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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल
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01 अक्टूबर, 2017





सुषमा सिन्हा की कविताएं

सुषमा सिन्हा:  को छात्र जीवन से ही चित्रकला एवं लेखन में रूचि रही है।

उनकी कविताएं  विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित रही है।
हिन्दी, पंजाबी, और उर्दू आदि भाषाओं के  साझा कविता संकलनों में  कविताएँ शामिल होती रही है।
’’मिट्टी का घर’’ आपका पहला कविता संग्रह है, जो वर्ष 2004 में प्रकाशित हुआ।
सुषमा सिन्हा
"बहुत दिनों के बाद" दूसरा कविता संग्रह वर्ष 2017 में 'प्रकाशित  हुआ। आप झारखंड वित्त सेवा में काम कार्यरत हैं।

1.

 विद्रोह

उन्होंने हमारे लिए रास्ते बनाए
हमारी मंजिलें निश्चित कीं
चहारदीवारी बनाकर
हमारे रहने और सोने की व्यवस्था कीं

उन्होंने
हमें जिंदा रहने देने की
सभी जरूरतें पूरी कीं
फिर
हमारी सोच और सपनों पर पाबंदी लगाई

उन्होंने चाहा
उनकी इच्छा हमारी भी इच्छा हो
उनकी सोच हमारी भी सोच हो
उनके सपने हमारी भी नींदों में आए
उनकी आँखें जो देखें हम उन्हें ही देखें

पर ऐसा हो न सका
हमने अपनी आँखों से दुनिया को देखा
नींदों में सपने भी हमारे अपने आए
हमारी सोच उनकी सोच से अलग होने लगी  विद्रोही होती हुईं हमारी इच्छाएँ
इंसाफ की मांग करने लगीं !!
००

(पहली किताब "मिट्टी का घर" से )



2.

 ख़बरे

बेमानी हो जाती हैं
अखबार में छपी सारी खबरें
बदसूरत हो जाते हैं
टी. वी. पर खबरें पढ़ते हुए खूबसूरत चेहरे

जब भी हम पढ़ते या सुनते हैं
किसी निर्दोष की हत्या
सामूहिक हत्या, बलात्कार
मासूमों के साथ दुर्व्यवहार
अपहरण, लूट-पाट, हिंसा
कोई दहेज के लिए जलाई गई जिन्दा

लगने लगता है तब
क्या मायने है इसके कि जाना जाए
दुनिया में कहाँ, क्या हो रहा है
देश की राजनीति किधर जा रही है
कौन राष्ट्रपति, कौन प्रधानमंत्री हो रहा है

कौन पूरी दुनिया जीत कर आया
किसने देश को स्वर्ण पदक दिलाया
किसने दुनिया में कौन-सा
चमत्कार कर दिखाया
किसने पूरी दुनिया में
खूबसूरती का परचम लहराया

कौन, किस शिखर पर पहुँच गया
कौन-सी बुलंदी पा ली
जबकि इंसानियत ही नहीं बच रही
तो बाकी क्या बच रहा
कि पढ़ा जाए अखबार
या फिर सुनी जाएँ खबरें ।।
०००

(दूसरी किताब "बहुत दिनों के बाद" से )



3.

बहुत दिनों के बाद


बहुत दिनों से मालूम नहीं है मुझे मेरा पता
बहुत दिनों से ढूँढ़ा भी नहीं किसी ने मुझे
पूछा भी नहीं मुझसे मेरे बारे में
खोई हुई-सी, अनजान राहों पर चलते हुए
जिंदा होने के पूरे एहसास के साथ
बातें करना चाहती हूँ आज
खुद से खुद के बारे में
बहुत दिनों के बाद

बहुत दिनों से घूमी नहीं रास्तों पर बिना मतलब
बातें नहीं कीं किसी से अपने मन की
बहुत दिनों से देखा नहीं चाँद को चलते हुए
सुना नहीं आवाज समुंदर की
समुंदर-सी आवाज के साथ बातें करते हुए
चलना चाहती हूँ आज
फिर चाँद के साथ,
बहुत दिनों के बाद

बहुत दिनों से भींगी नहीं बारिश के पानी में
बहुत दिनों से बैठी भी नहीं कहीं चैन से
बहुत दिनों से सुना नहीं बंद आँखों से
आ रही अजान की आवाज और सबद गान
मंदिर की सीढि़यों पर बैठ सुकून से
भीगना चाहती हूँ आज
घंटियों की आवाज के साथ
बहुत दिनों के बाद ।।
०००

(दूसरी किताब "बहुत दिनों के बाद" से )


4.

सफेद झूठ


तस्वीर के इस तरफ खड़ी मैं
बताती रही उसे
कि यह बिल्कुल साफ और सफेद है
तस्वीर के उस तरफ खड़ा वह
मानने से करता रहा इंकार  
कहता रहा
कि यह तो है खूबसूरत रंगों से सराबोर

मूक तस्वीर अपने हालात से जड़
खामोशी से तकती रही हमें  
उसे मेरी नजरों से कभी न देख पाया वह
ना मैं उसकी आँखों पर
कर पाई भरोसा कभी

खड़े रहे हम
अपनी अपनी जगह    
अपने अपने सच के साथ मजबूती से  
यह जानते हुए भी  
कि झक-साफ़-सफेद झूठ जैसा    
नहीं होता है कहीं, कोई भी सच !!  
०००

(जनसत्ता रविवारीय 'दिल्ली' 30.7.17 में प्रकाशित)



5.

