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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल
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07 फ़रवरी, 2017

संजय जोठे जी का एक लेख सत्य, सत्याग्रह, शूद्र, दलित और भारतीय नैतिकता

मित्रो आज पढ़ते हैं संजय जोठे जी का एक लेख        ......                 सत्य, सत्याग्रह, शूद्र, दलित और भारतीय नैतिकता

संजय जोठे ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतरराष्ट्रीय विकास में परास्नातक हैं, वर्तमान में TISS मुम्बई से पीएचडी कर रहे हैं। फोर्ड फाउंडेशन इंटरनेशनल फेलो हैं और लीड इंडिया फेलो हैं।  मध्यप्रदेेश के भोपाल में निवास करते हैं।  सामाजिक विकास के मुद्दों सहित पर पिछले 14 वर्षों से विभिन्न संस्थाओं के साथ कार्यरत है। ज्योतिबा फुले पर इनकी एक किताब प्रकाशित हो चुकी है और एक अन्य किताब प्रकाशनाधीन है। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं और ब्लॉग्स में भारतीय अध्यात्म और समाज सेवा/कार्य सहित सांस्कृतिक विमर्श के  मुद्दों पर शोध आधारित लेखन में संलग्न हैं।

सामाजिक राजनीतिक आन्दोलनों में एक लंबे समय से “आत्मपीड़क सत्याग्रह” प्रचलन में बने हुए हैं. ऐसे भूख हड़ताल, उपोषण, आमरण अनशन जैसे तरीकों से समाज के एक बड़े वर्ग को झकझोरने में सफलता भी मिलती आई है. ये तकनीकें और “टूल” सफल भी रहे हैं और उनकी सफलताओं से जन्मी असफलताओं को हमने खूब भोगा भी है. पूना पैक्ट की प्रष्ठभूमि में किया गया आमरण अनशन, या भारत की आजादी की रात फैले दुनिया के सबसे बड़े धार्मिक दंगे को शांत करने के लिए किया गया अनशन हो या पूर्वी पश्चिमी पाकिस्तान की तरफ बलात भेजे जा रहे अल्पसंख्यकों की चिंता से उभरा अनशन की धमकी हो, गांधी जी ने अनेकों अवसरों पर अनशन और उपोषण को एक नैतिक उपाय या उपकरण की तरह इस्तेमाल किया है और उनके सदपरिणामों और दुष्परिणामों ने मिलकर ही उस समाज की रचना की है जिसमे बैठकर हम इन पंक्तियों को लिख या पढ़ रहे हैं.

निश्चित ही साधन शुद्धि की बात करने वाले गांधीजी का आग्रह जिसे वे “सत्याग्रह” कहते रहे थे, एक शक्तिशाली रचना थी जिसमे समाज की “प्रचलित नैतिकता” को सम्मोहित करने और झकझोर देने की बड़ी ताकत थी. एक “अधनंगे हिन्दू संत” की छवि गढ़ने में उन्होंने जो सचेतन निवेश किया था जिसकी सफलता ने उन्हें एक ख़ास उंचाई तक पहुँचाया था, उस उंचाई पर साधन की शुद्धता की बहस में साध्य की शुद्धता की बहस को एकदम से विमर्ष से गायब कर देने में सफल हो सके थे. हालाँकि डॉ. अंबेडकर जैसे लोगों ने साध्य की शुद्धता पर साधन, साध्य और शुद्धता जैसे शब्दों की महिमा को अस्वीकार करते हुए बड़े तार्किक प्रहार किये थे लेकिन उन प्रहारों का असर उतना नहीं हुआ जितना होना चाहिए था. ये असर हो भी नहीं सकता था, और ये विवशता आज भी जस की तस बनी हुई है. या कहें कि ये विवशता अब कहीं अधिक बढ़ गयी है, आज धर्मप्रेम, राष्ट्रप्रेम, राष्ट्रभक्ति और राष्ट्रवाद की परिभाषाएं जिस अर्थ में बदली हैं और ‘गांधी के रामराज्य’ पर ‘रामराज्यवादियों का गांधी’ जिस तरह हावी हो चुका है उस हालत में अब साधन या साध्य शुद्धि की बहस में अब गांधी खुद भी आ जाएँ तो वे भी निराश होकर लौट जायेंगे.

