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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल
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13 मार्च, 2018

उर्मिला शुक्ल कविताएं 



उर्मिला शुक्ल




कविताएँ

नमक का  महत्व  

हम हैं कौन
रहते हैं कैसे
हमारी हँसी ख़ुशी
हमारे नाच गान
रीति नीति पर
बोलते हो मगर
नहीं जानते तुम  हमे

,हमारे मन और
जीवन को
नहीं जानते तुम

सिर्फ मुर्गा लड़ाना
सल्फी पीना और
सरहुल तक ही
सिमटा नहीं है
हमारा जीवन


नहीं जानते तुम
कितना मुश्किल है
दिन दिन भर
भटकना  और
छिपाये  रखना
अपने आप को
उन नज़रों   से
जो घुस आयी  हैं
हमारे  जंगल में
कुछ भी तो
नहीं जानते तुम

मगर   लिखते हो
बहुत कुछ
तुम लिखते हो कि
कितने मुर्ख हैं हम
कि नमक के बदले में
दे देते हैं
कीमती चिरौजियाँ
तुम नहीं जानते
जंगल का अर्थ
तुम नहीं समझते
नमक का  महत्व




 शब्द

पहले गढ़े  मैंने
ताकत और उत्साह से
भरे भरे अनेक  शब्द

मगर
उन्हें छीन लिया मठाधीशों ने
दे दिया उनके हाथ में

धर्म का झंडा
उन्मादी हो गये
मेरे शब्द।
तलवार लेकर वे
मिटाने लगे
अपना ही वज़ूद।

फिर रचे  मैंने 
मनुष्यता  से भरे भरे
कुछ  शब्द

मगर
अबकी उन्हें
अगुआ कर लिया
सफेदपोशों  ने
 दबा दिया उन्हें अपनी
कुर्सी के पाये तले
असहनीय दर्द से चीख रहे हैं
मेरे शब्द

और वे
कर रहे हैं अट्टहास
 अब मैं गढुँगी नहीं
बो  दूँगी  उन्हें
निराई  गुड़ाई
खाद पानी से जब
लहलहा उठेगी मेरे
शब्दों की फसल।
तब कोई मठाधीश
कोई सफेदपोश

नहीं छीन पायेगा उन्हें
छीनने की कोशिश में भी
झर  ही जायेंगे कुछ दाने।
समय आने पर
फिर उगेंगे वे
एक बार
दो बार
बार बार
लगातार
उगेंगे मेरे शब्द






छत्तीसगढ़ की औरत 

छतीसगढ़ की औरत
बोती  है धान
निदाई कटाई और
मिसाई करके भर देती
कोठी में  धान

वह जाती है बाज़ार
करती है सौदा
खरीदती है
साग भाजी या

मौसमी फल
केरा संतरा या
सीतफल
सिरपर धर कर टुकनी
लगाती है फेरा
मुहल्ले और गलियों का
भर लेती है पेट
अपने कुनबे  का

वह उतारती है सल्फी और
छिंद का रस
ले जाती है हाट
सल्फी का मटका लेकर
जब वो चलती है
सड़क पर
रैम्प पर चलती माडल को भी
कर देती है मात।
मेरे  छत्तीसगढ़ की औरत
लगाती नहीं   नारे
करती नहीं कोई  विमर्श
वो तो बस जीती है
जिंदगी।
जिन्दगी को  सलीब नहीं
रईचुली समझ कर
झूलती है वो

जिजीविषा की पर्याय है
मेरे छत्तीसगढ़ की औरत



चाहा था मैंने 

तुम आओ
जीवन में
ऐसे
जैसे आती है हवा
जैसे आती है
भोर की पहली किरण
जैसे फूटता है अँखुआ
जैसे  खिलता है फूल
अपनी ही खुशबू में
झूमता हुआ ।
मगर तुम तो आये
आँधी की तरह और
झकझोर कर रख  दिया
मेरे वजूद को।

