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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल
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30 जून, 2019


निर्बंध-बीस
दौड़ौ दौड़ो जल्दी दौड़ो
यादवेन्द्र


 बहु चर्चित फिल्म पान सिंह तोमर में एक क्रूर पर  मार्मिक दृष्य है जिसमें भर पेट रोटी मिलने के लोभ में नायक सेना के स्पोर्ट्स विभाग में दाखिला लेना चाहता है तो एक अफसर उसकी दौड़ने की काबिलियत की ओर ध्यान न देकर चुहलबाजी में आइसक्रीम का डिब्बा पकड़ा देता है और हुकुम देता है कि दूसरे अफसर  के घर इतने कम समय में पहुंचा कर दिखलाए जिसमें आइसक्रीम को पिघलने की नौबत न आये - पेट की भूख पान सिंह से यह काम चंद मिनटों में करवा लेती है।यह अलग बात है कि सौ साल से ऊपर हो चुके फौजा सिंह ने विलायत की सूनी जिन्दगी में कुछ रंग भरने की गरज से मैराथन दौड़ने की शुरुआत की थी या फिर आजकल कुछ तूफानी करने की गरज से खतरों भरी उछल कूद  के विज्ञापन की मौज मस्ती हो पर  भाग दौड़ की इस जिन्दगी में पेट की भूख न जाने कितने नौजवानों को आये दिन स्वाद बदलने की तफरीह वाले खाते पीते लोगों की सेवा में शहरों की भीड़ भाड़ भरी सड़कों पर बगैर अपनी  जान माल की रत्ती भर भी परवाह किये चंद रुपयों के एवज में रोज कई कई घंटे दौड़ाती है...उनके सिर पर एक जुनून की तरह यह शर्त सवार रहती है कि निर्धारित मिनटों की समय सीमा के अंदर नए और अपरिचित गंतव्य तक सामान नहीं पहुंचा तो एक तो ग्राहक निगेटिव रेटिंग देगा,ऊपर से कंपनी अपने नुकसान की भरपाई उसके पगार से करेगी।
नए ज़माने की यह नयी फ़ौज फास्ट फ़ूड के विदेशी ( ज्यादातर) व्यापारियों के डेलिवरी ब्वायज (जिन्हें अब डिलीवरी पार्टनर्स कहा जाने लगा है) की है जो प्राईवेट सिक्युरिटी गार्ड्स और ओला और उबर की तरह बड़े महानगरों से शुरू होकर अब धीरे धीरे मंझोले और छोटी शहरों में पाँव पसारती जा रही है।एक अनुमान के अनुसार देश में ऑनलाइन फ़ूड सर्विस का कारोबार फिलहाल 1.6 बिलियन डॉलर का है जो अगले साल तक दुगुना हो जायेगा 




यादवेन्द्र

कोई आठ दस पहले जब यह नया धंधा फैलना शुरू हुआ था और
इन नौजवानों के साथ सड़क दुर्घटनाओं के कई नए मामले सामने आने लगे तो ये  तथ्य निकल कर सामने आये कि दिल्ली के सबसे बड़े अस्पतालों के ट्रॉमा सेंटरों  में सड़क दुर्घटना के बाद इलाज के लिए आने वाले फास्ट फ़ूड डेलिवरी ब्वायज की  संख्या में तेजी से निरंतर इजाफा हो रहा है।यहाँ के वरिष्ठ डाक्टरों का कहना है कि दोपहिया वाहनों की खुली बनावट के कारण सिर की  चोट और हड्डी टूटने के हादसे उनके साथ सबसे ज्यादा पेश आते हैं।भले ही उनके पास खाद्य सामग्री पहुँचाने के लिए तीव्रगामी दुपहिया वाहन होते हैं पर कम से कम समय में गंतव्य तक पहुँचने और फिर आगे वाले दूसरे पते पर जाने की जल्दी में वापस दुकान तक लौट जाने का मानसिक दबाव इतना प्रबल होता है कि किसी का भी लगातार बढती जा रही वाहनों की भीड़ से बच कर सुरक्षित निकल  जाना दुश्वार होता जा रहा है।ऊपर से ग्राहक मिनट भर की देर पर भी निगेटिव रेटिंग देने को तैयार बैठे रहते हैं हाल में एक रात में कई सौ ऐसे चालान काटने वाली चेन्नई की परिवहन पुलिस ने यह पाया कि 73% से ज्यादा डिलीवरी पार्टनर्स दुपहिया चलाते समय ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन करते हैं.. यह देखते हुए कंपनी अधिकारियों को और मनोचिकित्सकों को बड़े पैमाने पर शामिल कर अभियान चलाया जा रहा है।यहाँ चेन्नई की बात इसलिए क्योंकि इसकी खबर मैंने पढ़ी - वैसे यह मंजर हर शहर में देखा जा सकता है 

एक अख़बार ने ऐसे ही हड्डी तुडवा कर इलाज करा रहे नौजवान को यह कहते हुए उद्धृत किया है कि दिन में दस घंटे की ड्यूटी तो आम बात है पर शुक्रवार की शाम काम का सबसे ज्यादा दबाव होता है...कई कई बार तो इस दिन हमें चौदह घंटे  खटना पड़ता है ..ट्रॉमा सेंटर के डाक्टरों ने भी शुक्रवार को सबसे ज्यादा दुर्घटनाओं की पुष्टि कीनेट में हैदराबाद के एक विज्ञापन के अनुसार डेलिवरी ब्वॉय को पच्चीस तीस हजार तक की पगार देने की पेशकश पढ़ी  जिसमें भी अनुभवी युवकों को प्राथमिकता दिए जाने की बात थी।हालाँकि अब स्थितियां पहले की तुलना में बहुत सुधरी हैं और इस धंधे के बड़े खिलाड़ी मेडिकल सुविधा और सवेतन छुट्टियाँ देने की बात भी करते हैं।यहाँ तक कि जोमेटो ने हाल में राजस्थान के अपने एक शारीरिक रूप से अक्षम डिलीवरी पार्टनर को बैटरी से चलने वाला वाहन दिया - इसका भरपूर विज्ञापन भी किया।इसी कंपनी ने कुछ दिनों पहले एक मानवीय फल की और ग्राहकों से आग्रह किया कि जब हमारा आदमी आपका खाने का पैकेट आपके हाथ में थमाए तो कम से कम एक ग्लास पानी उसे पिला दें ।शर्मनाक बात यह है कि कम्पनी के इस आग्रह पर अनेक प्रतिक्रिया नकारात्मक आई कि अपने लोगों की सुख सुविधा का ध्यान  रखन मालिकों का काम है ,हमारा नहीं  
पर ऐसा नहीं कि सब कुछ गुलाबी दिखाई दे रहा है - कुछ बड़ी कंपनियों के डिलीवरी पार्टनर आन्दोलन करने को मजबूर हुए क्योंकि पहले मिलने वाली सुविधाएँ और पैसे कम होते जा रहे थे।उनके अनुसार चार किलोमीटर के अंदर डेलिवरी के लिए उन्हें 35 रु और आठ किलोमीटर तक के लिए 120 रु दिए जाते थे जो अब घटा कर 15 रु और 80 रु कर दिए गये खराब मौसमों में ( (ख़ास तौर पर बरसात में पानी भरे इलाकों में) जब ग्राहक तक पहुँचना बेहद दुश्वार होता है तब भी उसी मेहनताने पर वे काम करने को मजबूर हैं  