सत्याग्रह का यह सत्य और ये साधन शुद्धि क्या है? आइये इसमें प्रवेश करते हैं. गांधीजी जिस ढंग की नैतिकता और शुचिता को समाज मनोविज्ञान के बदलाव के एक उपकरण की तरह इस्तेमाल करते हैं वह एक ख़ास तरह की प्रष्ठभूमि से आती है. असल में वे शुद्ध साधन से शुद्ध साध्य तक नहीं पहुँच रहे हैं बल्कि शुद्ध साध्य की अपनी विशिष्ट कल्पना से किसी शुद्ध साधन को ‘बेक प्रोजेक्शन’ की तरह निर्मित कर रहे हैं. सरल भाषा में कहें तो वे पहले एक अहिंसक, नैतिक, धर्मप्राण, हिन्दू अर्थ के रामराज्य की कल्पना करते हैं और उसे साकार करने के लिए जो भी करणीय है उसे “शुद्ध साधन” की तरह प्रचारित और प्रयोग करने लगते हैं. ऐसे प्रयासों को वे धर्म, अहिंसा मोक्ष और नैतिकता की इबारत में ऐसे बांधते हैं कि साधन शुद्धि ही एकमात्र बहस बन जाती है. और बहुत सावधानी से साध्य की शुद्धि की कोई बहस उभरने ही नहीं दी जाती. वे साध्य को बिना शर्त शुद्ध और सर्वहितकारी मानकर ही चलते हैं. इसमें सर्व और हित की उनकी अपनी विशिष्ट परिभाषाएं भी शामिल हैं जिनके निर्माण और संशोधनों का अधिकार उन्ही के पास सुरक्षित होता है. विनोबा या कन्हैयालाल मुंशी जैसे पट्टशिष्य तक उस परिभाषा में कोई बदलाव नहीं कर सकते.

सर्वोदय की कल्पना उन्होंने जिस विचार के साथ जोड़ी वह भी जानने योग्य है. रस्किन बांड से गांधी जी खासे प्रभावित थे, उन्ही की एक पुस्तक का गांधीजी ने गुजराती में ‘सर्वोदय’ के नाम से अनुवाद किया था. उनके लिए सर्वोदय का अर्थ था सबका उदय, या कहें सबका विकास, अब इस सर्वोदय को वे जिस रूप में पेश करते हैं उस अर्थ में सर्वोदय भारत का पुराना आदर्श है रहा है जिसमे भारत के उपनिषदों और धर्मशास्त्रों के पवित्र वाक्य “सर्वे भवन्तु सुखिनः” ‘सर्व खल्विदं ब्रह्म’, ‘वसुधैव कुटुंबकम’, अथवा ‘सोऽहम्‌’ और ‘तत्त्वमसि’ आदि शामिल हैं. हालाँकि हम देख चुके हैं कि इस देश में जिस दौर में इन महावाक्यों की महिमा अपने शिखर पर थी उसी दौर में मानवता के खिलाफ सबसे बड़े षड्यंत्र इसी देश में इन्ही महावाक्यों को जपने वाले लोगों ने रचे थे. सर्वं खल्विदं ब्रह्मम हो या सर्वे भवन्तु सुखिनः हो उसमे इस्तेमाल किया गया यह शब्द “सर्व” असल में कुछ ख़ास “टर्म्स एक कंडीशंस” के साथ ‘अप्लाय’ होता था. इस सर्व में शूद्र और अतिशूद्रों सहित स्वयं सवर्ण द्विजों की स्त्रीयां भी शामिल न थीं. ऐसे महावाक्यों के सर्जकों के दौर में समाज में भी इन नैतिक मूल्यों का जनमानस में कोई प्रभाव नहीं हुआ था, छुआछूत, स्त्री दमन, शिक्षा से वंचित करना आदि धर्माग्यायें मजे से चलती रही. ऐसे में आज हम यह कल्पना करें कि वे ही पुराने नैतिक मूल्य हमारे समाज में यूरोपीय अर्थ के लोकतंत्र, समाजवाद और ‘सर्वोदय’ को आज संभव बना सकते हैं तो शायद हम गलत उम्मीद कर रहे हैं.