सुकून

     
उसने कहा-
'अच्छा, एक बात बताओ  
कितना प्यार करते हो मुझसे'
और उसकी ओर
एकटक देखने लगी

बड़े गौर से देखा उसने भी
थोड़ा मुस्कुराया
फिर अपनी उँगलियों के पोरों से  
चुटकी भर का इशारा करते हुए कहा-    
'इत्तु-सा'  
और ठठाकर हँस दिया

बड़े सुकून से मुस्कुराई वह
और प्यार से बोली- 'बहुत है!'।।
०००

(जनसत्ता रविवारीय 'दिल्ली' 30.7.17 में प्रकाशित)



6.

दाँव


आज फिर  
एक आदमी ने जुए में
अपनी पत्नी को दाँव पर लगाया
और हार गया

उसकी पत्नी को
महाभारत की कहानी से
कुछ लेना-देना नहीं था
न ही वह द्रौपदी जैसी थी
और न ही उसे किसी कृष्ण का पता था

खुद के दाँव पर लगने की खबर सुन
थोड़ी देर कुछ सोचा उसने
और फिर अपने घर के बाहर  
खड़ी हो गई गड़ासा ले कर  ।।
०००

(जनसत्ता रविवारीय 'दिल्ली' 30.7.17 में प्रकाशित )



7.

 दुनिया का सच


सौ कारण बताकर
हमारी बेटियाँ  
इस दुनिया को बुरी बताती हैं  
और दुखी हो जाती हैं
अगले ही पल  
सिर झटक कर कहती हैं
जैसे कमर कस रही हों
'आखिर रहना तो इसी दुनिया में है'
और अपने-आप में व्यस्त हो जाती हैं

हजार कारण बताकर
हमारी माँएँ  
इस दुनिया को खूबसूरत बताती हैं  
जीवन के प्रति विश्वास दिलाती हैं  
तसल्ली देती हैं हमें  
और फिर देर तक        
डरती, सहमती, सशंकित होतीं  
स्वयं अंदर तक थरथराती हैं।।  
०००
('वागर्थ' जून 2017 में प्रकाशित)


8.

 मंत्रमुग्ध


कुछ तो था
जिसका डर था
कि जब भी तुम सामने से आते दिखे
बदल लिया मैंने रास्ता !

कुछ तो था
जिस से थी घबराहट  
कि जब जब हुआ तुमसे सामना  
फेर ली मैंने अपनी नजरें !

वह कुछ तो था
जिसके सुने जाने की थी आशंका
और बंद कर लिए मैंने अपने कान !
 
वह कुछ तो था
तुम्हारी निगाहों में  
जिसे महसूस करती रही
अपनी बंद आँखों से भी !
 
वह कुछ तो था    
तुम्हारी ख़ामोशी में    
जिसे सुनती रही सदियों से
सन्नाटे और शोर में भी !  

वह कुछ तो था
जो आज भी चौंक-चौंक जाती हूँ मैं
जैसे ले कर मेरा नाम
'मुझे' पुकारा हो तुमने !

वही कुछ तो
आज भी है हमारे बीच
कि खुद पर लगायी
तमाम पाबंदियों के बावजूद        
किसी चुम्बकीय आकर्षण में बँधी  
खिंची जाती हूँ तुम्हारी ही ओर
मंत्रमुग्ध !!  

(अप्रकाशित)



9.

 मेहनत की हँसी


अनाथ 'चिंता' के चेहरे पर            
चिंता की कभी  
कोई लकीर नहीं दिखती            

'पूनम' का दाग भरा चेहरा            
चमकता रहता है पूनम के चाँद सा        

'लक्ष्मी' को घेरे रहती है दरिद्रता          
फिर भी मुस्कुराती हुई        
आ ही जाती है समय पर          

इनके आने पर जाने कैसे        
मुझमें आ जाती है हिम्मत        
तैयार होती हूँ भाग-भाग कर              
निकल जाती हूँ झट काम पर          

सुनते ही गाड़ी की आवाज          
कैंपस में झाड़ू लगाते उनके हाथ          
ठिठक जाते है यकायक        

कौतूहल से निहारतीं उनकी आँखें              
मुझे देख मुस्कुराती हैं                
हाल जो इनका पूछ लो तो              
'अच्छा है' कह कर खिलखिलाती हैं                  

इन मेहनतकश औरतों की                
निश्छल हँसी                  
ले आती है मेरे चेहरे पर भी मुस्कान          
और.... थोड़ी और
बढ़ जाती है मेरी रफ़्तार !!                        
  ०००
( 'मणिका' सितंबर 2017 में प्रकाशित )



10.

सच का सामना

जब-जब भी चुभती हैं आँखों में
उजालों की नागवार सच्चाईयाँ
अच्छे लगने लगते हैं अँधेरे !

होश में जीना
जब लगातार होता जाता है मुश्किल
सुकून देने लगती हैं बेहोशियाँ !

बड़े अच्छे लगते हैं वे सारे झूठ
चख चुके होते हैं
जिनकी तल्ख़ सच्चाइयाँ !

