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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल
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17 अप्रैल, 2020

कभी कभार : ग्यारह

विपिन चौधरी




गली गर्ल : सोनिया सांचेज़


कई सांस्कृतिक, राजनैतिक, सामाजिक नागरिक आंदोलनों का गवाह रहे वैश्विक इतिहास में एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक आंदोलन, ‘अश्वेत कला आंदोलन’ भी था जो अमेरिका की धरती पर दस साल यानी 1965 से 1975 तक अस्तित्व में रहा, अफ़्रीकी-अमेरिकी अश्वेत समुदाय के बीच महत्वपूर्ण स्थान रखता  है. इस कलात्मक आंदोलन ने अश्वेत समुदाय की विचारधारा को एक नई दिशा दी. अफ्रीकी-अमेरिकी समाज के विचारों को प्रभावित करने वाले इस महत्वपूर्ण साहित्यिक और कलात्मक आंदोलन में अनेकों स्त्री रचनाकार और कलाकार सक्रिय रही थीं मगर इस आंदोलन में भी सभी आंदोलनों की तरह पुरुष रचनाशीलता का वर्चस्व इस कदरहावी रहा कि आंदोलन में शामिल प्रबुद्ध महिलाओं  को  उस तथाकथित लिबरल परिवेश के खिलाफ अपनी आवाज़ बुलंद करनी पड़ी क्योंकि उन्हें किसी भी कीमत पर नेपथ्य का हिस्सा बनना गंवारा नहीं था. ऐसी स्त्री रचनाकारों में से एक नाम सोनिया सांचेज़ का भी था जिन्होंने अपनी बौद्धिक गतिविधियों के चलते आंदोलन के दौरान अपने व्यक्तित्व की ऐसी ठोस पहचान अर्जित की जिसके बूते आंदोलन में शामिल अनगिनत कलाकारों, रचनाकारों  के बीच उनके व्यक्तित्व को अलग से चिन्हित किया गया. सोनिया सांचेज़ के लेखन का न सिर्फ व्यापक प्रचार-प्रसार हुआ बल्कि आने वाले समय में गंभीरता से उसका मूल्यांकन भी हुआ.

60 के दशक में सोनिया सांचेज़ अपनी उत्साही मुखरता और ठेठ कल्पनाओं की मदद से अफ्रीकी-अमेरिकी कविता-विधा में क्रांति लाने में सहायक बनी. नागरिक अधिकार एक्टिविज्म (1955-1968), स्त्री मुक्ति अभियान (1960-1980) जब अपने  चरम पर था उसी समय उनकी पहचानएक कवि, नाटककार, बाल साहित्यकार और शिक्षक के रुप में बन रही थी. 

सोनिया सांचेज़
एक बार सोनिया ने पढ़ा कि मल्कोम एक्स  के कभी कहा था-
"अमेरिका की मुख्यधारा में अश्वेत समुदाय कभी भी शामिल नहीं हो सकता'. उनका यह कथन सोनिया को बहुत खटका बस फिर क्या था सांचेज़ ने अपने समुदाय के लोगों को समाज में इज़्ज़तदार जगह बनाने में जुट गयीं.
कला आंदोलन में अपने कई समकालीनों की तरह एफ्रो-अमेरिकन समुदाय की कवि, शिक्षाविद, नाटककार, कार्यकर्ता सोनिया सांचेज़ के खाते में कई उपलब्धियाँ दर्ज हैं. 1970 में एमहर्स्ट कॉलेज में वह पढ़ाने वाली वह पहली एफ्रोअमेरिकन स्त्री थी और अश्वेत अध्ययन विभाग में दूसरी स्त्री थी जो इस पद पर आसीन हुई. दिलचस्प बात यह है कि इन सभी अश्वेत स्त्रियों का अपना एक बुलंद व्यक्तित्व था जो समग्र रूप में अश्वेत समाज के विकास के लिए एक कड़ी का काम करते हुए आपस में एक दूसरे को जोड़ता था. आज भी अनेकों विश्विद्यालयों और संस्थाओं में सोनिया को मार्टिन लूथर, ऑड्रे लोर्ड ,एड्रिएन रिच और ज़ोरानील हर्स्टन पर व्याख्यान देने के लिए बुलाया जाता है.  

