image

सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल
डॉ. संजीव कुमार जैन के लेख लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
डॉ. संजीव कुमार जैन के लेख लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

10 अप्रैल, 2016

कबीर के बहाने आधुनिकता पर एक बहस


डॉ. सजीव कुमार जैन
                                    
              
कबीर अपने समय में आधुनिक थे? यह कहने का फैषन सा चल पड़ा है। इस कथन के पीछे जो विचार काम कर रहा है वह यह कि आधुनिकता कोई बहुत ही उम्दा और मानवीय मूल्य है जिसके बिना कोई भी मानवता का पक्षधर हो ही नहीं सकता। कबीर आधुनिक थे तो बु़द्ध और महावीर भी आधुनिक थे? इसमें कोई शक या गुंजाइष नहीं रहती है। इसके बरक्स कोई यह कहे कि इन्हें आधुनिक कहकर आप इनका अपमान कर रहे हैं तो वह प्रतिक्रियावादी घोषित कर दिया जायेगा। क्या हम कभी यह सवाल पूछते हैं कि कबीर, महावीर या बुद्ध इस बर्बर और अवमानवीकृत आधुनिकता का ठप्पा अपने ऊपर लगवाना भी चाहते हैं या नहीं? कबीर जैसा साधारण और सहज व्यक्ति आधुनिक बर्बरता और जटिल पूंजीवाद के दुष्चक्र में पिसते उपभोक्ता को देखकर भी यही कहता की ‘चलती चाकी देखकर दिया कबीरा रोए। दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोए’। दूसरा सवाल यह है कि क्या हम आधुनिक हैं? और क्या जैसे हम आधुनिक हैं? वैसे आधुनिक कबीर हो सकते थे? क्या उन्हें वैसा आधुनिक होना चाहिए था? आधुनिकता चाहे औपनिवेषक हो या देषज वह आधुनिकता ही रहेगी। क्या हममंे देषज आधुनिकता का कोई लक्षण है? जिस आधुनिकता के अन्तर्विरोधों के कारण दो महायुद्धों की त्रासदी मानवता को झेलनी पड़ी हो, परमाणु बमों से हुई अनन्त पीड़ा को भोगना पड़ा हो? हजारों छोटे-मोटे युद्धों में करोड़ों इंसानों का रक्त बहा दिया गया हो, मानवता के अपमान और हृास की कहानी पूरी सदी में बिखरी पड़ी हो, मानवीय गौरव और गरिमा के अवमानना का महाकाव्य जिस विचारधारा ने लिखा हो? उस विचारधारा का ठप्पा कबीर जैसे मानवीय गायक पर लगाने का प्रयास उनका घोर अपमान ही माना जायेगा।
पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी जी ने अपनी ‘कबीर’ नामक पुस्तक में कबीर को वाणी का डिक्टेटर कहकर वास्तव में उन्हें आधुनिकता की पहली पंक्ति में ही पधरादेने की जो परंपरा प्रारंभ की थी उसका ही विस्तार डॉ. पुरुषोत्तम अग्रवाल ने अपनी पुस्तक ‘अकथ कहानी प्रेम की: कबीर की कविता और उनका समय’ में किया है। देषज आधुनिकता का प्रारंभ कबीर से करने के प्रयास में वे यह सोच ही नहीं सके की इसी आधुनिकता ने हिटलर जैसा डिक्टेटर पैदा किया था। और अन्ततः हजारी प्रसाद द्विवेदी और पुरुषोत्तम अग्रवाल अलग अलग तरह से उन्हें हिटलर की श्रेणी में ही बिठा रहे हैं।
आधुनिकता पर बहस का प्रारंभ अक्सर यह मानकर किया जाता है कि वह एक सुखद स्थिति है और उसने मानवीय मुक्ति की दिषा में कोई बहुत मूल्यवान विचार और स्थिति पैदा की है। अतः येन केन प्रकारेण कबीर जैसे व्यक्ति को भी आधुनिक होना ही चाहिए औपनिवेषिक न सही तो देषज ही सही। रिनेंसां का प्रारंभ इटली में हुआ और कला के क्षेत्र में मध्यकालीन बोध से विचलन के प्राथमिक लक्षण दिखाई दिए। पुनर्जागरण ने जो स्थितियाँ पैदा की थीं उनके परिणामस्वरूप कला और साहित्य में परंपरागतता और धर्म के बरक्स वर्तमान जीवन और इहलौकिकता ने प्रतिष्ठा पाने का प्रयास किया। इस प्रयास को आधुनिकता का पहला लक्षण माना गया। इसी इटली ने मुसौलिनी जैसा अधिनायक पैदा किया। मुसौलिनी आधुनिकता से उपजा अधिनायक था। यह भी ध्यान रखना चाहिए कि इटली इस समय कोई औपनिवेषिक देष नहीं था। वह तो स्वयं में कई राज्यों में बंटा हुआ देष था। औपनिवेषिकता बहुत बाद की चीज है और वह आधुनिकता का तात्कालिक परिणाम था न कि कारण।
ब्रिटेन, फ्रांस, स्पेन और जर्मनी ने विष्व में जो उपनिवेष बसाये वे पूँजीवाद विकास और विस्तार के अन्तर्विरोधों  के परिणाम स्वरूप उपजी परिस्थितियों की देन थे। कच्चे माल की आवष्यकता, और कारखाना प्रणाली से उत्पादित माल के लिए बाजार की मांग ने उपनिवेष व्यवस्था को जन्म दिया। आधुनिकता और औपनिवेषिकता का जो संबंध है वह अन्योन्याभावी न होकर कारण कार्य का है। कबीर के संबंध में औपनिवेषिक आधुनिकता के बरक्स देषज आधुनिकता की जो बहस डॉ. पुरुषोत्तम अग्रवाल ने की है, उसके मूल में जो अवधारणा है वह उपनिवेष और आधुनिकता को अन्योन्याभावी मानकर चली है। जब आप कारण और कार्य को अन्योन्याभावी मानकर चलेंगे तो उसके अन्तर्विरोधों को आप नहीं समझ सकेंगे। यही कारण है कि डॉ. पुरुषोत्तम अग्रवाल की पुस्तक ‘अकथ कहानी प्रेम की’ में वे न तो कबीर के साथ न्याय कर सके और आधुनिकता के साथ। हो सकता है कि अगले कुछ वर्षाें के शोध के बाद डॉ. अगवाल कबीर को उत्तर आधुनिक भी कह दें। फिलहाल उत्तर आधुनिकता भारत में अपना विस्तार उस रूप में नहीं कर पाई जिससे वो सर चढ़कर बोलने लगे, जैसे की आधुनिकता। कहीं कहीं ‘उत्तर आधुनिक’ पद का इस्तेमाल तो डॉ. अग्रवाल ने किया है पर उत्तर आधुनिकता का देषी संस्करण इसमें पैदा करने की कोषिष उन्होंने नहीं की।
देषज आधुनिकता का मतलब क्या है? आधुनिकता कोई फसल है जो हर देष की अपनी-अपनी पैदा होगी- जैसे देषी आम, देषी घी, देषी गेंहूँ, देषी मुर्गा, देषी गर्ल, देषी पिज्जा, देषी शराब, देषी भ्रष्टाचार इत्यादि। जिस समय कबीर इस देषी दुनिया में अलख जगा रहे थे उस समय औपनिवेषिक दुनिया में न तो औपनिवेषिकता ने जन्म लिया था और न आधुनिकता और न औपनिवेषिक अवधारणा ने। फिर क्यों हम कबीर जैसे फक्कड़ को मॉल और उपभोक्ता संस्कृति पर आधारित आधुनिकता के दायरे में समेटने की कोषिष कर रहे हैं? आधुनिकता का कोई भी मूल्य कबीर में हो ही नहीं सकता क्योंकि वे जिस परिवेष की उपज थे उसमें व्यक्ति नहीं मानव अस्तित्व में थे, पूँजीपति नहीं सामंत थे, लोकतंत्र न होकर सामंतवाद था, इहलौकिकता के स्थान पर ईष्वर, कर्म के स्थान पर कर्मकांड विराजमान थे और उद्योगों के स्थान पर घरेलू उत्पादन स्वायत्त अर्थव्यवस्था केन्द्र में थी।
कोई भी विचारधारा अपने परिवेष और समय की उत्पादन पद्धति की उपेक्षा करके नहीं पैदा हो सकती है। सामंतवादी विचारधारा अपने समय की यथास्थितिवादी भूराजस्व केन्द्रित अर्थव्यवस्था की उपज थी और उसकी पोषक भी। इसी तरह आधुनिकता भी पूँजीवादी उत्पादन पद्धति की उपज है और उसकी पोषक भी। यह आवष्यक नहीं है कि आज के वे अधिकांष संत और चिंतक जो समाज कल्याण में लगे हैं, सबके सब आधुनिक हों या आधुनिक युग में हैं तो भविष्य में वे उत्तरआधुनिक कहे जाने लगेंगे। वे सब आधुनिक युग में रहकर भी मध्यकालीन और पूर्वसामंतीय विचारधारा के हो सकते हैं - ‘‘आधुनिक के निर्धारण में ‘काल’ बोध एक जटिलता तथा द्वंद्व है। दुनिया में यह युग तो आधुनिक है; लेकिन कई समाज आधुनिक नहीं हैं तथा कई आधुनिक समाजों के ढांचे लड़खड़ा रहे हैं।’’ (आधुनिकता और आधुनिकीकरण, आधुनिक बोध, रमेष कुंतल मेघ, पृ. 56) आधुनिक न होने का मतलब जड़ होना नहीं है और आधुनिक युग में होने का मतलब गतिषील होना नहीं है। आधुनिकता एक प्रवृत्ति है, विचारधारा है, एक खास किस्म की उत्पादन प्रणाली और उत्पादन संबंधों को अभिव्यक्त करने की तकनीक है। परंपरा में सुधार की नहीं परंपरा से विचलन की स्थिति का नाम आधुनिकता है। धर्म का कर्मकांडी रूप सामंतवादी और आध्यात्मिक रूप आधुनिक नहीं हो सकता। धर्म जिस समय और स्थितियों की देन है, वह उन्हीं स्थितियों में कुछ प्रगतिषील भूमिका निभा सकता है, हर समय और स्थिति में नहीं। इसलिए हर अच्छे विचार और विचारक का आधुनिक होना आवष्यक नहीं है। डॉ. अग्रवाल के देषज आधुनिकता के आग्रह से तो ऐसा ही लगता है कि यदि कबीर को आधुनिक सिद्ध नहीं किया तो शायद कबीर जिंदा ही नहीं रहेंगे।
आधुनिकता ने एक नए किस्म की जड़ता और यथास्थितिवाद को जन्म दिया है। इसने मानवीय गरिमा को पूँजीवादी और समाजवादी महाख्यानों की तानाषाही के हथियारों से क्षति पहुँचायी है। कबीर ने इसी मानवीय गरिमा को प्रतिष्ठित करने के लिए सामंतीय ईष्वर और धर्म के खिलाफ संघर्ष किया था। आधुनिकता के दोनों महाख्यानों - पूँजीवाद और समाजवाद -ने मानवीय गरिमा और गौरव को जितना पृष्ठभूमि में धकेला है उतना इसके पहले के इतिहास में कभी नहीं धकेला गया। तो क्या हम कबीर को देषज आधुनिक कहकर मानवीय गरिमा के पतन का भागीदार नहीं कह रहे हैं।
कबीर जब यह कहते हैं कि -
सुखिया सब संसार है खावै अरु सौवे
दुखिया दास कबीर है जागे अरु रौवे।।
तो वे आधुनिक जीवन पद्धति पर ही तीखा व्यंग्य कर रहे थे। आधुनिक जीवन में खाकर सोने की प्रवृत्ति आधुनिक कहे जाने वाले वर्ग में जितनी अधिक है उतनी कबीर के समय में हो ही नहीं सकती थी, क्योंकि वह श्रमषील वर्ग के बीच रहते थे और सामंती वर्ग ही बिना श्रम के खाकर सोने की प्रवृत्ति वाला था, जो बहुत कम संख्या में था। आज का आधुनिक वर्ग जो नगरों और महानगरों में जीवन यापन कर रहा है - उसके पास देष और आम आदमी को लेकर कोई सांस्कृतिक चिंता या चेतना नहीं है। सुविधाओं का भोग और भोग के लिए सुविधाओं को जुटाना ही एक मात्र लक्ष्य जिस वर्ग का हो उस पर कबीर का जागना और रोना उन्हें सांस्कृतिक जागरण का अग्रदूत सिद्ध करता है न कि आधुनिक क्योंकि आधुनिकता ने इस तरह की सांस्कृतिक चिंता का अस्तित्व ही समाप्त कर डाला है अब कोई ऐसा नहीं मिलेगा जो इस तरह रातों की नींद और दिन का चैन खोकर मानवता की गरिमा को बनाये रखना चाहता हो।
आधुनिकता की अवधारणा का जो सबसे प्रतिगामी योगदान है, वह यही की उसने मानवीय सह अस्तित्व की सांस्कृतिक चेतना और गरिमा पर सोचने विचारने की आवष्यकता और अवसर को समाप्त कर दिया। मनुष्य से व्यक्ति, और व्यक्ति से उपभोक्ता में परिवर्तित मानव नामक यह प्राणी अब व्यक्तिगत उपभोग की सामग्री जुटाने में इतना व्यस्त है कि उसे दूसरे मानवीय प्राणियों के होने या न होने से कोई फर्क नहीं पड़ता।
व्यक्ति की सांस्कृतिक चेतना को सुविधाओं और मनोरंजन के साधनों के अंबार से कुंद करने का कार्य आधुनिक विचारधारा ने ही किया है। इसीलिए आज की पीढ़ी के पास कोई मानवीय कल्याण का सांस्कृतिक विजन नहीं है। अंदर से रिक्त और बाहर से सुविधाओं के ढेर में दबे यह आधुनिक जीवन शैली जीते लोग दरअसल जिंदा लाषें हैं। कबीर इसी तरह की जिंदा लाषों के लिए ‘सुखिया सब संसार है खावे अरु सौवे’ पंक्ति लिखते हैं।
कबीर जिस मानवीय वर्ग का प्रतिनिधित्व करते थे और करते हैं, क्या आज की देषज और औपनिवेषिक आधुनिकता में वह वर्ग कहीं भी आधुनिकता के सांचे में समाहित है? क्या उस वर्ग के जीवन में आधुनिकता ने कोई सकारात्मक योगदान दिया है? या फिर उसके सहज जीवन को और अधिक दुष्कर बना दिया है? इसकी जांच परख किए बिना कबीर को आधुनिक कहना उनका मानवीयता के प्रति किए गए योगदान को सिरे से नकारना होगा। आधुनिकता ने एक ओर जिस मध्यवर्ग के उदय को संभव बनाया था उसी मध्यवर्ग को अपने मुनाफे के लिए इस्तेमाल करने के उद्देष्य से मुक्त होने का भ्रम दिया और अन्ततः उसके श्रम का शोषण करके अकूत मुनाफा कमाया और निम्नवर्ग को हाषिये से भी बदतर स्थिति में ला पटका। कबीर के वर्ग को जीने की मूलभूत आवष्यकताओं से भी वंचित किया जा रहा है। आधुनिकता के किसी भी संस्करण में सत्ता और संपत्ति के गठजोड़ को नकारा नहीं जा सकता। सत्ता और संपत्ति के गठजोड़ ने आम आदमी को इंसानियत के दायरे से भी बाहर कर दिया है। चाहे युद्ध हो या शांति दोनों स्थितियों में उसके अस्तित्व को स्वीकारा भी नहीं जाता। लोकतंत्र हो या तानाशाही दोनों ही तंत्रों में आम आदमी दो ही काम करता है वह वोट देता है, ताली बजाता है और मर जाता है।  उसके लिए बनाये गए तमाम कानून और व्यस्थाएं सत्ता और संपत्तिषाली वर्ग के हित में गुलांटे भरने लगती हैं।
कबीर ने जिस विषेषाधिकार प्राप्त वर्ग और उसके विषेषाधिकारों पर चोट की थी, वह वर्ग और वे अधिकार निरंतर बढ़े हैं। जिस अनुपात में उनमें वृद्धि हुई है उसी अनुपात में आम आदमी के मूलभूत अधिकारों में कमी आती गई है। ईष्वर और धर्म ने जिस संपत्तिषाली वर्ग को सत्ता और विषेषाधिकार दिए थे कबीर ने उस धर्म और ईष्वर को ही नकार दिया था। क्या आधुनिकता ने धर्म और ईष्वर के कार्य को आगे नहीं बढ़ाया है, लोकतंत्र और राष्ट्र के विकास के नाम पर निरंतर आम आदमी के अधिकारों का हनन नहीं किया जा रहा है? और क्या यही लोकतंत्र और राष्ट्र के विकास का महाख्यान विषिष्ट वर्ग के अधिकारों में असीमित वृद्धि नहीं कर रहा है?
