पंखुरी सिन्हा
तेजो तीरे एक गाँव है बेल्वर ---जो कि कास्तेलो ब्रैन्को में 'मेरे पास के किले'-का गूगल सर्च करते अचानक मेरे सामने आया! हालाकि उस तक जाने की कोई सीधी बस नहीं थी--तो मैंने पास के शहर गाविआओ का टिकट लिया। ये मैंने बाद में देखा कि अब्रांतस जाने की सीधी बस थी, जो भी एक उतना ही ख्यात, खूबसूरत किला है। बेल्वर और अब्रांतस दोनों लिस्बन से लगभग ढाई घंटे की दूरी पर स्थित हैं, दोनों तेजो नदी के किनारे हैं और काश्तेलो ब्रान्को से लगभग सवा घंटे की दूरी पर स्थित हैं।
फिर बेल्वर का ज़िक्र हॉस्टल में भी हो रहा था, और उसके आसपास का भी-- मैनेजर सुझा रही थी- और इस तरह गाविआओ का दोपहर एक बजे का टिकट मेरे फोन में तैयार था! लेकिन हॉस्टल की ही और रास्तों की उलझनों के कारण वह बस इस तरह छूटी कि आँखों के सामने से निकल गई। तीस सेकेंड का फासला रह गया, मेरे और खुलती हुई बस के बीच! और दिन का पूरा नक्शा उलट फेर हो गया! मैं बस के दफ्तर में शिकायत करने गई कि मैं हाथ दिखाती रही लेकिन बस वाले ने खोलने से पहले एक बार न इधर देखा, न उधर और कुछ सेकेंड पहले ही, बस को चलता कर दिया!
रुपए में गिनें तो 700 से 900 के बीच का टिकट था! लेकिन बस कंपनी की दिलचस्पी केवल अगला टिकट बेचने में थी और वह भी 6 बजे शाम के लिए! बिना एक शब्द कहे वहाँ से मैं रुखसत हुई और
पार्श्व में स्थित ट्रेन स्टेशन पहुंची! मेरी खुश किस्मती कि अगले बीस मिनट के भीतर एक ट्रेन बेल्वर जा रही थी। ट्रेन में सवार होने से पहले ही एक भारतीय सज्जन से भेंट हुई जो अगले ही स्टेशन पर उतरने वाले थे, वहीं रहते थे। स्टेशन का नाम था—ह्रीतैशो !
और बड़ी खैरियत थी कि अंग्रेज़ी बोलने वाली एक पुर्तगाली लड़की मेरी बगल वाली सीट पर बैठी थी! उसने टिकट चेकर के आकर बताने से पहले ही बता दिया कि ट्रेन बेल्वर नहीं जायेगी! और मेरे एकदम से घबरा जाने पर उसने फौरन आश्वासन दिया कि बस का एक डी टूर है --यही लोग हमें बस से बेल्वर के बहुत करीब तक ले जायेंगे और उसका आखिरी आश्वासन था कि वह भी उस आखिरी स्टॉप तक जा रही है!
इससे मेरी घबराहट कुछ सम्भली--जबकि टिकट काटने वाले ने काउंटर पर साफ कहा था कि बेल्वर जायेगी! टिकट चेकर ने बताया कि विला वेल्हा दे रोदाओ के ट्रेन स्टेशन पर उतर कर, हम सब बस में ट्रांस्फ़र होंगे जो बेल्वर के करीब तक जायेगी!
खैर, कई दिलचस्प स्टेशनों के बाद रोदाओ से हमारी बस यात्रा आरम्भ हुई और तभी मालूम हुआ कि बस से डी टूर का मसला नया है। फरवरी के बाद से शुरू हुआ जब तूफान में वह पुल ध्वस्त हो गया जिस पर से हो कर रेल तेजो नदी पार किया करती थी। फिर मुझे फरवरी के उस तूफान की याद आई जिसने वाकई उत्तरी पुर्तगाल में काफी कहर बरपाया था। और बस में ही मुझे यह भी बताया गया कि बस बेल्वर के किले के काफी करीब से गुजरती है, जहाँ से किला मात्र तीन किमी दूर था, और हम वहां रुके भी, मैं नीचे भी उतरी, लेकिन यहां उस पुर्तगाली लड़की ने सचमुच मेरी बहुत मदद की! वह आकर बस के दरवाजे पर खड़ी हुई और उसने कहा कि अगर मैं वहां उतरी तो मुझे तीनों किमी पैदल चलना होगा, जो इस चिलचिलाती धूप में मुझे बिल्कुल नहीं करना चाहिए! बस कुछ देर से रुकी हुई थी, इसलिए और लोग भी इस विमर्श में शामिल हो गए थे और पुर्तगाली में मुझे 'बराज़ेम उतरने की सलाह दे रहे थे, एक स्वर में!' लड़की ने मुझे बहुत समझाया कि यहाँ मुझे कोई टैक्सी नहीं मिलेगी, निकटतम गाँव भी निकट नहीं, मुझे बिल्कुल बराज ही उतरना चाहिए, जहाँ लोग होंगे और मेरे लिए टैक्सी बुला सकते हैं! भीतर वाले लोग अब अधीर और उतावले होकर 'बराज़ेम' के साथ और कुछ कह रहे थे-- शायद जल्दी करने की बात!