अब हमारे लिए यह जानना भी जरूरी है कि ऐसे साध्य और उससे जन्मे ये साधन आते कहाँ से हैं? ये एक ख़ास तरह के धर्मदर्शन और तात्विक मान्यता से आते हैं जो व्यक्ति, व्यक्तित्व, समाज, धर्म, जीवन और जीवन के आत्यंतिक लक्ष्यों सहित इन लक्ष्यों के सन्दर्भ में व्यक्तियों के करणीय को एक विशेष रंग में रंगता है. इन रंगों को उभारने वाले सारे साधन “शुद्ध” हैं और इन रंगों को चनौती देने वाले या इनसे “तार्किक कंट्रास्ट” पैदा करने वाले साधन “अशुद्ध” हैं. उदाहरण के लिए किसी भी समाज की प्रचलित नैतिकता में एक संत या परोपकारी व्यक्ति का भूख से मर जाना पूरे समाज के लिए एक भारी बदनामी और चिंता का विषय बन जाता है. वहीं एक अज्ञात व्यक्ति का भूख से मर जाना किसी को दुखी नहीं करता या एक अपराधी, राष्ट्रद्रोही, या धर्मनिन्द्क सिद्ध कर दिए गये व्यक्ति को भूखों मार देना पूरे समाज को खुश भी कर सकता है.

सत्याग्रह के सत्य की अगर बात करें तो वह भी बड़ा खतरनाक है. भारतीय वैदिक धारणा या उपनिषदिक धारणा में सत्य एक ऐसा फिक्स्ड पॉइंट है जिसके बारे में सैधांतिक रूप से (कथनी में) यह बात फैलाई गयी है कि इस “एक” सत्य की तरफ अनंत रास्ते जा सकते हैं और जिसकी अनंत व्याख्याएं हो सकती हैं. असल में यह एक परमात्मा की धारणा का ही विस्तार है. लेकिन व्यवहार में (करनी) में देखें तो इस तथाकथित सत्य तक पहुँचने के लिए अनंत मार्ग नहीं हैं मार्ग एक ही है और उस पर चलने वाले चुनिन्दा लोग भी विशेष परमिट लेकर ही चलते आये हैं. उस मार्ग में नास्तिक, अनीश्वरवादी, वेदविरोधी या विधर्मी को चलने का कोई अधिकार नहीं है. हाँ ये अलग बात है कि इन श्रेणियों से आने वाले बुद्ध, महावीर, गोरख और कबीर जैसे लोगों ने वैदिक, औपनिषदिक या हिन्दू परिभाषाओं कि चिंता न करते हुए इतनी महिमा प्रदर्शित की कि बाद के वैदिकों हिन्दुओं ने इन व्यक्तियों को भी अपनी सनातन षड्यंत्रकारी “सर्वसमावेशी” खोल में निगल लिया. इस तरह ऊपर ऊपर दिखता है कि ये सर्वसमावेशी खोल सबको सत्यान्वेषण की एक सी सुविधा या अनुमति देती है लेकिन हकीकत में ये होता नहीं है.

अब मूल मुद्दे पर आते हुए अगर हम देखें कि इस मुल्क में सत्य, नैतिकता और आग्रह की ये परिभाषाएं हैं तो “सत्याग्रह” का क्या अर्थ और परिणाम हो सकता है? सत्य की परिभाषा और लोकमानस में उसकी स्वीकृति एक ख़ास रंग में रंगी हुई है. एक आस्तिक धर्मभीरु और रुढ़िवादी अर्थ का सत्य ही हमारे लोकमानस में स्वीकृत है. आजकल इस धर्मभीरुता के गर्भ से जन्मा राष्ट्रवाद और देशप्रेम इस एक ख़ास किस्म की नैतिकता को आकार दे रहा है जिसमे न केवल राजनीतिक सामाजिक शुचिता की परिभाषाएं तेजी से बदल रही हैं बल्कि स्वयं नैतिकता कि परिभाषा भी अब बड़े अनैतिक अर्थों में होने लगी है.