आधुनिकता की अवधारणा केन्द्रीकरण को लेकर चली थी। इसके तहत एक व्यवस्था और नियम की सत्ता सर्वत्र विद्यमान थी। इस केन्द्रीकरण की योजना में विज्ञान ने प्रकृति पर नियंत्रण करने का संघर्ष चलाया और उसे नियंत्रित किया। प्रकृति पर नियंत्रण के दौरान ज्ञानोदय की योजना ने उस वर्ग को सर्वाधिक उपेक्षित किया जो इस योजना के विकास में कोई महत्वपूर्ण भूमिका नहीं निभा रहा था या जो वर्ग परंपरागत मूल्यों और जीवन पद्धति को नहीं छोड़ रहा था। सामंत और मध्य वर्ग चालाकी से इस योजना में शामिल हो गया। वह अन्दर से तो परंपरागत और मध्यकालीन ही रहा, परन्तु ऊपर से आधुनिकता का खोल ओड़ लिया। इस चालाकी का फायदा यह रहा है कि वह धर्म और सत्ता की मलाई भी चांट रहा है और पूँजीवाद की रसमलाई भी मजे से खा रहा है। कबीर ने इसी सुविधाजीवी वर्ग को अपनी आलोचना का विषय बनाया था। क्या कबीर इस केन्द्रीकृत ज्ञानोदय की योजना को अपने समय में लागू होने देते? और क्या वे धर्म और सत्ता की तरह इसकी भी तीखी आलोचना नहीं करते? कबीर जैसा व्यक्ति ऐसी किसी भी विचारधारा और अवधारणा को सहन नहीं कर सकता था जिसमें आम आदमी की उपेक्षा और अपमान हो, उसके अस्तित्व को नकारा जाये और निरंतर शोषित किया जाये।
दरअसल कबीर किसी भी विचारधारा मंे अंटने और फसंने वाले व्यक्ति नहीं थे। वे जानते थे कि आम आदमी का प्रतिनिधित्व कोई भी विचारधारा नहीं करती है और प्रत्येक विचारधारा सत्ताधारी और शक्तिषाली वर्ग की अनुचरी होती है। जो काम युद्ध और हथियार नहीं कर पाते वह काम सत्ताधारी वर्ग विचारधारा के माध्यम से करा लेते हैं। सदियों से अनेक विचारधारायें पैदा होती रहीं हैं, और इन सबने अन्ततः वर्चस्वषाली वर्ग की सुरक्षा ही की है। किले की दीवारें तो तोडी़ जा सकती हैं, परन्तु विचारधारा जिन अमूर्त दीवारों का निर्माण करती है उन्हें कोई नई और अधिक ताकतवर विचारधारा ही विस्थापित कर पाती है। जैसा कि सामंतीय विचारधारा को पूँजीवादी विचारधारा ने विस्थापित किया। इस तरह एक के स्थान पर दूसरी विचारधारा स्थापित हो जाती है, परन्तु वह काम वही करती है जो पहले वाली विचारधारा करती रही थी।
सामंतीय व्यवस्था में विचारधारा ने मनुष्य को यह बात समझाई की उसको ईष्वर ने बनाया है और धर्म उसको दुःखों से मुक्ति दिला सकता है। जबकि सच्चाई यह है कि धर्म और ईष्वर दोनों को मनुष्य ने पैदा किया था। सदियों से विचारधारा एक ही कार्य करती रही है और वह है मनुष्य को सच्चाई से वंचित रखना और जीवन के भौतिक अंतर्विरोधों को छिपाना। उसके दुःखों और अभावों के कारण पिछले भव में और उनसे मुक्ति अगले जन्म में मिलेगी यह बताना। जबकि हम सब जानते हैं कि जीवन के तमाम सुख-दुख इसी जीवन में भौतिक कारणों से पैदा होते हैं और हमारी व्यवस्था ही उनकी उत्तरदायी होती है। विचारधारा सत्ताधारी वर्ग के हित को सुरक्षित रखने के लिए तथा भौतिक कारणों को छिपाने के लिए धर्म और ईष्वर को सामने रखती रही। इस तरह विचारधारा जीवन के वास्तविक कारणों से मनुष्य का ध्यान हटाती है और यह सत्ताधारी/वर्चस्वषाली वर्ग के हित में होता है। कबीर ने इसी विचारधारा को प्रष्नांकित किया था। धर्म के तमाम ठेकेदार पाखंड और कर्मकांड का प्रोपेगेण्डा करके इस विचारधारा को लादने का काम करते हैं इसीलिए कबीर विचारधारा के वाहकों पर चोट करते हैं और जिन तरीकों से विचारधारा आकार लेती है उन तरीकों को भी प्रष्नांकित करते हैं। कबीर के प्रष्नों का कोई उत्तर विचारधारा के पास नहीं है और जैसा कि पष्चिम में मार्टिन लूथर किंग ने चर्च के खिलाफ संघर्ष के साथ एक नई विचारधारा - आधुनिकता - को पेष किया था, वैसा कबीर ने नहीं किया उसके पीछे भी यही कारण है कि वे जानते थे कि किसी भी विचारधारा को अन्ततः सत्ताधारी वर्ग के हितों के अनुकूल ढाला जा सकता है। मार्टिन लूथर किंग की विचारधारा ने भी अन्ततः यही किया। नये सत्ताधारी वर्ग के वर्चस्व को स्थापित करने में आधुनिकता की विचारधारा क्रियाषील हो गई और नए तरह की तानाषाही दुनिया में पैदा हुई। मानवता के खिलाफ सबसे बड़े नरसंहार इसी नई विचाधारा के संरक्षण में किए गए।
इसीलिए कबीर की लड़ाई हर तरह की बंधी-बंधायी विचारधारा के खिलाफ थी। वे जानते थे कि आम आदमी अपनी दो जून की रोटी जुटाने में जुटा रहता है उसे इन विचारधाराओं को समझने और अपने अनुसार ढालने के लिए संघर्ष करने का समय नहीं है। अतः वे सहज समाधी और सहज जीवन का पक्ष लेते हैं -
              ‘हरिना समझ बूझ वन चरना’
हिरण जंगल का सबसे निरीह प्राणी होता है और प्यारा भी। कबीर उसे सचेत करते हैं कि जंगल हिंस्र पशुओं से भरा है, तू समझ बूझ कर चलना। यह समझना-बूझना क्या है? किससे सावधान रहने को कह रहे हैं कबीर। यह कोई लड़ाई नहीं है, यह सावधानी है, विवेकषील होना है, विवेकषीलता और समझदारी विचारधारात्मक संघर्ष के खिलाफ ही हो सकती है। आम आदमी को समझदारी का पाठ पढ़ाने के पीछे कबीर का जो लक्ष्य है उसे समझना चाहिए। विचारधाराओं के बरक्स समझदारी संघर्ष का सही रास्ता है, क्योंकि विचारधारायें आम आदमी को जाल में फंसाती हैं, वे सीधे वार नहीं करतीं, सदियों तक अधीन बनाये रखने का जंजाल रचती हैं। इनसे बचने का तरीका प्रत्यक्ष संघर्ष न होकर विवेकपूर्ण समझदारी ही है।
किसी भी व्यवस्था का विरोध करने के लिए उसके विचारधारात्मक मूल आधार पर चोट करना आवष्यक होता है और विचारधारात्मक मूल आधार पर चोट करने के लिए उसे समझना और उसकी तर्क पद्धति को तोड़ना जरूरी है। कबीर के पास सामंतीय व्यवस्था और यथास्थितिवादी विचारधारा धर्म और ईष्वर की विवेकपूर्ण समझ और बौद्धिक तर्क योजना को तोड़ने के लिए ज्ञान और तर्क की योजना थी। उन्होंने सामंतीय विचारधारा को तोड़ने के लिए उसके सबसे मजबूत गढ़ धर्म और ईष्वर पर चोट की। बहुत आष्चर्य हुआ यह देखकर की डॉ. अग्रवाल ने धर्म के आध्यात्मिक रूप की वकालत की और उसे कबीर के नाम से स्थापित किया। आध्यात्मिकता भी धर्म का एक अमूर्त रूप है जो जीवन के भौतिक कारणों से ध्यान हटाता है और धर्म के उदात्तीकृत रूप को सामने रखता है। यह भी विचारधारा को स्थापित करने का काम करता है। कबीर में तो आध्यात्मिकता है ही नहीं। वह तो विषुद्ध भौतिक जीवन के प्रतीक और आधारों को प्रतिष्ठित करते हैं।
विचारधारा का एक काम यह भी कि वह सत्य की विकृत या भ्रमपूर्ण प्रस्तुति करती है। सामंतीय विचारधारा ने धर्म और ईष्वर के उन रूपों को कभी सामने नहीं रखा जो उसकी वास्तविक उत्पत्ति और भूमिका को जनता के सामने प्रस्तुत करते। धर्म का उद्भव जादू-टोने से हुआ और प्रकृति के प्रति भय से सुरक्षा के लिए ईष्वर का नाम अस्तित्व में आया। इतिहास में धर्म और ईष्वर का उदय कब से हुआ? इसके प्रमाण प्रस्तुत करने का कार्य विचारधारा कभी नहीं करेगी। वह तो उसके पौराणिक और कथात्मक रूपों को ही आम आदमी के सामने पेष करती है जिससे भ्रम और भय बना रहे और सत्ताधारी वर्ग का हित सधता रहे। यही कारण है कि कबीर ने धर्म के भ्रमपूर्ण और भयोत्पादक रूपों को खंडित किया।
विचारधारा चेतना को कंुद भी करती हैं और उसके मानवीय विस्तार को सीमित करती हैं। वह हमें सोचे समझे समाधान और रास्ते बताती है ताकि सामान्य मानवीय चेतना स्वंतत्र रास्ते न खोज सके। यदि आम आदमी की चेतना जाग्रत और विवेकषील होकर अपने रास्ते और मंजिल खोजने लगेगी तो सत्ताधारी वर्ग के किले और गढ़ ध्वस्त हो जायेंगे। विचारधारा के आरंभिक उदय से लेकर उत्तर आधुनिकता तक के सफर को यदि आलोचित किया जाये तो हम पाते हैं कि वर्चस्वी विचारधाराओं ने जन चेतना और उसकी विचारधारा को कभी भी आकार ग्रहण नहीं करने दिया। उसे अस्तित्व में आने से पहले ही या तो कुचल दिया गया या अपने वर्ग में मिलाकर उसे डायवर्ट कर दिया गया। कबीर जैसे कुछ फक्कड़ जो लाभ-लोभ और भय की तकनीक से बचे रहे आज भी विचारधारा की जड़ों में मट्ठा डालने का काम कर रहे हैं। सामंतवाद ने सदियों तक मनुष्य को धर्म और ईष्वर के माध्यम से भाग्यवाद का पाठ पढाया और उसकी चेतना को मानवीय समाधान खोजने से रोका। आधुनिकता की विचारधारा ने भी व्यक्ति की चेतना को अपने स्वार्थ और निजी मुनाफे तक सीमित करके कुंठित कर दिया। इस संदर्भ में मैं अल्बर्ट आइंस्टीन का एक उद्धरण देना चाहूँगा - ‘‘मैं व्यक्तियों की सामाजिक चेतना के कुंठित हो जाने को पूँजीवाद की सबसे खराब बुराई मानता हूँ। हमारी संपूर्ण षिक्षा व्यवस्था इस दोष से ग्रस्त है। विद्यार्थी के अन्दर एक अतिरंजित प्रतिद्वंद्वता पैदा कर दी जाती है और वह सफलता की पूजा करने लगता है यह मानकर कि यही उसके भावी कैरियर की तैयारी है।’’( समाजवाद का सपना, पृ. 7)
कबीर को विचारधाराओं में समाहित करने की बहुत कोषिषें प्रारंभ से ही होती रही हैं। भारतीय देषज चिन्तकों, की पंरपरा में डॉ. अग्रवाल जैसे देषज आधुनिकता के पक्षधर भी शामिल हैं, ने उन्हें किसी न किसी विचारधारा के अन्तर्गत ही व्याख्यायित करने की कोषिष है। किसी ने उन्हें नाथपंथी, किसी ने बौद्ध, किसी ने इस्लाम, किसी ने ब्राह्मण विचारधारा और अब देषज आधुनिक विचारधारा के सांचे में ढालने का प्रयास किया। पर क्या कबीर को किसी विचारधारा में बांधा जा सकता है? वे पहाड़ी झरने की तरह अपनी लय और उद्याम आवेग के साथ प्रवहमान हैं उन्हें नलों के पानी की तरह अपने स्वार्थ के लिए इस्तेेमाल नहीं किया जा सकता।
पूँजीवादी उत्पादन पद्धति की वित्तपोषक विचारधारा आधुनिकता ने दो महाख्यानों को जन्म दिया। पूँजीवादी विचारधारा और समाजवादी विचारधारा। ये दोनों ही आधुनिकता के गर्भ से पैदा हुईं थीं अतः इनमें केन्द्रीकरण और व्यवस्था तंत्र की तानाषाही निहित थी। पूँजीवाद ने पूँजी के समक्ष मनुष्य की गरिमा और अस्तित्व को नकारा और समाजवाद ने पार्टीतंत्र की तानाषाही के बरक्स मनुष्य की गरिमा को नकारा -‘‘अक्टुबर क्रांति की त्रासदी थी कि उसने कठोर क्रूर आदेषधर्मी समाजवाद को जन्म दिया। समाजवादी लोकतंत्र की यह त्रासदी थी कि केयन्स का कल्याण राज्य पूँजीवादी भूमंडलीकरण के भयानक सैलाब को रोक न सका (जैसा कि भारत में हो रहा है)’’ (समाजवाद का सपना, पृ. 55) दोनों ने ही अन्ततः मनुष्यत्व को ताक पर रख दिया और ताकतवर को महत्व दिया। कबीर का विरोध इस तरह की दोनों ही विचारधाराओं से है। कबीर से देषज आधुनिकता का प्रारंभ माननेवाले डॉ. पुरुषोत्तम अग्रवाल ने उन्हें समाजवादी नहीं कहा यह सोचनेवाली बात है, क्योंकि आधुनिकता में पूँजीवाद की गंध अधिक है और डॉ. अग्रवाल कम से कम घोषित मार्क्सवादी तो हैं ही।
डॉ. अग्रवाल की आधुनिकता संबंधी कुछ टिप्पणियों को खोजने का प्रयत्न उनकी पुस्तक ‘अकथ कहानी प्रेम की: कबीर की कविता और उनका समय में’ करने पर हम उनकी आधुनिकता सबंधी सोच को समझने का प्रयत्न कर सकते हैं- इस पुस्तक की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसमें औपनिवेषिक आधुनिक विचारधारा से कबीर और भारतीय इतिहास को देखनेवाले विद्वानों की बात तो की है और खेद भी जताया है कि वे औपनिवेषिक मानसिकता के कारण भारतीय देषज आधुनिकता को नहीं देख सके, परन्तु उन विद्वानों के नाम या उनकी विचारधारा के उद्धरण संदर्भ सहित नहीं दिए गए।
 विद्वान लेखक को पूँजीवाद के विकास के अंकुरण भारत में देखने की इतनी तीव्र इच्छा है कि वह पूँजीवाद की मूलभूत प्रवृत्ति और विचारधारा के बरक्स भारतीय विचारधारा के अन्तर्विरोधों को अनदेखा करता रहा है। भारत में कबीर ने धर्मसत्ता का विरोध किया और उस समय भारत का व्यापार भी विकसित था। इसमें कोई शक नहीं है, परन्तु दोनों तथ्य पूँजीवादी विकास के लिए आधारभूत कारण नहीं है। भारत में पूँजीवाद का विकास तो आज भूमंडलीकरण के जमाने में भी पष्चिम की तकनीक और विचारधारा के सहारे ही हो रहा है। भारत का कोई अपना पूँजीवादी मॉडल विकसित नहीं हो सका। यही भारतीय विकास का अन्तर्विरोध है जिसे समझना आवष्यक है। भारतीय समाज और राजनीति की संरचना के आधार में ही पूँजीवादी विकास के तत्व नहीं है।
पूँजीवाद के उद्भव और विकास के संबंध में दूसरी बात जो डॉ. अग्रवाल के असंबद्ध और असंगत विवरणों से स्पष्ट होती है, वह कि वे भारत में पूँजीवाद के अपने विकास के लिए बैचेन हैं। तमाम मार्क्सवादी भारत में समाजवाद के विकास के लिए बैचेन देखे जाते हैं, और डॉ. अग्रवाल पूँजीवाद के विकास के लिए। उनका उपर्युक्त पुस्तक में यही प्रयास है कि भारत में जो पूँजीवादी विकास हुआ है और आधुनिकता का आरंभ हुआ है उसे भारतीयों की ही देन सिद्ध किया जाए। हमारा पूँजीवादी विकास हुआ और हम आधुनिक हुए इसका श्रेय विदेषियों को क्यों दिया जाए। यह बात बहुत अच्छी प्रतीत हो सकती है, कुछ देषज टाइप के विद्धानों को, परन्तु इसमें जो जहर छिपा है उसे नजरअंदाज करना खतरनाक होगा। शरीर में कोई बीमारी पैदा हो जाये तो उसका कारण बाहरी विषाणुओं का होना बीमारी के ठीक होने के लिए अच्छा होता है। यदि वह बीमारी शरीर का स्वाभाविक लक्षण बन जाये तो उसका इलाज बहुत मुष्किल होता है। पूँजीवाद एक खतरनाक बीमारी है जिसने मानवीयता के न केवल जिस्म बल्कि चेतना को भी लकवाग्रस्त बना दिया है, क्या उसका भारत में स्वाभाविक विकास मानना ठीक है? पूँजीवाद बाहरी कारणों से और परिस्थितियों से विकसित हुआ है यह भारत के हित में है न कि अहित में। भारत अभी तक अपनी मानवीय चेतना और सांस्कृतिक चेतना को जितना संचित रख सका है उसके पीछे उसका पूर्णतः पूँजीवादी विकास न हो पाना ही है। भारत का आधुनिकीकरण और पूँजीवादीकरण अभी होना शेष है, वर्तमान में जो दिखाई दे रहा है, वह औपनिवेषिक आधुनिकता और पष्चिमी पूँजीवाद की नकल ही है। हमें इस बात का रोना नहीं रोना चाहिए की भारत का पूर्णतः आधुनिक नहीं हुआ या भारत का कोई अपना देषज पूँजीवादी मॉडल नहीं है। यह अच्छी बात है इस देष के लिए। क्योंकि यदि ऐसा नहीं होता तो भारत भी अमेरिका जैसी बर्बर और पतित संस्कृति का वाहक बन जाता।
