1.
आवाज़ आ रही है
आवाज़ आ रही है?
फ़ेसबुक लाइव शुरू करते हुए
विद्वतजन ने पूछा-
आवाज़ आ रही है?
और अनगिनत सहमतियों में बनी
ऊपर उठे हुए अंगूठों की आकृतियों में
मैंने भी हामी भर दी
जी हाँ ! आवाज़ आ रही है.
लेकिन तभी मैं ठिठका कि
क्या वाक़ई आवाज़ आ रही है?
कूड़े के ढेर पर बसी बस्ती में
मियाँ बीवी के झगड़े में
बेवजह पीट दिए गए बच्चे के रोने की
और, पिटने के बाद भी रसोई बनाती
किसी औरत की सिसकियों की
आवाज़ आ तो रही है.
‘अखंड राष्ट्र’ के एक हिस्से में
बीते कई सालों से
शहर की वीरान गलियों में
गश्त करती सेना के बूटों की
आवाज़ तो आ रही है.
विश्व की उभरती हुई अर्थव्यवस्था
की राजधानी में
किसी गटर को साफ़ करते हुए
दम घुटने से मर गए
संविदा सफ़ाई कर्मी की मौत पर
रोती बिलखती उसकी बेवा की
आवाज़ आ तो रही है.
तू मुझे मौला कह
मैं तुझे हाजी कहूँ
के बेशर्म नारों के बीच
सीमा पर शहीद हुए
किसी फ़ौजी के जिस्म से
बूँद बूँद कर सच के टपकने की
आवाज़ तो आ रही है.
अन्न की रिकार्ड पैदावार
और आत्मनिर्भरता की ओर
मज़बूत कदम बढ़ाते देश में
सड़क पर गिरे दूध को
कुत्ते और आदमी के एक साथ सुड़कने की
आवाज़ आ तो रही है.
लोकतंत्र के बहुरंगी गलियारे में
हिटलर के घोड़े की टापों की
और मुसोलिनी के नारों की
आवाज़ तो आ रही है.
आवाज़ तो आ रही है
कि आवाज़ें पहुँच नहीं रहीं
आवाज़ तो आ रही है
कि आवाज़ें सुनी नहीं जा रहीं
झूठी खबरों के नक्कारखाने में
सच की तूती की
आवाज़ तो आ रही है.
लेकिन ! सवाल अब भी वही है-
क्या वाक़ई आवाज़ आ रही है?
2.
डरो
डरो!
डरो कि डरना अब अनिवार्य ही नहीं
वांछनीय भी है.
डरो कि वे
तुम्हें डरा हुआ ही देखना चाहते हैं.
अगर स्त्री हो!
तो डरो कि
तुम्हारे बचने और तुम्हारे पढ़ने के कानफोड़ू नारों
और तुम्हारे दिनदहाड़े ज़िंदा जला दिए जाने के बीच
किसी ने नहीं सुनी तुम्हारी राख से उठती हुई सिसकियाँ?
डरो कि देशभक्त “कुलदीपकों” ने अपनी
वासना से भरे, कामुकता से लदे रथों के पहिए
मोड़ दिये हैं तुम्हारी तरफ़.
अगर अल्पसंख्यक हो!
तो डरो कि
न्याय की देवी ने अपनी आँखों पर बँधी
निष्पक्षता की झीनी पट्टी भी अब खोल दी है, और
वह देख सकती है साफ़ साफ़
इंसाफ़ के तराज़ू के किस पड़ले पर संख्याबल भारी है.
अगर सामान्य नागरिक हो
और तुम्हारे अंदर का नागरिकताबोध कुलाँचे भर रहा है!
तो डरो कि
तुम्हें स्वयं ही देना होगा तुम्हारे होने का प्रमाण
डरो कि अब इस महादेश में बस्तियाँ नहीं होंगी
होंगे तो सिर्फ़ कैंप.
डिटेंशन कैंप, आइसोलेशन कैंप, कंसंट्रेशन कैम्प…
अच्छा! कवि हो
तो डरो कि
वे जानते हैं तुम डरते नहीं हो
डरो
कि तुम्हारी कविता झूठ बोल नहीं सकती
और सच वो सुन नहीं सकते.
3.