कुछ दिनों पहले न्यूयोंर्क टाइम्स  ने एक प्रवासी चीनी डेलिवरी ब्वॉय की दिनचर्या के बारे में लम्बी रिपोर्ट छापी थी जिसमें व्यस्त अमेरिकी शहरों में इलेक्ट्रिक साईकिल से खाद्य सामग्री पहुँचाने वाले एक डेलिवरी ब्वॉय की व्यथा का खुलासा किया गया था कि कैसे नए नए बन रहे सुरक्षित अपार्टमेंट्स और आफिस परिसरों में सीधा प्रवेश करना मुश्किल होता जा रहा है और तेज मोटर वाहनों की टक्कर से बचने के लिए उनके किनारे बने पतले रास्तों पर चलने पर उन्हें पुलिस के जुर्माने का भागीदार बनना पड़ता है.उस आदमी से यह सुनना अच्छा लगा कि उसका भला मैनेजर कभी कभार समय से न पहुँच पाने वाला सामान उसको खाने को दे देता है...भारत के सन्दर्भ में यह बात कितनी सच होगी  इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है. दिल्ली के बड़े फास्ट फ़ूड चेन के प्रबंधन का कहना है डेलिवरी पार्टनर्स  को वे सामान पहुँचाने के लिए पर्याप्त समय देते हैं और सड़क दुर्घटनाओं के लिए उनकी नीतियों को दोषी नहीं माना जाना चाहिए...ये तो लड़कों की व्यक्तिगत असावधानियों से होती हैं इसलिए उनकी गलतियों का दोष कम्पनी के ऊपर नहीं डाला जाना चाहिए कोई ताज्जुब नहीं कि अमेरिकी श्रम विभाग खाने का सामान घर घर पहुँचाने के इस काम को अनिवार्य तौर पर  जुड़े हुए खतरों को देखते हुए सेना,पुलिस,स्टंट करतब प्रदर्शन और आग बुझाने के काम के बाद पांचवां सबसे जोखिम भरा काम शुमार करती है.




करीब दस साल पहले अमेरिका के एक फास्ट फ़ूड चेन के खिलाफ  अनेक फ़ूड डेलिवरीपार्टनर्स  के संगठित होकर मुकदमा करने से दुनिया भर का ध्यान मजदूरों की इस नयी फ़ौज की तरफ गया जिसमें यह खुलासा हुआ कि उन्हें सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी से कम  पगार दी जाती थी... हर घंटे के करीब 1 .6 डालर पर सामग्री पहुँचने में एक बार देर होने पर 20 डालर और  जल्दबाजी में दरवाज़ा खोलने के लिए उसपर हाथ मारने पर 50 डालर  का जुरमाना वसूला जाता था.ऐसे काम में ज्यादातर दूसरे देशों से झूठे सच्चे कागजातों का सहारा लेकर अमेरिका आये हुए मजदूर लगे हुए थे ( ज्यादातर चीनी) इसलिए उनको बात बात पर उनकी गैरकानूनी नागरिकता की असलियत उजागर  कर देने की धमकी भी दी जाती थी....भारत के सन्दर्भ में देखें तो गाँव से शहरी चकाचौंध देख कर आकर्षित हुआ भोला भला नौजवान इस शोषण चक्र का शिकार बनता  हुआ दिखेगा...इस बहु चर्चित मुक़दमे का परिणाम सभी वादी मजदूरों की पुनर्बहाली और करीब 46 लाख  डालर की भरपाई के रूप में सामने आया जो उस समय तक के अमेरिका के सबसे बड़े रेस्टोरेंट हर्जाने के तौर पर अब भी याद किया जाता है.ऐसे ही अनेक क़ानूनी विवादों को ध्यान में रख कर बड़े फ़ूड चेन निर्धारित समय पर आपूर्ति न होने की दशा में पूरा पैसा लौटा देने का ऑफर स्थगित करने लगे. 
कारोबारी दुनिया की लुभावनी दुनिया की मिसाल है हाल में चीन में अपनी दुकान खोलने वाले अमेरिकी के.एफ.सी.(केंटुकी फ्राईड चिकेन) के छद्म नामों से विज्ञापित किये जाने वाले ये ऑफर  कि खाने का सामान तो अच्छा होगा ही इसको पहुँचाने वाले डेलिवरी ब्वॉय का रंग, कद काठी,वेश भूषा और भाषा भी ग्राहक  जैसा चाहे उसको वैसा ही हैंडसम उपलब्ध कराया जायेगा.बाद में ग्राहक  से कंपनी संतुष्ट होने की बाबत जानकारी भी लेगी.यद्यपि कंपनी इस तरह  के किसी छद्म प्रचार  से इंकार  करती है पर वहाँ के वेब  जगत  में हजारों  की संख्या  में  मन माफिक आई कैंडी का लाभ लेने वाले लोगों  के निजी  अनुभव  इस बारे में मौजूद  हैं. इस पर चर्चा के दौरान यह बात भी सामने आयी कि अपने सामान की कीमत बढ़ाने के लिए कंपनी ऐसे हथकंडे अपना रही है. कल  को चीन से किसी भी हाल में न पिछड़ने  की बदहवासी  में हमारे  देश  के नौजवानों को भी फुर्ती  और चुस्ती  के साथ  साथ  अपनी सूरत  को भी दाँव  पर लगाना पड़ा  तो कोई  अचरज  नहीं होना  चाहिए.   
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निर्बंध उन्नीस नीचे लिंक पर पढ़िए


  
यादवेन्द्र 
पूर्व मुख्य वैज्ञानिक
सीएसआईआर - सीबीआरआई , रूड़की

पता : 72, आदित्य नगर कॉलोनी,
जगदेव पथ, बेली रोड,
पटना - 800014 
मोबाइल - +91 9411100294 