उन टूटे रिश्तों की यादें भी
लगती हैं खूबसूरत
गुमां हुआ होता है जिनसे कभी दोस्ती का !

बेवफाई के बावजूद
बचा ही रहता है  
प्रेम का मुलांकुर, कहीं हमारे भीतर !

लोग कहते रहें लाख बुरा उन्हें
बुरे नहीं लगते हमें
देख चुके होते हैं जिनकी अच्छाइयाँ !

सारी स्थितियों के तय मानक
जरुरी नहीं
कि हों जीने के लिए बेहतर
कुछ भी नहीं होता, कभी भी मुक्कमल !!  
०००
(अप्रकाशित)



11.


बेहतरीन सपने

बेटी अपनी आँखों से
देखती है इंद्रधनुष के रंग
और तौलती है अपने हौसलों के पंख
फिर एक विश्वास से भरकर
अपनी माँ से कहती है-
'मैं आपकी तरह नहीं जीऊँगी'

मुस्कुराती हैं माँ
और करती हैं याद
कि वह भी कहा करती थीं अपनी माँ से
कि 'नहीं जी सकती मैं आपकी तरह'

माँ यह भी करती हैं याद
कि उनकी माँ ने भी बताया था उन्हें
कि वह भी कहती थीं अपनी माँ से
कि 'वह उनकी तरह नहीं जी सकतीं'

शायद इसी तरह
माँ की माँ ने भी कहा होगा अपनी माँ से
और उनकी माँ ने भी अपनी माँ से......
कि 'वह उनकी तरह नहीं जीना चाहतीं'

तभी तो
युगों-युगों से हमारी माँएँ
हमारे इंकार के हौसले पर मुस्कुराती हैं
और अपने जीवन के बेहतरीन सपने
अपनी बेटियों की आँखों से देखती हैं !!
०००
('वागर्थ' जून 2017 में प्रकाशित)



12.

घबराहट


बढ़ती जा रही है भीड़ रास्तों पर
घबराए हुए लोग भाग रहे हैं इधर-उधर
भाग रही हूँ मैं भी उनके साथ
रास्ता कभी घर की ओर का लगता है
कभी लगता कि जा रही हूँ काम पर

भागते-भागते पड़ी नज़र
एक बूढ़े व्यक्ति पर  
जो झोला टाँगे, डंडा पकड़े
चला जा रहा था धीरे-धीरे
धक से हुआ मन
जा रहे हैं पिता कहाँ इस तरह ?
अब तो उनसे चला भी नहीं जाता  
मुड़-मुड़ कर टिक रही है उनपर नज़र
भागती हुई झट पहुँची उन तक  
ओह !! नहीं... ये मेरे पिता नहीं....
पर किसी के तो पिता हैं  !

घबराई हुई वहाँ से भागी उस तरफ  
जहाँ रास्ते के किनारे बैठी एक बूढ़ी औरत  
हर आने-जाने वाले के आगे          
फैला रही थी अपना कटोरा        
देख रही हूँ गौर से, जा कर उनके पास        
कहीं यह मेरी माँ तो नहीं        
नहीं- नहीं....यह मेरी माँ नहीं....    
पर किसी की तो माँ हैं !
 
हड़बड़ाई हुई
भाग रही वहाँ से भी
रोक रहे हैं रास्ता छोटे-छोटे बच्चे
फैलाये हुए अपनी नन्ही नन्ही हथेलियाँ          
देखने लगी हूँ उन्हें भी बड़े ध्यान से    
कहीं इनमें मेरे बच्चे तो नहीं
नहीं.. इनमें मेरे बच्चे नहीं.....
पर किन्हीं के तो बच्चे हैं !

बेचैन हो कर रो पड़ी हूँ बेसाख्ता
और भागने लगी हूँ बेतहाशा...

'क्या हुआ मम्मा ? ....आप डर गईं क्या ?'        
झिंझोड़ कर उठा रही है मुझे मेरी बिटिया !!
०००
( परिकथा सितंबर 2017 में प्रकाशित )


13.

पँखों वाली लड़की

मैं ढूँढ़ रही हूँ
उस पगली सी लड़की को  
जिसके पँख हुआ करते थे    
बेवजह हँसती वह लड़की  
पंजों के बल चलती थी  
हौले से धरती पर पैर दबा  
आसमान में उड़ती थी    

परवाजों की तरह वह
इंद्रधनुष तक जाती थी        
रंग-बिरंगे सपने अपने
बस्ते में भरकर लाती थी
उन्हीं सपनों के रंगों में
जीती और जगमगाती थी  
अँधेरी रातों में भी
चमकती आँखों से मुस्कुराती थी      

सुना है
उनमें से कई सपने  
जीवन के जरुरी सपने थे जो खो गए  
कई सपने कमजोर थे जो टूट गए  
कई सपने तो यूँ ही भूखों मर गए  
कई सपने जो जिंदा बचे थे
आँसुओं से लथपथ पड़े थे
जिन्हें वह छोड़ नहीं पाई  
उन्हीं से भीगे पँखों के कारण  
फिर कभी वह उड़ नहीं पाई    