एक बात और डॉ. अग्रवाल की आधुनिकता की देषज अवधारणा के संबंध में उन्हें याद दिलाना चाहूंगा कि यदि वे मार्क्स और उसकी विचारधारा के पक्षधर हों तो - एंगेल्स ने ‘डयूहरिंग मत खंडन’ में लिखा है कि ‘‘दास प्रथा न होती, तो यूनानी राज्य, कला और विज्ञान भी न होते। दास प्रथा न होती, तो रोमन साम्राज्य कभी अस्तित्व में न आता। और यदि यूनानी कला तथा रोमन साम्राज्य उसकी नींव न डालते, तो आधुनिक यूरोप भी न होता।’’ इसमें सीधे-सीधे आधुनिकता के उदय को दास प्रथा की अनिवार्यता से संबद्ध किया गया है। क्या भारत में ऐसी दास प्रथा थी इतिहास के किसी भी कालखंड में? शायद नहीं। तो क्या अब विद्धान आलोचक इतिहास में दास प्रथा के विकास पर शोध करके देषी दास प्रथा के इतिहास को सिद्ध करेंगे जिससे देषज आधुनिकता को जायज ठहराया जा सके।
डॉ. अग्रवाल ने कहीं भी यह बताने की कोषिष नहीं की है कि जिस देषज आधुनिकता और पूँजीवादी विकास की वे बात कर रहे हैं, उसका भारतीय संस्करण कैसा होता? यदि कबीर आधुनिकता के जनक होते और भारतीय सामंतीय उत्पादन पद्धति वाली अर्थव्यवस्था - व्यापार और नगरीकरण - के कारण भारत का आधुनिकीकरण और पूँजीवादी विकास हुआ होता तो क्या आपकी सीरत और सूरत ऐसी ही होती? जैसी आज है? यदि ऐसी ही होती तो देषज आधुनिकता और औपनिवेषिक आधुनिकता में फर्क कैसा? और यदि नहीं तो, बतायें की देषज आधुनिकता का रूप कैसा होता? सिर्फ यह कहने से कि कुछ विद्वानों को कबीर के समय के भारत में पूँजीवादी विकास के लक्षण दिखाई नहीं देते और कबीर में आधुनिकता के, आपका काम पूरा नहीं होता, उन विद्वानों की पहचान स्पष्ट कीजिए और जिन विद्वानों को आपके अनुसार यह दिखाई दिया। वे कौन हैं? आपने जितने भी प्रमाण दिए हैं उनमें कोई भी देषज नहीं है, सबके सब औपनिवेषिक मानसिकता वाले विद्वान ही हैं।
हमें सवाल यह भी उठाना चाहिए कि भारत का जैसा भी आधुनिकीकरण हुआ है क्या वैसा होना चाहिए था? क्या डॉ. अग्रवाल आज के आधुनिक भारतीय संस्करण से संतुष्ट हैं? शायद नहीं ही हांेगे। क्यों? क्योंकि जो भी आधुनिकीकरण पिछली एक शताब्दी में हुआ है उसका 99 प्रतिषत पष्चिमी है। एक प्रतिषत आधुनिक भारत कबीर और निराला जैसे चिन्तकों में बचा हुआ है। क्या इस 99 प्रतिषत आधुनिकीकरण में देषज होने का कोई लक्षण है? यह देष यदि अपने देषज संस्करण में कहीं है तो उन प्रवृत्तियों और गतिविधियों में जो परंपरागत और धार्मिक संस्कारों में बची हुईं हैं।ष्
डॉ. अग्रवाल ने अपनी उपर्युक्त पुस्तक में आधुनिकता के संबंध में जो असंबद्ध और बेतरतीव बहस खड़ी की है, उसको पढ़ते हुए जो बात समझ आती है वह यह की आधुनिकता और पूँजीवाद के विकास की कोई स्पष्ट समझ निर्मित नहीं हो पाती। लेखक की मूल सोच है कि भारत में औपनिवेषिक आघुनिकता के पहले देषज आधुनिकता का विकास हो चुका था। इसके साथ ही उनका मानना यह है कि आधुनिकता का संबंध व्यापार है से औद्योगिकीकरण से नहीं है - ‘‘आधुनिक विचारों और रुझानों का कारण कार्य संबंध औद्योगिकीकरण से नहीं व्यापार से है’’ (पृ. 105) अपनी इस सोच को जायज ठहराने के लिए आपने जो प्रमाण और विवरण प्रस्तुत किए हैं, वे सब के सब अठारहवीं सदी के आसपास के हैं। इस समय के व्यापार के विकास और अन्तरराष्ट्रीय व्यापार के आंकड़े और लेखकों - देषज आधुनिकता और औपनिवेषिक आधुनिकता - के विवरणों से यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि भारत में व्यापार विकसित था और इसीलिए भारत में देषज आधुनिकता भी थी।
लेखक की समस्या यह है कि वह बात कर रहा है कबीर के समय की और कबीर को देषज आधुनिकता का जनक मानने की और उसके लिए व्यापार के विकास के प्रमाण दे रहा है अठारहवीं सदी के। इस तरह लेखक काल की संगतता को ठीक से नहीं बिठा पाया है। कबीर के समय पर बात करते समय कबीर के समय के भारत के व्यापारिक स्थिति के आंकड़े और विवरण उसके पास नहीं है। वे इतिहास में थोड़े और पीछे जाते पहली सदी के आसपास तो उन्हें व्यापार के विकास के और अधिक प्रमाणिक आंकड़े और विवरण मिल सकते थे। और आप वहाँ से आधुनिक रुझानों और विचारों का विकास मानसकते थे।
दूसरी समस्या इस पुस्तक की यह है कि इसमें इस बात को कई बार लिखा गया है कि आधुनिकता पूर्ववर्ती है और प्रबोधन (पुनर्जागरण) पश्चातवर्ती - देखिए प
ृ. 35पर ‘‘ औपनिवेषिक ज्ञानकांड का जन्म यूरोपीय आधुनिकता से हुआ था।’’ आगे पृ. 67 पर दो बार लिखा है तीसरे पैरा की दूसरी पंक्ति में ‘‘ आधुनिकता के बाद ही समाज प्रबोधन की दिषा में बढ़ता है।’’ चौथे पैरा के प्रारंभ में ‘‘इतिहास क्रम में प्रबोधन आधुनिकता के पीछे ही आता है।’’ वैसे में इस पूरे पैरा को उद्धरित करना चाहूँगा - ‘‘ आधुनिकता और प्रबोधन में अंतर किया जाता है। इतिहास क्रम में प्रबोधन आधुनिकता के पीछे ही आता है। आधुनिक होने के पहले कोई समाज प्रबुद्ध नहीं हो सकता। कुछ व्यक्ति प्रबुद्ध हो सकते हैं, ऐसे लोग अपने वक्त से आगे निकले कहलाते हैं, लेकिन प्रबोधन के मूल्यों का व्यापक समाज में प्रचार तो आधुनिकता के बाद ही हो सकता है। यूरोप में आरंभिक काल शरू हुआ पंद्रहवीं सदी में। प्रबोधन (एनलाइटेनमेंट) का दौर शुरू हुआ सत्रहवीं सदी से। इसी अर्थ में यूरोपीय प्रबोधन से वंचित लोग - क्या अकबर क्या कबीर और क्या तुकाराम- अपने वक्त से आगे और आधुनिक (अर्थात् प्रबुद्ध) चित्त के निकट कहे जाते हैं। प्रबोधन के मूल्य हैं - व्यक्ति सत्ता की स्वीकृति, सहिष्णुता और विवेक। बोलचाल में आधुनिक और प्रबुद्ध घुल-मिल जाते हैं। आधुनिक का अर्थ हो जाता है विवेकपरक, व्यक्ति सत्ता स्वीकार करने वाला सहिष्णु चित्त; और मध्यकालीन का अर्थ व्यक्ति सत्ता को नकारने वाला। प्रेमी जोड़े को फाँसी चढ़ाने का आदेष देनेवाली पंचायत का व्यवहार मध्यकालीन और प्रेमी -प्रेमिका आधुनिक।’’ (पृ.वही 67-68)
इस पैरा में कई तरह की असंगतियाँ हैं। सबसे पहले आधुनिकता और प्रबोधन के कालक्रम की बात की जाये। यूरोप में रिनेसां, एनलाइटेनमेंट, नवजागरण, प्रबोधन शब्द एक परिघटना के लिए प्रयुक्त किए जाते हैं। इनके लिए डॉ. अग्रवाल ने अधिकांषतः औपनिवेषिक ज्ञानकांड और यूरोपीय ज्ञानकांड शब्दों का प्रयोग किया है। डॉ. अग्रवाल ने आधुनिकता को पहले माना है और  नवजागरण को सत्रहवीं सदी से माना। यह अपने आप में गाड़ी को बैलों के आगे लगाने वाली बात है। हम सब यह जानते हैं कि ‘‘पष्चिमी (इटैलियन) रिनैसाँ 14-15 शती मूलतः प्राचीन संस्कृति का मानवीय धुरी पर पुनरुत्थान था। इसे ‘मानववाद’ (ह्यूमेनिज्म) कहा गया। मनुष्य के व्यक्तित्व की गहराइयों की छानबीन ने ‘व्यक्तिवाद’(इंडिजुअलिज्म) का उन्मेष किया। रिनंेसाँ आंदोलन-मध्ययुगों से स्पष्ट आंदोलन विच्छेद था। यह व्यक्तिवादी था। यह ईसाई रोमन साम्राज्य के विरुद्ध था। यह पोंगापंथ, पुराणपंथ के विरुद्ध था। इसमें नए मूल्यों तथा जीवन के नए दर्षन (इरास्मस के सुधारवाद, गेलीलियो का विज्ञानवाद, लियोनार्दो का शैक्षणिक सौंदर्यवाद आदि) का समावेष हुआ। यह उदारतावाद, बुद्धि की आलोचनात्मक एवं विवेकात्मक क्षमताओं के विकास, तथा दैवी एवं स्वर्गिक के स्थान पर इहलौकिक एवं मनुष्य-प्रकृति के आधुनिक विज्ञानों की ओर प्रयाण था।’’ (मिथक से आधुनिकता तक ले. रमेष कुंतल मेघ पृ. 70 का फुटनोट) यह उद्धरण सिर्फ इसलिए दिया है ताकि प्रबोधन और आधुनिकता का जो क्रम डॉ. अग्रवाल ने दिया है उसे सीधा करके समझा जा सके। आधुनिकता के संबंध में आगे प्रमाण प्रस्तुत करुंगा कि उसका प्रारंभ सत्रहवीं अठारहवीं सदी में होता है। आधुनिकता प्रबोधन का परिणाम थी न कि उसका कारण।
इसमें दूसरी असंगति है कि ‘प्रबोधन’ और ‘प्रबुद्ध’ को एक मान लिया गया है। प्रबोधन एक आंदोलन था जिसके लक्षण और विषेषतायें उपर्युक्त उद्धरण में दिखाई गईं हैं। लेकिन किसी समाज का प्रबुद्ध होना उसकी बौद्धिक क्षमता और मानवीय दृष्टिकोण का विकास होने से लगाया जाता है। हम इस सच्चाई से इंकार नहीं कर सकते की कोई समाज पूर्ण रूप से कभी प्रबुद्ध नहीं होता। समाज के कुछ व्यक्ति ही प्रबुद्ध होते हैं, शेष सब तो परंपरागत और रूढिवादी मानसिकता से बच नहीं पाते। आज की दुनिया में कोई समाज पूरी तरह से प्रबुद्ध होने का दावा नहीं कर सकता।
तीसरी विसंगति यह है कि आधुनिकता की जो विषेषतायें डॉ. अग्रवाल ने बताईं हैं वे दरअसल पुनर्जागरण के मूल्य हैं। आधुनिकता के मूल्य क्या हैं? यह डॉ. अग्रवाल ने ठीक से पूरी पुस्तक में कहीं भी नहीं बताये हैं। जिस देषज आधुनिकता की बात वे करते हैं उसकी पहचान और लक्षण क्या हैं, इसके संबंध में भी कहीं कुछ नहीं लिखा गया। जबकि इस पद का प्रयोग सैकड़ों बार किया गया है। चलिए हम रमेष कुंतलमेघ के शब्दों में भारतीय देषज आधुनिकता के लक्षण समझ लेते हैं - ‘हमारी स्वदेषी में जिन ऐतिहासिक आदर्षों तथा अभिवृत्तियों को स्वीकार किया गया है वे ‘नवजागरण’ की धुरी से भी उभरी हैं। उनमें शोषण और अन्याय का विरोध है तथा तथा उनका मानववाद कबीर-रैदास-तुलसी-जायसी की विरासत को लिए हुए है। इस नवजागरण वाली आधुनिकता ने हमारे आधुनिक भारत के लिए आधुनिकता की ऐसी कसौटियों  दीं: आषावाद (तिलक) गरीबी और अज्ञानता से संघर्ष (विवेकानंद), इहलौकिकता और राष्ट्रीयता (तिलक और गाँधी), प्रकृतवाद और वैज्ञानिकता(दयानंद), व्यक्तिवाद और मानवतवाद (रवीन्द्रनाथ) सामाजिक सुधार और कुटीर आर्थिक जीविका (गाँधी)। इन्हें हम अपनी एषियाई आधुनिकता के तत्व या मूल्य कह कर संबोधित करें तो भी असंगत नहीं है। दैवी की जगह मानवीय का विकास, धार्मिक रूढियों के बजाय तर्क की वरीयता, सामूहिक भेड़ियाधसान के बजाय वैयक्तिकता की पहचान तथा गरिमा; सामंतीय व्यवस्था के बजाय जन सामाजिकता वाली व्यवस्था आदि ही परंपरा से आधुनिकता के अपने संक्रमण-पंथ हुए।’’ (वही पृ. 72) उल्लेखनीय है कि उद्धरण का लेखक भारतीय नवजागरण का प्रारंभ डॉ. राममोहन राय से मानते हैं। ऐसा ही अधिकांष विद्वान भी मानते हैं।
डॉ. अग्रवाल के उपर्युक्त उद्धरण में एक अन्य असंगति यह है कि वे आधुनिक काल और आरंभिक काल का अंतर नहीं कर पाये -‘‘यूरोप में आरंभिक काल शरू हुआ पंद्रहवीं सदी में’’ इस वाक्य में आरंभिक नहीं आधुनिक कहना चाहते हैं। यह एक सामान्य भूल भी मानी जा सकती है, परन्तु ऐसी भूलें इस पुस्तक में कई स्थानांे पर मिल जाती हैं, इसलिए इसे सामान्य असंगति नहीं माना जा सकता।
डॉ. अग्रवाल आधुनिकता और पूँजीवाद के अन्तर्संबंध को भी बहुत ही सतही ढंग से समझने की भूल कर रहे हैं। सामंतवाद से पूँजीवादी में संक्रमण के मूल तत्व जो हैं, वे ही मध्यकाल से आधुनिकता में संक्रमण की दषायें भी होंगी। व्यापार का होना और नगरीकरण का होना मात्र पूँजीवाद की स्थिति पैदा नहीं करतीं। जैसा कि डॉ. अग्रवाल मानकर चलते हैं। सामंतीय नगरीय व्यवस्था और व्यापार की अपनी अलग विषेषतायें हैं। उनमें पूँजीवाद के विकास की कोई संभावना नहीं होती। इसको में आगे स्पष्ट करूंगा। इसके अतिरिक्त डॉ. अग्रवाल ने कबीर के समय को जड़ और गतिहीन कहने वालों को भी औपनिवेषिक आधुनिक विचारधारा वाला माना है। उन्होंने कोषिष की है यह समझाने की कि कबीर का समय जड़ और गतिहीन नहीं था। दरअसल वे कबीर को जड़ और गतिहीन मानने का विरोध कर रहे हैं। लेकिन उनकी समस्या यह है कि वे जड़ और गतिहीन समाज और समय के लिए लागू करते हैं। यद्यपि न तो वे तत्कालीन समय की प्रगतिषीलता को विवेचित कर पाये हैं और न ‘जड़ता’ और ‘गतिहीनता’ को समझ पाये हैं। तत्कालीन अर्थव्यवस्था और समाज को जड़ और गतिहीन कहने का अपना एक खास अर्थसंदर्भ है। इसका अर्थ यह नहीं है कि कबीर के समय में समाज और अर्थव्यवस्था में कोई हलचल ही नहीं थी। और वह एकदम ठहरा और सड़ा हुआ जल था।
यह संदर्भों को न समझपाने की समस्या पूरी पुस्तक में प्रारंभ से अंत दिखाई देती है। इसके पीछे लेखक की जो सोच है वह यह कि वह मानकर चल रहा है कि जिस वर्ग में यह पुस्तक पढ़ी जानी है, उसके पास इन संदर्भों की न तो कोई स्पष्ट समझ है और न अध्ययन करने का अवकाष। यह बात इसलिए सच है कि जिस तरह से इस किताब की प्रषंसा हिंदी आलोचना जगत में हो रही है, वह चीजों को न समझने की प्रवृत्ति का ही परिणाम है।
इस पुस्तक का एक अंतर्विरोध यह है कि इसमें देषज आधुनिकता के पैदा होने की संभावना कबीर के समय में तलाषने की कोषिष की गई है पर लेखक ने कहीं भी सामंतीय समाज से पूँजीवादी समाज में संक्रमण की स्थितियों पर टिप्पणी नहीं की। जो सबसे आवष्यक तथ्य था देषज आधुनिकता के संबंध में। सामंतवाद पर कोई विचार लेखक नहीं करता। उसके विघटन के बिना क्या पूँजीवाद और उसकी अनुगामी आधुनिकता संभव है? क्या कबीर का समय सामंतीय समाज और अर्थव्यवस्था का समय नहीं था?