29 जुलाई, 2018

निर्बंध: पांच

घोड़े भी इंसान को कुछ सिखा सकते हैं 

यादवेन्द्र


                                             यादवेन्द्र

अत्यंत लोकप्रिय उपन्यासों के ब्रिटिश लेखक निकोलस इवांस के अत्यंत लोकप्रिय उपन्यास "द हॉर्स व्हिस्परर" पर आधारित इसी नाम की फ़िल्म(रॉबर्ट रेडफोर्ड के निर्देशन में 1998 में बनी) फ़िर से देखी -- शायद पाँचवी बार।यह बर्फीले चढ़ाव पर हुई फिसलने से हुई एक दुर्घटना में घोड़े और उस से गिर कर बुरी तरह से घायल हो गयी लड़की के दुबारा उठ खड़े होने के संघर्ष की शानदार कहानी है जिसे मिल कर सम्भव करते हैं लड़की की दृढ निश्चयी माँ एनी मैक्लीन और अड़ियल घोड़ो को ठीक करने वाला पशु मनोवैज्ञानिक सह ट्रेनर टॉम बुकर - भारत  में इनका प्रचलन नहीं है पर पश्चिमी दुनिया में जिन्हें "हॉर्स व्हिस्परर" जैसे बेहद अर्थपूर्ण सम्बोधन से पुकारते हैं ।

दरअसल व्हिस्परर अमेरिकी स्लैंग का कवित्वपूर्ण शब्द है जो उस व्यक्ति के लिए प्रयोग किया जाता है जो किसी जानवर से इस हद तक अंतरंग होता है कि दोनों एक दूसरे की भाषा सहज रूप में  समझने लगते हैं। पर  इनकी गिनती शायद दोनों हथेलियों की उँगलियों से ज्यादा न हो।   

"हॉर्स व्हिस्परर" फ़िल्म स्क्रिप्ट के कुछ  अंश
एनी(मैक्लीन) - मैंने इस आर्टिकल में तुम्हारे काम के बारे में पढ़ा - कि तुम उनलोगों के साथ किस तरह का काम करते हो जिनके घोड़ों के साथ कोई समस्या होती है।
टॉम(बुकर)- दरअसल सच्चाई अलग है ...मैं उन घोड़ों के साथ काम करता हूँ जिन्हें उनके मालिकों से समस्या होती है।
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टॉम - जब मैं किसी घोड़े के साथ काम करता हूँ तो उसका इतिहास जानने में पहली दिलचस्पी होती है ....और कुछ गिने चुने मामलों को छोड़ दें तो सभी घोड़े अपनी सारी कहानी खुद बयान  कर देते हैं ….. मेरी दिलचस्पी हमेशा से घोड़े का पक्ष सुनने और जानने में रही है।
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वहाँ एकत्र समूह गर्मजोशी से हँसता है।टॉम ने अपनी बात राल्फ़ लॉरेन के मँहगे कपड़े पहन कर खड़ी महिला (एनी) को सुना कर कही जो घेरे से थोड़ी दूरी बना कर खड़ी थी।
टॉम -यदि यह घोड़ा सनकी था या आलसी था - जैसा तुम कह रही हो - तो हम पहले जाकर उसकी दुम देखेंगे कि वह कैसे हरकत करती है .... और उसके  कान भी देखेंगे। पर मुझे लगता नहीं कि यह कोई सनकी घोड़ा है .... अलबत्ता मुझे यह बुरी तरह से डरा और  घबराया हुआ मालूम होता है। देखो तो उसकी गर्दन की चमड़ी कैसी सिकुड़ी हुई है ,वह यह तय नहीं कर पा रहा है कि जाना किधर है .... ।

एनी  ने सहमति में सिर हिलाया। टॉम पल भर को घोड़े को निहारता है और इस तरह खड़ा रहता है जिस से गोल गोल चक्कर काटते घोड़े के चेहरे की ओर ही लगातार देखता रहे।
टॉम : अब तुम खुद देखो यह कैसे अपने पुट्ठे मेरे सामने कर रहा है ..... मुझे लगता है कि बाड़े से बाहर निकलने में यह आनाकानी इसलिए करता है क्योंकि उसके जख्म दुखते हैं।
एनी : उसको उठने बैठने या घूमने में तकलीफ़ होती है ,तुम देख सकते हो। मैं उसको धीमी चाल से चलाते हुए ऊँची छलाँग की ओर ले जाना चाहती हूँ .... ।
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कौन है असल हॉर्स व्हिस्परर ? 

दुनिया में सबसे ज्यादा बिकने वाली किताबों की फ़ेहरिस्त में शीर्ष स्थान पर रहने वाला निकोलस इवांस का यह  उपन्यास "द हॉर्स व्हिस्परर" जिस वास्तविक चरित्र पर आधारित है वह हैं डैन बक ब्रेन्नामन। वे बारह वर्ष की अवस्था से घोड़ों के साथ खेलते और चोट खाते रहे हैं - कई बार उनकी जान जाते जाते बची पर उन्होंने सबक यह लिया कि सबसे पहले वह कारण जाना जाये जिसके चलते घोडा अपने सहज बर्ताव से अलग चल रहा है ... एकबार यह मालूम हो जाए तो उसका निदान ढूँढना आसान हो जाता है। डैन बिगड़ैल घोड़ों को किसी न किसी दुर्व्यवहार या हिंसा के शिकार रहे बिगड़ैल बच्चे मानते हैं।वे किसी का भरोसा नहीं करते और उन्हें हरदम अंदेशा होता है कि सामने वाला इंसान आक्रमण करेगा। पर धैर्य , कुशल    नेतृत्व , करुणा और दृढ़ता के साथ इनको अतीत की कु - स्मृतियों से बाहर निकाला जा सकता है। जब घोड़े या कोई भी जानवर मालिक के साथ से सुरक्षित और निडर महसूस करने लगे तब उन दोनों के बीच सही संबंध जुड़ सकता है। घोड़े सामान्य तौर पर क्षमाशील होते हैं - हम अपने जीवन के जिन हिस्सों के खालीपन को खुद नहीं भर सकते घोड़े उन्हें भरना जानते हैं।  वे दरअसल आपको खुश देखना और करना चाहते हैं पर आपको उनके साथ चलना पड़ेगा।
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भारत में "हॉर्स व्हिस्परर" संबोधन पहली बार मैंने हाल में भारत तिब्बत बॉर्डर पुलिस  के सब इंस्पेक्टर मंगल सिंह के संदर्भ में सुना जो इस पुलिस बल के श्रेष्ठ एनिमल ट्रेनर मंगल सिंह माने जाते थे जिनकी  हाल में असमय मृत्यु हो गयी।