सुना है यह भी
कि उसके पँख    
हवा से भी ज्यादा हल्के थे      
और सपने समय से भी ज्यादा भारी            
टूटते हुए पँखों के दुःख
और दर्द के बावजूद      
वह हौसलों से भरी थी          
अपने मरणासन्न सपनों को        
जी-जान से बचाने में लगी थी        

दोस्तो !! आपको भी कभी    
मिल जाए अगर कहीं        
पँखों वाली ऐसी कोई लड़की        
बताना उसे -      
'कि सपनों के लिए पँखों को सहेजे    
कि पँखों के बिना सपने नहीं बचते              
कि सपनों के लिए जरुरी है
हमारे पँखों का बचा रहना ।।'
०००
( परिकथा सितंबर 2017 में प्रकाशित )



संपर्क:
 सुषमा सिन्हा
मकान न0- 30,
अशोक विहार एक्सटेंशन (वेस्ट)
राँची- 834002, झारखंड
मोबाईल न. 9430154549, 9431417339
Email:   sushmasinha19@gmail.com  

28 सितंबर, 2017


असगर वजाहत की कहानी:

नया  विज्ञान

असग़र वजाहत

लोग उसे घेरे खड़े थे।वह बड़ा उत्तेजित लग रहा था।शब्द उसके मुंह से गोलियों की तरह निकल रहे थे। उसके समर्थक उसके कुछ बोलने से पहले ही तालियां बजाकर दिल बढ़ा रहे थे वह लगातार बोल रहा था। किसी को सोचने या कुछ पूछने तक का मौका नहीं दे रहा था। उसके शब्द लोगों पर असर कर रहे थे और लोग उसके प्रशंसकों और समर्थकों ने शामिल हो रहे थे।
वह कह रहा था कि देखो हमने इतिहास बदल डाला ।हमने शासकों के नाम, घटनाओं का घटनाक्रम बदल दिया। हार को जीत बना दिया, अच्छे को बुरा बना दिया और बुरे को अच्छा कर दिया। काले को सफेद कर दिया और स्त्री को पुरुष बना दिया और पुरुष को स्त्री बना दिया ।

देखो हमने क्या कर दिया। हमने 1000 साल के इतिहास को बदल दिया। हमने किताबें बदल दी। किताबों के लिखने वालों को बदल दिया है।  हमने  एक दिन में  सैकड़ों इतिहासकार  पैदा कर दिए हैं जो सच्चा और पक्का इतिहास लिख रहे हैं। किताबों में  जो पहले लिखा था वह गलत था । अब जो हमने लिखा है वह सही है । अब वही पढ़ाया जाएगा। हमने इतिहास बदल दिया।

तालियों की गड़गड़ाहट के बाद उसकी जय जयकार होने लगी लोग खुशी से पागल हो गए उसने कहा कि हमारा इतिहास वास्तव में बड़ा गंदा इतिहास था। अच्छा किया जो उसे बदल दिया। इससे बड़ी देश की सेवा क्या हो सकती है।

फिर उसने कहा इतिहास को ही नहीं हमने भूगोल को भी बदल दिया है। हमने देश की सीमाओं को बदल दिया है ।तुम जहां तक समझते हो वहां तक देश नहीं है। देश की सीमाएं दूर दूर तक फैल गई है ।वह सब जो पहले विदेश  कहा जाता था वह विदेश नहीं, अब  देश का भाग हैं। भूगोल बदल दिया है। नदियों को पवित्र कर दिया है। पर्वत और जंगल जो कट गए थे उनको लगा दिया गया है।

इतिहास और भूगोल बदल दिया है ।

फिर उसने कहा अब हम विज्ञान बदलने जा रहे हैं ।वैज्ञानिक अब तक बड़ा झूठ बोलते रहे हैं। पश्चिम के वैज्ञानिकों ने हमारे विज्ञान को ठीक से नहीं समझा है ।और अब हम सिद्ध करने जा रहे हैं कि पश्चिम का विज्ञान गलत है । हमारे देश में आज से 10000 साल पहले सुपरसोनिक जेट से अधिक तेज चलने वाले वायुयान थे। यूरोप आज प्लास्टिक सर्जरी पर गर्व करता है पर हमारे देश में यह सर्जरी 10000 साल पहले हुआ  करती थी ।हमारे देश में 10000 साल पहले वह सब कुछ था जो आज भी आधुनिक से आधुनिक देश के पास नहीं है ।हमारे महापुरुषों का एक-एक वाण  सौ- सौ एटम बम के बराबर हुआ करता था ।हम यह बात सिद्ध करने जा रहे हैं। सबसे पहले हम यह सिद्ध करेंगे की पश्चिम के वैज्ञानिक बड़े झूठे और बेईमान थे। हमारे ही देश से हमारे वैज्ञानिक आचार्यों के फार्मूले चुराकर अपने देश ले गए और वहां उसको प्रचारित कर दिया। हम लोग प्रचार नहीं कर सके इसलिए हमारी बात  पहुंच नहीं सकी।