शीतल देवी
देखो द्रोण देखो-
अब बात अंगूठे तक सीमित नहीं रही
नियति का देवता जानता था
एकलव्य की ये नवासी
कलयुग में
फिर किसी राजपुत्र या पुत्री के लिए बनेगी चुनौती
बिना बाज़ुओं के जन्मी वो शायद इसीलिए
लेकिन देखो तो इसे
नियति को पैर का अंगूठा दिखाती
और उसी पैर के अंगूठे और उंगलियों से धनुष पकड़
दाँतों से प्रत्यंचा खींचकर
साधा है इसने लक्ष्य
उस व्यवस्था के सीने पर
जिसने आरक्षित रखी तुम्हारी शिक्षा
केवल राजपुत्रों के लिए.
देखो द्रोण देखो -
इसके माथे पर भी वही तेज
और, आँखों में वही विद्रोह है
जैसा एकलव्य में था
देखो इसकी रगों में दौड़ता खून
उबाल मार रहा है
गुरुदक्षिणा की तुम्हारी नैतिक माँग पर
और कुलांचे भर रहा है इसका आत्मविश्वास
ये ध्वस्त कर देगी वर्ण की वह न्यायप्रिय व्यवस्था
जिसने जन्म के आधार पर सुरक्षित रखे सारे पद
और आवंटित किया सारा श्रम.
देखो द्रोण देखो!
ये कोई साधारण लकड़ी नहीं
तुम्हारी तरफ़ चलाया गया
एकलव्य का सबसे घातक तीर है
विरोध में उठी सबसे बुलंद आवाज़ है.
4.
आवश्यकता है
सुना है ! किसी भयंकर बाढ़ में बह गई थी
एक बेहद उन्नत प्राचीन सभ्यता
शायद, बाढ़ ही में डूब गई थी ‘शापित’ द्वारका
निश्चित ही बहुत उन्नत है हमारी सभ्यता
हर साल बाढ़ में बहने के बावजूद बची रह जाती है.
ऐसा लगता है
नावें बचा लाती हैं हवा में उड़ान भरती सभ्यता को
हर साल डूबने से.
निश्चित ही बड़े खुशहाल हैं हमारे लोग
और पूरी तरह संरक्षित हैं हमारे जीव जन्तु
तभी तो साल दर साल
तबाही के बाद भी बचे रह जाते हैं.
बाढ़ के उतरने पर खोज निकालेंगे ये
कीचड़ में दबे
टूटे फूटे बर्तन, नागरिकता के दस्तावेज़
और, अपने परिजनों के शव.
ऐसी आफ़त के समय
एक गैंडे और आदमी को साथ साथ
नाव से सुरक्षित स्थान पर जाता देख
मेरा यह विश्वास दृढ़ हुआ कि
इस देश को नागरिकता पंजीकरण की तत्काल आवश्यकता है.
ढह गई छः मंज़िला इमारत एक
बह गई कुछ झुग्गियाँ
कल तक जो मकान मालिक थे
वे जो कल तक सड़क पर आना
अपना काम नहीं समझते थे
एकाएक सड़क पर आ गए आज वे
तंत्र के मलबे में अब भी दबे हैं कुछ जन
जल्द ही निकाल लिए जाएँगे उनके शव
और इस तरह समझ आया-
इस जनतंत्र को एक नए संसद भवन की तत्काल आवश्यकता है.
महामारी ने अपने पैर पसारे
और अधिनायकवाद ने उसके कंधे की सवारी की
मर गए असंख्य जिन्हें ईश्वर पर थी अटूट आस्था
बच गए असंख्य जिन्हें ईश्वर पर ना थी कोई आस्था
कुछ बचते बचते मर गए
कुछ मरते मरते बच गए
किसी ने कहा -
अलाने ईश्वरीय कोप से मर गए
तो किसी और ने कहा -
फलाने ईश्वर की कृपा से बच गए
जो मर गए उनके परिजनों ने ईश्वर की शरण ली
जो बच गए उन्होंने ईश्वर का आभार प्रकट किया
और इस तरह मेरा यह विश्वास प्रबल हुआ-
हमारी आस्था को एक मंदिर की तत्काल आवश्यकता है.
5.
