सत्यनारायण पटेल
इन दस कविताओं को पड़ते हुए, एक स्त्री के हृदय का आस्वाद लगातार महसूस होता है। महसूस होता है एक व्यक्ति के निज में कितना प्रेम भरा होता है और परिवेश की कितनी बारीक सी चीज चुभ कर इसे चीथड़े में बदल देती है । मेरी नजर में इन दसों कविताओं के दस स्वतंत्र शीर्षक होने चाहिए थे, इनमें इस तरह की सूत्र बद्धता नहीं है कि इनको सृंखलाबद्ध कविताओं की तरह देखा जाए। पहली कविता में एक माँ और उसकी अजन्मी बेटी के अन्तरसम्बन्ध पर प्रेक्षक की तरह टिप्पणी है। इस कविता में एक आत्मालाप और संवाद की संरचना में बात करने की कोशिश की गयी है। इस प्रयास में कई जगहों पर कविता के अनुशासन का अतिक्रमण होता हुआ भी महसूस होता है। इस कविता को और भी संपादित एवं संगठित किया जा सकता है। दूसरी कविता एक सामन्य निज अभिव्यक्ति है। इस तरह की अभिव्यक्तियाँ पहले बहुत सारे कवियों के पास उबलब्ध हैँ। तीसरी कविता भी अभिसार के क्षणों की कव्याभिक्ति तरह से सामान्य प्रभाव डालती है। चौथी, पांचवी, नौवीं तथा दसवीं कविता में कवि अपने सरोकारों से परिचित होता है। इन कविताओं में उसकी निजता में सहज भाव से जो अनुभव संसार शामिल होता है, वह अपने समाज के प्रति जिम्मादार नागरिक की तरह से आस्वाद अर्जित करता है। इन कविताओं को डायरीनुमा कविताओं की तरह भी देखा जा सकता है। एक संवेदनशील मनुष्य की डायरी का कुछ अंश कविता की संरचना में हमारे सामने है। कविता के संरचनात्मक तकनीक पर अभी बहुत संभावने हैं। कवि को और रियाज की ज़रूरत है।
प्रदीप मिश्र
सुश्री दीक्षा दुबे की कविताएँ

एक
तुम
उदास क्यों हो…?
जबकि
मैं ख़ुश हूँ कि कितना कुछ है तुम्हारे पास
मैं ख़ुश हूँ
कि हमेशा सोचती रही हो तुम
अपने परिवार के बारे में
बच्चों के बारे में
कर्त्तव्यो, परम्पराओं, सम्बन्धों के बारे में
और ……..मेरे बारे में…!
तुम्हारे सोचने से ही तो
आती है ख़ुशियाँ इस घर में…!
घर की ख़ुशी में ही तो है
तुम्हारी ख़ुशी।
तुम्ही तो अक़्सर कहती हो मुस्कराकर
कि तुम ख़ुश हो………
फिर…..
यह उदासी का मैकअप किसलिए…..?
कोई बन्धन नहीं है तुम्हें
बाहर जाती हो
नौकरी करती हो
सदा ही तो रहती हो
ख़ुशियों से लदी-लदी
कभी ख़ुशियाँ भी बोझिल होती है भला ….?
हिसाब-किताब की चिंता से तुम्हें
रखी कितनी दूर सदा
मेरी… तुम्हारी, पास बुक, चैक बुक, एटीएम कार्ड
सभी तो मैं सम्भालता आया हूँ….!
तुम्हें तो याद भी नहीं होगा
अपने एटीएम का पासवर्ड…!
फिर…चिंता किस बात की है तुम्हें….!
तुम
आसमान तक पहुँच कर भी
देख लेती हो अपना घर
सिर झुका कर ।
व्रत उपवास
हवन पूजन करती हो..