अरुणाचल प्रदेश के लोहितपुर एनिमल ट्रेनिंग सेंटर में मंगल सिंह ने सुबह लगभग छह बजे जानवरों का चारा खिलाया और एक घंटे बाद दिल का दौरा पड़ने से उनकी मृत्यु हो गई। एक अधिकारी के मुताबिक जानवरों को बिन बताये यह महसूस हो गया था कि उनके प्यारे ट्रेनर के साथ कुछ हुआ है। उन्होंने दोपहर और शाम को खाने की तरफ़ नज़र उठा कर भी नहीं देखा - अगले दिन भी बस नाम मात्र का भोजन किया। मंगल सिंह की कमी उन्हें खल रही है । जानवरों और मंगल सिंह के बीच एक खास किस्म का ‘रिश्ता’ था। खिलाते-पिलाते और ट्रेनिंग के दौरान मंगल सिंह जानवरों से बातचीत भी करते थे।घोड़े मंगल सिंह की भाषा कितनी समझ पाते थे पक्के तौर पर तो यह कहा नहीं जा सकता लेकिन उनके इशारों को वह बखूबी समझते थे। और एक बात जो घोड़ों और मंगल सिंह को जोड़ती थी वह था घोड़ों के प्रति मंगल सिंह का अपार और अंतरंग प्रेम।     

इस से पहले मंगल सिंह तीन वर्षों तक काबुल दूतावास में कुत्तों के स्क्वैड के 9 के प्रमुख थे और कई भयावह दुर्घटनाओं से भारतीयों को बचाने में सफल रहे थे - इस अनुकरणीय और साहसिक कार्य  के लिए उन्हें कठिन सेवा मेडल और फ़ॉरेन सर्विस मेडल से नवाजा गया था।

                          सब इंस्पेक्टर मंगल सिंह

थोड़ा सा भी भिन्न होने पर आसपास के मनुष्यों के प्रति बढ़ती  जाती  घृणा और असहिष्णुता के इस दुः समय में इंसान और घोड़ों के ऐसे  अप्रतिम प्रेम और साझेपन के उदाहरण बुनियादी मानवीय मूल्यों के प्रति गहरा भरोसा पैदा करते हैं - आखिर हमें  मारकाट से अमन चैन की तरफ़ लौटना ही होगा।





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निर्बंध: चार नीचे लिंक पर पढ़िए

पहनावे और विचार का गहरा रिश्ता
https://bizooka2009.blogspot.com/2018/07/blog-post_4.html?m=1



15 जून, 2018

निर्बंध: दो


याचना नहीं, दुर्बल का प्रतिकार 

यादवेन्द्र



यादवेन्द्र


साहित्य के 1997 के नोबेल पुरस्कार विजेता प्रखर वामपंथी इतालवी नाटककार दारियो फो की अक्टूबर 2016 में मृत्यु हुई तो सार्वजनिक स्मृति सभा में उनके कॉमेडियन बेटे जकोपो फो ने अपने पिता का सुनाया एक किस्सा सुनाया : "सदियों पुरानी बात थी इटली का ऐतिहासिक बोलोग्ना युद्ध जहाँ निहत्थी जनता और पोप के संरक्षण वाले राजा के बीच युद्ध चला था। (दारियो फ़ो ने इस  घटना को केंद्र में रख कर एक नाटक भी लिखा था -  The Tumult of Bologna) । इस युद्ध से हो रहे विनाश से लोगबाग तंग आ गए और शासन के खिलाफ़ उन्होंने बग़ावत कर दी - शासन चलाने वाले हुक्मरान भाग कर पहाड़ी पर बने एक किले के अंदर घुस गए ..... इसकी बनावट ऐसी थी कि कोई उसके अंदर प्रवेश नहीं कर सकता था ,अभेद्य।किले में शरण लेने वाले हुक्मरान के पास महीनों तक चलने वाला अन्न पानी था जबकि विद्रोही आम जनों के पास किले पर आक्रमण करने के लिए  हथियार तक नहीं थे। यहाँ तक कहानी सुनाने के बाद पिता ने मुझसे पूछ दिया : "अब तुम बताओ , इतने मज़बूत और सुरक्षित किले के अंदर छुपे हुए हुक्मरानों  पर  निहत्थे लोगों ने आखिर कैसे काबू किया होगा ?" मेरे पास इसका कोई जवाब नहीं था ,बल्कि मुझे तो यह विश्वास ही नहीं हो रहा था कि मेरे पिता जो कह रहे हैं वास्तव में यह हुआ भी था। मुझे निरुत्तर देख उन्होंने बताया :"बगावती लोगों में से किसी एक बन्दे को एकदम मामूली और बुनियादी सा ख्याल आया - इस किले को इंसानी मल  से पूरी तरह से क्यों न ढँक दिया जाए।फिर क्या था लोगबाग अपने घरों से गाड़ियों में मल  भर कर लाते और किले के ऊपर उड़ेल जाते।घरों के अंदर निवृत्त होने के बदले लोग किले के बाहर आकर निवृत्त होने लगे - यह किले पर चढ़ाई करने की उनकी अपनी अभिनव शैली थी।धीरे धीरे मल  की दीवार ऊँची और मोटी होती गयी...हालत यहाँ तक पहुँच गयी कि अंदर छुपे हुक्मरानों का हौसला और धैर्य दोनों जवाब दे गया और उन्होंने इस अनूठे हमले का जवाब देना भी छोड़ दिया और अंततः बगावती जनता के सामने हथियार डाल दिए ।" 


यह जानना बेहद दिलचस्प होगा कि दारियो फो जिस ऐतिहासिक घटना को किस्से की तरह सुना रहे थे वह पिछले साल वेनेजुएला के सरकार विरोधी आंदोलन में बड़े व्यापक तौर पर हथियार के तौर पर इस्तेमाल की जा रही थी ।देश की आर्थिक बदहाली से त्रस्त जनता महीनों तक  आंदोलनरत थी और पुलिस की गोलीबारी में अनेक जानें इस दौरान गयी।तेल के प्रचुर भंडार के रहते हुए भी सरकार की जनविरोधी नीतियों ने लोगों की आमदनी पर कुठाराघात किया , खाद्यान्न और दवाओं  का बड़ा संकट पैदा कर दिया - वहाँ का एक प्रतिष्ठित अखबार लिखता है कि देशव्यापी सर्वेक्षण करने पर मालूम हुआ कि  कृत्रिम अभावों के चलते 64. 3 फीसदी देशवासियों का  औसतन लगभग चौबीस पौंड (11 किलो) तक वजन कम हो गया।



