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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल
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03 नवंबर, 2010

नयी पहल

इस बार हम बिजूका के पाठकों का परिचय एकदम नयी कवियत्रि से करा रहे हैं। कवियत्रि सुश्री दीक्षा दुबे ( देवास) एक ऎसी कवियत्रि है… जिसने अभी तक अपनी कविताएँ कहीं छपने नहीं भेजी हैं.. न ही किसी कवि गोष्ठि में अभी तक अपनी कविताओं का पाठ किया है। कह सकते हैं कि उन्होंने अपनी पहचान एक कवियत्रि के रूप बनाने की कभी कोई कोशिश नहीं की है। बस.. जो भी अपने मन में उमड़ता-घुमड़ता है.. उसे कभी गद्य के रूप में.. कभी कवितायी अँदाज़ में अपनी डायरी में लिख लेती है। सुश्री दीक्षा दुबे साहित्य की दुनिया से और साहित्यिक संस्कारों से भी उतनी परिचित नहीं है, जितना आज का साहित्यकार है। उनका ज्यादातर समय गृहस्थि के कामों में और शिक्षिका होने के नाते अपने स्कूल और छात्र के बीच ही गुज़रता है। हम बिजूका के पाठकों का परिचय इस चुप्पा किसिम की और साहित्यिक हलके से अनजान कवियत्रि से उनकी दस कविताओं के मार्फ़त करा रहे हैं। उनकी कविताओं पर जाने-माने युवा कवि श्री प्रदीप मिश्र की टिप्पणी भी दे रहे हैं। श्री प्रदीप मिश्र को जब हमने ये कविताएँ टिप्पणी के लिए भेजी थी.. उन्हें कवियत्रि के नाम और परिचय के बारे में कुछ नहीं बताया था। उनसे हमने बिजूका की तरफ़ से इतना भर अनुरोध किया था कि आप कविता पढ़े और कविताओं के बारे टिप्पणी लिखे। ताकि चेहरे और नाम देखकर टिप्पणी करने वाली प्रवृति से हटकर कुछ किया जा सके। अब कविताएँ और उन पर लिखी टिप्पणी आपके लिए प्रस्तुत है। आगे भी इस तरह से और नये-पुरने साथियो की रचनाएँ प्रकाशित होती रहेगी। उम्मीद है यह पहल आपको पसंद आयेगी। इसकी खामियों पर पाठक हमें अपने महत्त्वपूर्ण सुझाव टिप्पणी के रूप भेज सकते हैं, जो नये या पुराने साथी इस पहल के भागीदार बनना चाहते हैं.. वे हमें अपना रचनात्मक सहयोग भी दे सकते हैं।

सत्यनारायण पटेल


इन दस कविताओं को पड़ते हुए, एक स्त्री के हृदय का आस्वाद लगातार महसूस होता है। महसूस होता है एक व्यक्ति के निज में कितना प्रेम भरा होता है और परिवेश की कितनी बारीक सी चीज चुभ कर इसे चीथड़े में बदल देती है । मेरी नजर में इन दसों कविताओं के दस स्वतंत्र शीर्षक होने चाहिए थे, इनमें इस तरह की सूत्र बद्धता नहीं है कि इनको सृंखलाबद्ध कविताओं की तरह देखा जाए। पहली कविता में एक माँ और उसकी अजन्मी बेटी के अन्तरसम्बन्ध पर प्रेक्षक की तरह टिप्पणी है। इस कविता में एक आत्मालाप और संवाद की संरचना में बात करने की कोशिश की गयी है। इस प्रयास में कई जगहों पर कविता के अनुशासन का अतिक्रमण होता हुआ भी महसूस होता है। इस कविता को और भी संपादित एवं संगठित किया जा सकता है। दूसरी कविता एक सामन्य निज अभिव्यक्ति है। इस तरह की अभिव्यक्तियाँ पहले बहुत सारे कवियों के पास उबलब्ध हैँ। तीसरी कविता भी अभिसार के क्षणों की कव्याभिक्ति तरह से सामान्य प्रभाव डालती है। चौथी, पांचवी, नौवीं तथा दसवीं कविता में कवि अपने सरोकारों से परिचित होता है। इन कविताओं में उसकी निजता में सहज भाव से जो अनुभव संसार शामिल होता है, वह अपने समाज के प्रति जिम्मादार नागरिक की तरह से आस्वाद अर्जित करता है। इन कविताओं को डायरीनुमा कविताओं की तरह भी देखा जा सकता है। एक संवेदनशील मनुष्य की डायरी का कुछ अंश कविता की संरचना में हमारे सामने है। कविता के संरचनात्मक तकनीक पर अभी बहुत संभावने हैं। कवि को और रियाज की ज़रूरत है।

प्रदीप मिश्र


सुश्री दीक्षा दुबे की कविताएँ



एक


तुम
उदास क्यों हो…?
जबकि
मैं ख़ुश हूँ कि कितना कुछ है तुम्हारे पास

मैं ख़ुश हूँ
कि हमेशा सोचती रही हो तुम
अपने परिवार के बारे में
बच्चों के बारे में
कर्त्तव्यो, परम्पराओं, सम्बन्धों के बारे में
और ……..मेरे बारे में…!