आये तुम
तपते  सूरज की तरह
छोड़े तुमने
अनगिन निशान
झुलस गईं मेरी
सारी  कोमलता।
फिर भी अभी
निःशेष नहीं हुआ है

सब कुछ
बाकी  है अभी भी
थोड़ी सी नमी
और मैं  चाहती हूँ
आज भी  कि
तुम आओ ऐसे जैसे ..... .।





घर की चौखट

कहते हैं सब
बदल रही  है दुनिया
बदल रही है औरत।
बदल रहा है घर और
उसकी रुपरेखा
बहुत सारी सुविधाओं से
भरी पूरी हो गयी है
औरत।

वे देखते हैं घर और
घर का आलीशान  रुप
वे नहीं देख पाते
घर की चौखट
जिसे लाँघती औरत
हो जाती है लहूलुहान
आज भी।







कुटुमसर की मछलियाँ 

 कुटुमसर  की गुफा में                                                                                                                                    तैरती अंधी मछलियाँ
सैलानियों का कुतुहल जगाती
उनका मन बहलाती मछलियाँ
अब हो उठी हैं वे
बहुत व्याकुल।
वे कर रही  हैं सवाल
अपने आप से
क्या सचमुच
वे धरती पर आयी हैं
सिर्फ मन बहलाने ?
मात्र यही है
उनके जीवन का लक्ष्य कि
भूलकर अपनी पीड़ा
बहलाती रहें
उनका मन
जिनके लिये वे हैं
सिर्फ एक तमाशा?
मछलियों ने अब
सूँघ ली हैं
उनकी मंशा
चीन्ह लिये हैं
उनके इरादे।
कहीं बाज़ार में
तब्दील न  हो जाये
उनका  जंगल
यही सोचकर
व्याकुल हैं
कुटुमसर की
मछलियाँ






 मादर की थाप पर 

थिरका करती थी
जिसकी देह।
आँखों से छलकती थी
मादकता सलफी की।
हरे बाँस सी
लचकती काया
अब हो  गयी है ठठरी
उस ठठरी को लादे
ढूँढ रही है वो
एक ऐसी ठौर कि जहाँ
दो पल थिरा सके
मगर जंगल के
पोर पोर से
रिसती बारूदी गंध
उसे कर देती है परेशान।
उसके जख्मों से
बहता लहू
कर देता है उसे
और और और व्याकुल।
वह  चाहती है कि
धो ले अपने जख़्मों पर
जमा लहू।
लगा दे उस पर मिट्टी कि
पूर जायें उसके जख़्म।
मगर कैसे ?
दरक गयी है
इंदिरावती छाती
मिट्टी सन गयी है
लहू से।
और लहू से
पूरता कहां  है
कोई जख़्म।
भागना ,भागना
बस भागना ही तो
रह गया है
उसके हाथ।










आँगन में लहलहाती 

तुलसी ने कभी
किया नहीं
कोई प्रतिवाद।
कभी  पूजा उसे और
कभी तोड़ लीं
उसकी सारी पत्तियाँ
बनाया लिया काढ़ा।
कभी दवा तो
कभी दुआ बन
वो आती रही काम।
दिया और बस
दिया ही उसने।
अपना सब कुछ
अपना वजूद ही
दे दिया उसने
पर की नहीं कोई शिकायत
माँ ने भी तो........
आँगन से फ़्लैट में
चली आयी वो
कभी गमले तो
कभी डिब्बे में
टाँग दिया गया उसे
उसने कभी नहीं माँगी
कोई जगह
अपने लिये।
अनजान नहीं हैं वे
हमारी मंशा से
वे जानती हैं कि
हमारे घर और दिल
दोनों की बहुत सँकरे
हो गये हैं
उनके लिये।





बातों  का मरम 

कहा करती थी माँ
तुम लड़की हो
मत हँसा करो
इतने जोर जोर से।
नज़रें झुकाकर
किया करो बात
भैया दादा से।