अब मूल रूप से प्रश्न ये है कि आजकल सामाजिक राजनीतिक कार्यकर्ताओं और मुक्तिकामियों में जिस तरह से सत्याग्रह प्रचलित हो रहा है उसे किस नजर से देखा जाये? उसकी सफलता असफलता सहित उसकी व्यावहारिकता और अव्यावहारिकता को किस ढंग से देखा जाए? क्या ये कार्यकर्ता ये मानकर चल रहे हैं कि समाज इतना नैतिक है कि उनके भूखे रहने पर उसे तकलीफ होगी? क्या वे ये मानकर चल रहे हैं कि उन्होंने गांधी या विनोबा की तरह अधनंगे फकीर की छवि गढ़ने में पर्याप्त ‘निवेश’ कर लिया है? क्या वे ये मानकर चल रहे हैं कि जिस नैतिकता या सामूहिक शुभ को वे सम्मान देते हैं जनता भी उसे उसी तरह सम्मान दे पा रही है? और इन सबसे बड़ा प्रश्न ये कि ये साध्य, साधन, शुचिता आदि का ये सौंदर्यशास्त्र जिस सांस्कृतिक प्रष्ठभूमि में जन्मा है क्या वह संस्कृति और उसका अतीत आजकल के लोकतांत्रिक या समाजवादी आदर्शों के साथ कम्पेटिबल है?

इन सभी प्रश्नों का एक ही उत्तर है – “नहीं”. न तो हमारे आज के मुक्तिकामियों ने अपनी धार्मिक अर्थ की फकीराना या शहीदाना छवि निर्माण के लिए पर्याप्त निवेश किया है (कई लोग तो करना भी नहीं चाहेंगे) न ही सामान्य जन मानस में एक पवित्र पुरुष या नैतिक पुरुष के रूप में अपनी छवि स्थापित की है और ना ही संस्कृति या नैतिकता की परिभाषाओं से आने वाले पारम्परिक करणीयों का उन्होंने पालन किया है. ऐसे में वे किस अधिकार से जनता को या सरकार को नैतिक बल से झुकाना चाहते हैं? ऐसी कौनसी नैतिकता उन्होंने इस जनता में या सरकार में देख ली है? इसका भी यही उत्तर है कि जनता की नैतिकता भी कंडीशंड की जा चुकी है. ऐसी जनता की नैतिकता से उम्मीद रखकर क्या अपनी जान भूखहडताल में दांव पर लगाना समझदारी है? हरगिज नहीं. न तो सरकारें इस योग्य हैं कि उनके आगे नैतिकता का या सत्य का आग्रह किया जा सके और न ही जनता इस योग्य रह गयी है कि उससे नैतिकता का कोई आग्रह किया जा सके. लेकिन यह जानते हुए भी हमारे मुक्तिकामी किस उम्मीद में भूख हड़ताल पर बैठ जाते हैं? निश्चित ही वे संविधान, विधि और कानून द्वारा बनाये गये नियमों से परिभाषित अधिकारों को हासिल करने की उम्मीद में “व्यवस्था” के सामने उम्मीद लगाए बैठे हैं. अब गौर कीजिये इस बिंदु पर वे समाज की नैतिकता से नहीं बल्कि “व्यवस्था के अनुशासन” से उम्मीद कर रहे हैं. इस क्रम में वे व्यवस्था को “अव्यवस्था फ़ैल जाने का भय” दिखाते हुए समाज की नैतिकता के सक्रिय होकर अचानक सड़कों पर उतर आने की झूठी उम्मीद कर रहे हैं. ठीक से देखा जाए तो बस इस दूसरी उम्मीद में ही सारी भूल हो रही है. पहली उम्मीद तक कोई खराबी नहीं है.