उसने कहा, सिद्ध कर दूंगा कि न्यूटन ने जो कुछ लिखा है सब झूठ है। वैसे न्यू न्यूटन पक्का चरित्रहीन था । एक वेश्या के साथ उसके अनैतिक संबंध थे  और अपनी पत्नी को लेकर  भाग गया था।  उसको मोहल्ले के लोगों ने पकड़ कर पीटा भी था।  लड़कियों को छेड़ने में  उसका कोई जवाब न था। गैलेलियो अपने एक टेलिस्कोप पर गर्व करता था  और हमारे यहां बिना टेलिस्कोप के दूर-दूर तक देखने वाले पैदा हुए हैं। आइंस्टाइन की थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी फ्राड है। वह बड़ा अज्ञानी था। असली खोजों से पता चला है कि वह तो भारत  में झुमरी तल्लइया के एक छोटे से कॉलेज में होम साइंस पढ़ाया करता था और यूरोप जाकर उसने थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी की घोषणा कर डाली। डार्विन तो बिल्कुल मूर्ख था। स्कूल में हमेशा फेल हो जाता था। उसके अध्यापक  उससे बहुत दुखी रहा करते थे । किसी को आशा तक न थी  कि वह हाईस्कूल पास कर सकेगा। उसके पिताजी की परचून की दुकान थी और माता धोबिन का काम करती थी ।उसके दादा कसाई थे और परदादा गाड़ीवान थे ।यह सब नयी खोजों से पता चला है।

तो मितरों आइए हम न्यूटन को, जिस  पर  पूरा यूरोप  गर्व करता है,को गलत सिद्ध करते हैं।
न्यूटन कहते हैं कि पृथ्वी में गुरुत्वाकर्षण है। मतलब यह कि पृथ्वी में शक्ति है ।हम कहते हैं कि आकाश में शक्ति है।  न्यूटन कहते हैं किसी चीज को ऊपर  फेंको तो वह पृथ्वी की ओर आएगी, नीचे गिर जाएगी। हम कहते हैं कि किसी चीज को ऊपर फ़ेकों तो आकाश में चली जाएगी। देवलोक में चली जाएगी। देवलोक में बड़ी शक्ति है। हम आज यही सिद्ध करेंगे। हम अपने शिष्यों से कहते हैं कि वह एक भारी पत्थर ले आए। भारी पत्थर को हम ऊपर फेकेंगे और वह आकाश में चला जाएगा।

उनके सौ शिष्य एक बड़ा भारी पत्थर लाए ।उसने अकेले  पत्थर को उठा लिया। तालियां बजने लगीं। लोग उसकी जय जयकार करने लगे। उसने पत्थर को दोनों हाथों से उठाकर आकाश की ओर फेंका और पत्थर ऊपर जाने लगा। तालियों की गड़गड़ाहट और बढ़ गई। जय जय कार के नारे लगने लगे। हर्षोल्लास छा गया। जरा देर में बहुत भव्य मंच लग गया। फूलों से सज गया। बैनर पोस्टर से लग गए। लाउडस्पीकर आ गए। अपार जनता आ गई और भाषण शुरू हो गए। देश प्रेम के भाषण। देश की उपलब्धियां । देश का गौरवशाली अतीत। देश का विज्ञान। देश का बदला हुआ इतिहास ।देश का बदला हुआ भूगोल । आगे और आगे और आगे बढ़ता हुआ देश।

अचानक देखा गया की आकाश में उछाला गया पत्थर बहुत तेजी से नीचे आ रहा है। उसका आकार भी बहुत बढ़ गया है। जैसे-जैसे वह नीचे आ रहा है वैसे वैसे उसका आकार बढ़ता जाता है। लोगों ने इधर-उधर भागने की कोशिश की । मंच से नेता कूदे। भागो ,बचाओ-बचाओ की बहुत सी आवाज़ें आने लगीं है लेकिन ऊपर से गिरने वाला पत्थर इतना बड़ा और इतना भारी हो गया था कि पूरा मंच और जय जयकार करने वाले सभी लोग और दर्शक उसके नीचे आ गए हैं।
०००

26 सितंबर, 2017

विनय सौरभ की कविताएं
__________________



विनय सौरभ


बचपन की कोई ब्लैक एण्ड ह्वाईट तस्वीर

अब तो उस मकान की स्मृति भर है
जिसके आगे मेरी वह तस्वीर है

एक घोड़ा बँधा दिखता है थोड़ी दूर में
और मेरा बड़ा भाई बैलगाड़ी के पीछे
कैमरे से छुपने की कोशिश में लजाता हुआ

आह, वह दृश्य !
मफ़लर और फूल वाले स्वेटर में
बुआ का हाथ थामे मैं अपने पुराने खपड़ैल वाले
घर के चबूतरे पर
और मेमने अपनी माँ के स्तन पर थूथन अपनी मारते हुए !

कितनी विह्वलता भरी है उस तस्वीर में !
कितना जीवन रस !

अब तो वह मकान भी नहीं रहा,और टोले में वह घोड़ा किसका था ?

सब कहते हैं -
तब तो हर घर में गायें भी होती थीं !

क्या आपके पास बचपन की कोई ब्लैक एण्ड वाइट तस्वीर है,
जिसके खेंचे जाने की याद ज़ेहन में नहीं के बराबर है ?