     अश्वेत कला आंदोलन में  सोनिया सांचेज़ और उनकी समकालीनों ने एक ख़ास तरह की ब्लैक पोएट्री इज़ाद की जिसका संबंध अश्वेत समुदाय की स्त्रियों  से जुड़े मुद्दों से था, इन  मुखर और मानीखेज़ मुद्दों पर लिखी कविताओं ने ही आगे चलकर अश्वेत स्त्रीवाद की नीव को पुख्ता किया.

सोनिया सांचेज़ ने अपने लेखन, खासतौर पर कविताओं के जरिए अश्वेत कला आंदोलन में पुरुषों के एकछत्र प्रभाव को उजागर किया. ‘रेव पिम्प्स’ और ‘टू ए जेलस कैट’ शीर्षक से उनकी ऑडियो एल्बम में इस प्रवृति को साफ तौर पर समझा जा सकता है.1आंदोलन में शामिल पुरुषों में व्याप्त हिंसक सेक्स की कल्पना को भी उन्होंने अपनी कविताओं के जरिए पाठकों के सामने रखा. सोनिया सांचेज़ ने  स्त्रीवादी नज़रिये से देखते हुए अश्वेत कला आंदोलन में एक वास्तुकार की भूमिका निभाई. 

बीसवी सदी के उत्तरार्थ में अमेरिका निवासी अश्वेत महिलाओं के अनुभवों को अपनी कविताओं में शामिल करने के साथ ही सोनिया सांचेज़ अपने लेखन में भाषागत, शैलीगत प्रयोग तो कर ही रहीं थीं उनका  प्रमुख एजेंडा  संगीत को कविता का हिस्सा बनाना भी था. आगामी युवा पीढ़ी ने  सोनिया की कविताओं में अश्वेत स्त्रियों की भूली-बिसरी आवाजों को पाया जो  मुख्यतः ऐतिहासिक दृष्टिकोण से स्त्रियों के मुद्दों को संबोधित करती हैं, जिसमें मुखरता से स्त्री के लिंग, उनके निजी अनुभव और राजनीति के साथ लोक काव्य भी सम्माहित  है. 

सोनिया सांचेज़  न केवल  बेहतरीन कविताएं ही लिखी बल्कि उनका कविता पाठ भी शानदार होता है. उनकी रूचि कविता में दर्ज़ सामग्री के साथ, शब्दों से उत्पन्न ध्वनि में भी है यही कारण है कि उनकी पहचान स्पोकन वर्ड की चैंपियन के रूप में भी है. वे अपनी स्पोकन वर्ल्ड की किताबों के लिए भी देश-विदेश में काफी प्रसिद्द हैं. उच्चारण की शुद्धता के पीछे एक कहानी है जिसके तार उनके बचपन से जुड़े हैं- लगन की धनी सोनिया सांचेज़ को बचपन से ही वाक्-दोष था, जिसके चलते उन्हें ज़ोर-ज़ोर से बोल कर पढ़ने की हिदायत दी गई थी. तब कविता उच्चारण के लिए बल देना शुरू करने के साथ ही  उन्हें कविता की ध्वनि की महत्वत्ता का अहसास हुआ और उन्होंने निरंतर कविता-पाठ का अभ्यास किया. वर्ष 1920 में स्कोम्बुज पुस्तकालय में उन्होंने अश्वेत लेखकों स्टर्लिंग ब्राउन, लुंग्स्टन हूजेस और काउंटी क्यूलन को पढ़ा और कविता के प्रति आकर्षित हुई.  

1960 में वे पूरी तरह से सामाजिक और राजनीतिक  रूप से सक्रिय हो गयी थीं और अपने आंदोलन के सिलसिले में कई बार वे गिरफ्तार भी हुईं.1965 में उन्होंने अश्वेत स्त्रियों को केंद्र  में रखते हुए पाठ्यक्रम तैयार किया, उनका विश्वास है कि एक शिक्षक ही अतीत की विरासत को बदलने और सामाजिक बदलाव लाने के लिए जिम्मेदार हैं और यही कारण है कि अपने लेखन और वक्तव्य में व्यापक रूप से शिक्षकों की प्रशंसा की. 