सरल शब्दों में कहें तो गांधी या विनोबा की तरह पारम्परिक संत या फकीर या ब्रह्मचारी या अणुव्रती की तरह स्थापित हुए बिना आप इस देश की जनता की नैतिकता को न तो ललकार सकते हैं न ही उससे कोई उम्मीद कर सकते हैं. इसीलिये अंबेडकर ने कभी भारतीय समाज की नैतिकता को ललकारने का वैसा प्रयास नहीं किया जैसा गांधी करते रहे थे. अंबेडकर जानते थे कि इस धर्मभीरु समाज की पाखंडी नैतिकता ही असली समस्या है, जिस नैतिकता ने भारत को सडाया है उससे क्या आग्रह करना? या यूँ कहें कि जहर के कुवें से अपने लोगों के लिए ही पीने का पानी मांगना अंबेडकर कैसे स्वीकार करेंगे? इस सच्चाई को आज के सामाजिक क्रान्तिक्रारियों पर लागू करके देखिये. वे एक दोमुही और असमंजस की स्थिति में फंसे हैं. एक तरफ वे लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, संविधान आदि के आदर्शों की छाँव में बुनी गयी लेकिन धर्मभीरुओं/ धार्मिक षडयंत्रकारियों द्वारा चलाई जा रही व्यवस्था से कोई आग्रह कर रहे हैं और दूसरी तरफ इस “सत्याग्रह” के लिए उस जनता के आक्रोश से भी उम्मीद लगाए बैठे हैं जिसके लिए ‘सत्य’ ‘नैतिकता’ ‘शुचिता’ ‘आग्रह’ सहित इन सबके प्रति ‘अधिकार’ की परिभाषाएं क्रान्ति विरोधी और बदलाव विरोधी परिभाषाएं हैं. ऐसे में न तो ये व्यवस्था उनकी सुनेगी और न ये जनता उनकी मौत पर आंदोलित होगी. रोहित वेमुला की मौत पर भारत की आम जनता ने कितने आंसू बहाए ये बताने की जरूरत नहीं है. ये ऐसा ही है जैसे आप एक खूंखार धर्मगुरु के घर के सामने धरना देकर बैठ जाएँ और उसी धर्मगुरु के प्रवचनों पर कीर्तन करने वाली जनता से उम्मीद करें कि वो जनता आपकी भूख हड़ताल या गिरती सेहत से प्रभावित होकर अपने धर्मगुरु के खिलाफ सड़कों पर उतर आये. अगर आप ऐसी उम्मीद कर रहे हैं तो आप आत्महत्या कर रहे हैं. ये व्यर्थ की भावुकता भी है और रणनीतिक अपरिपक्वता भी है.

ऐसे में क्या किया जा सकता है? क्या उपाय है? इसका एक ही उत्तर है कि जिस समाज की अनैतिकता ने इस व्यवस्था को जन्म दिया है या संविधान और कानून को ठीक ढंग से अमल में आने से रोका है उस नैतिकता से उम्मीद छोड़ दीजिये. व्यवस्था से शिकायत है तो ‘शिकायत निवारण की जो विधिसम्मत व्यवस्था’ है उसे अमल में लाइए. जनांदोलन और जनजागरण के लिए सड़कों पर “ज़िंदा” उतरिये, “लाश की तरह” आप एक ही बार शोभायात्रा निकाल सकते हैं. इससे काम आसान नहीं बल्कि मुश्किल होता है. ऐसे भावुक शहीदों का वही जहरीली नैतिकता कैसा दुरूपयोग करती है ये हम भगत सिंह और विवेकानन्द के जीवन से सीख सकते हैं. शहीद या विक्टिम बनने के अपने फायदे हैं लेकिन वे फायदे एक नैतिक समाज में एक सभ्य समाज में ही संभव हैं. भारत जैसे अनैतिक और असभ्य समाज में सिर्फ उन्ही लोगों का सत्याग्रह सफल हो सकता है जिनका सत्य धर्मान्ध व्यवस्था के सत्य की परछाई की तरह जन्मा हो. लेकिन अगर आप पश्चिमी मूल्यों से प्रेरित समाजवादी, लोकतांत्रिक, सेक्युलर और सहज मानवीय नैतिकता से भरी व्यवस्था के लिए संघर्षरत हैं तो आपको धर्मान्धों, गांधीवादियों, सर्वोदयवादियों और राष्ट्रवादियों के ढंग के सत्याग्रह और आत्मपीडन से बचना चाहिए.                                     
ग्राउन्ड रिपोर्ट इंडिया से साभार

03 दिसंबर, 2016

भारत के युवा सेक्स, हिंसा और भूत प्रेत के बारे में नहीं लिखें

मित्रो,  आज यह लेख.....पढ़िए..