देखो मत आसमान
रहो धरती पर
धरती की तरह।
मैं नासमझ
नाराज़ हो जाती थी उनसे।
तब कहाँ समझ पायी थी मैं
वो सब
जो कहना चाहती  थीं वे
अब जब भी
निकलती हूँ
घर के बाहर
बहुत याद आती हैं वे
मैं अब समझ पायी हूँ
माँ की बातों का मरम




विकल्प

कितना गहरा है अँधेरा
कि सूझता नहीं
 हाथ को हाथ ।
आच्छादित हैं इसमें
धरती और आकाश ।
कहाँ  गया सूरज ?
क्या उसने अँधेरे से
मिला लिया है हाथ ?
फिर तो ढ़ूँढ़ना ही होगा
कोई विकल्प ।
जलाना ही  होगा चिराग
जो भेदकर अँधेरा
बिखेरेगा रौशनी ।
दोस्तों चिराग सूरज तो नहीं
मगर विकल्प है सूरज का





 नोट -
1 कुटुमसर बस्तर की अँधेरी गुफा जहां की मछलियाँ रौशनी के आभाव में अंधी हैं।
2 इंदिरावती -बस्तर की प्रमुख नदी  

☝🏼






नाम - उर्मिला शुक्ल
जन्म - 20 - 9 - 19 62

शिक्षा - एम ए ,पी एच डी ,डी लिट्
लेखन - कहानी , उपन्यास ,कविता , ग़ज़ल ,समीक्षा और यात्रा संस्मरण। छत्तीसगढ़ी और हिंदी  में लेखन। 

प्रकाशन हिंदी  - कहानी संग्रह - 1 अपने अपने मोर्चे पर ,- प्रकाशक- विद्या साहित्य संस्थान इलाहबाद। 2 फूल कुँवर तुम जागती रहना - नमन प्रकाशन 2015  दिल्ली 3 मैं ,फूलमती और हिजड़े नमन प्रकाशन 2015 

साझा कहानी संग्रह -
1  बीसवीं सदी की महिला कथाकारों की  कहानियाँ नामक संग्रह नमन प्रकाशन दिल्ली द्वारा प्रकाशित दस खंडों में प्रकाशित। नवें भाग में कहानी गोदना के फूल प्रकाशित।

2 कलमकार फाउण्डेशन दिल्ली द्वारा 2015 में अखिल भारतीय कहानी प्रतियोगिता में पुरस्कृत  कहानियाँ । इस संग्रह में कहानी -सल्फी का पेड़ नहीं औरत प्रकाशित-प्रकाशक-श्री साहित्य प्रकाशन दिल्ली।

3 हंस -सिर्फ कहानियाँ सिर्फ महिलायें अगस्त 2013 कहानी बँसवा फुलाइल मोरे अँगना प्रकाशित और चर्चित।  

4  -कथा मध्य प्रदेश 4 खंडों में प्रकाशित मध्य प्रदेश एवं छत्तीसगढ़ के कथाकारों के संग्रह में 4 भाग में नहीं रहना देश बिराने प्रकाशित। 

कविता संग्रह - इक्कीसवीं सदी के द्वार पर (मुहीम प्रकाशन हापुड़ 2001 ) 
समीक्षा - 1 छत्तीसगढ़ी लोकगीतों में नारी - चेतना से विमर्श तक (वैभव प्रकाशन रायपुर ),2  हिंदी कहानी में छत्तीसगढ़ी संस्कृति  (वैभव प्रकाशन रायपुर )।3  हिंदी कहानी का बदलता स्वरूप (नमन प्रकाशन दिल्ली ),

3 हिंदी कहानियों वस्तुगत परिवर्तन
फ़िल्म:  