एक अकादमिशियन होते हुए भी अपने लेखन में अकादमिक भाषा का इस्तेमाल न करके अश्वेत समुदाय द्वारा प्रयुक्त अश्वेत-अंगेज़ी का प्रयोग किया और  कविता-विधा को बौद्धिक गलियारों से निकाल कर आमजन तक पहुँचाया.एक शिक्षक के नाते  उन्होंने अपने छात्रों को टोनी मॉरिसन, माया एंजेलो, रुबी डी, ऐलिस वॉकर और डैनी ग्लोवर से रूबरू करवाया और यही कारण है कि अपने अध्यापन के पैंतीस वर्षों में उन्होंने कविता के कई छात्रों को गढ़ा. युवाओं जैसी ज़िंदादिली  के साथ साहित्यिक, सामाजिक, सांस्कृतिक क्षेत्रों में लगातार सक्रिय सोनिया की आवाज़ की लोच और बुलंदी से उन्होंने संसार भर में ढेरों प्रशंसक अर्जित किए. सदियों तक अमेरिका की राजनीति, संस्कृति और साहित्य में एक प्रभावशाली  हस्तक्षेप रखने वाली सोनिया सांचेज़ के बहुआयामी व्यक्तित्व पर प्रसिद्ध अश्वेत लेखिका माया एन्जेलों ने उन्हें ‘साहित्य के जंगल का शेर कहा’ . चिली की प्रसिद्ध उपन्यासकार ऐज़ाबेल आलेंदे    भी उनके प्रशंसकों में से हैं.वहीं  सोनिया सांचेज़ कवि और चित्रकार क्रिस्टा फ्रेंक्लिन और अमेरिकन कवयित्री ऐनी सेक्सटन से बेहद प्रभावित रही हैं.

कविताओं को दूसरी कला-विधाओं में शामिल कर उन्होंने कविता के क्षेत्र में  अभूतपूर्व क्रांति ला दी और अपने इस उपक्रम से सैंकड़ों लोगों का कविता का दीवाना बनाया. उन्होंने सामान्य बोलचाल की भाषा यानी गली-कूचों में बोली जाने वाली  भाषा को कविता को दी और  बड़ी बुद्धिमत्ता से इतिहास और अपने समुदाय के मुद्दों के ज्ञान ने  उनकी उस कविता अभिव्यक्ति को धार दी जिनके विषय माकूल  और स्वर अन्तर्निहित थे.  समूचे अफ्रीकन-अमेरिकन समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हुए वे भाषा की शक्ति का बुद्धिमत्ता और प्रभावपूर्ण इस्तेमाल करते हुए हुए यथास्थिति को बदलने का उपक्रम करती हैं.   

उन्होंने अपनी अश्वेत विरासत पर लगातार लिखा और प्रत्येक जन को अपनी संस्कृति और अस्तित्व को पहचानने और उसका उत्सव मनाने के लिए प्रेरित किया. सोनिया सांचेज़ को हिप-हॉप जनरेशन की स्पिरिचुअल मदर माना जाता है.3 आज भी वह एक बालक की तरह सीखने की ललक रखती हैं. पचहत्तर वर्ष की उम्र में उन्होंने पोएट्री राइटिंग वर्कशॉप में पढाना शुरू किया. आज की युवा पीढ़ी  न केवल उनकी कविताओं से बल्कि उनके कविता पाठ के वाचन  से भी बहुत कुछ सीख रही है . वास्तव में सोनिया सांचेज़ ने किताब के पन्नों से कविता को निकालकर उसे व्यापक आयाम दिए . वे कहती हैं,  "मेरी कविता राजनैतिक है. यह या तो संभालती है या यह बदलाव के बारे प्रेरित करती है.4 उनका  काम  ब्लैक आर्ट एस्थेटिक में  महत्वपूर्ण भूमिका  निभाता है. उनके लेखन ने स्ट्रीट लिटरेचर के फलक को विस्तृत किया. स्ट्रीट लिटरेचर  वह साहित्यिक शैली है जो  वास्तविक रूप से सड़कों का साहित्य माना गया है यह उस क्षेत्र के बारे में कहानियों और उनकी सच्चाई को दर्शाता है. यह साहित्य शहर के निम्न आय वाले लोगों के दैनिक जीवन और स्थान विशेष को बखूबी दर्शाता है.5

     उन्होंने अपनी अफ़्रीकी-अमेरिकी संस्कृति की लगातार पुष्टि की और अपने नज़रिये को लगातार साफ़ करने के लिए अफ़्रीकी सभ्यता की "प्राचीन के और रुख किया. 