सच मानिये, कि बस टिकट की बर्बादी के बावजूद और आगामी टैक्सी बिल के बावजूद, वह एक खूबसूरत लम्हा था जब सड़क का एक बीहड़ था, पास एक किला, बहुत दूर नहीं एक गाँव, जून की एलेन्तेज़ो प्रान्त की पुर्तगाली धूप और मुझसे एक पूरी बस कह रही थी तेजो नदी के एक बराज पर ही उतरने के लिए! कम से कम, खूबसूरत महसूस हो रहा था और मैंने खुद को समझा लिया कि हिसाब कुछ कम करते लम्हे को खूबसूरत होने दूँ! आखिर, एक पुल टूटा था यहीं कहीं तूफान में, मैं उस तूफान के वक्त तेजो के किनारे ही थी--लिस्बन के ठीक उस पार आल्मादा के एक हॉस्टल में! तूफान कथा कहीं और लेकिन उस पूरे संयोग ने मुझे छुआ था! यह मेरे जन्मदिन के अगले दिन की बात है। बस अनेकों खूबसूरत गाँवों से होती हुई गुज़र रही थी, जिनमें नीसा नाम की जगह के साइन बोर्ड खास तौर पर मेरा ध्यान आकर्षित कर रहे थे! आखिरकार, तेजो के अथाह, नीले, चमकीले जल के आगे बस ने मुझे, और उस लड़की समेत कुछ और लोगों को उतारा और चलती बनी! आगे के स्टेशनों के लिए बस को आगे के एक रेलवे स्टेशन पहुंचना था। टिकट चेकर ने मुझसे कहा कि ठीक यहीं एक कम्यूनिटी सेंटर है, एक पिकनिक स्पॉट के दफ्तर सरीखा, वहां मुझे टैक्सी बुलाने में सहायता मिलेगी! ये बोल्त और ऊबर का भी इलाका नहीं था। हालांकि नदी मुझे बुला रही थी, लेकिन मैं दफ्तर में पहले गई । टैक्सी वाले ने कहा पंद्रह मिनट में आता है और मैं नदी की ओर दौडी! जगह का नाम था औरटीगा --खासी खूबसूरत जगह थी! नदी जैसे अपने गोल घुमाव में अलसाई लेटी थी! एक पुल था, उसके पार रास्ता, सामने पहाड़, लोग नदी में या उसके करीब सन्गीत का आनन्द ले रहे थे। टैक्सी उसी पुल की राह गई ।
टैक्सी वाले ने मुझे ठीक बेल्वर गाँव के बीचो-बीच, किले की सीढियों के नीचे उतारा और मैं दौड़ती हुई सीढ़ियां चढ़ने लगी क्योंकि बहुत देर हो चुकी थी। किले में दाखिल होते ही मैंने दफ्तर में किले के बन्द होने का समय पूछा तो उसने कहा कि वो तब बन्द करेगा जब मैं किला पूरा देख लूंगी! सुनकर मैं उछ्ल गई और फौरन अपने काम में लग गई--सबसे पहले मैं ने दीवार से लगी सीढ़ियां चढ़ी और किले की दीवार पर चढ़ गई और नदी के विहंगम दृश्य ने मेरा मन मोह लिया! एक पुल साबुत दिख रहा था अतिशय सुन्दर, नदी पार बालुई तट दिख रहे थे।
ऐसी सीढ़ियां अनेकों जगहों पर थीं, और सबको बाद में चढ़ने का इरादा बना बीच के आँगन में ऊँचे खड़े टावर में दाखिल हुई! किला अपने में बहुत बड़ा नहीं था, कमरे भी शेष नहीं थे, लेकिन टावर बखूबी सलामत था, और रेनोवेटेड था! सीढ़ियों की कई मंज़िल चढ़ कर ऊपर के कमरे में पहुँची तो दुबारा उछ्ल गई ---किले का ही नहीं, समूचे पुर्तगाल का एक अति संक्षिप्त इतिहास वहाँ लिखा था--जिसकी शुरुआत 1113 के पेपल बुल से होती थी जिसने यरूशलेम में ऑर्डर ऑफ द हॉस्पिटल ऑफ सेंट जॉन की स्थापना की! इसके बाद कई महत्वपूर्ण पड़ावों के उपरांत, जिसमें 1179 में पोप एलेक्जेंडर तृतीय द्वारा पुर्तगाल राज्य की स्वीकृति भी शामिल थी, 1194 के साल का विशेष उल्लेख था। पहले आसपास की ज़मीन उसी चर्च ऑर्डर को भेंट करने के बाद, जिसे पोप ने यरूशलेम में स्थापित किया था, राजा सान्चो प्रथम