साथ
जुगलबंदी कर रहा है
पीपल के विशाल वृक्ष
और उन पत्तों के सरसराहट के बीच
झिलमिल हो रहा है चाँद
जैसे तुम्हारी याद भी झिलमिल है
मन के किसी कोने में


जो जगे हैं वो या तो इश्क़ के मारे हैं
या बीमार हैं
यह हेमन्त की कटती हुई रात है
दूर कहीं कुत्तों के भौंकने की आवाज

रह रह कर आती है
और पत्तों के सरसराहट के एकालाप को
तोड़ देती है


किसी फटे छप्पर से चाँद वैसे ही झिलमिल
हो रहा है
जैसे मेरे बालकनी के सामने वाले पीपल के
पत्तों के बीच से

मजदूर
जिसकी नींद उचट चुकी है
वो भी देख रहा है चाँद को
इस उम्मीद में कि कल उसको
काम मिल ही जायेगा
उसके एक अलंग में उसका बच्चा सोया है
और एक ओर उसकी पत्नी कथरी लपेटे

ठंड से थरथरा रही है
मेरे लिए यह सुहाना और शीतल चाँद
जो मेरे उनींदी नींद पर मरहम लगा रहा है
यह सच नहीं है

हक़ीक़त यह कि
यह चाँद एक अजगर है
जो अपने को बड़ा कर रहा है
किसी को परिवार समेत निगल जाने के लिए


दो 

जो दिन के उजाले में संभव न था
उसका क्रियान्वयन हुआ
जब हाथ को हाथ नहीं सूझता था
और बात बन गयी कि
इस सर्द रात ने सुन्न कर दिया था
मस्तिष्क को
सुबह अख़बार के दबे पन्ने
दबी आवाज में सिसकी ले रहे थे
कुछ लोग थे जो गला फाड़ चिल्ला रहे थे
उनको पागल करार दे दिया गया
ऐसा पागल जिनको अपनी आवाज़ रखने का
हक़ इस बहुमत बाहुबली लोकतंत्र ने छीन लिया था
उन्होंने कहा उनको मुक्ति मिल गयी
बार बार मरने से ।


सुनीता 





गोधूलि 

(ज्ञान और मूर्खता का संधि-स्थल)

मूर्खता जब ज्ञान पर
हावी होने लगता है
धीरे-धीरे
समाप्त होने लगती है प्रज्ञा
नहीं कर पाते आप तर्क
एक अकुंठ श्रद्धा-भाव से
उपजता है मूर्खता
ज्ञान के रक्तिम आभा को
भस्मीभूत कर
उपजता है अंधेरा
तब जन्मतें है मूर्ख


मूर्खों के साम्राज्य में
नहीं जगह है
बुद्ध, गैलीलियो, कोपरनिकस, कबीर और मार्क्स की

अंधेरे का भी अपना प्रकाश होता है
जिसे अक्सर लोग
ज्ञान का चकाचौंध समझ लेते हैं
वे नव्यता को नकार देते हैं
वे अपने खोल में जीते हैं


उस अंधेरे में पलता हैं कहीं न कहीं
ज्ञान का विचार
कि उसका तेज अपने को समेट लेता है
धीरे धीरे टूटता है
अंधेरे का आवरण

फैलता है प्रकाश भी उसी तरह
जैसे अपने को समेट लेता है
गोधूलि और फजेरे का वक्त एक सा होता है
अंतर सिर्फ इतना कि

गोधूलि की प्रकृति उदास है
तो भोर की उल्लसित ।



दृश्य आजकल

एक 

कुछ इतिहास थे
जो मिथक में तब्दील हो रहे थे
और उसके आड़ में
लोग होते जा रहे थे
बलवाई और अराजक


अचानक इतिहास पुरुष के
आंखों से खून बहने लगा
मिथक अब अपना रुप बदल रहे हैं।


दो 

अचानक एक बहुत
बहुत चुप आवाज

बोल पड़ती है
तुम्हारे कानों से लहु बहने लगती है ।


तीन 

प्रतिमा पूजने वाले
प्रतिमा गढ़ने वाले

भागने लगते हैं
जब प्रतिमान निर्मित होते हैं ।




सुनीता 








चार 

धरती के गर्भ में पलती हैं
तुम्हारी

अहंमान्यताएं
तुम्हारे जुल्म

तुम्हारे सारे कर्म-कुकर्म
एक लम्बे इंतज़ार के बाद
निर्मित होती है कोई ज्वालामुखी




पांच 

कई बार फट चुकी हैं ज्वालामुखियाँ
फट कर भी उगलें हैं उसने खनिज
और तुम्हारे ऐय्यासी के साधन
कि तुम समझौता कर सको
बेच सको हिंडाल्को, अडानी और अम्बानियों को
मार सकों उनको जो आखिरी जन है
तुम्हारे सबसे बड़े जनतंत्र का