सोनिया सांचेज़ ने अपने हाइकू में कई ऐतिहासिक विषयों को दर्ज़ किया सदियों तक वे हाइकू विधा के करीब रही उनके हाइकू  अफ़्रीकी-अमेरिकी कविता का अटूट और महत्वपूर्ण हिस्सा हैं जिनमें उनके न केवल संगीत, संस्कृति, प्रेम, प्रकृति, सुंदरता, ख़ुशी6

राजनीति और राष्ट्रीयता की भावना सोनिया सांचेज़ की कविताओं में विस्तार पाती हैं. अश्वेत एकता की ललक, श्वेत प्रभुत्व के खिलाफ कार्यवाही के अलावा अश्वेत समुदाय के प्रति हिंसा पर उनकी कविताएँ  विश्व भर के कविता प्रेमियों को अपनी और आकर्षित करती हैं. 

अपनी सृजनात्मकता का  उत्सव मानते हुए अश्वेत रेडिकल एक्टिविस्ट सोनिया सांचेज़ अपने लेखन के एकांत की रौशनी की मशाल ले कर सड़कों और समहू के बीच उपस्थित होती हैं तो वह अवसर देखने लायक   होता है.  अलबामा में 1934 को जन्मी सांचेज़ अब  लगभग पचासी साल की उम्र में भी हैं और आज भी  अमेरिका  की संस्कृति और राजनीति को पुनर्परिभाषित करते हुए साहित्य में अफ़्रीकी-अमेरिकी समुदाय का प्रतिनिधित्व कर रही हैं. 



       
संदर्भ:
1        मन्निंगमारिया वर्डप्रेस कॉम- मॉडर्निटी एंड बियॉन्ड 
2        "सोनिया सांचेज़-बायोग्राफी" क्रिटिकल एडिशन ऑफ़ ड्रामेटिक लिटरेचर एडिटर कार्ल रोलिसन.इनोट्स.कॉम 4 अप्रैल, 2020
3       डब्लूडब्लूडब्लू.एमडॉक्.ऑर्ग/वॉच/ बैडड़ड़ड़ड़ड़-सोनिया सांचेज़ 
4       डिसिप्लिन एंड क्राफ्ट: एन इंटरव्यू विथ सोनिया सांचेज़ 
5       विकिपीडिया सोनिया सांचेज़ 
6       सोनिया सांचेज़'स पोएटिक स्पिरिट थ्रू हाइकू: जॉन ज़हेना 



अवसाद

खो गयी थी मैं अपनी आंखों में
टकराने उन गुफाओं  से गा रही हैं जो
सूरज-तले शाम की खुश्बू की महक लेते हुए
जहां  सूखी हड्डियां,
अपनी महक  में  नदी- भीतर ले रहीं हैं
हिलोरे
प्रकाश का एक फांक ऊपर-नीचे रेंग रहा  है
पलटता है फिर किनारे की ओर

जैसे बिस्तर पर  नशे में धुत हवा के झोंके
उस कंबल पर ढह पड़ते हैं  ढक रखा है जिसने पसीना
देखते हुए सपना मानो मार रहे हों  कुहनी
स्थिर हूँ मैं इसलिए घावों के साथ भौंडी  मैं
बेपहिया गाड़ी सी छोटी और अटल
क्या मैं रेत में खुश एक आवाज़  हूं?
देखो  हवाओं से मुखौटे
कैसे विदा होने की धुन पर
नृत्य कर रहे हैं
मैंने अपने कपड़े अलग कर दिए हैं
क्या मैं स्तनों द्वारा उपयोग में लाया हुआ
एक बीज हूं
नेत्रहीन नेवला,
या स्पैनियल दांत के बिना शिशु ?