चाँद का अपराधबोध
रात का सन्नाटा
सम्पूर्ण निस्तब्धता
शीतल वायु भी अवसाद फैलाती
ऐसे में पदचाप सहस्त्र पैरों की
दूर तक सुनाई देती रही
चर्र चर्र चर्र चर्र, पट पट पट पट
विस्थापित गृहस्थी लादे साइकिल की घंटी
ट्रिन- ट्रिन, ट्रिन- ट्रिन
बहुत देर तक बजती रही
शहर के स्थापित गृहस्थों की नींद बार बार टूटती रही
और फिर इस सूनी सड़क पे
बहुत दिनों बाद मद के कुछ घूँट लेकर
रफ़्तार का दीवाना एक
निकला उधर से
और एकाएक बंद हो गईं सारी आवाज़ें.......
रात का गहराता सन्नाटा
बढ़ती हुई निस्तबधता
शीतल वायु कुछ और विषैली हुई
ऐसी कि आसमान में चौकीदारी करते
चाँद की भी आँखें डबडबाने लगें
शीतलता में उसे भी झपकी आने लगे
ऐसे में रेल की पटरी पर
दिन भर भटकते पैरों की भी साँसे फूलीं
छोटे छोटे पाँव बेचारे चाँद को देख निंदासे हो गए
थकान मिटाने को वहीं पटरी पर सो गए
और फिर उधर से निकली
ज़रूरी रसद लिए एक निर्दोष ट्रेन
और ग़ैर ज़रूरी फूलती साँसे शांत हो गईं
वे अब और नहीं फूलेंगी कभी......
सुबह हुई
सूरज को अपनी गठरी में लादे
वो फिर आगे बढ़ गए
कारवाँ उनका चलता रहा
चाँद अपराधबोध से ग्रस्त
आसमान में लटका रहा.
6.
रीढ़ और नाक
(माँ के लिए श्रद्धांजलि)
१.
तुम और मैं
नाभिनाल से नहीं जुड़े थे.
शायद!
हम जुड़े थे
रीढ़ की हड्डी से
मेरी रीढ़ दरअसल
तुम्हारी ही रीढ़ का विस्तार है.
और इसीलिए
यह दर्द भी तुम्हारा ही है
जो अब मुझे मिल गया है
दर्द जो सीधी रीढ़ वालों को होता है शायद.
दर्द जो तुम्हारी अनुपस्थिति में भी उपस्थित है
दर्द जिसने मुझे और तुम्हें एकाकार किया हुआ है
दर्द जिसने तुम्हें मुझमे ज़िंदा रखा हुआ है
दर्द जो जीवन का शाश्वत संगीत है.
२.
रीढ़ जो आदमी को आदमी बनाती है
रीढ़ जो ऊँची से ऊँची मंज़िल पर और
कठिन से कठिन समय में
आदमी को सीधे खड़ा रहने का हौसला देती है
रीढ़ जो सिर्फ़ होने भर से नहीं होती
रीढ़ जो अक्सर होते हुए भी नहीं होती
रीढ़ जो दुनिया में आदमी की सफलता में
सबसे बढ़ी बाधा भी है और साधन भी
रीढ़ जो संबल है, स्वाभिमान है
रीढ़ जो वीरों का अभिमान है
रीढ़ जो लचीली हो तो सफलता की कुंजी है
रीढ़ जो चापलूसों और चाटुकारों की पूँजी है
रीढ़ जो मुझमे तुम्हारी अस्थिमज्जा से बनी है
रीढ़ जो तुम्हारी मालिश से तनी है.
३.
सुना है ! रीढ़ और नाक का कोई सम्बंध है
जिनकी रीढ़ सीधी होती है
उनकी नाक बहुत ऊँची होती है
दुनिया जिनकी रीढ़ नहीं झुका पाती
उनकी नाक पर हमले करती है
और तुम भरपूर लड़ीं अपनी नाक के लिए
अपनी सीधी और तनी हुई रीढ़ के साथ
और यही सिखाया-
जिनकी रीढ़ झुक जाती है
उनकी नाक खुद ब खुद टूटकर गिर जाती है.
7.
पुच्छलतारे
१.
नहीं रही अरवीना
नहीं रहा अनवर
नहीं रहे दयाबक्श.
वे इतिहास के निर्माता हो सकते थे
महज़ तारीख़ें भर नहीं बल्कि इतिहास को
दिशाबोध कराने वाले ध्रुव तारे!
लेकिन अफ़सोस कि सारे वाजिब कारणों के होते हुए भी
वे इतिहास में कहीं नहीं हैं
उनके पेट के विज्ञान ने उनका भूगोल बदल डाला
वे अंतरिक्ष के दिग्भ्रमित पिंड होकर रह गए
जो भटक गए अपने परिक्रमण पथ से
छिटक गए अपनी धुरी से
और रोटी के शक्तिशाली ध्रुवों के गुरुत्व में उलझ गए
अफ़सोस! ज़िंदा रहने की जद्दोजहद में
भूख के अथाह ब्रह्मांड में वे कहीं खो गए.