जो तुम्हारे भोग से पैदा हुआ है
नाजायज ही कहलाया


पर सावधान !
ज्वालामुखियाँ फटती रहेंगी
और उसमें नहीं निकलेगा सिर्फ खनिज ।



टैंक

एक

टैंक
में भरे बारूद से ज्यादा
ख़तरनाक होता है
दिमाग में भरा बारूद


दो 

बारूद का गंध
क्षत-विक्षत शरीर
चिपचिपे, सूख के पपड़ी पड़े
खून के धब्बों से राष्ट्र नहीं
हिंसा पैदा होती है ।


तीन 

टैंक के उपयोग में
आने वाले बारूद के गोले से
कहीं ज्यादा ख़तरनाक है
नागपुरी मस्तिष्क से उपजे फ़रमान


चार 

टैंक
शक्तिशाली हाथी के बल का पर्याय है
और विश्वविद्यालयों का ज्ञान
चींटी के सूक्ष्म लगन और क्रियाशीलता के
ज्ञान से बड़े सूरमा भी डरते हैं
बलों के रक्तिम इतिहास को
पर्दाफाश कर देता है ज्ञान
तर्क़ कसौटी है तुम्हारे झूठे सच को उकेरने का
जब भी ज्ञान से ख़तरा हो सरकार को
ज्ञान और तर्क़ के गढ़ पर टैंक रखे जाने के प्रस्ताव पारित होते हैं ।



पांच 

टैंक
प्रतीक है युद्धोन्माद और हिंसा का
उससे जंग जीता जाता है
दिलो - दिमाग नहीं
जहाँ दिलों - दिमाग के सौदागर बसते है
वे बारूदों से उड़ा देना चाहते हैं

ज्ञान और तर्क़ के मस्तिष्क को
वे पक्ष चाहते हैं किसी की पक्षधरता नहीं
वे क्रिया के व्यापारी हैं प्रतिक्रिया उन्हें बर्दाश्त नहीं
वे उद्वेलित हो जाते हैं
उन्हें ख़तरे का भय सताता रहता है
वे दिमागों में भी टैंक रखना चाहते हैं
अदृश्य टैंक
जिसे पहले विरोध के साथ ही ट्रिगर कर दिया जाए
फिर भी कुछ सिरफिरे होते हैं
जो किसी टैंक से नहीं डरते
वे बारूद में पानी डाल देते हैं
तुम्हारी अनंत इच्छाओं पर वे
गिरते हैं वज्रपात सा ।






 संतन को कहाँ सीकरी सों काम


अरे चुप करो
कुंभन
क्या तुम देशद्रोही हो
संत वही जिसे सीकरी सों काम
कुम्भनदास

योगी अब भोगी...
नाथ गाँवों में घूम भरथरी गाते थे कभी
अब वे राजधानियों में गाएंगे
भरथरी के गीत अब करुण नहीं हिंसक हैं
भरथरी के सारंगी से निकलेगा युद्धोन्माद का गीत

जब मैं छोटा था
मेरे गाँव में आते थे जोगी
जब हम नहीं खाते, जिद करते तो
दादी कहती जोगी झोले में ले कर चला जायेगा
जब दादी उनके झोले में अन्न देती
दादी का पल्लू पकड़ उनसे चिपका रहता
जोगी सुनाता 'सुन सारंगी कान कटबS'
सारंगी कहता 'हूँ' और मैं डर जाता
अब सारंगी गला काटेगा
लोग हँसेंगे, उनका मनोरंजन होगा
अख़बार छुपा ले जायेगा ख़बर
विज्ञापनों का भरमार अख़बार
नहीं बताएगा
किसी सांसद की असंसदीय हरकत को
हम किसी भी अख़बार में नहीं पढ़ पाएंगे

किसानों ने सत्ता के हृदय पर कपाल लेकर अपने बेबसी का रोना रोया
किसानों में माया बहुत है वे नहीं कर सकते कपाल लेकर तांडव
वे मरना जानते हैं पर खेती छोड़ना नहीं जानते
वे छोड़ सकते हैं अपना शरीर पर खेत नहीं छोड़ सकते
वे असल सर्जक हैं
जिस दिन उनका तांडव होगा
पृथ्वी पर अन्न नहीं सिर्फ कंक्रीट के जंगल बचेंगे


हे कुंभन
तुम बूढ़े हो गए हो
तुम्हारे प्रतिनिधि सठिया गये हैं
देखा नहीं कैसा जनादेश है
नहीं दिखता जनादेश

उन्माद का कोई जनादेश नहीं होता
सिर्फ उन्माद होता है

उन्माद शोर है
कभी बहुत शोर में दब जाता है

एक भूखे के पेट से निकला अंतिम शब्द
रो...टी....

