एक प्रोफेसर की हत्या
मैं यह पहले ही बता देना चाहता हूं कि यह कोई कहानी नहीं, कोरी कल्पना है। इसका वास्तविक घटना से कोई लेना- देना नहीं है। उसके बाद भी आपको कहानी पढ़ते -पढ़ते कहानी के मध्य में या समाप्ति पर यह महसूस होने लगेगा कि यह तो वही घटना है, जो कुछ समय पहले महानगर में घटी थी। जिसकी चर्चा चाय-पान की दुकान से लेकर कॉलेज- स्कूल,साहित्य और सिनेमा के गलियारों में और महानगर के अखबारों के पन्नों पर भी तैर रही थी। आपको बताता चलूं कि उस घटना का
एकमात्र दोषी मैं ही हूं । उसकी मौत का जिम्मेदार भी मैं ही हूं। मौत इसलिये कह रहा हूँ, क्योंकि पुरी दुनिया की नजर में यह हत्या नहीं बल्कि आकस्मिक मत्यु है। पर मेरी नजर में यह हत्या है । मेरी बातों से आप सबको लग रहा होगा कि मैं भी कैसा पागल आदमी हूं ।चलिए, मैं आपको पहले अपना परिचय दे देता हूं,ताकि आप मेरी कहानी में निहित सच को समझ जाने के बाद मुझे पागलों में गिनना छोड़ दें । जैसा कि परिचय में सबसे पहले नाम बताया जाता है तो मेरा नाम डॉ शिवशंकर सिंह है। मैं जाति से राजपूत हूं । अपने आपको मैं राजपूत इसलिए बता रहा हूं क्योंकि मैं सामान्य कैटिगरी से आता हूं । वैसे मैंने अपने जीवन में एक मच्छर तक नहीं मारा है। हो सकता है कि मेरी तरह आप भी न मार पाए हों, क्योंकि आप भी मेरी तरह मच्छरदानी लगाकर ही सोने के आदी होंगे।
आप यह भी जान लें कि मैं शाकाहारी नहीं हूँ । बहुत बार कोशिश करके भी नहीं हो पाया। मुँह का स्वाद हमेशा मेरी चेतना पर भारी पड़ा। अंडा, मुर्गा,मछली,बकरा सब खाया। खूब चाव से खाया,लेकिन मैं इन सबका हत्यारा नहीं हूं ,क्योंकि उनकी हत्या बुचड़खाने में हुई थी । मैंने सिर्फ मांस पका कर खाया था ,पर जैसा कि मारने वाले से ज्यादा दोषी मांस खाने वाला होता है।
उसी तरह मेरा मित्र अश्वनी, जिसका आज ही दाह- संस्कार करके कोलकाता से लौट रहा हूं........ हाँ ! वही कोलकाता शहर जो कभी कलकत्ता हुआ करता था। मुझे यह महानगर कभी पसंद नहीं आया। खैर ! अब मेरा कोलकाता आना हमेशा के लिए छूट जाएगा। गर्मी में पसीने से कई-कई बार
नहाना पड़ जाता है। उस पर लोगों और गाड़ियों की भीड़भाड़ । भारी शोरगुल से तो जैसे दम ही घुटने लगता है। मन करता था कब इस शहर को जल्दी छोड़कर वापस अपने रानीगंज चला जाऊं। रानीगंज एक छोटा सा शहर था। यहाँ वो सब कुछ उपलब्ध नहीं था जो कोलकाता में था । सुकून नहीं था कोलकाता में । वैसे कोलकाता में क्या नहीं है ? इस भीड-भाड़ से इतर कोलकाता वस्त्रों की विविधता और प्रचुर उपलब्धता के लिए प्रसिद्ध है। यहां रेशम, तांत और सूती साड़ियों की विविधताओं में उपलब्ध हैं। नायलॉन, खादी, ढाकाई हथकरघा और बनारसी साड़ियों की कई किस्में यहां उपलब्ध रहती हैं । कोलकाता जब भी आता था तो मित्र के साथ बाजार जाकर पत्नी के लिए सूती साड़ियां जरूर खरीद ले आता था।
जिस शहर में मेरा मन नहीं लगता था, उसी शहर में हर दिन ट्रेन भर भर कर लोग काम करने आते थे। फिर शाम को वापस लौट जाते थे। इस आवाजाही में मुश्किल से वो अपने घर में छह घन्टे से ज्यादा नहीं रह पाते होंगे।