द्वारा बेल्वर के किले के बाकायदा निर्माण की बात लिखी थी। इसके बाद अलारकॉस की लड़ाई का ज़िक्र था! मैंने तारीख देखी तो तीसरी बार उछ्ल गई --साल अगला 1195, और तारीख ठीक उस दिन की, बस महीना भी अगला था, वह मेरी माँ के जन्मदिन की तिथि थी। जयन्तियाँ भी अनेकों किस्मों की होती हैं, इतिहास कई शक्लों में हमसे जुड़ता है! आज इस ग्लोबल, पोस्ट इम्पीरियल समय में यूरोप का इतिहास सहज ही आकर्षित करता है। फिर जिस खूबसूरत किले में आप हम खड़े हों, उसके बारे में सबकुछ जानने को मिल जाए तो कहना ही क्या! सरल शब्दों में यह क्रूसेड्स और रीकौन्क़ुएस्ट का इतिहास है---धर्म से भी ज़्यादा, ज़मीन की लड़ाई और पुर्तगाल राष्ट्र के गठन का इतिहास! तो अलार्कोस की लड़ाई भी उसी विस्तृत लड़ाई का हिस्सा थी। यह 1210 में हुआ कि आधिपत्य की दुबारा स्थापना के बाद 1210 में राजा सान्चो प्रथम ने बेल्वर के किले के लिए राजकोष का एक हिस्सा दान किया। 1216 में बेल्वर के किले का ज़िक्र स्वयं पोप ने किया--दरअसल बेल्वर का किला क्रूसेडस के योद्धाओ की विश्राम स्थली भी रहा, जिन्हें नाइट्स टेम्पलार कहते थे। 1390 में डी नुनो अलवा रेश पेराईरा द्वारा किले का विस्तार और लगभग पुनर्निर्माण हुआ। 14 सितंबर 1398 में राजा दौम जुआऊँ प्रथम ने बेल्वर के बाशिंदों को समूचे बेइरा जिले में अधिक अधिकार दिए । 1440 से 41 तक बेल्वर का किला पुर्तगाली गद्दी अर्थात बाकायदा राज सिंहासन की लड़ाई में उलझा। जब राजकुमार दौम पेद्रो ने किले को घेर लिया। किले में लिखा, पुर्तगाली इतिहास का यह एक कम जाना सुना तथ्य है, क्योंकि घेरेबन्दी से लोकप्रिय पुर्तगाली इतिहास में सिर्फ़ 1832 -33 के पोर्तो की घेरेब्ंदी की स्मृति उभरती है--जब--पुर्तगाली सिविल युद्ध में 1832 से 33 के बीच पोर्तो के इर्द-गिर्द 13 महीने की घेरेब्ंदी रही, जहाँ दौम पेद्रो चतुर्थ के लिबरल सपोर्टस ने सफलता पूर्वक शहर को कब्ज़े में रखा,उन्हीं के बागी भाई दौम मिगेल की सेना के खिलाफ!
किन्तु इतिहास लोकप्रिय अध्यायों से बड़ा है। वापस बेल्वर के संदर्भ में--गौर तलब है कि ये रीजेन्ट राजकुमार पेद्रो थे, कार्यकारी राजकुमार, जो अपने बहुत छोटे भतीजे अफोंज़ो पंचम के बदले सत्ता की बागडोर सम्भाले हुए थे और अन्तत उन्होँने उन्हीं भतीजे के साथ की लड़ाई में अपने प्राण गँवाए--क्यौंकि ब्रगांज़ा के ड्यूक, औरेम के काऊंट अफोंसो ने वास्तविक राजा के कान भरे और उन्हें पेद्रो के खिलाफ उकसाया ! वह अल्फारोबेईरा की लड़ाई थी! और उकसाने वाला गलत था, किन्तु इतिहास विडम्बनाओं का बना है।
इसके बाद, पुर्तगाली इतिहास में बेल्वर का ज़िक्र लगभग 30 साल बाद 1469 में आता है, जब अफोंसो पंचम ने बेल्वर, मकाओ और अमीनदोआ में जानवरों की बिकी पर राजसी हक स्थापित किया। इसके बाद, 1476 में अवीरू में ब्लैक डेथ के समय, वहां के कॉन्वेन्ट में रहने वाली प्रिंसेस सेंट जोआना ने बेल्वर के किले में शरण ली। किंतु 1755 के लिज़्बन भूकंप में बेल्वर का किला लगभग ढ़ह गया। और किले के भीतर स्थित सेंट ब्रास का चेपल भी प्रभावित हुआ। लेकिन यह चेपल अब भी अपने रेस्टोर्ड रूप में किले के प्रांगण में खड़ा है.