देखा नहीं रंग भी बता देते हैं तुम नहीं हो उनके जैसे
अभी तुम चले जा रहे हो

कि कोई सामने से आता है
और तुम्हारे पेट को भभोड़ कर चला जाता है
तुम्हारे पेट से रिसता लहू नहीं दिखता किसी को

लोग तुम्हें देशविरोधी और पागल कह कर
जश्न मनाते हैं

लहू का रंग लाल नहीं
उन्हें केसरिया दिखता है महाकवि

वे जश्न मनाते हैं कि एक देशद्रोही खत्म हुआ
और तुम जो कभी भक्त थे अब कहे जाते हो देशद्रोही

कुंभनदास जी
मुस्कुराइये कि आप ...... हैं
मुस्कुराइये कि आप अभी तक जिन्दा हैं
मुस्कुराइये कि गदहों का लोकवृत है
मुस्कुराइये कि सीकरी अब जंगल है

मुस्कुराइये कि संत अब सीकरी में हों, जंगल में हों, संसद में हों, विधानपालिका में हों, कार्यपालिका में हों, न्यायपालिका में हों संत हैं

और आप असंत क्योंकि
संत वही जिसे सीकरी सों काम ।




एक 

जानता हूँ
कोई नहीं है

परिपूर्ण
संभवतः वे भी नहीं थे पूरे

जिन्होंने गढ़े
सफलता के मुहावरे

जो असफल थे
वे सबसे ज्यादा सफल दिखते थे


दो 

अपनी असफलता को
छिपाता
कभी अपनी वाचालता से

तो कभी
अपनी चुप्पियों से

मेरी चुप्पी जब
बहुत वाचाल हो जाती
तब मैं करता हूँ हत्याएं


तीन 

मैं लापरवाह था
इतना की
अपनी हत्या करता
खुद के गर्दन को दबाता
साँस उखड़ने तक


चार 

धोखेबाज नहीं देते धोखे
ना ही झूठे, झूठ बोलते हैं

किसी और से
सभी धोखे और झूठ एक सुंदर भाग है
वो भागते हैं अपने निज से


पांच 

कमी मुझमें कुछ नहीं थी
गलतियों का पुतला भी नहीं था मैं

अपनी वाचाल चुप्पी
और चुप्पी की वाचालता के बीच

हत्याएँ करते खुद की
अनेक समझौते किये सत्ता से

मैं जी हुज़ूर होता गया
यह मेरी कमी नहीं थी

यह मेरे समय का सत्य था ।





हम एक ऐसे समय में जी रहें हैं

जहाँ भारत भाग्य विधाता का
गुणगान करते हुए

हरिचरना कब का सरग
सिधार गया है

हमने सरकारें बनायीं
फिर उसी सरकार को रहे गरियाते

इस उम्मीद में की वे सुनेंगे हमारी बात
वो भी तो हमारे बीच से आते हैं
पर उनके गणित की सत्ता

चिरंतन रही
सत्तासीन तो सत्ता में हैं ही
जो नहीं हैं सत्ता में
उनकी सत्ता भी मुक़ाबिल है
हर बार जोड़ा उन्होंने जाति का गणित
कभी धर्म कभी संख्या के बल पर

ठगते रहे
उनके गणित के हर प्रश्नों
का जबाब विजय ही रहा हर बार
चाहे वो सत्ता में रहे या विपक्ष में

वो गणतंत्र के दिन
लेते रहे भव्य सलामी
और
गणतंत्र का आखिरी आदमी
अपने आखिरी सांस को बचाने के लिए
आखिरी दम तक लड़ता रहा
गणतंत्र और आजादी के फरेब में
वो हमें बदलते रहे
और हम उन्हें बदलने का भरम पाले रहे
हमारा निशाना भी तो हमेशा से चुकता रहा
हमारी मर्यादा हमें भीम नहीं बनने दे रही थी
कि हम करें प्रहार उनके मर्मस्थलों पर
हम करते रहे वज्र पर प्रहार वज्र से
पर इस महाभारत में वे बने रहे

अभिमन्यु को घेर कर मारने वाले
कभी द्रोण, कभी भीष्म,
कभी दुर्योधन तो कभी जयद्रथ भी


इस महाभारत के अंत में
नहीं बने विजेता पांडव
राजनीति के महाभारत में

विजेता दुर्योधन ही रहा
मरती गयी पांडवों की संवेदना
वो अब किसी गरीब के लिए नहीं लगाते