2 
रोई हूँ  पूरी रात मैं
बह रहे हैं मेरे माथे से आँसू
नाड़ियों में सुस्ती,
रीढ़ की हड्डी की आत्मा  से आँसू
बह रहे हैंजो  मेरे जन्म  के सन्नाटे में
अरे!क्या मैं जन्म ले चुकी हूँ? मैं त्वचा नहीं छील सकती
मैं सुन रही हूँ  चंद्रमा इन कमरों में नृत्य करने की हिम्मत कर रहा है
हे सितारा बनने के लिए
सितारे अपनी खुद की दया चाहते हैं
और ले रहे हैं देवताओं की तरह शांत
उछ्वास


प्रेम गीत
( स्पेनिश के लिए )

अगर मैं हंस दूँ तो माफ़ करना
तुम्हें हैं प्रेम पर गहरा विश्वास
तुम हो  इतनी  युवा
और मैं,
प्रेम के  पाठ के लिए काफी वृद्ध

हवा में टूट पड़ती यह बारिश,
प्रेम है
हरी मोम उलीच रही है घास अपनी
यही प्रेम है
और पत्थर
प्रेम के लौट गए क़दमों को कर रहे हैं याद
यही है प्रेम
मगर तुम
हो काफी युवा प्रेम की समझ के लिए
और मैं काफी बुजुर्ग

एक बार,
क्या फर्क पड़ता है
कब और कौन ?
परिचित हुई थी  प्रेम से मैं
मैंने अपनी देह को  किया
उसके अनुसार ठीक
और चली गई
प्रेम में करने विश्राम
मिटा दिए  थे अपने चिह्न सभी

क्षमा करना अगर मुस्कुराऊँ मैं
अनावृत सपनों की युवा उताराधारिणी
तुम हो इतनी जवान
और मैं प्रेम की सीख के लिए
काफी वृद्ध



कविता # 3 
बटोर लेती हूँ मैं
पीछे छोड़ी गयी सभी आवाज़ें
और फैला देती हूँ  तुम्हारे बिस्तर पर उन्हें
हर रात 
मैं तुम्हारी सांस लेती हूँ
और  हो जाती हूँ
मदहोश


--



14 नवंबर, 2019

कभी कभार : दस



कविता, उनका वास्तविक परिचय 

विपिन चौधरी









       स्त्रियों के अनथक संघर्ष, काल और क्षेत्र-विशेष से परे हैं, उनके ये संघर्ष निजी से लेकर सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक किसी भी रूप में हो सकते हैं। अपनी रचनात्मकता के साथ सामाजिक और राजनीतिक पटल पर सक्रिय एक ऐसी ही स्त्री, अश्वेत कवयित्री ऑड्रे लॉर्ड का नाम उन प्रभावशाली रचनाकारों में लिया जाता है जिनकी पहचान उनकी कविता को साथ रखकर पूरी होती थी। ऑड्रे लॉर्ड  का बहुमुखी  व्यक्तित्व इस कथन का सबसे पुख्ता सबूत है। क्रांतिकारी अश्वेत नारीवादी  अफ़्रीकी-अमेरिकी कवयित्री  ऑड्रे लॉर्ड  स्वयं भी ताउम्र अपने निबंधों, साक्षात्कारों में  कविता की महत्वत्ता को रेखांकित करती रही। 


        अपने प्रसिद्ध लेख, ‘सिस्टर आउटसाइडर:फेमिनिस्ट एंड  स्पीचेस’ में कविता की महत्वत्ता का उल्लेख करते हुए उन्होंने लिखा, "हम स्त्रियों के लिए कविता एक लक्जरी नहीं बल्कि हमारे अस्तित्व के लिए एक आवश्यक जरुरत है। कविता, ऐसी रोशनी  है जिसके आलोक-भीतर हम अपनी आशाओं और सपनों के जिंदा रहने और उनमें इच्छित बदलाव को लेकर समर्पित रहते हैं, कविता पहले  भाषा बनती है, फिर तब्दील होती है विचारों में और फिर अधिक ठोस कारवाही बन कर सामने आती है। कविता वह शैली  है जिससे  हम नामहीन को नाम देने में मदद करते हैं ताकि  उसपर आगामी कोई योजना बनाई जा सके।  हमारे दैनिक जीवन के छूने वाले अनुभवों से उकेरे गयी आशाओं और आशंकाओं के कहीं दूर के क्षितिज हमारी कविताओं से प्रभावित होते हैं।”