क्या उस फोटूग्राफ़र के बारे में यकीन से कुछ बता सकते हैं, जो शहर से गाँव फोटू
खेंचने के लिए ही आता था ?
०००


हाट की बात
______

हाट जाना मुझे मेरे पिता ने सिखाया

एकदम बचपन की बात बताता हूँ
वे रविवार की सुबह मुझे अपने साथ
कर लेते थे
मै झोला अपनी नन्हीं मुट्ठियों में भींचे
उनकी उँगली थामे होता था

मैंने उनके साथ कई शहर बदले
पर हाट जाने का सिलसिला बदस्तूर जारी रहा

अच्छे किस्म के आलू और दूसरी सब्जियों  की पहचान मैंने एकदम छोटी उम्र में  कर ली थी
क्या आपको पता है, बैगन हल्के अच्छे  होते हैं ?
मछलियों के फेफड़े से उनके ताज़ेपन की पहचान होती है ?

सोलह बरस पहले,
जिस दिन आख़िरी साँस ली पिता ने
वह रविवार का दिन था और मैं  अपने गाँव की हाट गया था

तीस बत्तीस का हो गया हूँ
हफ़्ते की हाट जाना मुझे आज भी अच्छा लगता है
हरी सब्जियों से भरे खोमचे मुझे जीवन में  देखे गये सुन्दर दृश्यों में  से लगते हैं

पिंजरों में प्यारे  कबूतर सिर निकालकर देखते हैं हाट आए लोगों को
बिक जाने के बाद उनका क्या होगा, थोड़े ही जानते हैं

अजीबोगरीब शक्ल के पगड़ी वाले जो अपने को परदेशी बताते हैं
बेचते हैं  कई किस्मों के तेल और जड़ी बूटियाँ
मौक़ा ताड़कर लोगों को रातों की हताशा और बेचारगी का निदान सुझाते हैं

कहते हैं -
सांडे का तेल लगाओ, सब ठीक हो जावेगा
बीवी खुश हो जावेगी

बच्चों  की आमद देख कर कहते हैं -
बाबू साब, तुम्हारी  उमर नहीं हुई ये सब सुनने की, चल खिसक ले

                      °°°


एक कवि का अंतर्द्वंद्व
_____

वह बहुत उदास-सी शाम थी
जब मैं उस स्त्री से मिला

मैंने कहा - मैं तुमसे प्रेम करता हूं
फिर सोचा - यह कहना कितना नाकाफ़ी है

वह स्त्री एक वृक्ष में बदल गई
फिर पहाड़ में
फिर नदी में
धरती तो वह पहले से थी ही

मैं उस स्त्री का बदलना देखता रहा !

ए‍क साथ इतनी चीज़ों से,
प्रेम कर पाना कितना कठिन है
कितना मुश्किल,
एक कवि का जीवन जीना

वह प्रेम करना चाहता है एक साथ कई चीज़ों से
और चीज़ें हैं कि बदल जाती हैं
प्रत्येक क्षण में !
०००

अगर मैं परदेश में मरा
(1997)
 ___

(पहल पुस्तिका में नाज़िम हिक़मत की एक कविता मेरा ज़नाज़ा से प्रेरित)

मुझे यक़ीन है
किसी रोज गहरी आकस्मिकता के साथ यह देह छूट जाएगी

दिन जब ऊपर को आ चुका होगा
पड़ोसियों को बहुत देर के बाद
मिलेंगे संकेत

तब तक बच्चे स्कूल
और कामगार अपने काम को जा चुके होंगे, घरेलू स्त्रियाँ रसोई की खटपट में जुटी होंगी

रोशनदान से कोई फुर्तीला आदमी भीतर आएगा और खोलेगा सामने का दरवाज़ा

अगर मैं परदेश में मरा तो
निश्चित ही थोड़ी दिक्कत आ सकती है

पड़ोसी मेरे स्थायी पते के लिए परेशान होंगे, वे शहर में मेरे किसी भी परिचय का हर संभव चिह्न ढूँढेंगे

मुरदे को बहुत देर तक
यूँ ही नहीं छोड़ा जा सकता !
वे एक परदेशी के वास्ते जरूरी औपचारिकता और अपना धर्म निभायेंगे ही

बच्चों में मृतकों को लेकर थोड़ा कौतुहल होता ही है
वे मेरी शवयात्रा को औचक नज़रों से देखेंगे, जिसमें यक़ीनन गिनती के लोग होंगे !

वह एक कवि की शवयात्रा नहीं होगी !!

यह स्वीकार कर लेने में क्या हर्ज है कि उस शवयात्रा में एक मुरदे को शमशान तक पहुँचाने की हड़बड़ी में सभी लोग भरे होंगे !

हालाँकि-

मृत्यु के बारे में कुछ निश्चित नहीं है
और आत्मा के बारे में ठीक -ठीक कुछ भी कहना कठिन जैसा है

आत्मा अगर है तो-
वह मेरी शवयात्रा को जाता हुआ देखेगी
अगर वह हँसती है तो-
आशंका है कि वह मृत्यु के बाद की
मेरी नियति पर हँसेगी !