२.
उन्होंने रोटी माँगी
हमने उन्हें भूख दी
उन्होंने पानी माँगा
हमने उन्हें प्यास दी
उन्होंने भूखे बच्चे के लिए दूध माँगा
हमने उन्हें सस्ती दर पे क़र्ज़ दिया
उन्होंने घर जाना चाहा
हमने उन्हें इंतज़ार दिया.
कहाँ पता था उन्हें कि
उम्मीद की जिस गाड़ी में वे
कंधे पर भूख का बस्ता टांगे चढ़ रहे हैं
उसी गाड़ी से भूख के उसी बस्ते में बांधकर
‘संभावित संक्रमित’ कहकर किसी लावारिस बम की तरह
भूखे पेट ही किसी अनजाने प्लैट्फ़ॉर्म पर उतार दिए जाएँगे?
कहाँ पता था?
गाड़ी की खिड़की से अपने गांव की बाट जोहती आँखें
अपने गंतव्य पर पहुँचने से पहले ही पथरा जाएँगी?
३.
वे बचाए जा सकते थे
थोड़े से पानी
कुछ रोटियों
साधारण दवा की एक गोली
और बहुत थोड़ी सी मानवीयता से
वे बचाए जा सकते थे
लेकिन नहीं बचाए जा सके.
अरवीना की बेटी जो
अपनी माँ की साड़ी से खेल रही है
नहीं जानती फ़र्क़ साड़ी और कफ़न में
और जाने भी कैसे
फ़र्क़ रह भी कहाँ गया है?
नहीं समझ पा रही वो कि कुछ दिनों पहले तक
उसकी माँ की पर्वत रूपी छाती से निकलने वाली
जीवनदायिनी दुग्ध की नदियाँ सूख क्यों गईं?
दर असल! वह खेल नहीं रही
बल्कि ढूँढ रही है -
भूख का वह बांध
जिसने उसके हिस्से का पोषण रोक लिया है!
४.
नहीं छपी ये खबर किसी भी प्रमुख अख़बार में
तो क्या अरवीना , अनवर और दयाबक्श
यूँ ही भुला दिए जाएँगे
अंतरिक्ष के किसी आवारा पिंड की तरह?
नहीं!
मैं अपनी कविता में जीवित रखूँगा उन्हें
सैकड़ों वर्षों में कभी कभार दिखाई देने वाले पुच्छल तारे की तरह
ताकि सनद रहे
मेरे हिस्से की भूख लेकर वे गुज़र गए
उनके हिस्से की रोटी लेकर मैं ज़िंदा हूँ.
०००
8
रोटी
------
मेरे बेटे ने पूछा
"पापा चुरमुरे वाला तो रोज़ चुरमुरा खाता होगा?"
मैंने कहा-
नहीं बेटा वो रोटी कमाने के लिए चुरमुरा बेचता है
और वो रोटी खाता है.
उसने फिर कहा-
पापा चाट वाले के तो बड़े मज़े हैं
रोज़ चाट खाता होगा.
मैंने कहा नहीं बेटा!
वो भी रोटी कमाने को चाट बेचता है
और वो भी रोटी ही खाता है.
फिर उसने अंडा खाते हुए कहा-
पापा अंडे वाला तो ज़रूर
रोज़ बढ़िया ऑम्लेट खाता होगा.
मैंने कहा -नहीं बेटा!
वो भी अपनी रोटी कमाने के लिए ही अंडे बेचता है
और सब्ज़ी ना होने पर अंडे से रोटी खा लेता है.
फिर कुछ ठहर कर
सोच विचार कर उसने कहा-
फिर सबको रोटी कौन देता है?
मैंने कहा- हमारा किसान.
अपनी देह तोड़कर
पसीने से फ़सल सींचकर
धरती की छाती चीरकर
निकाल लाता है रोटी इन सभी के लिए.
उसने छूटते ही कहा-
तब तो किसान ज़रूर भरपेट रोटियाँ खाता होगा!
अब मैं मौन था!
9.
तबरेज अंसारी को हृदयघात
(झारखंड में भीड़ हिंसा में जान गँवाने वाले युवक के नाम)
1.