कैंसर और इरादा फ़िल्म

उदय चे

ऐंगल्स ने कहा था कि किसी लेखक को अगर मारना है तो उसकी रचना पर चर्चा बन्द कर दो। एक चुप्पी बना लो। उसके पक्ष या विपक्ष में कोई चर्चा ही न करो। लेखक और उसका लिखा सब मर जायेगा। उस समय ऐंगल्स के साथ पूंजीवादी लेखकों ने ये ही तरीका अपनाया था।

उदय चे

इरादा फ़िल्म जो फरवरी 2017 में आई। जो एक बेहतरीन फ़िल्म है। इरादा फ़िल्म के साथ भी ये ही हुआ।
इरादा फ़िल्म जो कैंसर, कैंसर होने के कारण पर बनी फिल्म है। कैंसर के इस खेल में किस-किसको फायदा है इसका बखूभी चित्रण है। फ़िल्म ने जो मुद्दा उठाया उस पर चर्चा आज वक्त की जरूरत है। लेकिन वक्त पर और चर्चा पर उन्ही लोगो का कब्जा है जिनके मुनाफे के कारण कैंसर महामारी का रूप ले चुका है। कैमिकल फैक्ट्रियों के कचरे को जमीन में रिवर्स बोरिंग के जरिये पहुँचाने के कारण जमीन का पानी जहरीला हो गया। जो पानी और फसलों के माध्यम से ये जहर हमारे अंदर तक पहुंच रहा है जिस कारण कैंसर होती है। लेकिन आम इंसान के दिमाक मे पूंजीपतियों ने प्रचार के माध्यम से बैठा दिया कि कैंसर धूम्रपान और तम्बाकू से होता है। कैंसर धूम्रपान ओर तम्बाकू से भी होता है। लेकिन कैमिकल कचरा जमीन में पहूंचाने से पानी और फसल जहरीली हो गयी जिस कारण कैंसर महामारी बन गयी। लुटेरे पूंजीपतियों की मुनाफे की चाहत ने जमीन के पानी को जहर बना दिया इस का विरोध न हो इसलिए ये चुप्पी बनाई गई। आप धूम्रपान ओर तम्बाकू छोड़ सकते हो ये आपके हाथ मे है लेकिन आप पानी पीना कैसे छोड़ सकते हो। ये तो आपकी मूल जरूरत है। इस जहरीले पानी पीने से आज कैंसर महामारी का रूप धारण कर चुकी है।



मैने 2 दिन पहले इरादा फ़िल्म देखी। जैसे-जैसे फ़िल्म देख रहा था वैसे-वैसे देश की भयंकर सच्चाई डरा रही थी।
हम एक ऐसी जगह रह रहे है जहां रोजाना कोई ना कोई इस कैंसर की चपेट में आकर तड़फ-तड़फ कर मर रहा है। तड़फने के साथ-साथ उसको एक पूरा संगठित गिरोह  लूट भी रहा है। खून बेचने वालों से लेकर कीमो थेरैपी, इंशोरेंस, पानी बेचने वालो का एक बहुत बड़ा स्कैम है इसके पीछे।

पानी जो मौत की दलदल बन गयी।

यहाँ के लोगो के लिए पानी ही मौत बन गयी है। पानी किसी भी इंसान की जिंदगी की सबसे जरूरी पेय पदार्थ है। अब वो ही उसके लिए जहर बन गया है।

कोई अगर इस जहर पर रिसर्च करता भी है तो लुटेरा पूंजीपति उसको मरवा देता है। जिसने इस जहर को पैदा किया और जिसकी इस जहर के कारण दुकानदारी चल रही है वो सब इस जहर के खिलाफ बोलने वालों का मुंह बंद कर देते है।

कारपोरेट का मीडिया प्रचार करता है कि
"यहाँ का पानी पीने से आप नही बच सकते।"
सेफ रहो, अलर्ट रहो, साफ पानी पियो।

मतलब RO लगवावो। बोतल बन्द पानी खरीदो। जमीन का या नदियों के पानी से ये जहर खत्म हो इस पर कोई चर्चा नही।