अंग्रेजी के मशहूर लेखक जैफ्री ऑर्चर ने भारत के युवा लेखकों को सलाह दी है कि वो सेक्स, हिंसा और भूत प्रेत के बारे में नहीं लिखें । उनकी सलाह है कि खराब भाषा से भी भारत के युवा लेखकों को बचना चाहिए । उन्होंने साफ कहा है कि भारतीय युवा लेखकों को उन्हीं विषयों पर लिखना चाहिए जिसको लेकर लेखक को खुद पर पूरा यकीन हो यानि वो विषय को लेकर कन्विंस हों। जैफ्री ऑर्चर ने कहा कि लेखक को अपना काम करना चाहिए और फिर उसको जनता पर छोड़ देना चाहिए कि वो उसको पसंद करती हैं या नहीं । उन्होंने साफ तौर पर जोर देकर ये भी कहा कि जो जनता चाहती है उस हिसाब से नहीं लिखना चाहिए बल्कि लेखक को अपने हिसाब से साहित्य सृजन करना चाहिए । जैफ्री आर्चर कोई मामूली लेखक नहीं हैं बल्कि पूरी दुनिया में उनकी लेखन का डंका बजता है । सत्तर साल की उम्र में भी वो खुद के लेखन को चुनौती देते रहे हैं और लगातार नए नए विषयों पर लिखते रहे हैं। जब उपन्यास से मन भरने लगा तो नाटक लिखना शुरू कर दिया फिर कहानी की ओर मुड़ गए। एक अनुमान के मुताबिक उनकी किताब केन एंड एबेल की करीब साढे तीन करोड़ प्रतियां बिक चुकी हैं । यह साहित्य में एक घटना की तरह है । इस किताब से पहले प्रकाशित जैफ्री ऑर्चर की दो किताबें भी बेस्ट सेलर रही हैं । दरअसल अगर हम देखें तो जैफ्री ऑर्चर ने अपना करियर लेखक के तौर पर तब शुरू किया जब वो लगभग दीवालिया हो गए थे और उनपर कर्ज का भारी बोझ आ गया था । जैफ्री ऑर्चर सौ मीटर रेस के धावक रह चुके हैं, ब्रिटेन में सांसद रह चुके हैं लेकिन कारोबार में ठोकर खाने के बाद लेखक बने । कर्ज उतारा फिर राजनीति में गए ।

आर्थिक रूप से घिरे जैफ्री ऑर्चर ने सबसे पहले नॉट अ पेनी मोर, नॉट अ पेनी लेस लिखा जिसकी सोलह देशों में जमकर बिक्री हुई । उसके बाद तो उन्होंने लेखन को ही अपना लिया और अपने बैलेंस शीट को लेखन की कमाई से ठीक किया। गूगल के मुताबिक उनका तीसरा उपन्यास केन एंड एबेल विश्व साहित्य के इतिहास में ग्यारहवां सबसे सफलतम उपन्यास है । लियो टॉलस्टॉय के वॉर एंड पीस से सिर्फ एक पायदान नीचे । जैफ्री ऑर्चर का जीवन विवादों से भी भरा रहा है और जेल भी काट चुके हैं । लिहाजा उनका अनभव संसार वैविध्यपूर्ण है । जैफ्री ऑर्चर के बारे में ये बताने का मकसद सिर्फ इतना था कि उनकी सलाह को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए । उसको माना जाए या नहीं इस बात पर कम से कम विमर्श तो होना ही चाहिए । इस लेख का मकसद भी यही है ।

जैफ्री ऑर्चर की भारत के युवा लेखकों की इस सलाह पर कई लोगों ने ये सवाल उठाए कि उनको भारत के पाठकों की रुचि का और भारतीय लेखन का उनको क्या पता । अब ऐसे लोगों की अज्ञानता पर क्या कहा जाए । जैफ्री ऑर्चर का भारत से बहुत पुराना और गहरा नाता रहा है और वो नियमित तौर पर भारत आते जाते रहे हैं और भारत के बारे में उनकी एक राय भी है । भारतीय महिलाओं के बारे में जैफ्री ऑर्चर ने हाल ही में अपने एक इंटरव्यू में कहा है कि जब भी वो भारत आते हैं तो यहां की महिलाओं को मजबूत होते देखकर खुश होते हैं । वो भारतीय महिलाओं के सशक्तीकरण की भावना का सम्मान करते हुए कहते हैं कि नई पीढ़ी को रोकने की ताकत अब किसी में नहीं है । जैफ्री ऑर्चर भारत के प्रकाशन जगत की सचाईयों से भी वाकिफ हैं और अपनी कई किताबों को सबसे पहले भारत में ही लॉंच करते रहे हैं । उनका मानना है कि भारत में पाइरेसी एक बड़ी समस्या है और अगर भारत में किताब बाद में लॉंच की जाती है तो लेखक और प्रकाशक दोनों का नुकसान हो जाता है । लिहाजा वो इसकी काट के लिए सबसे पहले अपनी किताब भारतीय बाजार में ही लॉंच करते हैं ।