इन सब बातों को अगर छोड़ दूं तो आखिर मैं कोलकाता क्यों आता था और क्यों मेरा मन वहां लग जाता था? कोलकाता में बस मेरा यार अश्वनी था। आज वह भी हम लोगों को छोड़कर चला गया। एक दुर्घटना ने उसकी जान ले ली। जिसे सब एक दुर्घटना मान रहे हैं,दरअसल वो दुर्घटना नहीं है। निश्चित रूप से वो हत्या है,जिसका दोषी मैं हूं । मैं जानता हूं ,आप सब मुझे अभी भी पागल ही समझ रहे होंगे। चूंकि मैं आपको अपना परिचय बता रहा था ,जो अधूरा रह गया है । मैंने हिंदी में पीएचडी कर रखी है। इसलिए मेरे नाम के पहले डॉ लगा हुआ है अर्थात मुझे डॉ. की उपाधि मिली है। मैंने अपने जीवन में कई कहानियाँ और लघुकथाएं लिखी है। इसके बावजूद मैं प्रोफ़ेसर नहीं बन सका। पूरी जिंदगी स्कूल में पढ़ता ही रह गया । अच्छा कहानीकार होने के कारण भी स्कूल में मेरी अवहेलना होती रही। स्कूल तो छोड़िये, घर में भी यही हाल था ,क्योंकि मैं अन्य टीचरों की तरह पढ़ाकर लाखों रुपये नहीं कमा रहा था । ऐसा भी नहींं कहूंगा कि पढ़ाने की इच्छा नहींं थी ।इसकी कोशिश भी की पर हर बार कोई न कोई कहानी मेरे दिमाग में चलने लगती और सुबह -शाम टाईप राइटर पर कहानियाँ टाईप करता रहता। मेरे पास यही वो समय था, जब मैं लिख- पढ़ और बच्चों को ट्यूशन पढ़ा सकता था। किसी ने सही कहा कि एक वक़्त में एक ही काम हो सकता है। सो मैंने एक ही काम चुना लिखने का । हमेशा वही काम करो जो मन का हो। पर तमाम अमूल्य कहानियाँ लिखने के बाद भी मेरा परिवार और समाज मुझे नहीं समझ सका, क्योंकि आज की दुनिया में जीवन की हर उपलब्धि को पैसे से ही मापा जाता है। मैं उस उपलब्धि को अपने लेखन से अर्जित नहीं कर पाया,जिसे फ़िल्म स्टार और क्रिकेटर सहज ही प्राप्त कर लेते हैं ।
पर मुझे इसका मलाल नहीं है, क्योंकि ट्यूशन न पढ़ाने की वजह से ही मैं अपने बच्चों को पढ़ा पाया और आज मेरे दोनो बेटे सरकारी अफसर हैं।
जीवन में मैं इस बात से खुश था, पर धीरे -धीरे जीवन में दुःखों के कई पहाड़ मुझ पर टूटने लगे। सबसे बड़ा दुख तो मुझे मेरे मित्र के दुनिया छोड़ जाने पर लगा।
वैसे मैं दुखी तो बचपन से ही रहा हूं। पांच साल की उम्र में मां छोड़ कर चली गयी। मां और पापा में उस दिन किसी बात को लेकर झगड़ा हो गया था। मां बहुत गुस्से में आ गयी। मां कहने लगी कि"मैं जान दे दूंगी" । पापा ने बस यह कह दिया,जान देना आसान है क्या? बस पापा ने यहीं गलती कर दी। मां ने उस दिन अपने शरीर पर किरासन तेल छिड़ककर अपने आपको आग के हवाले करके यह साबित कर दिया कि जान देना बहुत आसान काम है। लव और कुश जैसे दो छोटे- छोटे बच्चों को छोड़कर मां चली गयी।
पापा को हम दो भाईयों को पालने के लिए दूसरी शादी करनी पड़ी।सौतेली मां के प्यार और सगी मां के प्यार में क्या फर्क होता है ,इसके बाद ही पता चला। इसके पहले मैं मां को सिर्फ मां ही समझता था। दुनिया की हर मां को एक जैसा ही समझता था। धीरे -धीरे मुझे समझ में आने लगा कि कोख से जन्म दी हुई मां और सौतेली मां में एक बड़ा फर्क होता है । उसी
भवर में मैं फस गया था। मां कोई ऐसी वस्तु तो नहीं कि बाजार जाकर दूसरी बदल लाता। कई बार मां की शिकायत पापा से करने की कोशिश भी की, पर हर बार पापा और मां के आपसी प्यार और तालमेल को देख मैं चाह कर भी कुछ नहींं कर पाया। मगर शायद पापा सब कुछ समझते थे । कई बार वो मुझे हाट-बाजार साथ ले जाते और पूछते,"दूसरी मां प्यार करती है न तुझे। "