 आन्दोलनकर्मियों का कहना था कि पुलिस के पास हमें प्रताड़ित करने के लिए अत्याधुनिक हथियार हैं और हम साधनहीन निहत्थे - हार कर हमने पशु और मानव मल  को ही अपना गोला बारूद बना लिया।इस हथियार को लोगों ने "शिट बम" और "पूपूटोव" जैसे नाम दिए जो सामाजिक विमर्श का हिस्सा बना। शीशियों और डिब्बों में मल भर कर आंदोलनकारी देश की राजधानी की सड़कों पर सुरक्षा बलों से महीनों से मोर्चा लेते  रहे ।सरकार ने इन्हे "रासायनिक हथियार" का नाम दिया और दलील देनी शुरू की कि मल  के सड़कों और सुरक्षा बलों के शरीर पर बिखरने से अंतरराष्ट्रीय रासायनिक हथियार समझौते का उल्लंघन होता है...यह भी कहा  कि पहले ही आवश्यक दवाओं की कमी से जूझ रहे देश में मल  के इस तरह फेंके जाने से महामारी फैलने का संकट उत्पन्न हो सकता है।पर जब शासन जनता की मुश्किलों संबंधी किसी बात को सुनने को न तैयार हो तो आंदोलनकारियों के हाथों में यह तख्ती आ जाना  किसी अचरज की बात नहीं है : "तुम्हारे पास गैस के गोले हैं ,हमारे पास मल की शीशियाँ।" 


दुर्बल जन लंबे समय तक आंदोलन के लिए साधन जुटाने में हार जाए और सरकारी दमन के हथियारों का जवाब न दे पाए तो ऐसे अनूठे और अभिनव प्रयोग की और भी मिसालें सामने आएंगी।

मानव मल के साथ मनुष्य की गरिमा का शुरू से छत्तीस का आँकड़ा रहा है - तमाम घोषणाओं के बावजूद सिर  पर मैला ढ़ोने की प्रथा भारत के कई हिस्सों में आज भी जारी है और यह काम करने वाला कोई भी व्यक्ति समाज के ऊँचे तबके से संबंध नहीं रखता ,सबसे दलित शोषित तबका ही यह काम करता है। जैसे ही आर्थिक सामाजिक शक्ति आती है यह तबका मैला ढ़ोने जैसा मान गरिमा को शर्मसार करने वाला काम करना बंद कर देता है और दबाव डालने पर विद्रोह में खड़ा हो जाता है।


गूगल से साभार


थोड़े बड़े फलक पर देखें तो दिल्ली में महानगर के घरों से  हर रोज इकठ्ठा होने वाले दस हजार टन कचरे के स्थायी निपटान के लिए लैंडफिल साइट्स की राजनीती को देखा जा सकता है। क्षमता से जयदा कचरा भरने के कारन हुई एक दुर्घटना के बाद दिल्ली में जब गाज़ीपुर ,भलस्वा और ओखला लैंडफिल साइट्स को बंद कर दिया गया। गाज़ीपुर के बारे में सुप्रीम कोर्ट तक ने कटाक्ष किया कि वह दिन दूर नहीं जब यह क़ुतुब मीनार की ऊँचाई से होड़ लेने लगेगा। ध्यान देने की बात है कि जब इस साईट को शुरू किया गया था तब अधिकतम ऊँचाई बीस मीटर निर्धारित की गयी थी - अब यह पचास मीटर को पार कर गया है। टाइम्स ऑफ़ इंडिया कहता है कि पास के स्कूलों के बच्चों को भयंकर दुर्गंध ,धूल और कभी भी मलबा ऊपर से नीचे आ जाने के खतरों के चलते अक्सर स्कूल न आने की हिदायत देनी पड़ती है। एक स्थानीय निवासी को यह कहते हुए उद्धृत किया गया है कि अब हमारे पास यहाँ का कचरा उठा कर संसद के द्वार पर फेंकने के सिवा कोई और चारा नहीं बचा है। इसके लिए नयी वैकल्पिक जगह  रानी खेड़ा गाँव के पास की जमीन तय की गयी तो आसपास के गाँव वासियों ने प्रदूषण और स्वास्थ्य कारणों से इसका जबरदस्त विरोध किया। शासन ने पुलिस की मदद से अपना फैसला थोपने की भरपूर कोशिश की पर गाँव वासी टस से मस नहीं हुए। दूसरी  प्रस्तावित नई  साइट 


घोंडा गुजरान और सोनिया विहार में  है जिसको लेकर 
बड़े विरोध सामने आने लगे हैं - ध्यान रहे यह सारा मामला शहरी कूड़े के  ढ़ेर को दुर्बल जनता के माथे पर लाद देने का है और इनका भरपूर विरोध होना लाजिमी है। 
अपने आसपास देखें तो उत्तरी पाकिस्तान के पेशावर शहर के आसपास कचरे इकठ्ठा करने के खिलाफ स्थानीय नागरिकों का विरोध इतना बढ़ गया कि वहां के सांसद की शिकायत पर मुख्यमंत्री को सामने आना पड़ा। ऐसे विरोधों का पैटर्न एक सा ही है - शहरों का कचरा गाँवों में इकठ्ठा करना जिससे गाँववासियों को एतराज है - बढ़ती बीमारियाँ,दुर्गन्ध और प्रदूषण के दुष्प्रभाव ऐसे स्थलों पर साफ दिखाई देते हैं और स्थानीय आबादी इनके साथ रहना अपनी गरिमा का अपमान मानती है। 

छोटे स्केल पर देखने में यह हमारे देश की समस्या दिखती है पर कचरे और मल के निपटान की समस्या विश्वव्यापी है और अपने अपने ढंग से इनका विरोध करने का इतिहास भी बहुत पुराना  है। करीब देस सौ साल पहले अमेरिका के राष्ट्रपति निवास व्हाइट हाउस के पिछवाड़े मानव मल को इकठ्ठा करने वाला बड़ा गड्ढा हुआ करता था और 1841 में तत्कालीन राष्ट्रपति हैरिसन की असामयिक मृत्यु का संभावित कारण इस मल के गड्ढे के चलते भूमिगत जल के प्रदूषित होना माना गया था। 1849 में फैले हैजे की महामारी से सिर्फ न्यूयॉर्क में पाँच हजार लोग असमय काल के गाल में समा थे , इसके पीछे भी मल प्रबंधन की दुर्दशा मानी गयी थी। एटलस ऑब्स्क्यूरा वेबसाइट पर प्रकाशित  लेख में यह बताया गया है कि उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में गाड़ियों में ढोये जाने वाले मॉल का अमेरिकी सड़कों पर बिखर जाना आम बात हुआ करती थी। यह लेख उल्लेख करता है कि तब मल इकठ्ठा करना और यहाँ वहाँ ले जाना लगभग पूरा पूरा अश्वेत अमेरिकियों और दूसरे देशों से आये प्रवासियों के हाथ में था। 