                18 फरवरी, 1934, हार्लेम, न्यूयॉर्क संयुक्त राज्य अमेरिका में जन्मी ऑड्रे लॉर्ड बचपन से ही अन्वेषी स्वभाव की थीं।  थोडा और परिपक्व होने के बाद वे सामूहिक पहचान के विचारों का प्रतिनिधित्व करने में विश्वास रखने लगी,  उनका मानना था कि किसी अल्पसंख्यक समुदाय में एकल व्यक्तित्व को आसानी से नज़रअंदाज़ किया जा सकता है। इसलिए ऐसे समाज में खास तौर पर एक स्त्री के लिए मल्टीप्ल आइडेंटिटी का होना आवश्यक है।

        जीवन के अनेक हिस्सों में  अलग-अलग जिम्मेदारी निभाने वाली ऑड्रे लॉर्ड की एक अन्य  पहचान समलैंगिक की  भी रही, अपनी इस पहचान को भी उन्होंने हमेशा प्रमुखता  दी और इसे अपने स्त्रीत्व का प्रमुख हिस्सा माना। अश्वेत नारीवाद में ‘इंटरसेक्शनएलिटी’ की परिभाषा के दखल का प्रयास करने वाली वे प्रमुख नारीवादी थी। अपनी दूरदर्शी दृष्टि के चलते उन्होंने 'इंटरसेक्शनएलिटी’ की परिभाषा में लगातार विस्तार किया और इसे अश्वेत स्त्री के अस्तित्व के लिए बेहद महत्वपूर्ण बताया।  

         यह ऑड्रे लॉर्ड ही थी जिन्होंने स्त्रीवादी आंदोलन में  उम्रवाद, (किसी व्यक्ति की उम्र के आधार पर पूर्वाग्रह या भेदभाव), समर्थवाद, (समर्थ लोगों के पक्ष में भेदभाव), होमोफोबिया (समलैंगिकता और समलैंगिक लोगों के प्रति चरम और तर्कहीन टकराव),  वर्गवाद, (किसी विशेष सामाजिक वर्ग से संबंधित लोगों के विरुद्ध पक्षपात) या पक्षपात करना, सीसेक्सिस्म ( ऐसे  मानदंड के लिए अपील  जो लिंग बाइनरी को लागू करता है, जिसके अंतर्गत लिंग अनिवार्यता जरुरी मानी जाती है और उसके न होने के  परिणामस्वरूप ट्रांस आइडेंटिटी का उत्पीड़न होता है) को भी शामिल किया। ऑड्रे लॉर्ड की आवाज़, स्त्रीवाद की दूसरी लहर की अवधि के दौरान उभर कर आयी जिसमें उन्होंने पितृसत्तात्मक  समाज में स्त्री की विशेषताओं  को बचाने पर ज़ोर देने के साथ-साथ उन्होंने अपने काम में स्त्री द्वारा स्त्री की पहचान पर बल दिया। 

          श्वेत समाज के  विशेषाधिकारों और शक्ति संस्थानों पर उसका रुख हमेशा कड़ा होता था, उसे दर्शाने के लिए वे एक सक्रिय कार्यकर्ता के रूप में विभिन्न आंदोलनों में भाग लेती, संगोष्ठियाँ आयोजित करवाती और लेखन में अपना प्रतिरोध दर्ज करती रहीं। लेखन की विविध विधाओं में भी उन्होंने  अपने व्यक्तित्व की  विभिन्न पहचान का भरपूर इस्तेमाल किया। उनके नाम कई दर्ज़ उपलब्धियाँ केवलमात्र निजी उपलब्धियाँ न होकर एक बड़े समुदाय को समर्पित कार्यसिद्धियाँ हैं। 