अपने घर के लिए
मेरी और बच्चों की लम्बी उम्र
और ख़ुशियों के लिए
उन्हें संस्कारी और
चरित्रवान बनाने के लिए ।
तुम स्वतंत्र हो
परम्पराओं और रुढियों के
जंग खाए कंटिले तारों से कसे बन्धन
तोड़ने के लिए
मैंने कब ‘ना’ कहा तुम्हें
बदल सकती हो समाज बेधड़क
अपना घर छोड़कर…..
जानती हो न……
एक घर तो डाकन भी छोड़ देती है
फिर तुम तो………
इस घर की मालकिन हो
तुम क्यों उदास हो……..?
किस एहसास की कमी खाती है तुम्हें
क्या हुआ जो जनने न दी तुम्हें
छोटी-सी सिर्फ़ एक बेटी…..
किसकी याद घेर लेती है तुम्हें
और क्यों सहम-सी जाती हो…..
कोई क्रूर पुरुष नहीं…..
अपनी ही कोख से जना बेटा
जब पुकारता है तुम्हें
माँ………..
कितनी सौभाग्यशाली हो तुम
अच्छी बेटी……
अच्छी बहू……
अच्छी पत्नी…..
अच्छी माँ …..
और अच्छी औरत होने का सुख और सम्मान
जो मिला है तुम्हें ।
कितना कुछ तो है तुम्हारे पास
घर……
बच्चे…
परिवार….
धन….
प्रतिष्ठा….
सम्मान…
स्वतंत्रता…
अधिकार….
एकान्त….
और निजता….
फिर किस चीज़ की कमी खाती है तुम्हें
बोलो..न
आख़िर क्यों उदास हो…?
000
दो
तब
अच्छा लगता था
मन का बहकना
बादलों के साथ बरसना
नदी के साथ बहना
हवाओं के साथ मचलना
फूलों के साथ मुस्कराना
भावनाओं के सागर में गोते लगाते हुए
निकालना
ख़ुशियों के मोती ।
सपनों की सैर करते हुए
समेटना
चिड़ियों की चहचहाहट
सुबह की ठंडी हवा
शाम की तनहाई
रात की मदहोशी
मौसम का मिजाज
शायरी का दिल से गुज़रना
और अचानक
दिल का लहरों-सा मचल जाना..।
अनजाना चेहरा
रूहानी स्पर्श
मीठा दर्द
एक अनजानी कसक
हल्का-हल्का नशा !!
पर
जब रिश्तों, परम्पराओं, कर्त्तव्यों
और मर्यादाओं की शिलाओं से टकराते हुए
कोशिश करता है उड़ान भरने की मन
क्यों हो जाता है लहूलुहान……..?
000
तीन
भर जाती है
फूलों में ख़ुशबू
और तितलियों में रंग
उजला हो जाता है
सब
पहली बारिश में धुली
निखर आई पत्तियों की तरह
दूब की तरह लरज़ते हैं होंठ
देह, शाखे बन जाती है
सिहर उठता है
भीतर का बहाव
आँखें मुँदाती है
शरमीले पौधे की पत्तियों जैसे
खिल जाता है
गुलमोहर गालों पर
जब
हल्की-सी छूअन से
बिखर जाता है…हरसिंगार
धरती पर…..
000
चार
हाँ…
मैं फिर जाना चाहती हूँ
उस बचपन में
जहाँ मेरी खिलखिलाहट पर
ख़ुश हो दूसरे भी
बिना कहे मेरे ग़ुस्से को
और मेरे दर्द को भी
समझ ले कोई
गुब्बारे की तरह मुँह फुलाकर
ज़िद की हदों को पार करते
कि जब
हाथ पैर पटके
चीख कर रोऎं
सिर फोड़े दीवारों से
तो पगली न कहे दुनिया
प्यार से उठा ले कोई
चूम ले माथा
मेरी हरक़तों पर
पुलकित हो कर…..