फ़िल्म में लुटेरा पूंजीपति, खोजी ईमानदार पत्रकार को मारने से पहले कहता है कि -

रिवर्स बोरिंग किस चिड़िया का नाम है ये कोइ नही जानता
अमोनियम नाइट्रेट, क्रोमियम कैमिकल ये जहरीले है। किसी को कोई फर्क नही पड़ता है। इंजेक्सन लगा कर सब बेहोसी में जीये जा रहे है।

शनिवार-रविवार को बीबी के साथ डिनर, गर्ल फ्रेंड के साथ डिस्को बस ये जिंदगी है।
इस जहर की उनको आदत सी पड़ गयी है
इसलिए मेरा बिजनेस सही है। क्योकि कोई मेरे बिजनेस पर सवाल नही उठाता।

वैसे पूंजीपति ठीक कह रहा है। आज ये ही तो हालात है। पंजाब और पंजाब के लगते बार्डर इलाको में हर घर से कैंसर के कारण मौत हो चुकी है लेकिन क्या आपने कभी विरोध के स्वर सुने। सुनोगे भी नही।
कभी पंजाब की धरती क्रांति और क्रांतिकारियों को पैदा करती थी लेकिन आज हालात क्या है। रोजाना इस बीमारी की चपेट में आकर लोग मरते हैं लेकिन पंजाब का आवाम पूंजीवाद के नशे में चूर है। बहुतो को कोकीन का नशा मार गया तो बहुतो को फ्री इंटरनेट, फैसन, शॉपिंग मार गया।
क्योकि पूंजीवाद ने आपकी नशों में बड़े शातिराना तरीके से अपने नशे को पहुंचा दिया है।
पिछले 20 साल में 3 लाख किसान आत्महत्या कर गए जिसका हम जब जगह जिक्र करते है। लेकिन पिछले 20 साल में कैंसर से भी लाखों लोग मर गए। कोई सर्वे नही, कोई जिक्र नही, कोई लड़ाई नही।

कुछ सालों में कैंसर के मरीजों को नजदीक से देखा है। कैंसर के कारण होने वाला असहनीय दर्द, गरीब परिवार की रुपयों के अभाव में बेबसी, कैसे धीरे-धीरे घर से इंसान भी जाता है और जमीन, रुपया, गहने सब कुछ चला जाता है। ईमानदारी से सरकार कैंसर से मरने वालों का सर्वे करवाये तो एक बहुत बड़ी भयानक सच्चाई सामने आ सकती है।

बहुत पहले कहानियों में सुनते थे कि फ़ैलाने इलाके में एक जिन्न आ गया। जो गांव से दूर जंगल या पहाड़ में रहता है वो इलाके वालों से हर रोज एक इंसान को खाने के लिए लेता है। उसके साथ मे भेड़, बकरी, गाय, फल बहुत से सामान भी साथ मे लेता है। फिर एक दिन उस गांव में एक इंसान आता है और उस जिन्न को मार कर वहाँ के इंसानों को बचाता है।
 ये कहानी बहुत सुनी है, फिल्मो में भी है, महाभारत मे ऐसी कहानी का जिक्र मिलता है। लेकिन उस जिन्न को किसने पैदा किया ये उन कहानियों में नही है।
लेकिन जो ये कैंसर का जिन्न है जो हर रोज बहुत से इंसानों की बलि ले रहा है साथ मे उसकी भेड़, बकरी, गाय, भैंस, जमीन, गहनों को भी खा रहा है। इसको किसने पैदा किया ये जरूर मालूम है। पूंजीपति की पूंजी कमाने की हवस ने इस जिन्न को पैदा किया है। इस हवस पर लगाम लगाने की जिम्मेदारी हमने जिनको सौंपी नेता, पोलिस, नोकरशाह, मीडिया, कानून वो सब इस लूट के हिस्सेदार बन बैठे है।