कहेगी ही-
कि परदेश में भी मरे
और अंत तक कविता के कोई मित्र नहीं  बना सके !
 •••


परिचय
विनय सौरभ: 22 जुलाई 1972 को  संथाल परगना के एक गाँव *नोनीहाट* में जन्म।

  टी एन बी कालेज, भागलपुर  से स्नातक और भारतीय जन संचार संस्थान, नयी दिल्ली से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा‌

देश की शीर्ष पत्र पत्रिकाओं में तीन सौ के करीब कविताओं और लेखों का प्रकाशन।

संपर्क:
मोबाइल: 7274078832
9431944937

24 सितंबर, 2017


नीलेश रघुवंशी की कविताएं

गंज बासौदा (म.प्र.) जन्मी नीलेश रघुवंशी 1997 में अपने पहले कविता संग्रह-घर निकासी,  से काव्य यात्रा शुरू की तो फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। पानी का स्वाद, अंतिम पंक्ति में, कवि ने कहा, खिड़की खुलने के बाद जैसे महत्वपूर्ण कविता संग्रह तक आ पहुंची।
नीलेश रघुवंशी

नीलेश रघुवंशी की रचनात्मक यात्रा सिर्फ़ कविताओं के ही नए-नए सोपान से गुज़र रही है, बल्कि उनका उपन्यास-एक कस्बे के नोट, भी खासा चर्चित रहा है। नीलेश ने अनेक नाट्य लेखन लिखें है । कविता संग्रह, उपन्यास और नाट्य लेख पर उन्हें अनेक सम्मान और पुरस्कार से नवाजा जा रहा है। यहां हम बिजूका के पाठकों के लिए उनके नए कविता संग्रह - खिड़की खुलने के बाद, से कुछ कविताएं साझा कर रहे हैं। आशा है कि बिजूका के पाठकों को इन्हें पढ़कर अच्छा लगेगा।



ग्यारह कविताएँ

चक्र 


 1.... भूख का चक्र

सबके हिस्से मजदूरी भी नहीं अब
षरीर में ताकत नहीं तो मजदूरी कैसे

छोटे नोट और सिक्के हैं चलन से बाहर

पाँच सौ के नोट पर छपी
पोपले मुँह वाली तस्वीर भी
कई दिन से भूखी है
वो भी शिकार है तंत्र के चक्र में भूख की ।  

2....फैशन का चक्र

फैशन आजकल में
क्या छोडूँ और क्या तो पहनूँ
मैचिंग बीते जमाने की बात है
अब जमाना है कंट्रास्ट का
डिफरेंट मिक्स एंड मैच
लेकिन
लाल के साथ नीला बिल्कुल नहीं
रेड का फोबिया खत्म हो चुका है अब
आजादी के मायने की बात न करना
ये गुलामी बड़ी मोहक है ।

एकदम घुप्प अंधेरे में चलता है चाक
न कुम्हार दिखता है न दिखता है आकार
घूम-घूमकर लौटता है फैशन
फसल कोई बोता है
काटता है कोई और
यही है फैशन का चक्र  ।


3....झूठ का चक्र

एक झूठ बोला
बचते-बचाते दो-चार झूठ और बोले
एक नहीं, सौ नहीं, हज़ारों-हज़ार झूठ बोले
आखिर में लड़खड़ाती जुबान में
थक हारकर सच बोला ।

सच र्धेर्य नहीं खोता
झूठ की मृत्यु की प्रतीक्षा भी नहीं करता
झूठ करता है वो सब कुछ
जिसे करने की सच सोचता भी नहीं
तर्क में नहीं
कुतर्क में घुटता है दम झूठ का  ।

4....मौसम का चक्र

थोड़ा-थोड़ा सब कुछ लेने के फेर में
नहीं मिलता कुछ भी
मौसम बदलता है तो बदलती है सोच
अपने चरम पर पहुँचता
हर चार माह में बदलता
मौसम भी बनाता है हमें निकम्मा ।

5.....प्यार का चक्र

उछालती जब उसे बाँहों में
दिल काँपता था मेरा
उसकी दूध की उल्टी से
सूखता था मेरे भीतर का पानी
एक वृक्ष की तरह
उसकी जड़ें मेरे भीतर तक फैलती चली गईं ।

सोचती
जब अठारह का हो जाएगा
छोड़ दूँगी घने जंगल में
बर्फीले पहाड़ों के ऊपर होगा उसका मचान
अन्तहीन आकाश में उड़ते देख
पीठ फेर लूँगी ।

बदलती दुनिया, जोखि़म, रोमांच से प्यार
बड़ी लम्बी उछाल है उसकी
जाने क्या होता है अब मेरे भीतर
फड़फड़ाती हूँ उसे उड़ते देख
अपने हाथों को ढाल बना
उड़ना चाहती हूँ उसके संग ।

प्यार का ये चक्र
घूमकर आ ठहरता है उसी जगह
जहाँ...मैं सोचती हूँ
बस एक बरस और ।


6....हँसने का चक्र

हँसने हँसाने का दूसरा नाम है जीवन
लेकिन जाने कब कैसे और क्यों
हँसना छोड़ दिया हमने
हँसी को छोड़ दौड़ के पीछे लग गए
धीरे-धीरे हँसी सेल्समेन, सेल्सगर्ल्स और
क्रेडिट कार्ड बेचने वालों की हो गई
हँसी को शिष्टाचार के संग रोजगार बनाया उन्होंने
ठगे जाने के भय से न हँसे न मुस्कुराए
रो भी न सके हम ।