    एक प्रकार का जुनून, ईमानदारी, अनुभूति और भावनाओं  की  गहराई प्रेम, भय, नस्लीय और यौन उत्पीड़न, अस्तित्व और शहरी संघर्ष उनकी कविताओं  में आसानी से पकड़ में आते हैं। उनके कवि जीवन की शुरुआत प्रेम कविताओं से हुई और 1960 तक आते-आते वे अपने राजनैतिक वक्तव्यों के लिए जानी गई। उनके लिए कविता पहली जुबान थी। अपने जीवन-काल में उनके बारह कविता संग्रह प्रकाशित हुए। उन्होंने अपनी कविताओं में  श्रृंगारिक रस का  बखूबी प्रयोग  किया, अफ्रीकी डायस्पोरा की प्रतीकवादी और इतिहास से समृद्ध कविताएँ उन्होंने खूब लिखी। ऑड्रे लोर्ड ने लगातार यह महसूस किया कि भीतरी संवेदनाओं से उपजी कविताएँ सार्वजनिक राजनीतिक और अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम बन सकती हैं।

         अफ़्रीकी अमेरिकी कवयित्री सोनिया सांचेज़ और अमेरिकी एड्रिएने रिच से उनकी खूब जमती थी। ऑड्रे लॉर्ड समलैंगिकता के मुद्दे को अँधेरे से निकाल कर प्रकाश में लेकर आयीं जिससे  विभिन्न सामाजिक वर्गों  के लोग जागरूक हुए और समाज में  अश्वेत समलैंगिक स्त्रियों के मुद्दों को  पहचान कर उन पर काम किया। तीसरी दुनिया के नारीवादी विर्मश की प्रमुख स्वर, ऑड्रे लॉर्ड  ने अपने लेखन में  स्त्री की आत्मनिर्भरता की अवधारणा को बार-बार दोहराया है।  दोनों तरफ से हाशिये पर खड़ी यानी अश्वेत और समलैंगिक स्त्री के रूप में ऑड्रे लॉर्ड का सफर आसान नहीं था मगर उनके भीतर ऐसी प्रखर  स्त्री-चेतनाको  उनके दौर के लोगों ने देखा परखा, जाना और समझा। आज भी संसार भर की रचनात्मक लोग उनसे प्रेरणा ग्रहण कर रहे हैं।

         एक अश्वेत समलैंगिक नारीवादी के रूप में अपने कैरियर के तौर पर अपनी पहचान को लगातार पुख्ता करते हुए उन्होंने जो लेख लिखे उनके शीर्षक हैं  'योर साइलेंस विल नॉट प्रोटेक्ट यू',  'द मास्टर'स टूल्स विल नेवर डिस्मेंटल द मास्टर'स हाउस', ‘सिस्टर आउटसाइडर’ उनके प्रमुख लेख v व ।‘हु सेड इट वाज़ सिंपल’, ‘पॉवर’, ‘आफ्टरइमेजेज’, ‘सिस्टर इन आर्म्स’, ‘नेवर तो ड्रीम ऑफ़ स्पाइडर्स’ और ‘कोल’ उनकी प्रमुख कविताएँ मानी गई।   

         स्तन कैंसर के रोगी के रूप में उन्होंने चौदह वर्ष तक की लंबी लड़ाई लड़ी और अपनी इस बीमारी को भी उन्होंने  मोटिवेशन का एक  पुख्ता माध्यम माना और इसी के चलते  स्तन कैंसर से बचाव और उससे संघर्ष को लेकर लिखी गई उनकी व्याधि की कहानी को  कैंसर पर केंद्रित पत्रिकाओं में ऑड्रे लॉर्ड ने मृत्यु की संभावनाओं के बारे में तफ़्सील से बात की। 70 के दशक की शुरुआत में 90 के दशक में एक सक्रिय कार्यकर्ता और कवि के रूप में ऑड्रे लॉर्ड ने अपनी कविताओं के जरिए अपने जीवन के कई विरोधाभासों को प्रतिबिंबित किया। उनकी कविताओं के अधिकांश विषय  प्रेम की भावनाओं, बच्चों, अभिभावकों और दोस्तों के बीच संबंधों के सूक्ष्म और जटिल  दोनों प्रकार के भावनाओं से प्रेरित हैं।  उनकी कुछ कविताओं में राजनीति में परस्पर समाजवाद और अफ्रीकी-अमेरिकी सांस्कृतिक अनुपातवाद और अफ्रीकी अमेरिकी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का विरोधाभासी मिश्रण एक ही समय में दीखता है, जो वास्तव में समकालीन अमेरिकी समाज की दमनकारी स्थितियों में शामिल था।