तुम्हारे सोचने से ही तो
आती है ख़ुशियाँ इस घर में…!
घर की ख़ुशी में ही तो है
तुम्हारी ख़ुशी।

तुम्ही तो अक़्सर कहती हो मुस्कराकर
कि तुम ख़ुश हो………
फिर…..
यह उदासी का मैकअप किसलिए…..?

कोई बन्धन नहीं है तुम्हें
बाहर जाती हो
नौकरी करती हो

सदा ही तो रहती हो
ख़ुशियों से लदी-लदी
कभी ख़ुशियाँ भी बोझिल होती है भला ….?

हिसाब-किताब की चिंता से तुम्हें
रखी कितनी दूर सदा

मेरी… तुम्हारी, पास बुक, चैक बुक, एटीएम कार्ड
सभी तो मैं सम्भालता आया हूँ….!
तुम्हें तो याद भी नहीं होगा
अपने एटीएम का पासवर्ड…!
फिर…चिंता किस बात की है तुम्हें….!

तुम
आसमान तक पहुँच कर भी
देख लेती हो अपना घर
सिर झुका कर ।

व्रत उपवास
हवन पूजन करती हो..
अपने घर के लिए
मेरी और बच्चों की लम्बी उम्र
और ख़ुशियों के लिए
उन्हें संस्कारी और
चरित्रवान बनाने के लिए ।

तुम स्वतंत्र हो
परम्पराओं और रुढियों के
जंग खाए कंटिले तारों से कसे बन्धन
तोड़ने के लिए

मैंने कब ‘ना’ कहा तुम्हें
बदल सकती हो समाज बेधड़क
अपना घर छोड़कर…..
जानती हो न……
एक घर तो डाकन भी छोड़ देती है
फिर तुम तो………
इस घर की मालकिन हो
तुम क्यों उदास हो……..?

किस एहसास की कमी खाती है तुम्हें
क्या हुआ जो जनने न दी तुम्हें
छोटी-सी सिर्फ़ एक बेटी…..

किसकी याद घेर लेती है तुम्हें
और क्यों सहम-सी जाती हो…..
कोई क्रूर पुरुष नहीं…..
अपनी ही कोख से जना बेटा
जब पुकारता है तुम्हें
माँ………..

कितनी सौभाग्यशाली हो तुम
अच्छी बेटी……
अच्छी बहू……
अच्छी पत्नी…..
अच्छी माँ …..
और अच्छी औरत होने का सुख और सम्मान
जो मिला है तुम्हें ।

कितना कुछ तो है तुम्हारे पास
घर……
बच्चे…
परिवार….
धन….
प्रतिष्ठा….
सम्मान…
स्वतंत्रता…
अधिकार….
एकान्त….
और निजता….
फिर किस चीज़ की कमी खाती है तुम्हें
बोलो..न
आख़िर क्यों उदास हो…?
000

दो


तब
अच्छा लगता था
मन का बहकना
बादलों के साथ बरसना
नदी के साथ बहना
हवाओं के साथ मचलना
फूलों के साथ मुस्कराना
भावनाओं के सागर में गोते लगाते हुए
निकालना
ख़ुशियों के मोती ।

सपनों की सैर करते हुए
समेटना
चिड़ियों की चहचहाहट
सुबह की ठंडी हवा
शाम की तनहाई
रात की मदहोशी
मौसम का मिजाज
शायरी का दिल से गुज़रना
और अचानक
दिल का लहरों-सा मचल जाना..।

अनजाना चेहरा
रूहानी स्पर्श
मीठा दर्द
एक अनजानी कसक
हल्का-हल्का नशा !!