हँसना जरूरी है निरोगी काया के लिए
हँसी क्लब में प्रवेश के लिए मोटी फीस भरी
हँसने के नाम पर
कैसी डरावनी आवाजें निकालने लगे हम
हमेषा बुरा माना जाता है बिना वजह दाँत दिखाना
नदी किनारे मिलती है सच्ची हँसी
नदियों को हमने जाने कब का बेच दिया
हँसने का कोई चक्र नहीं
बिकने की कोई उम्र नहीं ।

7.....रोने का चक्र

तुमने जन्म लिया तो रोए
भूख लगी तो रोए
मन की कोई चीज न मिली तो रोए
अपनों से बिछुड़ने पर रोए, खूब रोए
खुशी में फूट-फूटकर नहीं रोए कभी
आँखें गीलीं हुईं और तुमने कहा
ये आँसू खुशी के आँसू हैं ।
फिर
तुमसे कहा गया
बात-बात पर रोना अच्छी बात नहीं
रोने से नहीं मिलता कुछ भी
तुमने
अपने भीतर आँसूओं का कुआँ बना लिया
जो मारे ठंडक के जम गया
बहुत दिन से नहीं रोए सोचकर
अचानक तुम रोए खूब रोए
जीवन में रोने से नफरत करना भी

एक रोना है ।   


8....सोचने का चक्र

जब
महानगरों को देखा
चकाचौंध में उनकी घिग्गी बँध गई मेरी
भाषा ने साथ छोड़ दिया
खुद की भाषा को छोड़
लपलपाने लगी दूसरे की भाषा में
स्वचालित सीढ़ियों से डरते
पानी को बिकते, खुद को फिकते देख
अपनी जगह लौट आई
लौटकर
गाँवों, नगरों को महानगर में बसाने का सोचने लगी
नगर, उपनगर, गाँव, देहात, कस्बे महानगर
चकाचौंध, धिग्गी, लपलपाहट, सनसनाहट
नींद ने मेरा साथ छोड़ दिया
नींद को बुलाने के लिए
एक से हज़ार तक गिनती गिनने लगी
गिनते हुए गिनती के बारे में सोचने लगी ।

9....यात्रा का चक्र

बंजर जिंदगी को पीछे छोड़ देना
बारिश को छूना चाँद बादलों से यारी
नंगे पाँव घास पर चलकर ओस से भीग जाना
खाना-बदोष और बंजारों के छोड़े गए घरों को देखना
खुद को तलाशना उन जैसा हो जाना
न होने पर ईर्ष्या का उपजना
प्राचीन इमारतों के पीछे भागना
स्थापत्य मूर्तियों को निहारना
एक पल में कई बरस का जीवन जी लेना
ट्रेन का छूट जाना जेब का कट जाना
किसी के छूटे सामान को देखकर
बम आर.डी.एक्स. की आषंका से सिहर जाना
घर पहुँचना और पहुँचकर घर को गले लगा लेना
यात्रा का पहला नाम डर, दूसरा फकीरी  ।

बहुत दिनों से जाना चाहती हूँ यात्रा पर
लेकिन जा नहीं पा रही हूँ
एक हरे भरे मैदान में
तेज, बहुत तेज गोल चक्कर काट रही हूँ
यात्रा के चक्र को पूरा करते
खुद को अधूरा छोड़ रही हूँ ।

10....नींद और स्वप्न का चक्र

नींद के गुण दोष
स्वप्न के गुण दोष हैं
अनिद्रा की षिकार नहीं
फिर भी
नींद नहीं मेरे पास ।
कहती है नींद
खुद के लिए जियो
स्वप्न कहते हैं
औरों के लिए जियो ।
न जागती हूँ न रोती हूँ
नींद से भरी
स्वप्न की पगडंडी पर चलती हूँ ।

11...जीवन का चक्र

जीवन क्या है
कभी हँसना कभी रोना
कभी मिलना कभी बिछड़ना
कभी सुख की कामना करना
कभी दुख को परे धकेलना
कभी दुनिया पर तंज कसना
कभी मोह माया को गले लगाना
कभी नंगे पाँव
इस भवसागर से कूच कर जाना ।

जीवन की शुरुआत तुमसे
अंत भी तुमसे
बीच में मध्यांतर
मध्यांतर में एक नहीं, कई मोड़
किसी एक मोड़ का जिक्र
चक्र को अधबीच में रोक देगा ।

तुमने
एक नहीं, हज़ार इच्छाओं को जन्म दिया
हर इच्छा ने पूरे होने तक
कई बार गिराया, उठाया कई बार तुम्हें
कुछ ने तुम्हें बौना कर अपना कद बढ़ाया
किसी एक को जन्म लेने से पहले
तुमने मार डाला
कौन था वो
जिसे जन्म लेने से पहले तुमने पैनेपन के साथ मारा
रोते हो हर रात उसके संग
कि तुमने उसे जन्म नहीं लेने दिया
बेल की तरह तुमसे लिपटी
तुम्हें तनकर रहना जो सिखाती
उस अजन्मी इच्छा का नाम है
जीवन का चक्र ।

कहने सुनने से जो छूट गया
जो कहा नहीं गया अभी तक
जो रचा नहीं गया अभी तक
हर बार कहने में जो छूटता है
वहीं से शुरूरू होता है जीवन का चक्र ।
०००
06 जनवरी बुधवार से 09 मार्च मंगलवार 2010 भोपाल