अभी पिछले दिनों न्यूयॉर्क और न्यूजर्सी से इकठ्ठा किया हुआ लगभग दस मिलियन पौंड मानव मल अपेक्षाकृत पिछड़े अलबामा प्रान्त के पारिश शहर में रेलवे स्टेशन पर महीनों तक रेल के डिब्बों में खड़ा रहा - जहाँ ले जा कर इस मल को बड़े गड्ढों में ठिकाने लगाना था वहाँ के नागरिकों के विरोध के चलते ऐसा करना संभव नहीं हो पा रहा था। पारिश के अतिरिक्त वेस्ट जेफरसन शहर के नागरिक प्रशासन ने भी मल से भरी दुर्गन्धयुक्त गाडी के अपने इलाके से गुजरने पर कड़ा एतराज जताया। अंततः समझौता यह हुआ कि पहले मल का रासायनिक ट्रीटमेंट कर के उसे दुर्गंधरहित और अपेक्षाकृत कम हानिकारक बनाया जाए फिर गड्ढों में भरा जाए। भारत ही नहीं अमेरिका  संपन्न तबके की गंदगी दुर्बल तबके के मत्थे मढ़ने की कोशिश की जा रही है पर कमजोर वर्ग भी अपने हितों और कल्याण के लिए सजग है और नए नए ढंग से प्रतिकार करता है। 
००


निर्बंध: एक को नीचे लिंक पर पढ़िए

कौन तार से बीनी चदरिया

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01 जून, 2018

निर्बंध: एक


कौन तार से बीनी चदरिया


यादवेन्द्र


मित्रों, 
आज से बिजूका पर श्री यादवेन्द्र जी का पाक्षिक स्तम्भ: निर्बंध,   
शुरु कर रहे हैं।  निर्बंध के तहत यादवेन्द्र जी देश और दुनिया के किसी भी कलारूप और कलाकार के  संघर्षों से अवगत कराएंगे। 

आज हम इसकी पहली कड़ी प्रकाशित कर रहे हैं। निर्बंध महीने की एक और पन्द्रह तारीख को प्रकाशित होगा। 

आशा करते हैं कि बिजूका के पाठक मित्रों के लिए निर्बंध 
जानकारी परख, ज्ञानवर्धक  और रुचिकर होगा । 

बिजूका पर आगे और भी कुछ कॉलम शुरु करने की योजना है। यदि बिजूका के स्नेहिल मित्र, पाठक और रचनाकार साथी इस संदर्भ में अपने महत्त्वपूर्ण सुझाव देना चाहें तो उनका हार्दिक स्वागत है। सुझाव नीचे कमेंट की जगह या फिर बिजूका की ईमेल आईडी - bizooka2009@gmail.com , पर दिये जा सकते हैं ।     

सत्यनारायण पटेल



निर्बंध: एक



कौन तार से बीनी चदरिया


यादवेन्द्र


बाबा आदम के जमाने से इंसानी जीवन कभी भी किसी निर्धारित दायरे में बंध कर नहीं चला न ही सीधी क्षैतिज रेखा में आगे बढ़ा.... पारम्परिक अर्थों में कहें तो तय सीमाओं के अतिक्रमण पर अक्सर बड़े बुजुर्गों की  तिरछी नज़र ही रही है और यथासंभव इसको हतोत्साहित किया जाता रहा है।पर इस से कौन इन्कार कर सकता है कि विकास और बदलाव का पहिया हमेशा सीमाओं के अतिक्रमण के बीहड़ प्रांतर से होकर ही आगे बढ़ा है।जिजीविषा और बदलाव की उत्कंठा के बीच कई बार प्रतिरोध के ऐसे अदेखे अबोले आख्यान सामने आते हैं कि ध्यान हटता नहीं - मानव जीवन का असल सौंदर्य शास्त्र इन्हीं से निर्मित होता है।यह पाक्षिक कॉलम विभिन्न कला माध्यमों के बीच झिलमिलाते झाँकते ऐसे मोतियों को लड़ी में पिरोने की कोशिश है।

यादवेन्द्र


यादवेन्द्र 

बातें अप्रत्याशित तौर पर कहाँ से कहाँ जाकर जुड़ जाती हैं -  एक दिन सुबह सुबह मैं अपनी बेटियों  के साथ घर के पिछवाड़े बैठा चाय पी रहा था कि एक पीले होते पपीते पर चिड़िया चोंच मारती दिख गयी।मेरी फूलकुमारी ने आवाज़ देकर चिड़िया को उड़ा दिया पर  मैंने टोका कि इस  फल पर तो कुदरती उनका ही हक है,अब रोकना  मत उनको...हमने उनसे उनका खाना इस तरह छीन लिया तो बेचारे परिंदे  कहाँ जायेंगे - और दिल पर हाथ रख के कहो ,बगैर इनके तुम्हें यह घर भी घर जैसा लगेगा ? मैंने उसे बताया कि नेट खोल कर देखोगी तो सैकड़ों ऐसी साइट्स दिखेंगी जो तरह तरह के उपाय बताती हैं जिनसे चिड़ियों को फलों के बाग़ से दूर रखा जा सके।कई तरह के कोर्स भी होते हैं इनके। इन उपायों में बड़ी चद्दरों सरीखी जालियाँ और चिड़ियों को परेशान  करने वाली आवाज़ निकालने वाले स्पीकर सबसे ज्यादा लोकप्रिय उपाय हैं पर कुछ दिनों पहले पढ़े एक लेख के बारे में मैंने बेटी को बताया जिसमें पुराने चमकदार कंप्यूटर डिस्क को फलदार वृक्षों पर लगाया गया तो पक्षी उसकी परावर्तक सतह को देख कर दूर रहे।