          अपनी कविताओं  में वे अक्सर लैंगिकता  और नस्लवाद से टक्कर लेती हुई दीखती हैं तो उनकी कविताओं में वैश्विक मुद्दों के साथ-साथ आइडेंटिटी  के मुद्दों और उनसे असर का पता लगाने की कोशिशें भी होती हैं। उन्होंने अपनी अफ्रीकी विरासत का पता लगाने वाली कविताएँ भी लिखी। कविता में उनकी गहरी सक्रियता का आलम यह था कि उनकी कुछ कविताएँ रोमांटिक थीं तो वे अपनी राजनीतिक और आक्रोश से लबरेज़ कविताओं, खासतौर पर नस्लीय और यौन उत्पीड़न पर केंद्रित कविताओं के लिए भी जानी गई।

         आज भी ऑड्रे लॉर्ड का समय उनकी कविताओं में प्रतिध्वनित होता है और नई पीढ़ी उस दौर को अपने समय की रोशनी में देखते हुए उनका अन्वेषण करती है और आगे भी करती रहेगी। इस तरह ऑड्रे लॉर्ड की सत्ता सदैव स्त्री-अस्तित्व के लिए संघर्षरत रहेगी उन्हें बार-बार यह  याद दिलवाते हुए कि स्त्रियों तुम्हारी चुप्पी तुम्हारी  रक्षा नहीं कर सकेगी । 

                          


                            

ऑड्रे लॉर्ड



ऑड्रे लॉर्ड की कविताएँ

अनुवाद : विपिन चौधरी


                              
बोलती है स्त्री
                                                         
 चंद्रमा,  
सूर्य के जरिए चिन्हित और प्रभावित होता है 

मेरा जादू लिखा नहीं गया 
लेकिन जब समुद्र  परिवर्तित होता है
तब वह  अपने पीछे मेरा आकार  छोड़ देता है 
नहीं चाहिए मुझे लहू से अछूते की तरफदारी 
प्रेम के अभिशाप सी बेरहम
मेरी  गलतियों या मेरे अभिमान सी स्थिर

प्रेम  और अफ़सोस  का एक  साथ
घाल-मेल नहीं करती मैं
न ही घृणा में मिलाती हूँ तिरस्कार
और अगर चाहते हो तुम मुझे जानना
देखो मुझे यूरेनस की आंत से
जहाँ सागर बेचैन  है  बंदीगृह में

नहीं रहती मैं  अपने
जन्म- भीतर
न ही अपनी दिव्यता में
कौन हूँ मैं चिरयुवा
और आधी वयस्क 
और अभी भी  खोज रही हूँ
*डाहेमी में  अपनी चुड़ैल बहनों को
जो पहनती हैं  मुझे
अपने लच्छेदार कपड़ों में
करती हैं शोक जैसे  हमारी माएं

काफी लंबे समय से हूँ मैं  स्त्री
मेरी मुस्कराहट से रहना  सावधान
 पुराने  जादू  संग और दोपहर के नए रोष के संग
तुम्हारे ढेर सारे  वायदों  के साथ
हूँ मैं विश्वासघाती

मैं एक स्त्री, 
और वह भी  नहीं 
 कोई श्वेत स्त्री


पुनः सृजन

साझेपन में  सिमट
श्रमरत होना है
कितना सरल

देह  के मिलना पश्चात्
मिलन कागज व कलम  का 
न ही परवाह  और न ही प्राप्ति
कि रचा डाला हमने
या कि नहीं 
मगर ज्योहीं तुम्हारी देह
हरकत करती है
मेरे हाथ तले
आवेशित और प्रतीक्षारत,
हटा देते हैं हम
कमरबंद
अपने रान* के सहारे
रचते हो मुझे
तुम
छवियों संग पहाड़ गतिशील होते हैं
हमारे एक से दूसरे शब्द-देशों के आरपार
मेरी देह
लिखती है तुम्हारी त्वचा पर
वह कविता
रच दी है जो तुमने
मुझपर


तुम्हें छू
थाम लेती हूँ मैं
अर्धरात्रि,
चंद्रमा की ज्वाला मेरे कंठ में होती है अस्त जैसे
करती हूँ प्रेम तुम्हें
देह में बौर सी
रचती हूँ तुम्हें
और तुम्हारा बनाया हुआ
समेट लेती हूँ भीतर अपने