1836 में बेल्वर काऊंटी का खात्मा करते उसे गाविआओ में मिला दिया गया। किन्तु 1951 में एक बार फिर माल्टा के सौवरेन मिलिटरी ऑर्डर को बेल्वर भेजे जाने का हुक्म हुआ। कमाल है कि किले के इर्द-गिर्द की हर गतिविधि का इतना व्यापक और विस्तृत वर्णन किले के भीतर उपलब्ध है।
लेकिन इतिहास से परे, वह इस पहाड़ी चोटी से दिखने वाली नदी की यहाँ वहाँ गोल होती लम्बाई थी, जिसके लिए राजकुमारियों ने नाम गढ़े, जो आज भी एक ऐतिहासिक प्राकृतिक खूबसूरती की तरह जगमगा रही। बल्कि कहें कि वह यह खूबसूरती थी जिसने यहाँ इतिहास के अध्याय लिखे। किले से निकल कर दरवाजे पर खड़ी हुई तो दृश्य को पीछे छोड़ कर सीढियां उतरना मुश्किल था! और हर सीढ़ी पर रुकना मुश्किल! देर हो रही थी, गाविआओ से लौटने का बस टिकट था! उस दिन गाँव में एक मीडिएवल फेस्टिवल था, सन्गीत ऊपर किले तक आ रहा था, चर्च के रास्तों में रंगीन रिबन लगे थे। किले वाले ने मेरे लिए टैक्सी बुलाई थी, वह भी मेरे पीछे-पीछे निकला था, मुझे खड़ा कर उसने ताला लगाया था, मेरे अनुरोध पर मेरी तस्वीरें खींची थी, और धड़धडाता हुआ सीढ़ियां उतर गया था! मैं भी रुकते रुकते गाँव को देखूँ कि नदी को--विचारती, उतर रही थी! मन हो रहा था गाँव में टहल आऊँ, किन्तु घड़ी की इजाज़त न थी। टैक्सी वाले ने बेल्वर का पुल पार कर गाविआओ में प्रवेश किया। और बस स्टॉप पर मुझे उतार दिया।
गाविआओ एक छोटी, प्यारी सी जगह, जहाँ बड़े बड़े रेस्तराँ थे! अखब़ार पत्रिका की एक दुकान से मैंने भी आइसक्रीम खरीदी और नज़ारे समेटने में व्यस्त हो गई! बहुत दूर जाना संभव नहीं था। 'आई लव गाविआओ' का एक प्यारा सा बोर्ड था, जिसका मैनें सेल्फी विडियो बनाया। आसपास और भी खूबसूरत दृश्य थे, पहाड़, घाटियाँ, चौक, चौराहे, राहें, लेकिन मैं समय से एक मिनट पहले ही, स्टॉप पर आकर खड़ी हो गई। बस का पता ठिकाना नहीं। लगभग आधे घंटे बाद बस अवतरित हुई और हम चले। इसी बीच, बस के इन्तज़ार में खड़े, मैंने देखा कि बेल्वर जाती हुई बस भी सामने से गुजरी! फिर स्टॉप पर जाकर करीब से उसका समय पढ़ा, तो अगर सही बस से आई होती तो मज़े में ये बस ले ली होती, टैक्सी की ज़रूरत न होती! बहरहाल, लौटती बस की राह ट्रेन वाली बस की राह से थोड़ी अलग लेकिन खूबसूरत उतनी ही नहीं! मुझे गाँवो के बीच से गुजरना, बहुत पसंद है, फिर ये बस 'नीसा' नाम की जगह से गुजर रही थी, जिसके नाम के साइन बोर्ड मैने देखे थे! और जिस नाम ने मुझे बहुत आकर्षित किया था! इस पूरे इलाके को करीब से देखने की तमन्ना बनी रही, और ये बहुत बाद में हुआ कि जब घर पहुँच कर मैंने लिस्बन विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग का वेब पेज खोला तो पाया कि नीसा के पास एक किले के पुरा तात्विक अध्ययन को लेकर एक चर्च में कौन्फ़रेन्स हो रहा है। लेकिन काम की परेशानियों में जुड़ नहीं पाई! अब देखिये, नीसा के उस किले समेत बाकी के गाविआओ से मिलने कब जा पाती हूँ!



बहुत ही प्यारी सी भाषा में लिखा गया वृतांत। आज ही यूट्यूब पर इन जगहों की सैर करूंगा। सैल्फी कौन लेगा?
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