हिमाचल यात्रा में  सेब के बड़े बड़े बागानों को हरे रंग की जालीदार चद्दरों से ढंके हुए खूब देखे भी हैं। मेरे बाग में खूब मेहनत करने वाले माली को सबसे ज्यादा गुस्सा अपने फलों को चिड़ियों के खाने या बर्बाद करने पर आता है - हाड़तोड़  मेहनत   करने वाले के लिए यह स्वाभाविक भी है। आम हो या अनार हो या पपीता ,जैसे ही वे पकने शुरू होते हैं वह उनपर कपड़े लपेट कर बाँध देता है जिससे वे चिड़ियों की पहुँच से बाहर हो जायें। उसने नाशपाती के ऊँचे पेड़ पर एक डिब्बा बाँध रखा है जिसे नीचे से रस्सी खींच कर बजाता भी रहता है  जिससे पक्षी दूर रहें।  पर जब नाशपाती के फलों पर  उसकी यह तरकीब भी काम नहीं आयी तो उसने हमें बताये बगैर एक ऐसा कारनामा  किया जिसके लिए 25 वर्षों में पहली बार उसे तगड़ी डांट सुननी पड़ी - उसने ब्रेड में जहर मिला कर इधर उधर रख दिए जिसे खा कर दो तीन चिड़ियाँ मर गयीं। उसके बाद चिड़ियों ने हमारा घर महीनों तक त्याग दिया था ,मोर भी नहीं फटके उधर।हम उनके बगैर अनाथ और अछूत हो गए थे पर उन परिंदों को अपनी सदाशयता का भरोसा दिलाते भी तो कैसे।  धीरे धीरे हमें उन सीधे सरल प्राणियों ने माफ़ी दे दी और फिर से हमसे घुलमिल गए पर शमशेर माली का अपराध अक्षम्य था और अंत अंत तक उसने निगाहें उठा कर बात नहीं की।



तभी ऋचा ने बी वी कारंत के उस नाटक की याद दिलायी जो अपनी मृत्यु से कुछ महीने पहले उन्होंने दिल्ली के सरकारी स्कूलों के विद्यार्थियों के साथ कमानी थियेटर में किया था और हम अखबार में सूचना देख कर बगैर किसी पूर्व योजना के साथ साथ उसे देखने पहुँच गए थे - रबीन्द्र नाथ ठाकुर की मशहूर कहानी "तोता काहिनी" पर आधारित उस नाटक का शीर्षक कारंत ने सम्भवतः 'पिंजरशाला' रखा था।वह  नाटक  एक तोते  के राजा के बाग़ में लगे पके फल बगैर इजाज़त लिए  खा लेने के कारण अनुशासनहीनता के आरोप में उसे दण्डित करने का आख्यान था। वह पक्षी बड़ा मूर्ख था। गाता तो था, पर शास्त्र नहीं पढ़ता था। फुदकता और उड़ता था मगर यह नहीं जानता था कि कायदा-कानून किसे कहते हैं। राजा ने कहा, ‘ऐसा पक्षी किस काम का? जंगल के फल खाकर जो शाही फलों के बाग में नुकसान पहुंचाये।’ मंत्री को बुलाकर आदेश दिया, ‘इस पक्षी को शिक्षा दो।’ यह पक्षी छोटा सा घोंसला बनाता है वह इतना छोटा है कि उसमें विद्या जैसी भारी-भरकम चीज रखने की जगह ही कहां है? इसलिये सबसे पहली जरूरत यह है - इस पक्षी के लिये एक शानदार पिंजड़े का निर्माण किया जाये।राजा के आदेशानुसार तोते के लिए एक भव्य पिंजरा बनवाया गया ,वह भी सोने का। यह भव्य पिंजरा राजा की सदाशयता और तरक्की पसंदी का प्रतीक बन गया और लोगबाग उसको देखने के लिए उमड़ने लगे। पंडितों को बुला कर मोटी मोटी पोथियों के भाष्य और टीका तैयार कराये गए जिसके पन्ने फाड़ फाड़ कर तोते को हजम कराने के अभियान शुरू किये गए - ऐसे में उस बेचारे के खानपान के कुदरती साधनों की तरफ़ भला किस का ध्यान जाना था।एकदिन राजा ने खुद चल कर सारा इंतजाम देखने की इच्छा जाहिर की ,वह हुआ भी पर पक्षी को सिखाने का तामझाम इतना बड़ा था कि राजा और उसके लाव लश्कर को पक्षी कहीं नजर ही नहीं आ रहा था। 
पिंजड़े में न दाना था न पानी। थी केवल विद्या की भरमार। ढेर सारी पोथियों के ढेर सारे पन्ने फाड़-फाड़ कर कलम की नोंक  से पक्षी के मुंह में बेरहमी पूर्वक ठूंसा  जा रहा था। उसका गाना तो कब का बंद हो चुका था। चीखने-चिल्लाने की भी कोई गुंजाइश नहीं थी। एकदिन पहरेदारों ने कोतवाल को खबर दी कि तोता अपने निर्बल चोंच से पिंजरे को तोड़ने की कोशिश कर रहा था और बार बार अपने पंख भी फड़फड़ा रहा था। फिर क्या था आनन् फानन में  सुरक्षा का हवाला देकर लोहे की जंजीर तैयार की गयी। फिर देखते-देखते पक्षी के पंख भी काट दिये गयेराजा के विद्वान दरबारियों ने एकमत से यह  रिपोर्ट दी  : राज्य के  पक्षियों की बात न पूछो। अक्ल तो उनमें पहले से ही नहीं थी। परंतु अब तो कृतज्ञता भी नहीं रही।’ इन सारी  आवभगत से राजा के लोग मालामाल जरूर हुए पर तोते का जीवन नहीं बचाया जा सका।इसके बाद  दरबारियों ने घोषणा की कि पक्षी की शिक्षा संपूर्ण हुई। अपनी अनुशासनहीनता छोड़ कर अब न वो फुदकता है, न उड़ता है! राजा ने पक्षी को खुद हाथ में लेकर देखा ,यहाँ वहाँ कोंचने पर भी  न उसके मुंह से हां-हूं हुई, न हल्की सी सिसकी ही निकली और न उसके पंख विहीन देह में कोई हरकत हुई। केवल उसके पेट में पोथियों के सूखे पन्ने खरखराहट सी करने लगे।राजा को भी विशवास हो गया कि मूढ़ मगज पक्षी को शिक्षित करने का उसका परम् लोक कल्याणकारी सारी सफलता पूर्वक संपन्न हुआ। 