सबसे पहले मैं सामंतवाद से पूँजीवाद में संक्रमण की उन स्थितियों को संक्षेप में प्रस्तुत करूंगा जो यह स्पष्ट करेंगी की भारत के मध्यकाल में यानी कबीर के समय की अर्थव्यवस्था और राजनीतिक, सामाजिक स्थितियों में  पूँजीवाद में रूपांतरित होने की कोई संभावना नहीं थी। और इसीलिए उनके समय और समाज को आधुनिक नहीं कहा जा सकता।
पूँजीवाद एक विषिष्ट तरह की उत्पादन संबंधों की संरचना को इंगित करता है, न कि पूँजी के संचय और भ्रमण को। मार्क्स ने पूँजीवाद की जो परिभाषा दी है, उसको समझे बिना पूँजीवाद पर कोई भी बहस बेमानी होगी। उनके अनुसार - ‘‘इसकी अनिवार्य विषेषता संपत्तिहीन मजदूरी कमाने वालों और पूँजी के मालिक उद्यमियों के बीच वर्गों का विभाजन है।’’ कोई भी पूर्वपूँजीवादी व्यवस्था पूँजीवाद में रूपांतरित हो इसके लिए उसमें कुछ सामान्य स्थितियों का होना आवष्यक है। इन स्थितियों को मार्क्स के विवरणों के द्वारा ही समझा जा सकता है।
मार्क्स सामंतवाद से पूँजीवाद में संक्रमण के लिए जो पहली स्थिति मानते हैं वह है ‘‘वे समांतवाद से पूँजीवाद समाज में संक्रमण की आत्मा, लघु उत्पादकों के प्राथमिक रूप से कृषक समाज, जिसके सर्वाधिक महत्वपूर्ण सामाजिक वर्ग भूस्वामी और उनके परतंत्र रैयत थे, से बाजार में विनिमय के लिए उत्पादन करने वाले समाज में रूपांतरण को मानते हैं, जिसके प्रमुख वर्ग पूँजी के स्वामित्व वाले उद्यमी और संपत्तिहीन उजरती मजदूर होते हैं।’’ (सामंतवाद से पूँजीवाद में संक्रमण, संपा. रोडली हिल्टन, पृ. 158)
उनकी दूसरी मान्यता है, जो डॉ. अग्रवाल के व्यापार और नगरीकरण के जंजाल को छिन्न-भिन्न कर देती है, कि ‘‘उनका प्रमुख तर्क यह है कि मुद्रा या वस्तु के माध्यम से व्यापार चाहे कितना भी व्यापक रूप में फैला हो और मौद्रिक पूँजी के संचयन में कितनी भी उत्पादकता हो, वे अपने आपसे सामंतवादी समाज का रूपांतरण नहीं कर सकते। सामंती समाज के विघटन का स्वरूप और गति इसके विपरीत, ‘उत्पादन प्रणाली’ के रूप में इसकी मजबूती और आंतरिक अभिव्यक्ति’ पर निर्भर करता है। इसके पतन का प्राथमिक कारण इस पर पड़नेवाले (बाहर से) व्यापार के प्रभाव के बजाय समाज का आंतरिक अंतर्विरोध होता है।’’ (वही पृ. 158)
‘‘सिर्फ व्यापार का इतिहास हमें यह नहीं बता सकता कि सामंती संबंधों ने कब और क्यों पूँजीवाद को जगह दे दी, कैसे किसानी खेती और दस्तकारी उद्योग ने पूँजी के विषाल संकेन्द्रण और उजरती मूजदूरों को जगह दे दी, कैसे लगान से प्राप्त मुनाफे का स्थान मजदूरों द्वारा तैयार माल में निहित मूल्य के दोहन से प्राप्त मुनाफे ने ले लिया।’’ (वही पृ. 162)
कबीर के समय के भारत में सामंती समाज के आंतरिक अतंर्विरोध क्या थे? और क्या उस समय उजरती मजदूर वर्ग और पूँजी के स्वामित्व वाले उद्यमी थे? और क्या भारतीय समाज में इस तरह की कोई संभावना खोजने का प्रयास डॉ. अग्रवाल ने किया जिससे देषज आधुनिकता के पैदा होने की संभावना बनती।
मुख्य लक्षण जिसे मार्क्स ने इंगित किया है, सामंती समाज, समाज के आंतरिक अंतर्विरोधों से ही विघटित होता है, इस तथ्य का विष्लेषण किए बिना किसी भी सामंती समाज के पूँजीवाद में रूपांतरित होने की व्याख्या बेमानी होगी।
मार्क्स के विचारों को आगे बढाया जाये ताकि पूँजीवाद में भारतीय समाज के संक्रमण की संभावनाओं का सच सामने आ सके। मार्क्स इस बात पर जोर देते हैं कि सामंती समाज में जो पूँजी संचित होती है, वह दो लोगों के पास होती है - एक तो व्यापारी और दूसरा महाजन। ये दोनों वर्ग जिस तरह से पूँजी संचित करते हैं, वह उत्पादन और उसके साधनों पर नियंत्रण से नहीं होती और न उजरती मजूदर वर्ग के श्रम से उत्पादित अतिक्ति मूल्य से। बल्कि वह कम दाम में खरीदना और अधिक में बेचने के कार्य व्यापार से होती है। दर असल व्यापारी के मुनाफा और उद्योगपति के मुनाफा कमाने के चरित्र में अंतर है। यह अंतर ही एक को पूँजीपति और दूसरे को व्यापारी सिद्ध करता है। डॉ. अग्रवाल इस अंतर को समझने में नाकाम रहे हैं। इसीलिए वे व्यापार से आधुनिकता और पूँजीवाद के उदय का संबंध स्थापित कर सके।
व्यापारी का मुनाफा वस्तुओं के मूल्य में अंतर का उपयोग करके कमाया जाता है और महाजन का मुनाफा ब्याज बसूल करके। यह दोनों ही लक्षण सामंतीय अर्थव्यस्था के हैं। इनसे पूँजीवाद का उदय संभव नहीं है। इनके चरित्र में मूलभूत अंतर यह है कि इनके द्वारा संचित पूँजी उत्पादन की पूरी प्रक्रिया पर इनका कोई नियंत्रण नहीं होता। यही कारण है मध्यकाल तक के भारत में किसान और दस्तकार अपनी उत्पादन प्रक्रिया और उसके साधनों का स्वामी स्वयं होता था। लेकिन  अंग्रेजी राज की स्थापना के बाद जैसे ही विदेषी औद्योगिक क्रांति संभव हुई भारत में उत्पादन के साधनों जमीन और तकनीक पर से उसका स्वामित्व समाप्त होने लगा और परिणामतः वह उजरती मजूदर में बदलने लगा। डॉ. अग्रवाल ने कई स्थलों पर इस बात पर भी आपत्ति जताई है कि अंग्रेजी राज के आने से ही भारत का औद्योगिकीकरण मानने वाले औपनिवेषिक मानसिकता के हैं। वे  उत्पादन के इस चरित्र को नहीं समझ सके इसलिए इस तरह की स्थापनायें देते रहे।
मार्क्स ने तीसरा तथ्य जो पूँजीवाद के विकास के लिए अनिवार्य बताया है, वह है, लगान का नकदीकरण। वे यह मानते हैं कि नकद लगान के उदय का सामंती संबंधों के विघटन से सीधा संबंध है - ‘‘उन्होंने सामंती लगान से पूँजीवादी लगान को उसी सावधानी के साथ अलग किया जिस सावधानी से सौदागरी पूँजी को औद्योगिक पूँजी से। किसानों द्वारा भूस्वामी को अदा की गई सामंती लगान चाहे वह श्रम के रूप में हो अथवा जिन्स के रूप में या नकद उस ‘अधिषेष मूल्य’ के समरूप हो जो पूँजीपति मजदूरों से उगाहता है।’’ (वही पृ. 159)
क्या कबीर के समय के भारत में नकद लगान लिया जाता था? लगान के नकदीकरण का प्रारंभ अंग्रेजी राज के समय से ही हुआ है। इसके लिए इरफान हबीब के मध्यकालीन इतिहास का अध्ययन आवष्यक है जिसे डॉ. अग्रवाल ने सिरे से नकार दिया है।
मार्क्स पूँजीवादी उद्योग के विकास के लिए नकद संपत्ति का संचयन भी आवष्यक मानते हैं। नकद लगान से भूमि और किसानों के संबंधों में परिवर्तन हुआ। इससे सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन जो परवर्ती भारत में दिखाई देता है, वह यह कि भूमि अब विक्रय की वस्तु बन गई। दूसरा परिवर्तन यह हुआ कि समृद्ध व्यक्ति अधिषेष को संचय करने की स्थिति में आ गए और छोटे किसान भूमिहीन होकर मजूदर बनते गए। प्रेमचंद ने गोदान में किसान के मजदूर बनते जाने की महागाथा प्रस्तुत की है और इस अर्थ में वह आधुनिकता का महाकाव्य भी कहा जा सकता है।
मार्क्स को मानने-जानने वाले यह बात जानते हैं कि किसी भी समूह का राजनीतिक और सामाजिक ढांचा उस समूह की उत्पादन प्रणाली के अनुरूप निर्धारित होता है। इसलिए तत्कालीन समाज के आर्थिक और राजनीतिक अंतर्संबंधों और अंतर्विरोधों का अध्ययन भी किया जाना चाहिए।
पूँजीवाद के उदय और विजय के संबंध में मार्क्स की विचारधारा को प्रस्तुत करते हुए एरिक हॉब्सबाम अपने लेख ‘सामंतवाद से पूँजीवाद तक’ में लिखते हैं कि - ‘‘पंद्रहवी सदी के मध्य से सत्रहवीं सदी के बीच विस्तारवाद का पुनरागमन जिसकी विषिष्टता सामंती समाज के आधार पर ऊपरी ढांचे में दरारों के पहले चिह्नों का उभरना है। (रिफार्मेषन और नीदरलैंड में बुर्जुआ क्रांति के तत्वों का उदय) इसी काल में यूरोपीय व्यापारियों और विजेताओं का पहला स्पष्ट प्रवेष अमरीका, और हिंद महासागर में हुआ। इसी काल में मार्क्स पूँजीवादी युग की शुरुआत की निषानी मानते हैं।.....................करीब करीब एक ही साथ ब्रिटेन की औद्योगिक क्रांति, अमरीकी क्रांति और फ्रांसीसी क्रांति, जो सभी अठारहवीं सदी के अंतिम चौथाई में घटित हुईं, के पूर्ण होने से पूँजीवादी समाज की जीत सुनिष्चित हो गई।’’ (वही पृ. 172)
सामंती व्यवस्था अनिवार्य रूप से गतिहीन और जड़ ही नहीं होती, परन्तु उस व्यवस्था में स्वयं को रूपांतरित करने की कोई गतिषीलता या प्रवृत्ति नहीं पाई जाती। इसलिए उसे जड़ और यथास्थितिवादी कहा जाता है। डॉ. अग्रवाल ने इस ‘जड़’ और ‘गतिहीन’ पर आपत्ति की है, खासतौर से कबीर के समय और समाज के संदर्भ में। वे यह नहीं समझ पा रहे हैं कि सामंती व्यापार और सौदागरी पूँजी का मुनाफा यथास्थिति और गतिहीनता में ही निहित होता है। सामंती व्यापार और उत्पादन प्रणाली का मूल चरित्र होता है ‘उपभोग के लिए उत्पादन’ यह मूलतः गतिहीन होती हैं। जबकि पूँजीवादी उत्पादन प्रणाली मुनाफा कमाने के लिए निरंतर स्वयं को बदलती रहती है। नई तकनीक और नए बाजारों की खोज और नए उपभोक्ता का निर्माण। इस अर्थ में सामंती समाज और समय गतिहीन और जड़ होता है। सामंती समाज और समय में उत्पादन के साधन सीधे उत्पादकों के हाथों में केन्द्रित होते थे और इसीलिए वे सिर्फ उपभोग के लिए उत्पादन तक सीमित रहते हैं। उनमें अधिषेष को पूँजी में बदलने की प्रवृत्ति नहीं होती। उनका मुनाफा नए उत्पादन क्षेत्रों में विनियोजित नहीं होता। वह वस्तुओं के मूल्य के अंतर से और सूदखोरी से ही निष्चित मुनाफा कमाता है। मुनाफा उत्पादक पूँजी में नहीं बदलता जिससे और अधिक मुनाफा कमाया जा सके। इन अर्थों में कबीर का समय और समाज गतिहीन और जड़ था।
पूंजीवाद की विषेषता ही यह है कि वह निरंतर उत्पादन की तकनीक और मुनाफा कमाने के तरीकों में परिवर्तन करती है और इस तरह स्वयं के होने का तर्क खोजती रहती है। बिना स्वयं को परिवर्तित किए पूँजीवाद जिंदा नहीं रह सकता। सामंतवाद ने स्वयं को यथास्थिति में बनाये रखने की कोषिष में अपनी पूरी ताकत लगा रखी थी, परन्तु जैसे ही उसका सामना इस नई प्रणाली से हुआ वह स्वयं को बचा नहीं सकी। इस तरह बाहरी प्रभाव के बल से और आंतरिक अंतर्विरोधों के कारण सामंतवादी पद्धति विघटित हो गई।
मार्क्स ने प्रसिद्ध कम्युनिस्ट घोषणा पत्र में पूँजीवाद के इस चरित्र को स्पष्ट किया है - ‘‘पूँजीपति वर्ग जीवित ही नहीं रह सकता अगर वह लगातार उत्पादन के औजारों में और इसके फलस्वरूप उत्पादन के संबंधों में, और इन दोनों के साथ-साथ समाज के सारे संबंधों में क्रांतिकारी परिवर्तन न करता रहे। इसके विपरीत, उत्पादन की पुरानी पद्धति को अपरिवर्तित रूप में बनाये रखना पहले के सभी औद्योगिक वर्गों के अस्तित्व की शर्त थी। पहले के सभी युगों से पूँजीवाद को अलग करने वाले पहलू हैं: उत्पादन में निरंतर क्रांतिकारी विकास, सभी सामाजिक स्थितियों की अबाधिक उथल-पुथल, हमेषा बनी रहने वाली निष्चितत और हलचल। सभी स्थिर, जड़ीभूत संबंध मिटा दि जाते हैं, जिनके साथ पुरातन और श्रद्धामूलक पूर्वग्रहों और विष्वासों की पूरी शृंखला थी, और सभी नवनिर्मित संबंध जड़ीभूत होने के पहले ही पुराने पड़ जाते हैं। वह सब जो ठोस है, हवा में उड़ जाता है, वह सब जो पवित्र है, भ्रष्ट हो जाता है, और आखिरकार पुरुष औश्र स्त्रियाँ मजबूर हो जाती हैं कि अपने जीवन की वास्नविक परिस्थितियों को तथा अपने जैसों के साथ अपने संबंध का पूरे होषो-हवास से सामना करें।’’ (समाजवाद का सपना, पृ. 30)
मार्क्स का यह कथन सबसे महत्वपूर्ण है, उनके सभी विचारों के बरक्स। इससे बहुत सी बातें जो डॉ. अग्रवाल ने कहीं हैं, उनकी सच्चाई सामने आ जाती है। जड़ता और स्थिरता का अर्थ भी स्पष्ट हो जाता है कि क्यों सामंतवाद को जड़ या गतिहान कहा जाता है। भारतीय सांमतवाद में स्वयं को बलने के लक्षण नहीं थे और उसकी सारी ताकत स्वयं को यथास्थिति में बनाये रखने में लगी थी। कबीर के तमाम विचारों को भी हम यदि बिना किसी पूर्वग्रह के देखें तो पायेंगे कि उनमें भी इस तरह की गतिषीलता नहीं थी जो युग और समाज को आमूल-चूल बदल दे। यद्यपि उनकी सदाष्यता इसे बदलने के लिए ही प्रयत्नषील थी तथापि उसमें स्वयं को बदलने की क्षमता और प्रवृत्ति नहीं थी। यही कारण है कि वे अपनी तमाम मानवीयता और सद्भावना के कोई विषिष्ट परिवर्तन नहीं कर सके। यह भक्ति युग के सामंतीय चरित्र का वैषिष्ट्य है, जिसे हमें कोरी भावुकता से नहीं  वैज्ञानिकता और विवेक से समझना चाहिए। इससे कबीर का योगदान कम नहीं हो जाता। उन्होंने ठहरे हुए पानी में सतह पर ही सही हलचल तो पैदा की ही थी। कबीर की मूल्यवत्ता इस बात में निहित है कि वे तत्कालीन सामंतवाद की पोषक विचारधारा के झांसे में नहीं फंसे, क्योंकि मार्क्स ने यह भी कहा है कि ‘जिस वर्ग के पास भौतिक उत्पादन के साधन हैं उसका मानसिक उत्पादन के साधनों पर भी नियंत्रण होता है। जिसके पास मानसिक उत्पादन के साधन नहीं हैं उनके विचारों को दोयम श्रेणी का माना जाता।’’ (वही, पृ. 64) उत्पादन के साधनों पर नियंत्रणवाले वर्ग के नियंत्रण में कबीर नहीं थे, इसीलिए वे अपने समय से आगे थे। यही उनका मानवीय योगदान था।
व्यापार का होना मात्र पूँजीवाद का संकेतक नहीं है। हम यह नहीं कह सकते की किसी समय और समाज में व्यापार और नगर थे इसलिए वहाँ पूँजीवादी विकास के लक्षण थे। यहाँ मार्क्स के विचारों को देखना होगा -‘पुराने की जगह कौन सी नई उत्पादन पद्धति लेगी यह व्यापार पर निर्भर नहीं करता, बल्कि पुरानी उत्पादन पद्धति के चरित्र पर निर्भर करता है।’’ ( सामंतवाद से पूँजीवाद में संक्रमण, संपा. रोडली हिल्टन, पृ. 187) जब तक हम भारतीय सामंतीय उत्पादन पद्धति के चरित्र का विष्लेषण नहीं करेेंगे तब यह नहीं कह सकते कि उसमें पूँजीवादी विकास की संभावनायें मौजूद थीं। सिर्फ फतवेवाजी करके और भावनात्मक राष्ट्रीयता का उपयोग करके तथ्यों को नकारने की प्रवत्ति ठीक नहीं है।
सामंतीय समाज के नगर भी पूँजीवाद के विकास के सूचक नहीं थे। उनका चरित्र और विकास भी उत्पादन के साधनों और तकनीकों पर आधिपत्य के कारण नहीं बल्कि सामंतीय शासकों की उपभोक्तावादी जीवन शैली के कारण हुआ था। यही कारण है कि जब पूँजीवादी संबंधों का विकास भारत में 19वीं और बीसवीं सदी में हुआ तो पुराने नगरों का विनाष होने लगा और नगद लगान और भूमिपर स्वामित्व के परिवर्तन, तथा अधिषेष उत्पादन पर नियंत्रण के लक्षण वालें नए नगरों का विकास हुआ। ‘‘पूँजी और बाजार जिस पर सामंती षहरी विकास आधारित था, किसी भी अर्थ में पूँजीवादी विष्वबाजार के सीधे पूर्वज नहीं थे। (वही पृ. 187)
सामंतीय व्यापार और बाजार का चरित्र कुछ मालों तक सीमित होता है और उसमें मजदूरी भी जिंस के रूप में दी जाती है और विनिमय भी जिन्स और मुद्रा दोनों माध्यमों से होता है। अतः उसका मूल चरित्र विकासषील न होकर यथास्थितिवादी होता है।
एक तथ्य और इस संबंध में ध्यान रखना चाहिए कि सामंतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था अपने आप में स्वायत्त चरित्र वाली और मिश्रित अर्थव्यवस्था होती है। पूँजीवाद के विकास ने ग्रामों का ग्रामीणीकरण किया। इसका अर्थ यह है कि पूँजीवादी व्यवस्था में ग्राम सिर्फ कृषि उत्पादक व्यवस्था बन गई। अब ग्राम अन्य आवष्यकताओं के लिए नगरों पर आश्रित होने लगे। इसके अतिरिक्त कृषि उत्पादों का व्यवसायीकरण और वाणिज्यीकरण भी पूँजीवादी व्यवस्था की देन है। इसमें ग्राम अर्थव्यवस्था के मूल चरित्र को विघटित कर दिया। क्या इस विघटन के सूत्र कबीर के समय के ग्राम में दिखाई देते हैं? शायद नहीं क्योंकि यह परिवर्तन 18वीं और 19वीं सदी में पहली बार दिखाई दिए हैं।