कुछ दिन पहले मेरे एक मित्र से लड़ने के तरीकों पर चर्चा चल रही थी  की इस कैंसर वाले मसले पर कैसे लड़ा जाए। क्योंकि ये मामला बहुत बड़ा है। 1 गांव या 10 गांव मिलकर भी इस लड़ाई को जीत नही सकते। मेरा दोस्त भी उन्ही गांव से था जिस गांव में प्रत्येक घर से ये बीमारी बलि ले चुकि है। वो साथी इस मुद्दे पर लड़ भी रहे है। इस फ़िल्म ने लड़ने का तरीका बता दिया। लड़ाई का एक ही तरीका है। वो है शहीद-ऐ-आजम भगत सिंह का रास्ता "बहरो को सुनाने के लिए धमाके की जरूरत होती है।"


मदारी फ़िल्म के बाद इरादा एक बेहतरीन फ़िल्म है जो समस्या को उठाती है। पूंजीपति-पोलिस-मीडिया-राजनीति के लूट के लिए बने नापाक गठबंधन को बेबाक तरीके से दिखाती है। व इसके साथ मे समस्या के समाधान के लिए क्रांतिकारी रास्ता दिखाती फ़िल्म है।

फ़िल्म में भटिंडा से बीकानेर के बीच एक पैसेंजर ट्रेन जिसमे 60% से ज्यादा कैंसर के मरीज आते और जाते है। इस ट्रेन का चित्रण रोंगटे खड़े करने वाला है। भारत की ट्रेनों में अक्सर नमकीन, छोले, पॉपकार्न, मूंगफली, पापड़ बेचने वाले मिलते है। लेकिन इस ट्रेन में खून बेचने वाले, इंशोरेंस बेचने वाले, कीमोथेरेपी का पैकेज बेचने वाले मिलते है जिसको फ़िल्म में बहुत ही अच्छे तरीके से दिखाया है। खून बेचने वाला आवाज लगा रहा है कि 2 के साथ 1 फ्री, आज का रेट 150-150
फ़िल्म ने रक्तदान कैम्पो पर भी सवाल उठाया है।

फ़िल्म में नसीरुद्दीन शाह की दमदार आवाज में दुष्यन्त की ये लाइने लाजवाब है-
"सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नही, मेरा मकसद नही, मेरी कोशिश है ये सूरत बदलनी चाहिए।
आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।
हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।
- दुष्यन्त कुमार

"समुंद्र के किनारे मकान हो तो,
तूफान से होशियार रहना चाहिये।"

 दमदार और असरदार डायलोक भी फ़िल्म की कहानी को बेहतरीन बनाते है -

"चूहे मारने वाली दवाई से आप बच जाओगे, लेकिन यहाँ के पानी से कभी नही बच पाओगे"

"लाशें दलदल में धँसती हुई।"

"कैमिकल के कारण यहाँ का पानी, यहाँ की मिट्टी, यहाँ कि फसलों में जहर घुला है।"

"यहाँ का पानी ही नही खून भी लुटेरे पूंजीपति की जागीर है।"

"ये शहर जितना जमीन के ऊपर है उतना ही जमीन के नीचे है।"

"घुन ही गेंहू को मिटा सकता है।"

लेकिन पत्रकार जो अपनी सच्चाई के कारण मौत के मुआने पर खड़ा है। वो पूंजीपति को कहता है-

पत्रकार - तुम्हे लगता है तुम सच को दबा दोगे, कोई ना कोई सच को जरूर सामने लाएगा
सच छुपेगा नही। सच छुपेगा नही।
हमको भी लगता है कि आने वाले समय मे लोग लड़ेंगे मजबूती से और इस लुटेरी कौम का सर्वनाश कर देंगे।

"जलते घर को देखने वालों
फुस का छपर आपका है।
आग के पीछे तेज हवा
आगे मुकद्दर आपका है।
उसके कत्ल पर मै भी चुप था।
मेरी बारी अब आयी।
मेरे कत्ल पर आप भी चुप हो।
अगला नम्बर आपका है।"