कारंत साहब


इधर राज दरबार में तोते ने आखिरी साँस ली ,उधर  बाहर नये वसंत की दक्खिनी बयार में सारी कलियों, सारे फूलों ने एक गहरी आह भरी।
सरकारी स्कूलों के गरीब बच्चों को नाट्यशास्त्र में इतना सघन अंतरंग शामिल कर लेना कि वास्तव और अभिनय की विभाजक रेखा पूरी तरह मिट जाये,कारंत के शिल्प और व्यक्तित्व  का जादुई कमाल था।प्रस्तुति के अवसर पर कारंत स्वयं उपस्थित थे और बीच बीच में कलाकार बच्चों से संवाद भी कर रहे थे। सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे किस सामाजिक पृष्ठभूमि से आते हैं किसी से छुपा नहीं है - मैं अपने किसी निकट के परिवार को नहीं जानता जिसके बच्चे आज की तारीख में कॉन्वेंट और प्राइवेट स्कूलों को छोड़ कर सरकारी स्कूल  में पढ़ते हैं और दिल्ली के इस आयोजन में शामिल बच्चों के दूर दूर से आये परिजनों के कपडे लत्तों को देखकर उनकी माली हालात समझना मुश्किल नहीं था। उस दिन मेरे मन में वर्गीय चरित्र के कारण गहरे रूप में जड़ जमाये संस्कृति संबंधी यह   विचार  कि अच्छे खातेपीते परिवारों में ही संस्कृति की समझ और पोषण सम्भव है ,गरीबों और समाज की निचली सीढ़ी के लोगों की कोई सांस्कृतिक समझ नहीं होती ,सचमुच काँच के किसी कीमती पात्र सा खंडित हो रहा था।नाटक में मुख्य पात्र तोते की भूमिका दर्जा छह की जिस छात्रा ने निभायी थी उसका मन को बेध देने वाला क्रंदन आज भी जब याद आता है मेरा कलेजा मुँह को आ जाता है - बगैर पात्र और कथ्य की सांस्कृतिक समझदारी के कोई कारावास की वैसी दारुण पीड़ा को व्यक्त कर ही नहीं सकता ... किरदार के जीवन को आत्मसात करने के लिए गहरी संवेदना और करुणा की दरकार होती है जो उस दस ग्यारह साल की बच्ची में कूट कूट कर भरी थी जिसको निर्देशक ने समझा और उभारा। मैंने कारंत से इस बावत देर तक बात की और अपने अप्रत्याशित  आत्मबोध के बारे में बेवाक होकर बताया। उन्होंने मेरी बात को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि देश के विभिन्न ग्रामीण अंचलों में घूमते नाटक करते हुए उन्होंने समझा कि संस्कृति को बचाने का माद्दा सिर्फ़ उन भोले भाले अल्पशिक्षित ग्रामीणों में है ,जड़विहीन शहरी मध्यवर्ग में बिलकुल नहीं। मैंने कारंत से बात कर जल्दी ही रुड़की में स्कूली बच्चों के साथ एक थियेटर वर्कशॉप आयोजित करने की सहमति प्राप्त की...अफ़सोस,कारंत से बातचीत आगे बढ़ती उस से पहले ही वे हमें छोड़ कर चल दिए।

भला हो पीले पपीते और चिड़िया का कि हमने सुबह सुबह भारतीय नाट्यशास्त्र के अनूठे सितारे बी वी कारंत को न सिर्फ़ याद किया बल्कि प्रणाम भी किया।
००


(कहानी के चुनिंदा उद्धरण http://www.rachanakar.org/2015/05/kahani-tota-by-rabindranath-thakur.html  से साभार)
यादवेन्द्र जी एक और पोस्ट नीचे लिंक पर पढ़िए

उनके हाथ में इतना ही है


https://bizooka2009.blogspot.com/2018/04/blog-post_81.html?m=1



संक्षिप्त परिचय:

यादवेन्द्र 

जन्म 1957 बिहार के आरा में
बिहार के विभिन्न शहरों गाँवों से स्कूली और भागलपुर से  इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद कुछ महीनों के लिए छत्तीसगढ़ के कोरबा में नौकरी। 1980 से लगातार रुड़की के केन्द्रीय भवन अनुसन्धान संस्थान में वैज्ञानिक के तौर पर काम करने के बाद  अंततः निदेशक के तौर पर वहाँ से  जून 2017 में कार्यमुक्त हुए - वैज्ञानिक कर्म के मुख्य विषय : हिमालयी भूस्खलन और भूकम्प का अध्ययन और भवनों पर इसका प्रभाव कम करना , पर्यावरण संरक्षण की दिशा में इंस्ट्रूमेंटेशन का लक्षित हस्तक्षेप और सांस्कृतिक विरासतों का वैज्ञानिक उपादानों के उपयोग से संरक्षण। इन वैज्ञानिक कामों पर लोकप्रिय व्याख्यान ख़ास तौर पर विद्यार्थियों के बीच देना अत्यंत प्रिय अध्यवसाय। एकाधिक बार प्रोफेशनल काम से विदेश यात्रा।वैज्ञानिक विषयों पर हिंदी में प्रचुर लेखन। अवकाश प्राप्ति के बाद अब दशकों से अधूरे पड़े सृजनात्मक साहित्यिक कामों को पूरा करने का संकल्प। रविवार,दिनमान,जनसत्ता, नवभारत टाइम्स,हिन्दुस्तान,अमर उजाला ,प्रभात खबर,आविष्कार ,साँचा ,कादम्बिनी , लोकमत समाचार,समकालीन जनमत  इत्यादि में विज्ञान सहित विभिन्न विषयों पर प्रचुर लेखन। विदेशी समाजों की कविता कहानियों के अंग्रेजी से किये अनुवाद नया ज्ञानोदय, पहल ,हंस ,कथादेश,वागर्थ,शुक्रवार,अहा जिंदगी जैसी पत्रिकाओं और अनुनाद ,कबाड़खाना, लिखो यहाँ वहाँ ,ख़्वाब का दर,सेतु साहित्य,समालोचन,सदानीरा,बिजूका  जैसे साहित्यिक ब्लॉगों में प्रकाशित। मार्च 2017 के स्त्री साहित्य पर केन्द्रित "कथादेश" का अतिथि संपादन। साहित्य के अलावा सैर सपाटा ,सिनेमा और फ़ोटोग्राफ़ी का शौक।हाल में भारतीय ज्ञानपीठ से विभिन्न देशों की लेखिकाओं की कहानियों का संकलन 'तंग गलियों से भी दिखता है आकाश' (2018) प्रकाशित। वर्तमान में पटना में निवास।

पता : 72, आदित्य नगर कॉलोनी,
जगदेव पथ, बेली रोड,
पटना - 800014 
मोबाइल - +91 9411100294 


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