वह किसी की पिटाई से भी मारा जा सकता था
लेकिन उसके पास एक अदद दिल था
जिसमें संवेदनाएँ हिलोरे भरती थीं
जो धड़का करता था पुरज़ोर
कभी अपने बच्चे की खिलखिलखिलाहट पर
उत्साह में कूदने लगता
कभी माँ की बीमारी में
दुःख के मारे बैठ जाता
कभी बीवी को उदास देख
अवसाद में डूब जाता
कभी अपनी अकर्मण्यता पर
क्रोध की ज्वाला में धधकने लगता.
फिर एक दिन!
जब चोरी करके भी वह पूरी ना कर सका
माँ, बीवी और बच्चे की हसरत
तो उसके दिल ने मारे शर्म के धड़कना बंद कर दिया
और इस तरह बचा ली उसने उस समाज की इज़्ज़त
जिसे शर्म आना बंद हो चुकी है.
2.
यूँ तो फोड़ दी जानी चाहिए थीं वह आँखें
जिन्होंने सच देखकर भी नहीं देखा
यूँ तो काट दी जानी चाहिए थी वह ज़बान
जिसने थाने में चुप रहना हितकर समझा
यूँ तो तोड़ दी जानी चाहिए थी वह क़लम
सच लिखने से पहले जिसकी हलक सूख गई.
यूँ तो कुचल दी जानी चाहिए थीं वह अंगुलियाँ
जिन्होंने काग़ज़ के उजले मुँह पर कालिख पोत दी.
यूँ तो जला दी जानी चाहिए थी क़ानून की किताबें
सबकुछ देखकर भी जो साक्ष्यों के अभाव में मौन थी.
लेकिन ऐसा होने पर इस समाज को
अपने नंगेपन का बोध हो जाता
इसलिए समाज को शर्मिंदगी से बचाने के लिए
उस दिल ने स्वतः ही धड़कना बंद कर दिया.
3.
मारा ही जाना चाहिए था उसे
आख़िर चोरी की थी उसने
चोरी करना उतना बड़ा अपराध नहीं है
जितना चोरी करते हुए पकड़ा जाना.
समाज के सुसभ्य ढाँचे के लिए,
पुश्त दर पुश्त धन संचय की स्वतंत्रता,
पूँजी के संरक्षण की न्यायप्रिय अवधारणा,
और समाज में क़ानून के राज के विरुद्ध
चोरी सबसे संगीन अपराध है.
मारा ही जाना चाहिए था उसे
इस गम्भीर अपराध में.
वो तो अच्छा ही हुआ कि उस कमज़ोर दिल ने
ख़ुद ही दम तोड़ दिया.
०००
10
फुटपाथ
फुटपाथ देखा है आपने?
हाँ हाँ वही जहाँ,
कुछ देर पहले तक
धूल का ग़ुबार था,
गंदगी का अंबार था,
वहाँ अभी अभी कुछ मैले कुचैले लोग आ गए हैं.
झाड़ेंगे बुहारेंगे उस जगह को,
वही है उनका आशियाना.
दिखाई नहीं देते पर हैं,
बैठक, रसोई और शयनकक्ष उनके इस आशियाने में,
दरवाज़ों के बाहर महँगी दरी नहीं है,
खिड़कियों पर महँगे पर्दे नहीं है,
अंदर आने औरजाने के लिए कोई पूछता नहीं,
बड़ी बेतकल्लुफ़ी से रहते हैं वो,
कुछ नहीं है उनके पास छुपाने या दिखाने को,
और नींद तो ऐसी सोते हैं कि बस........
पूरे दिन की कमाई,थकान और कल की चिंता को,
सिरहाने किसी पोटली में दबाकर,
और वे वैसे ही सोएँगे तब तक,
जब तक कि,
कोई उन्मत्त,
नशे में धुत्त,
अपनी गाड़ी उनपर चढ़ा नहीं देगा.
और फिर वे मात्र एक फ़ाइल बनकर,
फाँकेंगे धूल किसी थाने में,
और बचे हुए अन्य,
कोई और जगह देखकर,
सोने लगेंगे फुटपाथ पर.
०००
प्रकर्ष मालवीय “विपुल “
शिक्षा- परास्नातक समाजशास्त्र
संप्रति- उच्च न्यायालय इलाहाबाद में अनुभाग अधिकारी के पद पर कार्यरत
संपर्क- 9389352502