जान की बाजी
चूकती संवेदना मरती आदमियत
और चारों तरफ शोर ही शोर में
उन्होंने बदल दिया गणतंत्र के मायने
हम भी कब बदल गए
पता ही नहीं चला


हरिचरना अब स्वप्न में भी नहीं आता
अब तो बस शोर है शोर ही
आपकी चुप्पी आपके जान की
सबसे बड़ी शत्रु है
आप भी शोर में शामिल हो जाइये

नहीं तो क्या पता
आपके बगल से एक उन्मादी भीड़ गुजरे
और उस शोर में दब जाए आपकी चीख
चीख जो पूरे जान लगा कर कहा होगा

अंतिम बार
शामिल हो जाइये भीड़ में
चिल्लाइये भारत माता की जय
कानफोड़ू आवाज में कहिये वंदे मातरम
आपकी स्वतंत्रता को शोर से अलग कर के
नहीं किया जायेगा मूल्यांकित
कि स्वतंत्रता भी अब एकमात्र शोर है
जश्न मनाइये कि हर गणतंत्र

हरिचरना का श्राद्ध होता रहे
हरिचरना नहीं है
अब तो बस शोर है चारो तरफ
भारत माता की जय और वंदे मातरम के उद्घोष
में हर बार मृत हो जाता है कोई इस विशाल माता का सुपूत
उसके घर का खालीपन को शोर
से नहीं भरा जा सकता
गणतंत्र ने हमे नहीं हमने
बदल दिया है शोर से गणतंत्र को
अब तो गणतंत्र मने सिर्फ
शोर
शोर, शोर, शोर, शोर, शोर




गोविन्द सेन 




तुम्हारा जन्मदिन


तुम्हारा जन्मदिन
चुप्पियों के साये में
चहलकदमी करते
मेरे मौन को खुरचता है


असावरी के कोमल ऋषभ
कि तरह आती है तुम्हारी याद
"मुंदरी मोरी काहें को छीन लई"1
कि मेरी आँखों में बसती हैं
तुम्हारी यादों की मुंदरी


तुम्हारी याद राग सोहनी है
जिसकी प्रकृति चंचल है
तुम्हारी तरह
यूँ तुम्हारी याद
जैसे राग तोड़ी में गंधार
और तुम्हारे जन्मदिन पर तुम्हारी याद
जैसे कुमार जी की धनवसंती
जो कभी पूरिया धनाश्री तो कभी वसंत का आभास
ये मेरे मौन के साथी हैं
मेरे वाचालता में भी
मेरा मौन साथ चलता है


नहीं समझ पाया जुगलबंदी को
तुमने ही तो कहा था
संगत करने से हम आत्ममोह से बचे रहते हैं
यह कैसी संगत है प्रिये
कि तुम लगातार आगे बढ़ती गयीं
और मैं ठहरा ही रहा
कभी पीछे मुड़ कर देखना
मैं यहीं इंतज़ार करता मिलूंगा
तुम्हारे जन्मदिन के दिन तक
बस तुम ही नहीं होती हो
अपने ही जन्मदिन पर ।


1 राग अड़ाना की चर्चित बंदिश






कवि और पुरस्कार


हे कवि
तुम्हारी यह कविता
बहुत अच्छी नहीं है
इसे तुम डाल दो कचरे की पेटी में


कवि
तुमने कैसे स्वीकार कर लिया

कोई पुरस्कार,
कई बेहतर कविताओं के बीच
अपनी इस वाहियात कविता पर,
इस वर्ष की कई सर्वश्रेष्ठ कविता तो मैंने लिखी है

इसी वर्ष तो तुम पर
लगे हैं कई आरोप
एक आलोचक ने एक कवि के बारे में लिखते
हुए कहा एक आलोचक के कहने पर कवि ने लिखी
है कविता में गाली
उनकी दाँव-पेंच वाली राजनीति
और रस-रंजन तुम्हारी विनम्रता पर भारी है

जब भी कोई पुरस्कृत होता है
होने लगती है कई कई व्याख्याएं
शब्दों में अनर्थ भरे जाते हैं
तुम्हारी सफलता पर
प्रश्नचिन्ह लगाये जाते हैं
जानते हो कवि
तुम्हारी सफलता पर उनकी
अनाशक्त तिलमिलाहट
कविता को मिले पुरस्कारों से ज्यादा भारी है




परिचय 
कुमार मंगलम 

अध्येता (हिन्दी साहित्य)

फिलहाल गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय से 'कुंवर नारायण के काव्य में दार्शनिक प्रभाव' विषय पर शोधरत ।