कबीर आधुनिक थे या नहीं यह इस संक्षिप्त विष्लेषण के संदर्भ में समझना चाहिए। कोई भी व्यक्ति अपने समय से कितना भी आगे हो - विचार और चिंतन में, अपने समय की उत्पादन व्यवस्था को मूलतः परिवर्तित किए बिना आधुनिक नहीं हो सकता। कबीर में तत्कालीन स्वायत्त ग्राम्य व्यवस्था के चरित्र को बदलने की बैचेनी दिखाई नहीं देती। वे जागरण गीत गाते हैं, धर्म और ईष्वर के खोल को तोड़कर बाहर निकलने का प्रयत्न करते हैं, पाखंड़ों और अंधविष्वासों के शोषण से आम आदमी को सावधान करते हैं और उनकी तर्क पद्धति को कटघरे में खड़ा करते हैं। पर उनके समय के जो अन्तर्विरोध थे उनसे सीधे-सीधे टकराने का बीड़ा वे नहीं उठा सके यह उनके समय की सीमा थी।
अब तक मैंने कबीर को उस अर्थ में आधुनिक नहीं माना जिस अर्थ में डॉ. अग्रवाल ने उन्हें आधुनिक सिद्ध करने का प्रयास किया था। डॉ. अग्रवाल के विवेचन में आधुनिकता की कोई सुसंबद्ध संकल्पना ही नहीं जिससे किसी तरह की वैचारिकी पैदा हो सके।
आधुनिकता को व्यापक अर्थाें और संदर्भों में विवेचित किए बिना किसी युग या व्यक्ति को आधुनिक सिद्ध नहीं किया जा सकता। ‘आधुनिकता’, आधुनिकीकरण और आधुनिक बोध एक ही लाठी से नहीं हांके जा सकते। ‘‘जब जब पवित्र चेतना की आस्था को तार्किक चेतना के विवेक ने अपदस्थ किया है तब तब आधुनिकता की झिलमिलाहट हुई है।’’ (रमेष कुंतल मेघ, आधुनिकता, आधुनिकीकरण और आधुनिकबोध, पृ. 56) इस अर्थ में हम बुद्ध, महावीर और कबीर  को आधुनिक बोध का व्यक्ति कह सकते हैं। यहाँ आधुनिकता देषज और औपनिवेषिक के प्रपंच की बोधक नहीं है। जब हम आधुनिक को एक विषेषण मानकर चलें तो कह सकते हैं की कबीर का बोध आधुनिक था और इसलिए कबीर आधुनिक व्यक्ति थे। कबीर ने मनुष्य को अपने समय में प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया था। भूत और भविष्य के भतिव्य से निकालकर वर्तमान में मनुष्य की अर्थवत्ता को पहचानना उनके आधुनिक बोध का सबूत है। जिस युग में आस्था के स्थान पर तर्क की प्रधानता हो, आध्यात्मिकता के स्थान पर भौतिकता, धर्म और ईष्वर के स्थान पर मनुष्य की प्रतिष्ठा हो, वह युग आधुनिक कहा जा सकता है। इस अर्थ में कबीर का युग आधुनिक नहीं था। सामाजिक और राजनीतिक आधुनिकीकरण उत्पादन के साधनों में परिवर्तन और उसके चरित्र में बदलाव की अपेक्षा रखते हैं। इस संदर्भ में भारत में आधुनिकीकरण का युग राममोहन राय से प्रारंभ माना जा सकता है। आर्थिक आधुनिकीकरण का प्रारंभ नियोजित अर्थ व्यवस्था के प्रारंभ से माना जाना चाहिए और इस अर्थ में भारत अपने लक्ष्य से भटक गया है।
    

                                                  डॉ. संजीव कुमार जैन
                                              522 - आधारषिला, ईस्ट ब्लॉक एक्सटेंषन
                                                             बरखेड़ा, भोपाल, म.प्र. 462021
                                                             मो. 09826458553

31 मार्च, 2016

असंगति और विसंगति बनाम ‘अकथ'

 
डॉ. संजीव कुमार जैन
                  
                 
डॉ. पुरुषोत्तम अग्रवाल की यह पुस्तक ‘अकथ कहानी प्रेम की: कबीर की कविता और उनका समय’ हिन्दी आलोचना के क्षेत्र में एक विचित्र इतिहास रच रही है। इस पुस्तक को पढ़ने के बाद जो कि बहुत ही साहस और हिम्मत का काम था, जो मैंने किया, एक वाक्य में इस पर टिप्पणी की जाये तो इस तरह होगी ‘‘हिन्दी आलोचना के इतिहास में इससे अधिक कूढ़मगज, ढेरों असंगतियों और विसंगतियों से युक्त, अन्तर्विरोधी तथ्योें और असंगत भाषा, वाक्यों और व्याकरण से भरी कोई अन्य किताब न है और न होगी। यह असंगतियों, विसंगतियों, अन्तर्विरोधों का अजायबघर कही जाये तो अतिषयोक्ति नहीं होगी। मुझे यह आष्चर्य होता है कि इसकी प्रषंसा जो लोग कर रहे हैं वे क्यों कर रहे हैं? या तो उन्होंने इसे पढ़ा ही नहीं है और यदि पढ़कर ऐसा कर रहे हैं तो हिन्दी पाठकों के साथ गंभीर मजाक कर रहे हैं। इसके लेखक को न तो भाषा की तमीज है और न विषय की। न वाक्य संरचना की न शब्दों के इस्तेमाल की। न ‘लेखन’ की तमीज है। गद्य की समझ और पकड़ का नितांत अभाव है इसमें। इतना घटिया गद्य लिखने के बाद भी यदि वह हिन्दी आलोचना का सिरमोर बन रहा है तो सोचनीय स्थिति है हिन्दी आलोचना की। इसका शीर्षक भले ही ‘अकथ कहानी प्रेम की: कबीर का कविता और उनका समय’’ हो, परन्तु इसके केन्द्र में न कबीर की कविता है और न उनका प्रेम। यह भी एक विसंगति ही कही जायेगी की लेखक जिसे अपनी बत्तीस वर्ष के निरंतर शोध, जिज्ञासा और अध्ययन का परिणाम बता रहा है, उसमें कबीर पर परिमाण के हिसाब से भी एक चौथाई भाग नहीं लिखा गया है, उनकी कविता पर तो मुष्किल से दसवां भाग भी नहीं है। विषय की दृष्टि से देखें तो विसंगति औश्र गहरा जाती है कि लेखक ने एक भी बात ऐसी नहीं की जो कबीर पर नई सोच या शोध से संबंधित हो। बल्कि कई तो इतनी हल्की और बचकानी है, जैसे विद्यार्थी सीरीज की गाइडों में मिलती हैं। कबीर केन्द्र में नहीं हैं तो फिर क्या है इस किताब के केन्द्र मे? ठेठ भाषा में कहा जाये तो ‘शुद्ध बकवास’ के अलावा कुछ भी नहीं है इस किताब में। शुद्ध बकवास इसलिए कि लेखक ने जिस देषज आधुनिकता बनाम औपनिवेषिक आधुनिकता और ज्ञानकांड जैसे शब्दों का संजाल (अवधारणात्मक विचार या दृष्टि का नितांत अभाव है अतः शब्दों का संजाल कहा है।) बुना है और जिसके जाल में पूरा हिन्दी प्रदेष और हिन्दी के विद्वान फंस गये हैं, उसका क, ख, ग भी लेखक को नहीं पता। इसमें प्रयुक्त:आधुनिकता’ की समझ को लेखक के शब्दों में ही देखें तो उसकी समझ पर आपको तरस आयेगा। पृष्ठ 67 के तीसरे पैरा का दूसरा वाक्य ‘‘आधुनिकता के बाद ही समाज प्रबोधन की दिषा में बढ़ता है।’’ और चौथे पैरा का दूसरा वाक्य ‘‘इतिहास क्रम में प्रबोधन आधुनिकता के पीछे ही आता है।’’ सबसे पहले तो इन दोनांे वाक्यों में प्रयुक्त क्रिया को देखें और लेखक की भाषा समझ पर तरस खाने के अलावा कुछ कर नहीं सकते। ‘बढ़ता है’’ और ‘आता है’’ दोनों में वर्तमान सातत्य बोधक अनिष्चत काल की क्रिया का उपयोग किया गया है जैसे कि किसी सार्वभौमिक सत्य के बारे में लिख रहा हो। जैसे कि सूरज उगता है, वारिष के बाद बाढ़ आती है, राम खाता है, घोड़ा दौड़ता है इत्यादि। जिस आधुनिकता और प्रबोधन के संबंध में लेखक लिख रहा है वह इतिहास में स्वयं लेखक के अनुसार ही चौदहवीं-पन्द्रहवीं सदी में हो चुकीं हैं। क्या इस तरह की क्रियाओं का प्रयोग संगत है? तो क्यों हम इस किताब को पढ़कर अपना समय खराब कर रहे हैं। अब जरा लेखक की आधुनिकता और प्रबोधन की समझ की संगति के बारे में बात करलें। सबसे पहले तो मैं माननीय प्रतिष्ठित आलोचक महोदय को एक सलाह देने की हिमाकत करूंगा कि वे आधुनिकता के संबंध में कम से कम रमेष कुन्तल मेघ की पुस्तक ‘‘आधुनिकता बोध और आधुनिकीकरण’’ को गौर से पढ़ लें। यदि उसे पढ़ने का समय और क्षमता आप में न हो तो राजकमल से प्रकाषित ‘‘हिन्दी आलोचना की पारिभाषिक शब्दावली’’ में आधुनिकता और पुनर्जागरण की अवधारणा को ही पढ़ लें। इस विषय के अधिकारिक विद्वानों को पढ़ने की सलाह में नहीं दे सकता, क्योंकि उन्हें पढ़वाकर उनका अपमान नहीं करूंगा। महोदय, निवेदन है कि इतिहास का सामान्य विद्यार्थी भी यह जानता है कि ‘प्रबोधन’ (रिनँसां) पहले आया था और उसके परिणाम स्वरूप आधुनिकता का जन्म हुआ। आपने यह गाड़ी के पीछे इंजन लगा कर क्यों अपनी और अपने गुरुओं की थोड़ी बहुत बची-खुची इज्जत को सरेआम नीलाम कर दिया। आधुनिकता और प्रबोधन के संबंध में लेखक के दोनों ही कथन असंगत हैं तो इस आधार पर लिखी गई पूरी किताब में कुछ भी संगत कैसे हो सकता है? अगला वाक्य है ‘‘आधुनिक होने के पहले कोई समाज प्रबुद्ध नहीं हो सकता।’’ समाज तो आधुनिक होने के बाद भी प्रबुद्ध नहीं होता तो आप क्या कर लेंगे, जैसा कि भारतीय समाज और यूरोप का पूरा समाज आधुनिक बाद में हुआ पहले प्रबुद्ध हुआ। कैसे? यह आगे बात करेगंे। लेखक आगे लिखता है ‘‘यूरोप में आरम्भिक (आधुनिक काल, कहना चाहता है और कह दिया आरंभिक काल, इस तरह की असंगतियाँ पूरी किताब में भरी पड़ी हैं।) काल शुरू हुआ पंद्रहवीें सदी में। प्रबोधन (एनलाइनमेंट) का दौर शुरू हुआ सत्रहवीं सदी से।’’ एक ही पृष्ठ पर तीन बार लेखक उल्टी गंगा बहा रहा है और लोग उसकी तारीफ किये जा रहे हैं। आष्चर्य हो रहा है हिन्दी विद्वानों की समझ और सोच पर। इतना असंगत लिखते हुए भी यह किताब कैसे छप गई और कैसे चर्चा का विषय बनी हुई है? समझ से परे है? क्या होता जा रहा है हिन्दी के पाठकों और विद्वानों को? क्या हमने अपनी सोचने विचारने की क्षमता को बिल्कुल ही गिरवी रख दिया है या स्वनामधन्य नामवरों के आतंक से इतने आतंकित की अपनी वैचारिक क्षमता को ही खो चुके हैं। प्रबोधन का युग सबसे पहले इटली में 14 वीं सदी में प्रारंभ हुआ था। इसके बाद फ्रांस, जर्मनी और अन्य यूरोपीय देषों में प्रबोधन का प्रसार हुआ। हिन्दी आलोचना की परिभाषिक श्ब्दावली के पृष्ठ 312 पर लिखा है ‘‘14वीं शताब्दी से 16वीं शताब्दी तक के समय को यूरोप में पुनर्जागरण काल कहा जाता है।’’ आगे पृष्ठ 313 पर लिखा है कि नवजागरण की कल्पना के प्रचार का श्रेय इटली के नवजागरण के प्रथम इतिहासकार वर्कहार्ट को है, यद्यपि रिनँसां शब्द का प्रयोग सबसे पहले फ्रांसीसी इतिहासकार दार्षनिक मिषेसेट ने 19वीं सदी के पूर्वार्द्ध में किया था।’’ इसी पुस्तक में आधुनिकता के बारे में लिखा है पृष्ठ 83 पर लिखा है 6‘ आधुनिकतावाद का युग यूरोप में उन्नीसवीं सदी से शरू होकर बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध तक माना जाता है।’’ इसी पृष्ठ पर आधुनिकता को परिभाषित करते हुए लिखा है ‘‘आधुनिकता का संबंध आधुनिकीकरण के फलस्वरूप पुरातन तथा परंपरागत विचारों एवं मूल्यों, धार्मिक विष्वासों और रूढ़िगत रीति रिवाजों के विरूद्ध नवीन और वैज्ञानिक आविष्कारों, विचारों, नए मूल्यों आदि से है। ‘आधुनिकीकरण’ शब्द उन समस्त परिवर्तनों तथा प्रक्रियाओं के लिए प्रयोग किया जाता है जो पूँजीवादी अर्थव्यवस्था के अन्तर्गत औद्योगीकरण तथा यंत्रीकरण के कारण प्रकट हुई है।’’ इन दोनों उद्धरणों के आलोक में इस पुस्तक की आधुनिकता संबंधी बकवास को पढे ंतो हजारों असंगतियाँ प्रकट हो जाती हैं। आधुनिकता का पूरा इतिहास और मार्क्स सहित सभी विचारक यह मानते हैं और प्रमाणित करते हैं कि आधुनिकता का संबंध औद्योगिकीकरण से है। जबकि विद्वान् आलोचक पृष्ठ 105 पर लिखता है कि ‘‘आधुनिक विचारों और रूझानों का कार्यकारण संबंध औद्योगिकीकरण से नहीं व्यापार से है।’’ मार्क्सवादी गुरू परंपरा का यह षिष्य किसतरह मार्क्स के सिद्धांत को उलटा लटका रहा है और पूरा भारतीय मार्क्सवादी समाज उसकी प्रषंसा कर रहा है। लेखक को इतिहास का थोड़ा भी ज्ञान होता तो शायद वह यह कभी नहीं लिखता क्योंकि भारतीय व्यापार तो ईसा पूर्व की दूसरी तीसरी सदी में इससे अधिक विस्तृत था। प्लनी ने व्यापार संतुलन भारत के पक्ष में होने पर चिन्ता जताई थी और रोम को भारत से व्यापार बंद करने की सलाह दी थी। यदि व्यापार से ही आधुनिकता का संबंध होता तो भारत तो ईस्वी सन् के प्रारंभ में ही आधुनिक हो चुका होता। गुप्त युग तक व्यापार के विकास की स्थिति बहुत विकसित थी। नई सोच, आस्था पर तर्क की विजय, ईष्वर के स्थान पर मनुष्य की प्रतिष्ठा, नई भौगोलिक खोजों, नई वैज्ञानिक खोजों, नई तकनीक, नई कला, नया साहित्य। इन सबने मिलकर यूरोप को जैसे सोते से जगा दिया था। यह सब 14 वीं सदी से सोलहवीं सदी तक होता रहा। इस सबके परिणामस्वरूप उत्पादन की नई तकनीक का विस्तार और आद्योगिकीकरण ने यूरोप को आधुनिकता की ओर अग्रसर किया। इस तरह 17वीं सदी से आधुनिकता का वास्तविक प्रारंभ माना जा सकता है। यदि प्रबोधन से भी आधुनिक युग का प्रारंभ मानें तो भी प्रबोधन कारण है और आधुनिक युग कार्य। पर लेखक ने तो ठीक उल्टा ही कर दिया। इस विषय पर बहुत विस्तार से लिखने का मन है और लेखक की हजारों असंगतियाँ इस संबंध में पूरी किताब में भरी पढ़ीं हैं जिन्हें फिर कभी प्रस्तुत करूंगा। यह तो इस पुस्तक के आधार की मुख्य असंगति की ओर एक इषारा भर था। इस पुस्तक की छोटी-छोटी मगर बहुत महत्वपूर्ण असंगतियाँ और विसंगतियाँ यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ। मैं इसके पहले अध्याय की कुछ बहुत ही स्थूल असंगतियों और विसंगतियों को सप्रमाण यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ। पूरी किताब की असंगतियाँ और विसंगतियाँ लिखने के लिए इससे भी बड़ी पुस्तक लिखना पडे़गी। इस पूरी किताब की मुख्य विषेषता है जुमलेबाजी। इसमें बहुत महत्वपूर्ण अवधारणाओं को बहुत चलते ढंग से इस्तेमाल किया गया है, जैसे ‘उत्तर अधुनिकता’ आज के युग की सबसे महत्वपूर्ण अवधारणा को जितनी बार भी प्रयोग किया गया है, उतनी ही बार उसकी मूलचेतना को समझे बिना। इसी तरह ‘आधुनिकता’ और ‘ज्ञानकांड’ जैसी अवधारणाओं को जिन्होंने पूरी दुनिया का नक्षा बदल दिया, बहुत ही सरलीकृत और बिना अवधारणात्मक चेतना के प्रयोग किया है, जो बहुत ही गंभीर मसला है हिन्दी आलोचना के लिए। अध्याय एक: जो कलिनाम कबीर न होते ...’ जिज्ञासाएँ और समस्याएंँ का पहला उप अध्याय है ‘बैचेनी, जिज्ञासा और यात्रा: कबीर से मेरा नाता।’’ यहीं से असंगति और विसंगति की बात प्रारंभ की जाए। इस अध्याय का पहला ही ‘पैरा’ ‘‘कबीर के अध्ययन की समस्याएँ - भक्ति संवेदना के भारतीय सांस्कृतिक इतिहास के अध्ययन की समस्याएँ भी हैं।’’ इस वाक्य में अर्थगत असंगति है। इस एक वाक्य में तीन अलग-अलग समस्याओं को एक ही लाठी से हांकने की कोषिष की गई है जो कि असंगत है। असंगत आलोचक के लिए भी है, इसीलिए इस एक वाक्य का अर्थविस्तार पूरे अध्याय में कहीं भी नहीं है। यह एक विसंगति है कि वो कौन सी समस्यायें हैं कबीर के अध्ययन की जो भक्ति संवेदना के भारतीय सांस्कृतिक इतिहास की समस्यायें भी हैं, यह नहीं बताया गया। तीन अलग अलग तरह की चीजों की समस्यायें एक ही कैसे हो सकती हैं - (1) कबीर के अध्ययन की समस्यायें, (2) भक्ति संवेदना के अध्ययन की समस्यायें, (3) भारतीय सांस्कृतिक इतिहास के अध्ययन की समस्यायें। इसमें असंगति यह है कि कबीर एक व्यक्ति हैं उनके अध्ययन की समस्यायें बिल्कुल अलग होंगी जो ‘भक्ति संवेदना’ के अध्ययन की समस्याओं से नहीं मिल सकती, क्योंकि भक्ति संवेदना एक प्रवृत्तिपर अवधारणा है जिसका विस्तार कबीर के समय तक भी लगभग एक हजार वर्ष में फैला हुआ है। तीसरी बात है जिसे दूसरी से मिला दिया गया है, भारतीय सांस्कृतिक इतिहास के अध्ययन की समस्यायें जो न भक्ति संवेदना के अध्ययन की समस्यायें हो सकती हैं और न कबीर के अध्ययन की। पृ. 15 का दूसरा पैरा ‘‘भारत, बल्कि किसी भी गैर यूरोपीय समाज के अतीत और वर्तमान को समझने के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा है - चेतना का उपनिवेषीकरण।’’ इसमें असंगति यह है कि भारत यहाँ एक राष्ट्र के रूप में संबोधित है जबकि अन्य जगह ‘भारतीय समाज’ पद का प्रयोग किया गया है। इस स्थल पर भारतीय समाज होना चाहिए था। विसंगति यह कि यहाँ ‘गैर यूरोपीय समाज’ पद के साथ भारतीय समाज संगत होता। दूसरी विसंगति यह है कि भारत के अतीत और वर्तमान को समझना और किसी भी गैर यूरोपीय समाज को समझने की आपसी संगति बैठाने के लिए एक नहीं इस जैसी कई किताबें लिखना पढेंगी तब भी षायद संभव न हो और ‘गैर यूरोपीय समाज’ जैसा कोई समाज इस दुनिया में न था और न है। गैर यूरोपीय देष तो हैं, परन्तु समाज पद का प्रयोग इस प्रसंग में असंगत है। इस पर भी विचार करें कि जब भारत जैसे विषाल देष के विभिन्न समाजों को समझने का एक ही फार्मूला संभव नहीं है तो गैर यूरोपीय समाजों तक को इस फार्मूले में कैसे सरलीकृत किया जा सकता है। इस ‘गैर यूरोपीय’ पद का प्रयोग कई जगह किया गया है, परन्तु विसंगति यह कि कहीं भी इसे मूर्त रूप देने की या विवेचित करने की कोषिष नहीं की गई है। वह इसलिए कि ऐसा करना या होना असंभव है। अब बात करें ‘चेतना के उपनिवेषीकरण’ पद की। यह पद आगे के वाक्यों, या पैराओं से अपनी संगति नहीं बैठा पाता है। कहीं भी, किसी भी रूप में ‘चेतना के उपनिवेषीकरण को स्पष्ट करने की कोषिष लेखक ने नहीं की है। जो कि एक अच्छे गद्य की मांग के अनुरूप अगले ही वाक्य में होनी चाहिए थी। इसी पैरा का अगला वाक्य है ‘कुछ लोगों को लगता है कि अंग्रेजी राज की स्थापना से पहले का भारत धरा पर स्वर्ग समान था।’ अब इसे चेतना का उपनिवेषिकरण समझा जाये क्या? पर नहीं लेखक ऊपर की बात का स्पष्टीकरण नहीं कर रहा। यह भी एक विसंगति है जो पूरी किताब में व्याप्त है कि अधिकांषतः एक ही पैरा के सारे वाक्य अलग-अलग और आपस में असंबद्ध और असंगत होते हैं। अब इसकी अर्थगत असंगति को देखें। इस वाक्य की अर्थ ध्वनि यह है कि भारत को स्वर्ग समान मानना जैसे कोई अपराध है जो ‘कुछ लोग’ करते हैं, तो शायद यह बताना मूर्खता होगी की ऐसा अपराध ‘कुछ लोग’ नहीं ‘अधिकांष लोग’ करते हैं और इसमें हमारे सारे विचारक, दार्षनिक और सिद्धांतकार भी शामिल हैं। इस वाक्य की दूसरी अर्थ ध्वनि है कि उन ‘कुछ लोगों’ को ऐसा नहीं लगना चाहिए था। विसंगति यह है कि पूरी किताब में लेखक ने यही कोषिष की है कि ‘अंग्रेजी राज के पहले का भारत धरा पर स्वर्ग समान था यह बात सिद्ध हो जाये।’ इस बात को लेखक बार-बार ‘देषज आधुनिकता’ की अवधारणा से प्रस्तुत करता है। इसमें एक विसंगति और है वे ‘कुछ लोग’ कौन हैं? इस बारे में लेखक अन्त तक मौन है। क्यों? कारण स्पष्ट है कि वे ‘कुछ’ नहीं ‘अधिकांष’ लोग हैं जिन्हें गिनाया नहीं जा सकता। एक अन्य विसंगति यह उभर कर सामने आती है, दर असल ‘कुछ लोग’ वे हैं जिनकी चेतना का उपनिवेषिकरण हो गया है और जो भारत को स्वर्ग समान नहीं मानते हैं। यदि इस वाक्य को पहले वाक्य की संगति में पढ़ा जाये और जैसा कि गद्य की मांग होती है, पढ़ा ही जाना चाहिए तो विसंगति साफ हो जाती है कि दूसरा वाक्य पहले वाक्य के ‘चेतना के उपनिवेषीकरण’ के ठीक उलट है। इसका तीसरा वाक्य - ‘हमारी हर समस्या विदेषियों की देन है।’ इसे दूसरे वाक्य के ‘कुछ लोगों को लगता है’ के साथ ही पढ़ा जायेगा। अब यदि ये वे ही ‘कुछ लोग है’ जिन्हें भारत धरा पर स्वर्ग समान लगता था, तो जाहिर कि हमारी हर समस्या विदेषियों की देन, ऐसा मानना या लगना जायज है, परन्तु लेखक पहली बात के विपक्ष में है और दूसरी बात के पक्ष में, क्योंकि अगले ही वाक्य में इसकी विसंगति उभर कर सामने आ जाती है। जिसमें स्वयं के लिए समस्यायें पैदा न कर पाने की सामर्थ्य के अभाव की बात कही गई है। चौथा वाक्य इस किताब का सबसे अधिक असंगत वाक्य है। ध्यान से पढें़ इस वाक्य को ‘‘दूसरे शब्दों में, अपनी समस्यायें हल तो हम क्या करेंगे, इतनी भी सामर्थ्य परमात्मा ने भारतीयों को नहीं दी है कि अपने लिए कुछ समस्यों खुद भी पैदा कर सकें।’’ दुनिया में ऐसा कौन सा विचारक या व्यक्ति होगा जो परमात्मा से स्वयं अपने लिए स्वयं ही समस्यायें पैदा करने की सामर्थ्य देने की मांग करेगा? कोई स्वयं के लिए खुद ही समस्याएं पैदा करेगा? यह वाक्य अपने आप में दुनिया का सबसे असंगत वाक्य कहा जायेगा। फिर है! विदेषी आत्मन् (पुरुषोत्म अग्रवाल जी) भारतीय परमात्मा समस्यायें हल करने की सामर्थ्य देने की तो सोच सकता है, समस्यायें पैदा करने की नहीं। इस वाक्य की शब्दगत असंगतियों को देखें - पहली असंगति यह कि यह वाक्य जिन शब्दों - ‘दूसरे शब्दों में,’ से प्रारंभ होता है, जिसका अर्थ है कि यह वाक्य ऊपर कही गई बात को ही स्पष्ट करेगा, परन्तु दुर्भाग्य से ऐसा होता नहीं है, क्योंकि इसमें भारतीयों में समस्यायें हल करने की सामर्थ्य तो है नहीं, समस्यायें पैदा करने की सामर्थ्य भी परमात्मा ने नहीं दी (अर्थात् भारतीय नपुंसक हैं जो कुछ भी नहीं कर सकते, इसमें स्वयं पुरुषोत्तम अग्रवाल और उनके स्वनाम धन्य गुरु भी शामिल हैं) यह कहा गया है जिसका ऊपर के वाक्यों से कोई संबंध नहीं है। दूसरी असंगति यह कि ‘सामर्थ्य’ शब्द का प्रयोग समस्यायें पैदा कर सकने के लिए किया गया है जो कि एकदम असंगत है। सामर्थ्य समस्यायें हल करने की हो सकती या हल करने की नहीं हो सकती, परन्तु समस्यायें पैदा करने की सामर्थ्य न! बा बा! न! किसी भी भाषा में संभव नहीं, सिर्फ पुरुषोत्तम अग्रवाल को छोड़कर। एक अन्य असंगति यह है कि यह अन्तिम वाक्य विदेषियों की तरफ से कहा गया है, क्योंकि इसमें ‘भारतीयों को नहीं दी’ कहा है जिसका सीधा सा अर्थ है कि कोई बाहरी व्यक्ति यह बात कह रहा है। वह कौन है? इसका प्रमाण देना आवष्यक नहीं समझा गया और ऐसा सभी स्थलों पर हुआ है। विसंगति यह है कि जिस वाक्य के स्पष्टीकरण के रूप में यह वाक्य आया है उसमें ‘कुछ लोग’ भारतीय हैं न कि बाहरी। इसके अलावा इस वाक्य में एक और असंगति है, वह यह कि इसकी अर्थ ध्वनि यह है कि स्वयं अपने लिए समस्यायें पैदा कर सकने की सामर्थ्य का न होना कोई खेदजनक बात है, जो भारतीयों के पास नहीं है और विदेषी जो न केवल स्वयं के लिए बल्कि हम भारतीयों के लिए भी समस्यायें पैदा करते रहे हैं यह बहुत ही नेक काम हो। इस किताब के इस दूसरे ही पैरा में ‘पाठगत’ असंगति भी देखी जा सकती है कि पैरा जिस बात से प्रारंभ हुआ, अन्त होते होते बात बिल्कुल ही बदल गई। यह असंगति इसी पैरा में हो ऐसा नहीं है, यह पूरी किताब की खास विषेषता है। गद्य की थोड़ी भी समझ रखने वाले हम जैसे लोग भी यह बात जानते हैं कि एक पैरा में पहला वाक्य जो बात कहता है और आगे के सारे वाक्य लगभग उसी से संबद्ध बातें कहते हैं या उसकी व्याख्या करते हैं, या स्पष्टीकरण करते हैं, या प्रमाणित करते हैं, परन्तु इस किताब में ऐसा नहीं हुआ, जो गद्य की विडंबनात्मक विसंगति ही कही जायेगी। पृष्ठ 16 के पैरा तीन का दूसरा वाक्य ‘गहराई के साथ ‘गुजरना’। इस वाक्य में असंगति यह है कि गहराई के साथ ‘जुड़ना’ शब्द अधिक संगत है ‘गुजरना’ नहीं। पैरा चार की तीसरी पंक्ति में ‘निरन्तर चलती आ रही’ में ‘चलती’ षब्द असंगत है। इसके स्थान पर ‘चली आ रही’ होना चाहिए। ‘ती’ प्रत्यय अनिष्चित वर्तमान का द्योतक है और ‘रही’ सतत् भूतकाल का दोनों एक साथ कालगत असंगतता की प्रतीक हैं। इसी पृष्ठ का पांचवां पैरा इस तरह प्रारंभ होता है ‘‘दस वर्ष बीत चले। सन् निन्यानवें के दिसम्बर में बनारस में नवलदास जी से भेंट हुई थी।’ इन दो वाक्य में पहला वाक्य इस पूरे प्रसंग में कोई अर्थ नहीं रखता और उसकी टोन भी गद्य के अनुकूल नहीं है। किस बात के लिए दस वर्ष बीत चले इसका कोई सुसंगत संदर्भ नहीं है। अगले वाक्य में जब आप ‘सन्’ शब्द का उल्लेख कर रहे हैं और इसके पहले किसी तरह के काल का कोई संदर्भ नहीं है तो यह वाक्य असंगत है। दूसरी असंगति यह है कि पृष्ठ 18 के पहले पैरा में लिखा है कि ‘‘एकेडमिक ढंग से कबीर का अध्ययन शुरु किए बीस बरस हो चुके थे, जब नवलदास जी से मिला था।’’ इसके बाद का वाक्य है ‘‘दस बरस और बीत चुके।’’ पहले का ‘दस वर्ष बीत चले’ ‘और बीत चुके’ में बदल गया। अब इन दोनों वाक्यों की संगति बैठाने की कोषिष कीजिए? इस सन् निन्यानवें को आप भूमिका के ठीक बत्तीस बरस हो चुके हैं दिल्ली आये और इसके पहले लिखा है कि बत्तीस बरस हो चुके कबीर पर टर्म पेपर लिखे हुए। इन दानों बत्तीस बरस की असंगति इस बात में है कि लेखक ने ग्वालियर से दिल्ली आकर जेएनयू से एम. ए. किया और 1985 में कबीर पर पीएच.डी. की थी। अब आप इन तिथियों की संगति बिठायेंगे तो आपको कबीर के जन्म की तिथि से अधिक मेहनत करनी होगी और लगभग सभी तिथियाँ एक दूसरे को गलत सिद्ध कर देंगी। यह बहुत बड़ी विसंगति है कि एक नामधारी आलोचक नामघारी आलोचकों की अनुषंसा और आषीर्वाद के तले इस तरह की आलोचनायें लिखे और पूरा हिन्दी प्रदेष उसकी तारीफ में ताली बजाये। अब हम अपने मूल पैरा की अन्य असंगतियों को देखें - ‘सन् निन्यानवें के दिसम्बर में’ यह वाक्य आपको हिन्दी की प्रकृति के कितने अनुकल लग रहा है? जरा ध्यान से सोचें कि आपने किसी आलोचनात्मक गद्य की पुस्तक या लेख में इस तरह का वाक्य कहीं कभी पढ़ा या सुना है? शायद नहीं। भाषा की दृष्टि से दाल में कंकड़ की तरह खटकता है और अर्थ की दृष्टि में ‘सन् निन्यानवें’ का कोई मतलब इस प्रसंग में नहीं है। इस पूरे संदर्भ में आप सन् के स्थान पर ‘उन्नीस सौ’ लिखते तो सुन्दर और संगत होता दूसरी बात इस सन् लिखने की कोई बहुत अधिक आवष्यकता नहीं है। आप निन्यानवें में मिले या 2000 में, दिसम्बर में मिले या मार्च में इससे कोई फर्क इस विष्लेषण पर पढ़ने वाला नहीं है। आप मिले और इस शोध पर क्या फर्क पड़ा यह महत्वपूर्ण है, जो आगे के विवेचन में उपलब्ध नहीं है। नवलदास जी ने कबीर की अकथ कहानी के बारे में क्या जानकारी दी? यह ज्यादा महत्वपूर्ण है यदि दी हो तो! क्योंकि आगे आपने जो उनकी मुलाकात का विष्लेषण किया है वह भी विषय विवेचन की दृष्टि और तर्कसंगतता की दृष्टि से असंगत है। आपने नवलदास जी की जो विषेषता प्रतिपादित की है जरा उसकी संगति और औचित्य को भी देख लिया जाये। इसी पैरा के तीसरे चौथे वाक्य में आपने लिखा ‘‘संस्कृत और अंग्रेजी दोनों से अनभिज्ञ होने के कारण, हिन्दी भी बस पढ़ ही सकने के कारण, ‘पढ़े’ लिखे लोगों के मुहावरे में नवलदास ‘अनपढ़’ कहे जायेंगे।’’ सबसे पहले तो आप स्वयं उनकी इस ‘अनपढ़ता’ को बता कर स्वयं अपने पर ही व्यंग्य कर रहे हैं, क्योंकि आप ही वह पढ़े लिखे हैं जो उनके बारे में इस तरह की बात लिख रहे हैं, जैसे उनकी जीवनी लिख रहे हों। सामान्य षिष्टाचार भी यह कहता है कि आप किसी से मिलें तो उसके बारे में उसकी योग्यतायें और अच्छाइयाँ ही बखान करें बषर्तें उनकी जीवनी न लिख रहे हों और फिर कबीर जैसे व्यक्ति पर शोध के संबंध में आप जिस व्यक्ति से मिल रहे हैं, वह अनपढ़ होगा यह आपकी विद्वता ही कह सकती है, अन्य किसी की सामान्य बुद्धि तो नहीं। श्री नवलदास जी अनपढ़ हैं या नहीं पर जिस वाक्य से आपने उनको अनपढ़ सिद्ध किया है, उस वाक्य से आपका ‘पढ़क्कूपन’ अवष्य सिद्ध हो रहा है? जरा देखें इस वाक्य में आये आये इस उप वाक्य को ‘‘हिन्दी भी बस पढ़ ही सकने के कारण’ यह वाक्य किसी हिन्दी पढ़े लिखे का तो नहीं ही लगता। खास तौर से ‘पढ़ ही सकने’ पद पर ध्यान दीजिये और इसकी संगतता पर गौर कीजिए। इसमें आये ‘भी’, ‘बस’, ‘ही’ ‘सकना’ इतने सारे सामर्थ्य और अनिवार्यता बोधक शब्दों का इस्तेमाल आपको किसी अन्य उपवाक्य में नहीं मिलेगा। दूसरी असंगति पूरे वाक्य में यह है कि ‘होने के कारण, हो सकने के कारण,’ दो बार एक ही तरह के सामर्थ्य बोधक शब्दों का प्रयोग भी असंगत है। इस वाक्य को इस तरह लिखा जाता तो कुछ संगत होता ‘‘संस्कृत और अंग्रेजी से अनभिज्ञ होने और थोड़ी बहुत हिन्दी जानने के कारण आप अनपढ़ कहे जा सकते हैं।’’ आगे उनसे मुलाकात का विवरण दिया है कि नवलदास द्वारा कबीर बानी की व्याख्या सुनकर लेखक को एकाएक लगा, ‘‘अरे! ये तो वैसी ही बातें कर रहे हैं, जैसी मुझे बचपन में सूझा करतीं थीं।’’ इसकी असंगति यह है कि लेखक को नवलदास से मिलकर आत्मबोध हुआ जबकि लेखक उनसे मिला (संभवतः) कबीर के बारे में जानने के लिए था। दूसरी बात यह है कि लेखक को नवलदास की अध्यात्म की बातें बचपन में ही सूझ चुकीं थीं। इससे दो बातें सिद्ध हो रहीं हैं एक तो लेखक बचपन से ही आत्मज्ञानी किस्म के संत रहे हैं, क्योंकि जिस तरह की बातें आपने आगे लिखीं वह किसी आत्मज्ञानी और पहुँचे हुए संत को ही सूझ सकती हैं, प्रोफेसर को नहीं और फिर बचपन में...............? आगे लिखा है कि ‘‘उन दिनों (मतलब बचपन में) जब सहजबोध तरह -तरह के शास्त्र ज्ञान और विमर्षों से आच्छादित नहीं हुआ था।’’ पहली असंगति यह कि बचपन में किसका ‘सहजबोध’ शास्त्रज्ञान और विमर्षाें से आच्छादित होता है, पता नहीं? दूसरी असंगति यह कि सहजबोध कहते ही उसे हैं जो बिना किसी कृत्रिम साधन के उत्पन्न होता है। जो शास्त्र ज्ञान और विमर्षाें से आता है वह सहजबोध होता ही नहीं है। ‘उन दिनों,...(मतलब बचपन में लेखक को इतनी गहरी दार्षनिक अनुभूति होती है)....‘‘जो कुछ है, भीतर या बाहर, संसार भर में, सब एक अखण्ड का ही पसारा है। इस अनादि अनन्त जगत के परे कौन परमात्मा हो सकता है? कहाँ हो सकता है?’’ इस पूरे ‘शब्द समूह’ (वाक्य तो मैं कह नहीं सकता) को जरा गौर से पढें तो बहुत सारी असंगतियाँ एक साथ दिखाई देंगी। ‘भीतर या बाहर’ में ‘या’ नहीं ‘और’ होना चाहिए, क्योंकि आगे ‘संसार भर’ में लिखा है। जब भीतर या (और) बाहर लिख दिया तो ‘संसार भर’ में लिखने की आवष्यकता नहीं है, क्योंकि लेखक अपने आत्मबोध के बारे में बात कर रहा है। ‘भीतर या बाहर’ और ‘संसार भर’ में एक साथ एकदम असंगत हैं। अब आगे के शब्द समूह पर विचार करें ‘‘इस अनादि अनन्त जगत के परे कौन परमात्मा हो सकता है? कहाँ हो सकता है?’’ इसमें जो दो प्रष्नसूचक शब्द और प्रष्नवाचक चिहृ दिये हैं, इनकी संगति को गौर से देखें। पहला प्रष्न जो अर्थ ध्वनि दे रहा दूसरा ठीक उससे उल्टी। पहले प्रष्न से ऐसा महसूस हो रहा है कि लेखक यह कह रहा है कि इस अनादि अनन्त जगत से परे कोई परमात्मा नहीं हो सकता? ‘कौन परमात्मा हो सकता है?’ का यही अर्थ है कि कोई नहीं हो सकता। दूसरा प्रष्नवाचक वाक्य कह रहा है यदि वह इस अनादि अनन्त जगत से परे है तो कहाँ रहता है? ये कौन और कहाँ के बीच की दूरी का ज्ञान न होना हिन्दी गद्य को विसंगतिपूर्ण बना रहा है। अन्य विसंगति यह कि इतने दार्षनिक प्रष्न लेखक को ‘उन दिनों’ यानि बचपन में उठ रहे थे और इसकी अनुभति नवलदास से मिलकर हुई। खैर, आगे बढें, नवलदास का यह प्रसंग दो तीन पैराग्राफों तक चलता है, परन्तु इनमें कोई भी ऐसी बात नहीं है जिससे कबीर के बारे में कोई जानकारी लेखक को मिली हो। संगत प्रष्न यह उठाया जाना चाहिए इस असंगति के बीच से कि भई आखिर आप दस बर्ष बीत चले पर’ नवलदास जी से क्यों मिले थे? पृष्ठ 17 का दूसरा पैरा इस तरह प्रारंभ होता है ‘‘भगत नवलदास बता रहे थे-मैं उनकी बानी को अपने शब्दों में ढाल रहा था - सर्वव्यापी, अखंड चेतन का बोध मनुष्यमात्र का जन्मजात बोध है।’’ इस वाक्य को सुनकर आपको गणेष जी कि वह कथा याद नहीं आई जिसमें एक ऋषि बोलते हैं और गणेष जी ग्रंथ लिखते हैं। मजेदार बात यह है कि अब तक लेखक अपने बचपन से बाहर नहीं आया बल्कि जन्म के समय तक पहुँच गया। ‘सर्वव्यापी, अखंड चेतन का बोध मनुष्यमात्र का जन्मजात बोध है।’’ अगर ऐसा बोध जन्मजात होता जैसा की लेखक को लगता है तो कम से कम लेखक को तो मोक्ष हो जाना चाहिए था। विसंगति यह कि इसके पहले के पैरा में जो सहजबोध था वह जन्मजात बोध में बदल गया। ‘सहजबोध और जन्मजातबोध के बीच का ‘बोध’ (अन्तर) लेने के लिए लेखक को जेएनयू छोड़कर मेरे कस्बे में आना चाहिए। मजाक देखिए कि यह ‘जन्मजात बोध’ अगले ही पैरा में ‘सहजात बोध’ और इसकी अगली ही पंक्ति में ‘सहज समता बोध’ में बदल जाता है। इसी पैरा की पहली पंक्ति में ‘ऐसा ही सहजात बोध है, मनुष्य मात्र की ‘समता’ का’ यहाँ ‘समता’ की संगति पर विचार कीजिए। दरअसल लेखक को ‘समता’ और ‘समानता’ शब्दों के बीच की असमानता का ज्ञान नहीं है जो आष्चर्यजनक है। यहाँ लेखक समानता के अर्थ में समता शब्द का उपयोग कर रहा है। यह एक विसंगति ही कही जायेगी कि लेखक को इस तरह के शब्दों के बीच के फर्क का पता नहीं है। पृष्ठ 18 के दूसरे पैरा में एक पद आया है ‘‘विनम्रता नहीं जुटा सकते?’’ विनम्रता जुटाई नहीं जाती दिखाई जाती है, आलोचक महोदय। इसी पृष्ठ का तीसरा पैरा देखें - ‘‘कबीर समाज पर टिप्पणी करने वाले कवि थे,’’ इसमें आये ‘टिप्पणी’ शब्द की संगति को कबीर द्वारा समाज की की गई तीखी आलोचना के संदर्भ में देखें। आलोचक ने कबीर की पूरी ‘धार’ को सामान्य पत्रकार या अधिकारी की (‘टीप’) ‘टिप्पणी’ में बदल दिया। यदि भारत भूमि पर कबीर भी समाज पर सिर्फ ‘टिप्पणी’ करने वाले कहे जायेंगे तो कबीर का पैदा होना ही व्यर्थ हो जायेगा और इन जैसे घटिया लोग कबीर को रसातल में ले जाकर दफनाने में संलग्न हैं। इसके आगे का वाक्य कबीर की पूरी ‘ऐसी की तैसी’ करके रख देता है। यह वाक्य कॉमा के बाद प्रारंभ होता है ‘‘जो रचनाकार समाज के बारे में कुछ नहीं कहते, उनकी रचनायें भी उनके समाज के बारे में कुछ बताती हैं।’’ कितना बढ़िया कॉम्प्लीमेंट लेखक ने कबीर को दिया है! कि जो रचनाकार (लेखक जैसे) समाज के बारे में कुछ नहीं कहते, जब उनकी रचनायें भी समाज के बारे में कुछ न कुछ कहती हैं तो महाषय (कबीर) आपने समाज पर टिप्पणी करके कौन सा तीर मार लिया। विसंगति यह है कि लेखक के आसपास ही ऐसे रचनाकार होंगे जो रचनाकार तो हैं, परन्तु वे समाज के बारे में कुछ नहीं कहते! फिर वे किसके बारे में कहकर रचनाकार हैं, भगवान ही जाने! या लेखक! इस पैरा की एक असंगति तो यह है कि इसमें ‘समाज’ शब्द सात बार आया है और जब वास्तविक समाज शब्द की आवष्यकता हुई तो वहाँ ‘समय’ शब्द आ गया। समाज की जगह ‘समय’ कितना संगत है आप विचार कर सकते हैं और समय के साथ ‘सुन रहा है’ क्रिया का उपयोग ‘उत्सुकता’ और ‘सम्मान’ जैसे विषेषणों के साथ किया गया है जो समाज के साथ ही संगत हैं, समय के साथ नहीं। महत्वपूर्ण विसंगति और लेखकीय समझ की विडंबना इस वाक्य में स्पष्ट होती है ‘‘जिस समाज की वे आलोचना कर रहे हैं, वह क्या वक्त की बर्फ में जमा हुआ समाज लगता है?’’ भाई साहब! वक्त की बर्फ मंें जमा हुआ समाज नहीं होता तो कबीर आलोचना नहीं, प्रषंसा करते। कबीर आलोचना कर ही इसलिए रहे हैं कि वह समाज ‘जड़’ हो चुका था, सोया हुआ था, तभी तो उन्होंने जागरण गीत गाये हैं। सैकड़ों साखियाँ और पद कबीर ने समाज को जगाने के लिए, सावधान करने के लिए गाये हैं। ‘‘सुखिया सब संसार है खावै अरु सौवे। दुखिया दास कबीर है जागे और रोवे।’’ क्या जाग्रत समाज के लिए कहा जायेगा? लेखक महोदय के पास इसके प्रमाण न हों तो मैं साखियों और पदों को छांटकर भेज सकता हूँ। और भारतीय चिन्तन के इतिहास लेखकों के हजारों प्रमाण दे सकता हूँ जो उस युग को यथास्थितिवादी और जड़ सिद्ध करते हैं, और वे सही करते हैं क्योंकि इतिहास और समाज का थोड़ा सा भी ज्ञान रखने वाले जानते हैं कि मध्यकाल के सामंतीय जीवनमूल्य यथास्थितिवादी ही होते हैं। इस पैरा का प्रारंभ समाज पर टिप्पणी को लेकर हुआ बीच में फिर प्रष्न उठाया कि क्या बताती है कबीर की कविता उनके समाज के बारे मे?’ इसके बाद कबीर ने जो बताया है, वह लेखक को पता नहीं इसलिए बात बदल दी और समय कैसा है इस पर बात करने लगा। इस प्रसंग को विष्लेषित करना चाहिए था, नहीं किया। यह इस पूरी किताब की विषेषता (दुर्गुण, घटिया गद्य का उदाहरण) है, जो कि अधिकांष पैराग्राफों में दिखाई देती है। जिस बात को लेकर बात प्रारंभ होती है, उसे अन्त में या बीच में ही बिना कोई संगत विष्लेषण, विवेचन किए छोड़ दिया जाता है। पृष्ठ 21 का पैरा चार ‘‘कबीर का निधन ‘देर से देर’ 1518 ईस्वी में माना गया है।’’ इसमें प्रयुक्त ‘देर से देर’ पद की संगति पर विचार कीजिए इसके प्रयोग की असंगति स्पष्ट हो जायेगी। देर से देर क्या होता है? पृष्ठ 22 का पहला पैरा ‘‘इन ‘आधुनिक’ आकलनों के विपरीत’’ के इस वाक्य की संगति ‘‘इन’’ शब्द की संगति में निहित है और ‘‘इन’’ शब्द की संगति इसके पहले अगर आधुनिक आकलनों को प्रस्तुत किया गया हो तो उससे जुड़ी है। विसंगति यह है कि इसके पहले या बाद में किसी भी तरह के ‘आधुनिक आकलनों’ को प्रस्तुत नहीं किया गया है तो इस वाक्य की असंगति अपने आप स्पष्ट हो जाती है। पृष्ठ 22 के पांचवे पैरा की छह पंक्तियों को दो वाक्यों में विभाजित किया गया है। ये दोनों वाक्य एक दूसरे से विपरीत विचारों को प्रस्तुत करते हैं, जबकि लेखक ने इन्हें एक दूसरे के पूरक के रूप में प्रस्तुत किया है। पहले वाक्य में कहा गया है कि ‘‘औपनिवेषिक आधुनिकता में रची-बसी खोज दृष्टि कबीर के समाज की लोक स्मृति को ही नहीं, स्वयं कबीर को भी ऐसी कृपा दृष्टि से देखती है जिसे कबीर अबोध बच्चे से नजर आते हैं, जो अपने घर का पता तक ठीक से नहीं बता पाता।’’ इसमें औपनिवेषिक आधुनिकता मे रची बसी दृष्टि (किसकी है यह बताने की कृपा पूरी पुस्तक में कहीं भी नहीं है, यह लेखक के दिमाग का फितूर भी हो सकता है) कबीर को बच्चा मानती है। इसके बाद दूसरा वाक्य देखिए और इन दोनों की संगति बिठाने की कोषिष कीजिए- ‘‘देखिए न, असल में तो वे थे - ईसाई मिषनरी के पूर्व पुरुष (कौन? संभवतः कबीर, क्योंकि ऊपर कबीर के बारे में ही बात हो रही। अब इस पूर्व पुरुष का अर्थ निकालिये।) शरा या बेषरा सूफी, (कौन? कबीर, कैसे यह आप लेखक या उनके परमपिताओं से पूछ सकते हैं।) महायानी बौद्ध, नाथ पंथी या आजीवक, लेकिन समझते थे खुद को नारदी भक्ति में मगन,’’ इसका अर्थ है कबीर जो खुद को नारदी भक्ति में मगन समझते थे, वह गलत समझते थे, क्योंकि वे तो ईसाई मिषनरियों के पूर्व पुरुष, शरा या बेषरा सूफी, महायानी बौद्ध, नाथपंथी या आजीवक थे। इनमें से भी दरअसल क्या थे? यह लेखक को भी नहीं मालूम। लेखक को यह भी नहीं मालूम की आजीवक सम्प्रदाय कबीर या उनसे बहुत पहले से ही अस्तित्व में नहीं था और ईसाई मिषनरी सबसे पहले अकबर के दरबार में आये थे तो उनके पूर्व पुरुष वे कैसे हो सकते हैं? क्या तुक है इन असंगत बातों को कबीर के साथ जोड़ने की और वास्तविक विसंगति यह है कि इनका ऊपर के पहले वाक्य से क्या लेना-देना है जिसमें उन्हें बच्चा कहा गया है। यदि बच्चा मानने की सोच औपनिवेषिक है तो ईसाई मिषनरी के गुरु मानने की सोच क्या देषज है? पृष्ठ 23 के पहले पैरा में - ‘‘कुछ लोगों की साजिषों’’ और ‘‘बाकी लोगों के बुद्धुपन’’ जैसे पदों का इस्तेमाल हुआ है। क्या लेखक बताने का कष्ट करेगा कि वे कौन लोग हैं जिन्होंने साजिषें कीं? नहीं, वह यह कष्ट कर ही नहीं सकता, क्योकि वह डरपौंक है, यही कारण है की पूरी किताब में इसी तरह के - ‘कुछ लोगों’ - जुमलों का प्रयोग किया गया है, न तो किसी की तथ्यात्मक जानकारी दी गई है और न उन साजिषों का पर्दाफाष किया गया है, जिनके बारे में लिख रहा है। दूसरी बात यह कि ‘‘बाकी लागों के बुद्धुपन’ में बाकी लोग कौन हैं, और इस बांकी में स्वयं लेखक भी शामिल नहीं है क्या? और उनके गुरु नामवर जी और उनके गुरु डॉ. रामविलास शर्मा जी, उनके गुरु डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी जी, और उनके गुरु क्षितिमोहन जी और पूरे हिन्दी साहित्य के गुरु श्री रामचंद्र जी शुक्ल षामिल नहीं हैं क्या? और अगर नहीं हैं तो ‘बांकी लोग’ जैसा असंगत पद क्यों लिखा। और लिखा है तो क्या इनके बुद्धुपन को सिद्ध कर सकता है लेखक? उसमें साहस और हिम्मत है इनके बुद्धुपन और लोगों की साजिषों का पर्दाफाष करने की? शायद नहीं, क्योंकि वह न तो साजिषों को जानता है और न बुद्धुपन को वह तो अपने असंगत विवरणों की रौ में बस यूँ लिख गया है। इस पैरा की अन्य विसंगतियाँ और असंगतियाँ देखिए - ‘‘कुछ लोगों की साजिषों’’ और ‘बांकी के बुद्धुपन’’ को औपनिवेषिक आधुनिकता और उत्तर आधुनिकता की कृपा ने भारतीय सांस्कृतिक अनुभव की ऐतिहासिक व्याख्या के बीज शब्दों के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया है।’’ अब यह औपनिवेषिक आधुनिकता और उत्तर आधुनिकता की कृपा क्या है? कोई जबाव नहीं है। प्रसंग बस जहाँ तक मेरा अध्ययन है कबीर पर उत्तर आधुनिक विचारदृष्टि से किसी भी लेखक या विचारक ने अभी तक विचार नहीं किया है। दूसरी बात भारतीय आलोचना के विकास में जितने भी प्रतिष्ठित विचारक आलोचक हुए हैं उन सबने एक स्वर से कबीर को अपने समय का सबसे आधुनिक व्यक्ति सिद्ध किया है, माना है और वे थे भी। ‘औपनिवेषिक आधुनिकता’ पद का सैकड़ों बार उपयोग करने के बावजूद लेखक ने कहीं भी इसकी व्याख्या करने की कोषिष नहीं की है, और न यह बताने की कोषिष की है कि इस औपनिवेषिक आधुनिकता के कृपापात्र लेखक या आलोचक कौन हैं जिन्होंने कबीर को आधुनिक नहीं माना। जरा इस ‘बीज शब्द’ पर ध्यान दीजिए। किसको ‘बीज शब्द’ के रूप में प्रतिष्ठित किया है जबाव है ‘‘कुछ लोगों की साजिषों’’ और ‘बांकी के बुद्धुपन’’ को। हिन्दी आलोचना के विकास और इतिहास में कहीं भी इस तरह के बीज शब्दों का उपयोग नहीं हुआ है सिवाय लेखक की इस किताब के। अब जरा इस पदबंध पर ध्यान दीजिये ‘‘भारतीय सांस्कृतिक अनुभव की ऐतिहासिक व्याख्या’’ किसकी? बीज शब्द के जबाव में यह पदबंध है। क्या होती है यह भारतीय सांस्कृतिक अनुभव की ऐतिहासिक व्याख्या? कोई बतायेगा जिसके बीज शब्द ‘‘कुछ लोगों की साजिषों’’ ‘बांकी के बुद्धुपन’’ जैस शब्द हैं। कहाँ की गई है इस तरह की व्याख्या? किसने की है इस तरह की व्याख्या? इनके जबाव संभवतः लेखक की अगली किताब में मिल जायेंगे! भगवान करे वह कभी न आये। अध्याय एक का तीसरा भाग: आधुनिकता: देशज बनाम औपनिवेशिक यह पूरा अध्याय जो कि दस पृष्ठों में लिखा गया है को एक सुसंगत पाठ के रूप में पढ़ने की कोशिश व्यर्थ प्रयास में तब्दील हो जाती है। इसमें वर्णित विषय को पकड़ने की कोशिश मैंने की, जो निष्कर्ष सामने आया उसे जरा ध्यान से देखें - इसके पहले पैरा में कुछ (वकौल लेखक) ‘सांस्कृतिक घटनाओ’ का उल्लेख है। दूसरे पैरा में कुछ बेतुके और असंबद्ध प्रश्न किए गये हैं। तीसरे पैरा में इमेनुएल वार्लस्टाइन का उद्धरण है जिसकी कोई संगति नहीं है। चौथे और पांचवे में भविष्य और अतीत की कुछ बेतरतीब बातें करते हुए पेन्डुलम धर्म पर बात समाप्त होती है। छटवें पैरा में कविता कैसे पढ़ी जाए से बात प्रारंभ की गई है और अन्त तक देशकाल के बारे में प्रामाणिक निष्कर्षांे तक पहुँचने की बात लेखक करने लगता है। सातवें पैरा में इतिहाकार और समाजशास्त्री आ गए और दैनन्दिन व्यवहारों के स्रोतों की बात करते हुए लेखक आठवें पैरा में ब्राह्मण वर्चस्व की बात को औपनिवेशक सांठगांठ बताते हुए अन्त में ब्राह्मण वर्चस्व को समझने की बात करने लगता है। इसके बाद नवें पैरा से बारहवें पैरा तक तुलसी और उनके कलिकाल वर्णन की बात आ जाती है। इसी संदर्भ में वह वर्णव्यवस्था को मिलने वाली चुनौती की बात उस रचनाकार के अभिलेखों से करता है जो ब्राह्मणवाद और वर्णाश्रम व्यवस्था का सबसे बड़ा पोषक रहा है। तेरहवें पैरा (पृ.30) में वह देशभाषाओं की प्रतिष्ठा की बात करते है। चौदहवें पैरा में जाकर लेखक को याद आता है कि मैंने इस अध्याय का नाम आधुनिकता: देशज बनाम औपनिवेशिक रखा है। देश भाषाओं की सहस्राब्दी में यूरोपीय और गैर यूरोपीय समाज अपने अपने ढंग से आधुनिकता की ओर बढ़ रहे थे।’’ यहाँ से लेखक ने एक नया विमर्श खड़ा करने की कोशिश की है। वह ‘आधुनिकता’ को लेकर है और पूरी पुस्तक में उसने सैकड़ों बार देशज आधुनिकता को प्रतिष्ठित करने और औपनिवेशिक आधुनिकता को अपदस्थ करने की कोशिश की है। दरअसल इस पुस्तक का केन्द्र ‘कबीर की अकथ कहानी प्रेम की’ की जगह यह देशज और औपनिवेशिक आधुनिकता हैं। यह भी एक विसंगति है। यह विमर्श यदि ठीक तरह से सही संदर्भ में उठाया जाये तो वाकई हम सही निष्कर्षों तक पहुँच सकते हैं, परन्तु लेखक हर बार कहीं से भी इसका सिरा पकड़ लेता है और कहीं भी किसी भी मुद्दे पर जाकर छोड़ देता है और फिर यही कार्य करता है। इस पैरा का अन्त भी कबीर को हाशिए की आवाज मानना ऐसी ही भूल है पर समाप्त होता है। प्रारंभ आधुनिकता से किया समाप्त किसी और निष्कर्ष से। इसके बाद का पन्द्रहवां पैरा पिछले पैरे की पूँछ पकड़ कर प्रारंभ होता है ‘‘हाशिए पर ही रहे होते तो..... से और दूसरे ही वाक्य में इस बात को छोड़ दिया जाता है और बीच में तुलसी, राजसत्ता को फालतू मानना जैसे जुमले सामाजिक गतिशीलता और नई जातियों के बनने की बात से पैरा समाप्त होता है। अगला पैरा भी वर्णाश्रम के सैद्धांतिक ढांचे से प्रारंभ होता है और सामप्त होता राज सत्ता और सामाजिक व्यवहारों की बात पर जाकर। इसके बाद के पैरा में अंग्रेजी राज के पहले भारत में पॉलिटिकल इकॉनॉमी की बात प्रारंभ करते हैं। अंत में धर्मशास्त्र के अर्थशास्त्रीकरण की बात पर बात समाप्त करते हैं। अगला पैरा इसी आर्ष पद से प्रारंभ होता है ‘धर्मशास्त्र के अर्थशास्त्रीकरण’ के इस काल में’ यहाँ से वैष्णव सोच की बात करने लगते हैं जो आगे दो तीन पैरा तक चलती है। इस तरह पूरा अध्याय विचित्र और अन्तर्विरोधी बातों से भरा है। कहीं कोई संगति नहीं है इसके बीच। सबसे बड़ी विसंगति यह है कि दो पैराओं के बीच तो कोई तालमेल ढूँढ़ना बेमानी है ही अधिकतर एक ही पैरा में कई कई तरह की अलग-अलग बातें लेखक लिखता रहा। इन सारे पैराओं को ध्यान से पढ़ा जाये तो हजारो विसंगतियाँ - भाषा, पद, वाक्य, अर्थ और संगति की मिलेंगी। कुछ की बानगियाँ यहाँ पेश हैं। इसका प्रारंभ जिस पैरा से होता है उसका पहला वाक्य है ‘‘कबीर और रामानन्द ईसा की पन्द्रहवीं-सोलहवीं सदी में सक्रिय थे।’’ इस ‘सक्रिय थे’ क्रिया को ध्यान से पढें तो ऐसा लगता है मानो कोई गुंडे या असामाजिक तत्वों के सक्रिय होने की बात कही जा रही हो। जैसे दक्षिण के चन्दन वनों में वीरप्पन सक्रिय था या चम्बल के बीहड़ों में फूलनदेवी सक्रिय थी, या कश्मीर में आतंकवादी सक्रिय थे। ‘सक्रिय थे’ क्रिया पद किसी भी रचनाकार या कवि या लेखक के बारे में प्रयुक्त किया जाना भाषायी असंगति का ही प्रमाण है। इसके बाद इस पैरा की दस पंक्तियों में नौ वाक्य हैं जिनका आपस में कोई तालमेल दिखाई नहीं देता। सिर्फ कुछ नाम और सन् गिनाये गये हैं जो किसी भी (उच्चस्तरीय?) समीक्षा पुस्तक या आलोचना के लिए संगत नहीं लगता। इसमें छटवां वाक्य है ‘‘इसके पहले वल्लभाचार्य, दादू, और चैतन्य के सम्प्रदाय स्थापित हो चुके थे।’’ इसमें जो ‘इसके पहले’ पद है, वह असंगत ह,ै क्योंकि इसके पहले वाले वाक्य में कहा गया है कि ‘‘धर्मदास ने कबीरपंथ की स्थापना सत्रहवीं सदी के आरंभ में की थी।’’ अतः ‘इसके पहले’ पद का अर्थ धर्मदास के कबीरपंथ की स्थापना के पहले हुआ जो कालक्रम की दृष्टि से असंगत है और वल्लभाचार्य, दादू और चैतन्य का क्रम भी गलत है। यहाँ ‘इसके पहले’ के स्थान पर होना चाहिये ‘इनके पहले’। विसंगति यह है कि सुधी आलोचक को इसके और इनके का फर्क नहीं पता। इसी पैरा का दूसरा वाक्य है ‘‘1582 में ‘पद सूरदास जी का’ नामक संकलन तैयार किया गया।’’ और अन्तिम वाक्य है ‘‘पद सूरदासजी का में सूरदास के ही नहीं नामदेव और कबीर के पर भी हैं।’’ ये दोनों वाक्य एक साथ लिखे जाते तो ज्यादा संगत होते। इसे इस तरह लिखा जाता - ‘‘सन् 1582 में ‘पद सूरदासजी का’ नामक संकलन तैयार हुआ जिसमें सूरदास के अलावा नामदेव और कबीर के पद भी हैं।’’ सुसंगत वाक्य रचना हिन्दी के महान् आलोचक से अनुमोदित पुस्तक में न हो तो यह बहुत बड़ी विसंगति ही कही जायेगी। अब पृ. 27 के तीसरे पैरा को पढें -इसमें तीन वाक्य हैं, जो प्रश्नवाचक हैं, पहला प्रश्नवाचक वाक्य है ‘‘पन्द्रहवीं, सोलहवीं, और सत्रहवीं सदियों में घट रही उपर्युक्त सांस्कृतिक घटनाओं का सामाजिक-आर्थिक और राजनैतिक परिवेश से कोई संबंध था या नहीं?’’ सबसे पहले ‘सांस्कृतिक घटनाओं’ की संगति पर विचार कर लें। इसके पहले पैरा जिसकी चर्चा हमने ऊपर की है उसमें कौन सी सांस्कृतिक घटना हैं जो घटी? कबीर और रामानन्द का सक्रिय होना या ग्रंथों के संकलन तैयार होना, या परचईयों की रचना होना? चलो मानलें की ये साहित्यिक कार्य थे इस लिए सांस्कृतिक कार्य भी हो सकते हैं, परन्तु इन्हें सांस्कृतिक ‘घटनायें’ कहना भाषा और समझ की असंगति ही कही जायेगी। भक्ति ओदालन सांस्कृतिक घटना थी, सूफी आंदोलन सांस्कृतिक घटना थी। मगर कबीर या रामानन्द का सक्रिय होना सांकृतिक घटना नहीं ‘सांस्कृतिक क्रियाषीलता’ का उदाहरण हैं। क्रियाषीलता और घटना के बीच के अन्तर को न समझना एक विसंगति ही कही जायेगी। इस वाक्य गठन की संगति पर विचार करें - ‘‘से कोई संबंध था या नहीं?’’ पूछा जा रहा है तो (गद्य की मांग है और प्रष्न पूछने के तरीके के की भी कि) इसका उत्तर अगले ही वाक्य में मिलना चाहिए, परन्तु ऐसा नहीं हुआ और उत्तर नहीं देना था तो वाक्य संरचना इस प्रकार होनी चाहिए ‘से कोई संबंध था?’ यह संगत वाक्य है, लेखक द्वारा लिखा गया वाक्य असंगत है। दूसरा प्रष्नवाचक वाक्य ‘‘उस परिवेष के स्वरूप को समझे बिना क्या इन घटनाओं का सामाजिक अर्थ और ऐतिहासिक महत्व समझा जा सकता है?’’ इसमें ‘उस परिवेष’ की संगति खोजिए और ऊपर के वाक्य से तालमेल करने की कोषिष कीजिए? पहले वाक्य में बात ‘सांस्कृतिक घटनाओं’ की हो रही थी और परिवेष से उसके संबंध के बारे में पूछा जा रहा था, संगति इसमें थी की ‘इन घटनाओं’ से संबंधित कोई नया प्रष्न किया जाता, लेखक चाह तो ऐसा ही रहा है, परन्तु हो ठीक उल्टा रहा है। अब वह परिवेष के स्वरूप को समझने की बात कहने लगा। विवेच्य विषय की संगति की दृष्टि से इन दोनों वाक्यों की विसंगतियों को देखा जा सकता है। विवेच्य ‘सांस्कृतिक घटनायें’ हैं या ‘परिवेष’? यह निष्चित कर पाना लेखक के लिए असंभव है, क्योंकि यह बात इस पूरी पुस्तक में पसरी (पसारा है) हुई है। लेखक बात कुछ प्रारंभ करता है और आगे बढ़ते ही कोई बिल्कुल अलग बात कहने लगता है और पहली बात की संगति बैठाने का ध्यान उसे नहीं रहता। लगभग प्रत्येक पृष्ठपर यह विसंगति देखी जा सकती है। तीसरा प्रष्न भी देखें और उसकी संगति बिठाने की कोषिष (कष्ट) करें ‘‘इन घटनाओं की तर्कसंगत व्याख्या किए बिना उस ऐतिहासिक परिवेष को तर्कसंगत ढंग से ‘पढा’ जा सकता है?’’ पहले प्रष्न में सांस्कृतिक घटनाओं का परिवेष से संबंध बिठा कर तर्कसंगत व्याख्या करने की सोची गई होगी दूसरे में उसी परिवेष के स्वरूप को समझ कर इन घटनाओं का महत्व समझने की सोची गई अब तीसरे प्रष्न में बात इन घटनाओं से परिवेष की तर्कसंगत व्याख्या की आ गई। कैसे कारण कार्य को कार्य कारण में बदला गया इसकी संगति आलोचक और उनके समर्थक ही बैठा पाने में समर्थ हो सकेंगे? एक और असंगति देखें पहले प्रष्न में सामाजिक-आर्थिक, राजनैतिक परिवेष’ की बात है तीसरे प्रष्न में ‘उस ऐतिहासिक’ में ‘उस’ पद से उपर्युक्त परिवेष है जो ‘ऐतिहासिक’ में बदल गया। कैसे? क्यों? स्वनामधन्य लोग ही बता सकते हैं? अगला वाक्य देखें इसी (पृष्ठ से) ‘‘सवाल इतिहास से भी जुड़े हैं, वर्तमान और भविष्य से भी’’ वर्तमान और भविष्य के साथ ‘अतीत’ या ‘भूत’ शब्द की संगति ही ठीक है ‘इतिहास’ की नहीं और दो क्या एक बार भी ‘भी’ की आवष्यकता नहीं है। सुसंगत वाक्य ‘‘सवाल भूत, वर्तमान और भविष्य से जुड़े हैं’’ यह है इसके ठीक बाद में आलोचक महोदय ने ‘इमेनुएल वार्लस्टाइन’ की पुस्तक से ए¬क उद्धरण प्रस्तुत किया है। क्यों किया है? उसका विवेच्य विषय और संदर्भ से क्या नाता है? वर्णित सांस्कृतिक घटनाओं से उसकी क्या संगति है? या तो लेखक जानता होगा या उसके भगवान। यह एक ऐसी विसंगति है जो इस पूरी पुस्तक में दिखाई देती है। इसी तरह के जो अन्य उद्धरण दिए गए हैं उनकी कोई भी संगति अलोचक उस संदर्भ से नहीं बिठा पाया है, बस यों ही थेगड़े की तरह चिपका दिए गए हैं। पृष्ठ 28 के पहले पैरा का पहला वाक्य ‘‘विधाता ने इतिहास को किसी पूर्वनिर्धारित मार्ग पर चलाकर उस मार्ग का नक्षा कुछ चुनिन्दा लोगों के कान में नहीं फँूक दिया है।’’ सबसे पहले इस वाक्य के औचित्य पर विचार कीजिए। क्या अर्थ है इस वाक्य का इस पुस्तक और इस संदर्भ में? क्यों लिखा गया है यह वाक्य? क्या संगति है इसके पहले आये उद्धरण से इस की? दूसरे आलोचक को शायद नहीं पता की नक्षा या तो बनाया जाता है या दिखाया जाता है कान में नहीं फूँका जा सकता। नक्षा दिमाग में भी बनाया जा सकता है, परन्तु कान में फूँकने का प्रयोग विद्वान् आलोचक ही कर सकते हैं। इस वाक्य के गठन के औचित्य पर भी विचार किया जा सकता है। ‘चलाकर’ और ‘दिया है’ जैसे क्रिया पदों की संगति हिन्दी भाषा में तो नहीं बैठ सकती। कबीर पर लिखी जा रही इस किताब में एक विसंगति यह है कि इसमें कबीर पर जब भी लेखक कुछ कहने की सोचता है उसे कोई न कोई दूसरी बात याद आ जाती है और वह उसी वाक्य में उस दूसरी बात के बारे में कहने लगता है कबीर को वहीं छोड़ देता है, जैसे पृष्ठ 28 पर ही ‘‘कबीर को ही नहीं, समूचे भारतीय अनुभव’ ‘कबीर हों या कोई और कवि’ इस वाक्य में ‘और’ शब्द की संगति पर विचार कीजिए। महोदय ‘और’ नहीं ‘अन्य’ शब्द ज्यादा सुसंगत है। इसके पहले 26 पेज पर दूसरे पैरा का प्रारंभ यों करते हैं ‘‘कबीर ही नहीं भारतीय इतिहास लेखन मात्र के प्रसंग में’’ पृष्ठ 34 के अन्तिम पैरा में ‘कबीर के ही नहीं, अन्य प्रसंगों में भी’ पृष्ठ 38 का अन्तिम पैरा ‘यह अकेले कबीर का नहीं, मानवीय चैतन्य मात्र का’ पृष्ठ 39 का अन्तिम पैरा ‘कबीर और दूसरे निर्गुण संतों के स्वप्न’ प्रत्येक जगह कबीर अन्य की तरह ही प्रयुक्त हुए हैं मुख्य की तरह नहीं। पृष्ठ 28 के तीसरे पैरा को पढें और भूलभुलैया की तरह अर्थ का द्वार खोजें, शायद आपको मिल जाये? पहला वाक्य है ‘‘आवष्यक है कि कविता को बतौर कविता के, संवदेनषीलता और सम्मान के साथ पढ़ा जाये।’’ इस वाक्य के प्रारंभ का जो तरीका है उससे इस वाक्य का संबंध ठीक इसके ऊपर वाले वाक्य या संदर्भ से होना चाहिए। विसंगति यह है कि इस तीसरे भाग में जिसका एक हिस्सा यह पैरा है कविता को लेकर कोई भी बात नहीं कही गई है जिससे इसका संबंध बिठाया जा सके। नई बात कहने के लिए नया पैरा किस तरह प्रारंभ किया जाना चाहिए यह भी अगर मुझे बताना पढे़गा तो फिर आलोचक को जेएनयू छोड़कर मेरे कॉलेज में दाखिला ले लेना चाहिए। इसकी अर्थ संगति पर विचार करें। भई! कविता को बतौर कविता ही पढ़ा जाता है, बतौर इतिहास या राजनीति या दर्षन के नहीं, इसमें आवष्यक है जैसी कोई बात नहीं है, मैने आज तक कवि को सम्मान पूर्वक पढ़ा या सुना जाने की बात सुनी है कविता को नहीं, कविता को संवेदना के साथ पढ़े जाने की आवष्यकता को मैं स्वीकार कर सकता हूँ। कविता के संदर्भ में सम्मान शब्द असंगत है उसकी जगह संवेदना होना चाहिए। ‘साहित्य समाज का दर्पण है’ यह मुहावरा सौ साल पुराना हो कर घिस गया है, आज के विखण्डनवादी युग में कविता के बारे में यह कहना कि ‘‘सामाजिक गतिषीलता के बारे में जानने-समझने के लिए भी कविता को पढ़ना चाहिए’’ यह कह कर आलोचक कौन सा तीर मार रहा है? और अगर 21 वीं सदी की आलोचना इसी बिन्दु पर अटकी है तो क्या कहने हिन्दी आलोचना के विकास के और क्या कहने इन स्वनाम धन्य आलोचकों की आलोचनात्मक वृत्ति के? इस पैरा का अगला वाक्य पढ़ें और विचारें की आपकी समझ में क्या आया - ‘‘कबीर हों या कोई ‘और’ (‘और’ की जगह ‘अन्य’ शब्द सुसंगत है) कवि - उन्हें ‘इतिहास की अदालत’ में अपने मुकदमे के गवाह के तौर पर बरतने भर से कविता के प्रति संवेदनहीनता तो प्रकट होती ही है, इतिहास लेखन की अपनी भी हानि होती है।’’ इस इतिहास की अदालत से मुझे कमलेष्वर का ‘कितने पाकिस्तान’ की अदालत याद आ गई। क्या लेख का आषय इसी अदालत से है? यदि हाँ तो उससे जितनी संवेदनषीलता पैदा हुई उतनी किसी अन्य से नहीं और यदि नही ंतो कौन सी इतिहास की अदालत और कौन सा अपना मुकदमा और कौन से गवाह? और कवि को इतिहास की आदलत में खड़ा कर भी दिया तो इतिहास लेखन की अपनी हानि कैसे संभव है? आपने ही ऊपर कहा कि सामाजिक गतिषीलता को जानने के लिए कविता को पढ़ना चाहिए तो कबीर के समय की सामाजिक गतिषीलता और इतिहास लेखन में कैसे अन्तर करेंगे? ‘इतिहास’ सामाजिक गतिषीलता से ही बनता है महोदय! तो उसकी हानि कैसे होगी?। इस अध्याय में देष भाषा स्रोतों की बात बार-बार की गई है, परन्तु विसंगति यह है कि कहीं भी देषभाषा स्रोतों का कोई विवरण या प्रमाण नहीं दिया गया है। कौन से हैं वे देषभाषा स्रोत? कब लिखे गए किसके बारे में बात करते हैं, किस युग के बारे में? कोई भी प्रमाणिक तथ्य नहीं रखा गया। इसके अतिरिक्त ‘औपनिवेषिक आधुनिकता’ या औपनिवेषिक ज्ञानकांड’ पद का भी कई बार प्रयोग किया गया है। इस अध्याय में कहीं भी आधुनिकता को परिभाषित या विवेचित करने का प्रयास नहीं किया। सिर्फ जुमलों की तरह इन शब्दों को इस्तेमाल किया गया है। इसी तरह ‘राजसत्ता का फालतूपन’ पद भी कई बार प्रयोग किया गया है। न तो लेखक ने यह बताया कि किसने यह बात कही और न यह बताया कि क्यों कही, उसके बारे में किसी तरह की कोई ठोस और प्रमाणिक जानकारी इसमें नहीं है जबकि कई बार इस पद का प्रयोग विचित्र संदर्भों में किया गया है और कई बार तो विरोधी संदर्भों में भी प्रयोग किया है। इसी तरह ‘धर्मषास्त्र का अर्थशास्त्रीकरण’ का प्रयोग कई बार किया है क्या है इसका मतलब बताने की या कोई प्रमाणिक तथ्य पेष करने की कोषिष लेखक ने नहीं की है। ये जुमले किन्हीं स्रोतों (संभवतः विदेषी) से लेकर ज्ञान का आतंक जमाने के लिए प्रयोग किए गये हैं। पृष्ठ 31 के दूसरे पैरा के इन वाक्यों को पढ़ें और कुछ संगतिपूर्ण अर्थ खोजने की कोषिष करें तो आपको लगेगा कि सागर से अमृत निकालना तो आसान है पर इन वाक्यों से अर्थ निकालना मुष्किल। इस पैरा और इसके पहले के पैरा में लेखक दो बातें कह रहा है कि वर्णाश्रमपरक चिन्तन, राजसत्ता और धर्मषास्त्र ईसा की आठवीं सदी से लौकिक व्यवहार को वरीयता दे रहे थे। दूसरी उसे चिन्ता है कि कहीं ‘शास्त्रों’ का अपमान न हो जाये तो वह पीछे से लगा देता है कि इन लौकिक व्यवहारों को शास्त्रसम्मत सिद्ध करने के प्रयत्न करना भी उस समय की शास्त्री चिन्ता थीं इसके बीच में राजसत्ता और अर्थषास्त्र भी घुस गए हैं। ‘‘ईसा की आठवीं सदी के बाद से तो धर्मषास्त्रीय चिन्तन की मुख्य चिन्ता ही राजसत्ता की व्यावहारिक महत्ता को सैद्धांतिक रूप से ‘‘शास्त्र सम्मत’’ भी सिद्ध करने की हो जाती है।’’ इस पैरा की अर्थगत संगति पर बाद में विचार करेंगे पहले इसके तथ्यों की संगति को देख लें। ‘आठवीं सदी के बाद से’ लेखक शायद नहीं जानता की सारे के ‘धर्मशास्त्र’ लगभग आठवीं सदी के पहले ही लिखे जा चुके थे। हाँ उन पर टीकायें इस युग में हो रहीं थीं। शंकराचार्य के ष्षास्त्र अवष्य इसी समय में सामने आये, परन्तु उनकी संगति इस कथन के मूल अर्थ से ठीक विपरीत है, शंकराचार्य का पूरा दर्षन सामंतीय मूल्यों यानि जड़ता और यथास्थिति को बनाये रखने की दिषा में सक्रिय था। जो कि लेखक की मूल चिन्ता धर्मषास्त्र को व्यावहारिक सिद्ध करने के विपरीत हैं। दूसरी बात यह कि सारे धर्मषास्त्र सदियों से यही करते रहे हैं जो लेखक ने लिखा है ‘‘धर्मषास्त्रीय चिन्तन की मुख्य चिन्ता ही राजसत्ता की व्यावहारिक महत्ता को सैद्धांतिक रूप से ‘‘शास्त्र सम्मत’’ भी सिद्ध करने की हो जाती है।’’ मनुस्मृति से लेकर याज्ञवलक्य स्मृति तक और पुराणों ने यही कार्य किया है, इसमें ऐसी कोई बात नहीं जो आठवीं सदी में घटित हो रही हो। असंगति इस बात में है इसके लिए लेखक ने इसी पैरा के अन्तिम वाक्य में जो प्रमाण दिया है वह भी कौटिल्य के अर्थशास्त्र का है शंकर की त्रयी का नहीं कौटिल्य का अर्थशास्त्र कब लिखा गया था यह बताने की आवष्यकता नहीं है। दूसरी बात की कौटिल्य का अर्थशास्त्र ‘धर्मषास्त्र’ नहीं है। इस किताब की एक महत्वपूर्ण असंगति इस बात में है कि इसमें तथ्यों के संदर्भों और प्रमाण देने की कोषिष नहीं की गई है। पहले ही अध्याय में लेखक कई ऐसी बातें करता है जिन्हें बिना प्रमाण के लिखना ‘अषोधपरक’ दृष्टिकोण ही कहा जायेगा। इस अध्याय के अन्त में जो 19 संदर्भ दिए गए हैं, वे सब के सब इस तरह के हैं जो सिर्फ सूचना देने वाली जानकारियों को प्रमाणित करते हैं, किसी भी विचारधारा और विष्लेषण या अवधारणाओं को प्रमाणित करने के लिए कोई भी प्रमाण न देना ही आपके बीस वर्ष से निरंतर शोध करते रहने पर प्रष्नचिहृ लगाता है। इस एक अध्याय में ही विषय और अवधारणाओं संबंधी असंगतियाँ और विसंगतियाँ पंक्ति दर पंक्ति भरी पड़ी हैं। कोई भी तथ्य और कथन न तो किसी विचारधारा का अंग बन पाता है और न कोई संगत बात प्रस्तुत कर पाता है। इसकी विषय और अवधारणागत असंगतियों पर अलग से लिखने पर ही स्पष्ट कर सकूँगा। मेरा निवेदन इतना भर है कि ज्ञान और आलोचना के इन मठों और गढ़ों को हिन्दी जगत कब तोड़ेगा? कब हम स्वयं को आतंक और छोटेपन की हीन भावना से मुक्त करेंगे? 00

डॉ. संजीव कुमार जैन
522 आधारषिला, ईस्ट ब्लाक 
बरखेड़ा भोपाल  462021