000
पाँच
बिल्कुल तैयार हूँ मैं
उड़ने के लिए
मैंने उतार दिया है लिबास
मुक़्त कर दिया है
उसके पीछे से
आसमान ताकती इच्छाओं को
हाँ.. उन गहनों को भी..
जो झुकाने लगे थे
मेरी गरदन और पीठ
वजन का कम होना
पहली शर्त है उड़ने के लिए
ले ली है विदा
हर फ़िक्र से
ज़िम्मेदारियों से कहा
ना याद आए
ना याद किया करे..
अपने भीतर के डर से भी
आख़िर जीत ही गई मैं…..
मेरी उड़ने की चाह
बड़ी थी
पृथ्वी के गुरूत्वाकर्षण से
दहलीज़ से किए गए सारे अनुबंध
झूठे ही निकले आख़िर
हवाओं से दोस्ती कर ली है मैंने
कह दी है पक्षियों से भी
हमसफ़र होने की बात
तय कर ली है दिशा भी
मुझे दिख रहा है बादलों के बीच
मेरे सपनों का संसार……
000
छः
मन
जो सोचता है
आँखें वही देखती है
मन
जो चाहता है
मस्तिष्क वही समझता है
मन
जो कहता है
कान वही सुनते हैं
यूँ भी
मन हावी रहता है इंद्रियों पर
लेकिन
तानाशाह बन जाता है
जब विश्वास में पड़ जाती हैं
गाँठें………..
000
सात
छँट ही जाती है धुँध
पर
गीली हो जाती है हवा
थमा ही जाता है तूफान
वक़्त भर देता है घाव
पर
रह जाते हैं नासूर
जिनकी कसक सालती है
उम्र भर……..
000
आठ
जिद
आसमान को छूने की
काग़ज़ की कश्ती से
समन्दर पार करने की
हवा को बाहों में समेट कर
आईने पर जमी गर्द उड़ाने की
धूप को मुट्ठी में पकड़ कर
अंधेरे कमरे में उजास भरने की
या ज़िद
ख़ुद को सुई के छेद में पिरो कर
उधड़ी ज़िन्दगी को रफू करने की
फिर
चाहे आसमान टूटे
नन्ही ज़िद के कंधों पर
या फिर आँखों से बहे समन्दर
आँधियाँ आए
या छलनी हो जाए सीना
क्योंकि..
ज़िद तो फिर ज़िद है….
सुनी है कब
ज़िद ने सलाह और हिदायत
000
नौ
वो एक बूँद
जिसे कहते हैं कि आँसू है
पीते हैं तो
कभी प्यास
कभी आग भड़कती है
समन्दर के पानी से भी खारा है
बहती नहीं
गल जाती है दुनिया जिसमें
ये मोती है मुहब्बत का
जिसे पाने के लिए
इस समन्दर में उतरते हैं
दीवाने कितने...!
ये जान कर कि
आँख का पानी
बहा देगा सब ख्वाहिशें
उम्मीद के तिनके को पकड़ कर
पा लेता है ये मोती
सारा खारापन
धुल जाता है और
मुट्ठी में होती है
कायनात सारी….
000
दस
आवाज़ नहीं थी कोई
पर कुछ तो टूटा है
जो रिसने लगी है
छूते ही
धरती….
दरक गई है कुछ ऎसे
कि समा गया उसमें
आसमान सारा….
दिखती नहीं
अपनी परछाई भी
कैसे हो पहचान
आकृतियाँ है चेहरे नहीं…
भरा पड़ा है खालीपन
यहाँ वहाँ
शाखें डरी हुई है
जड़ों के खोखलेपन से….
नमी खो गई रिश्तों की
पानी पानी हुआ सब
बूँदे सूख गई हैं
ओस नहीं ठहरती
घास पर अब…
बादल भी शरारत से बस
मुस्करा कर चले जाते हैं
ख़ुशियों की तरह……
और सूखी धरती से
रिसने लगता है फिर कुछ
दर्द सा……
000