अब हम आते हैं जैफ्री ऑर्चर की युवा लेखकों को दी जानेवाली सलाह पर । उन्होंने सेक्स संबंध से लेकर भूत-प्रेत की कहानियां नहीं लिखने की सलाह दी है लेकिन इन दिनों सेक्स संबंध युवा लेखकों के लेखन में लगभग अनिवार्य उपस्थिति की तरह है । कई युवा लेखकों को लगता है कि उपन्यासों में बगैर यौन संबंधों के छौंक के उसको सफल नहीं बनाया जा सकता है जबकि उनके सामने ही अमिष त्रिपाठी का उदाहरण है । जो बगैर इस तरह के विषयों को छुए दुनिया के बड़े लेखकों की लीग में शामिल हो गए हैं । दरअसल कुछ युवा, कुछ युवापन की दहलीज पार कर चुके लेखक अपनी कहानियों में यौन संबंधों का इस्तेमाल उसी तरह करते हैं जैसे कुछ फिल्मकार अपनी फिल्मों की सफलता के लिए नायिकाओं से अंग प्रदर्शन करवाते हैं । उन्हें ये सफलता का शॉर्टकट फॉर्मूला लगता है । फिल्मों में भी जहां कहानी की मांग हो वहां अंगप्रदर्शन से परहेज नहीं करना चाहिए और साहित्य में भी जहां सिचुएशन की मांग हो वहां यौन संबंधों का वर्णन होना चाहिए । साहित्य में यौन संबंधों के वर्णन को लेकर बहस पुरानी है लेकिन जिस तरह से चेतन भगत जैसे लेखकों ने जुगुप्साजनक तरीके से चटखारे लेने के अंदाज में इस तरह से प्रसंगों पर विस्तार से लिखा है उसको जैफ्री ऑर्चर की टिप्पणी के आइने में देखे जाने की जरूरत है । चेतन के नए उपन्यास वन इंडियन गर्ल के कई पन्ने तो पोर्नोग्राफी को मात देते हैं । हिंदी में जब मैत्रेयी पुष्पा का उपन्यास चाक या फिर अल्मा कबूतरी प्रकाशित हुआ था तब भी उसमें वर्णित यौन संबंधों को लेकर साहित्य जगत में अच्छा खासा विवाद हुआ था । साहित्य के शुद्धतावादियों ने तब मैत्रेयी पुष्पा के लेखन को कटघरे में खड़ा किया था । बाद में भी इस तरह के प्रसंगों को लेकर कई कृतियां आईं । कृष्णा अगिनहोत्री की आत्मकथा के दो खंड- लगता नहीं है दिल मेरा तथा ...और और औरत में इस तरह के प्रसंगों की भरमार है । हद तो बुजुर्ग लेखिका रमणिका गुप्ता ने अपनी आत्मकथा में कर दी। उनकी आत्मकथा आपहुदरी में जिस तरह क जुगुप्साजनक प्रसंगों की भरमार है वो उस किताब को साहित्य के अलग ही कोष्टक में रख देता है। जैफ्री ऑर्चर की सलाह युवा लेखकों को लेकर है । इन वरिष्ठ लेखकों की रचनाओं का उल्लेख इस वजह से किया गया ताकि लेखन की इस परंपरा को समझने में मदद मिले । यौन संबंध मानव जीवन की अनिवार्यता है लेकिन उसको कितना और कैसे उभारा जाए ये लेखक पर निर्भर करता है । अभी पिछले दिनों युवा लेखिका सोनी सिंह का संग्रह क्लियोपेट्रा प्रकाशित हुआ था । उनकी कहानियों में इस तरह के कई प्रसंग बेवजह आते हैं और जिस तरह के बिंबो का वो इस्तेमाल करती हैं वो हिंदी कहानी में कुछ जोड़ता हो इसमे संदेह है । हलांकि राजेन्द्र यादव को सोनी सिंह की कहानियां अपने बेबाक बयानी के बावजूद बौद्धिक खुराक मुहैया करवाने वाली लगती हैं । संभव है कि यादव जी की तरह के कुछ पाठक साहित्य में हों । सोनी सिंह के अलावा भी कई लेखक लेखिका इस तरह की कहानियां लिख रहे हैं । पर उनमें से ज्यादातर अपनी इस तरह की कहानियों से पाठकों को झकझोरने के बाद अलग भावभूमि पर विचरण करने लगी हैं ।  जिसको उनके कोर्स करेक्शन की तरह देखा जा रहा है ।