पर
जब रिश्तों, परम्पराओं, कर्त्तव्यों
और मर्यादाओं की शिलाओं से टकराते हुए
कोशिश करता है उड़ान भरने की मन
क्यों हो जाता है लहूलुहान……..?
000

तीन


भर जाती है
फूलों में ख़ुशबू
और तितलियों में रंग
उजला हो जाता है
सब
पहली बारिश में धुली
निखर आई पत्तियों की तरह

दूब की तरह लरज़ते हैं होंठ
देह, शाखे बन जाती है
सिहर उठता है
भीतर का बहाव
आँखें मुँदाती है
शरमीले पौधे की पत्तियों जैसे

खिल जाता है
गुलमोहर गालों पर
जब
हल्की-सी छूअन से
बिखर जाता है…हरसिंगार
धरती पर…..
000

चार


हाँ…
मैं फिर जाना चाहती हूँ
उस बचपन में
जहाँ मेरी खिलखिलाहट पर
ख़ुश हो दूसरे भी

बिना कहे मेरे ग़ुस्से को
और मेरे दर्द को भी
समझ ले कोई

गुब्बारे की तरह मुँह फुलाकर
ज़िद की हदों को पार करते
कि जब
हाथ पैर पटके
चीख कर रोऎं
सिर फोड़े दीवारों से
तो पगली न कहे दुनिया

प्यार से उठा ले कोई
चूम ले माथा
मेरी हरक़तों पर
पुलकित हो कर…..
000

पाँच


बिल्कुल तैयार हूँ मैं
उड़ने के लिए

मैंने उतार दिया है लिबास
मुक़्त कर दिया है
उसके पीछे से
आसमान ताकती इच्छाओं को

हाँ.. उन गहनों को भी..
जो झुकाने लगे थे
मेरी गरदन और पीठ

वजन का कम होना
पहली शर्त है उड़ने के लिए

ले ली है विदा
हर फ़िक्र से
ज़िम्मेदारियों से कहा
ना याद आए
ना याद किया करे..
अपने भीतर के डर से भी
आख़िर जीत ही गई मैं…..
मेरी उड़ने की चाह
बड़ी थी
पृथ्वी के गुरूत्वाकर्षण से

दहलीज़ से किए गए सारे अनुबंध
झूठे ही निकले आख़िर

हवाओं से दोस्ती कर ली है मैंने
कह दी है पक्षियों से भी
हमसफ़र होने की बात

तय कर ली है दिशा भी
मुझे दिख रहा है बादलों के बीच
मेरे सपनों का संसार……
000

छः


मन
जो सोचता है
आँखें वही देखती है
मन
जो चाहता है
मस्तिष्क वही समझता है


मन
जो कहता है
कान वही सुनते हैं

यूँ भी
मन हावी रहता है इंद्रियों पर
लेकिन
तानाशाह बन जाता है
जब विश्वास में पड़ जाती हैं
गाँठें………..
000

सात


छँट ही जाती है धुँध
पर
गीली हो जाती है हवा

थमा ही जाता है तूफान
वक़्त भर देता है घाव
पर
रह जाते हैं नासूर
जिनकी कसक सालती है
उम्र भर……..
000

आठ


जिद
आसमान को छूने की
काग़ज़ की कश्ती से
समन्दर पार करने की
हवा को बाहों में समेट कर
आईने पर जमी गर्द उड़ाने की
धूप को मुट्ठी में पकड़ कर
अंधेरे कमरे में उजास भरने की
या ज़िद
ख़ुद को सुई के छेद में पिरो कर
उधड़ी ज़िन्दगी को रफू करने की

फिर
चाहे आसमान टूटे
नन्ही ज़िद के कंधों पर
या फिर आँखों से बहे समन्दर
आँधियाँ आए
या छलनी हो जाए सीना
क्योंकि..
ज़िद तो फिर ज़िद है….
सुनी है कब
ज़िद ने सलाह और हिदायत
000

नौ


वो एक बूँद
जिसे कहते हैं कि आँसू है
पीते हैं तो
कभी प्यास
कभी आग भड़कती है

समन्दर के पानी से भी खारा है
बहती नहीं
गल जाती है दुनिया जिसमें
ये मोती है मुहब्बत का
जिसे पाने के लिए
इस समन्दर में उतरते हैं
दीवाने कितने...!
ये जान कर कि
आँख का पानी
बहा देगा सब ख्वाहिशें
उम्मीद के तिनके को पकड़ कर
पा लेता है ये मोती
सारा खारापन
धुल जाता है और
मुट्ठी में होती है
कायनात सारी….
000

दस


आवाज़ नहीं थी कोई
पर कुछ तो टूटा है
जो रिसने लगी है
छूते ही
धरती….
दरक गई है कुछ ऎसे
कि समा गया उसमें
आसमान सारा….

दिखती नहीं
अपनी परछाई भी
कैसे हो पहचान
आकृतियाँ है चेहरे नहीं…

भरा पड़ा है खालीपन
यहाँ वहाँ
शाखें डरी हुई है
जड़ों के खोखलेपन से….

नमी खो गई रिश्तों की
पानी पानी हुआ सब
बूँदे सूख गई हैं
ओस नहीं ठहरती
घास पर अब…

बादल भी शरारत से बस
मुस्करा कर चले जाते हैं
ख़ुशियों की तरह……

और सूखी धरती से
रिसने लगता है फिर कुछ
दर्द सा……
000