जैफ्री ऑर्चर की इस सलाह के बाद एक बार फिर से साहित्य में इस बात पर बहस होनी चाहिए कि साहित्यक शुचिता की सीमा कितनी हो । लेखक सिचुएशन की मांग पर कहां तक जा सकता है या जा सकती है । यौन संबंधों पर लिखने के लिए दरअसल बहुत सधे हुए दिमाग और लेखनी की जरूरत होती है । ये प्रसंग ऐसे होते हैं कि अगर लिखते वक्त लेखक का संतुलन खो गया तो वो उसके लेखन को हल्का भी कर दे सकता है या पाठक उसको रिजेक्ट भी कर सकते हैं । खुद लेखक को भी इस तरह के लेखन के पहले कन्विंस होना चाहिए । पाठकों को कहानियों की ओर आकर्षित करने के लिए इस तरह के प्रसंग जबरदस्ती नहीं ढूंसने चाहिए । जैफ्री ऑर्चर ने एक और बात कही कि बाजर की मांग के हिसाब से लेखकों को नहीं लिखना चाहिए तो वो इस ओर इशारा करते है कि लेखक तो पाठकों की रुचि का निर्माण करते हैं, रुचियों आधार पर साहित्य सृजन करनेवाले लेखक नहीं बल्कि कारोबारी होते हैं । अब हिंदी के युवा लेखकों को तय करना है कि वो वैश्विक लेखक की सलाह मानते हैं या फिर शॉर्टकट सफलता के लिए पुराने फॉर्मूले को अपनाते हैं । 

000 अनंत विजय
प्रस्तुति-बिजूका समूह
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टिप्पणियां:-

प्रदीप मिश्रा:-
मैंने कोशिश किया लेकिन यह लेख पूरा नहीं पढ़ पाया। इतना उबाऊ लेखन है कि पाठक को जोड़ता ही नहीं है। खैर मैं तो नहीं पढ़ पाया माफी।

राजेश्वर वशिष्ट:-
बहुत बढ़िया आलेख। उचित और सामयिक मार्गदर्शन।

सिनीवाली:-
मार्गदर्शन करता आलेख। बहुत हद तक सहज है।

उदय अनुज:-
सत्या पटेल जी ! हमारे देश में सेक्स को मसाले की तरह काम में लेकर लेखन में भले ही कुछ प्रसिद्धी पाई हो किन्ही लेखकों ने , लेकिन उन्हें स्थाई सम्मान यहाँ का पाठक वर्ग नही देता।

रेणुका:-
सवाल ये भी है कि ऐसे विषयों पर उल्लेख लिखने की सीमा कौन तय करेगा।  मेरे लिए तो ठीक है वो दूसरे के लिए भी सही हो, ऐसा ज़रूरी तो नहीं।  दूसरी बात, लेखन में लेखक की निजी सोच के साथ साथ पाठकों की रूचि भी शामिल होनी चाहिए।

वीना राजशिव:-
पाठकों की राय ज़रूर शामिल हो लेकिन राय भी सही है या नहीं, या केवल पाठक पढ़ना चाहता है, ये सोचकर करना शायद उचित नहीं। अगर राय या उसकी चाहत समाज को कोई दिशा ना देकर केवल भटकाव ही दे ऐसी राय से परहेज़ रखना चाहिए।
वैसे हो सकती है जो बात मेरे लिए उचित है वो दुसरे के लिए अनुचित हो। फिर भी अपना मानक हमें खुद तय करना होगा की हम किस स्तर तक जाएंगे।

जेफ्री आर्चर की सलाह बिलकुल सही है। अन्नावश्यक रूप दे यौन संबंधो के विषय उठाना, लिखना सस्ती लोकप्रियता हासिल करना है। जहां ऐसा हो की ऐसी बातों के बिना आपकी कहानी या उपन्यास बढ़ ही ना पाये वहाँ ज़रूर हो। और इसमें सधा हुआ लेखन खूबसूरती बढ़ाता है। नग्नता अगर झीने परदे में है तो शायद ज़्यादा सुन्दर लगे। वैसे यहां तो ऐसी कहानियां पढ़ने को मिलती है की लेख़क सारी खूबसूरती उसी में ढूंढता है।
सत्य जी जेफ्री आर्चर का लेख साझा करने के लिए आभार