मैं अक्सर खामोश रहता। फिर पिता मेरी खामोशी से सब कुछ समझ जाते। हम दोनोें की खामोशी का तालमेल मां को हम दोनों के साथ रखे हुआ था। इसी खामोशी की वजह थी कि आज मेरे सौतेले भाईयों ने मुझे जमीन से बेदखल कर दिया है। जमीन पर दावा करने का मतलब है, उनसे लड़ाई-झगड़ा,कोर्ट- कचहरी। अगर मैं इन झंझटों से दूर न रहता तो अपने उपन्यास और कहानियों को पूरा न कर पाता । गांव और भाईयों से दूर होने का फैसला भी मेरा और पिताजी का था। दसवीं के बाद बारहवीं की पढ़ाई के लिए मैं भागलपुर हॉस्टल में चला गया। यहां मैं अपने दोस्तों में रम गया। नये- नये दोस्त बन गये ।गांव बहुत कम जाता। पिताजी ही मुझसे मिलने आ जाया करते। बी.ए पास करके एम.ए में आ गया। यहीं मेरी दोस्ती अश्वनी से हुई थी। उसके पहले मेरा मित्र यतीश हुआ करता था । यतीश अक़्सर अश्वनी के बारे में मुझसे कहा करता था -" एम ए में एक नया दोस्त बना है, जो बहुत ही जीनियस है , बहुत ही अच्छा लड़का है। " यतीश ने मेरा परिचय. अश्वनी से कराया। फिर मेरी भी वही राय थी जो यतीश की थी। उसमें सबसे बड़ी खूबी यह थी कि वह निजी प्रसंगों पर बात न के बराबर करता था, ख़ास कर उन बातों से परहेज़ करता था, जिनमें किसी की बुराई होती हो या ईर्ष्या की झलक मिलती हो। मुझे कोई ऐसी बातचीत याद नहीं है, जिसमें उसने किसी की निंदा की हो।
सबसे खास तो यह था कि उसके चरित्र से उसका चेहरा भी मिलता था। गोरे चेहरे पर घनी काली दाढ़ी,सिर पर घने बाल । उसके चेहरे की चमक किसी को भी अपनी ओर खींच लेती थी। अश्वनी की अपनी विशेषता रही है कि वह जहां भी रहा, उसने शत्रु कम और मित्र अधिक बनाए।
छात्र जीवन से लेकर अब तक हम मित्रों के बीच जाति- धर्म की भावना कभी आड़े नही आई और न तो हम लोगों ने किसी दूसरे के साथ कोई भेदभाव किया। सबसे बड़ी बात कि हमारा पारिवारिक संबंध बहुत दृढ़ था। हमारे साथ-साथ हमारे बच्चे भी आपस में खून के रिश्तों की तरह जुड़ गए थे।
हमारी दोस्ती की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि हमलोग एक दूसरे की टांग खींचने का भरपूर आनंद लिया करते थे। अश्वनी कहता भी था-" तुम लोग मेरी गोदी में बैठकर मेरी दाढ़ी नोंचते रहते हो , क्या मुझे पता नहीं है ? "
इतना जिंदादिल इंसान आखिर ऐसी मौत मरेगा, यह कौन सोच सकता था । सुबह बेटा रसोई में चाय बनाने गया। जैसे ही उसने गैस ऑन किया कि फिर रसोई में आग ही आग के सिवा कुछ नहींं था। यह देख मित्र अश्वनी बेटे को बचाने के लिए आग में कूद कर बेटे को बाहर ले आया। पर आग में वो भी आधा झुलस गया। तत्काल चारों तरफ हो-हल्ला मच गया और आनन -फानन में उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। चूंकि अश्वनी एक कवि था। कोलकाता के सभी साहित्यिक मित्र मदद के लिए अस्पताल पहुंच गये। सूचना मिलते ही मैं रेलवे स्टेशन पहुंच गया। जो ट्रेन मिली,उसी पर सवार जो गया।
वैसे एक बात थी -रानीगंज से कोलकाता जाते वक़्त ट्रेन में तरह -तरह के व्यंजन बेचने वाले आते । खास कर ट्रेन में कचौड़ी, समोसा, प्याज साथ में खीरा और उबले हुए अंडे। अक्सर जब भी कोलकाता जाता तो ट्रेन में कचौड़ी-समोसा का नाश्ता करता था। ऐसा नहींं था कि रानीगंज शहर में कचौड़ी-समोसा नहीं मिलता था। पर ट्रेन के अंदर बड़े- बड़े साइज के कचौड़ी-समोसा की बात ही अलग थी। खैर ! में भी किन बातों में आप सबको उलझा रहा हूं। पर आज इच्छा हो रही है कि आप सबको अपने दिल की सारी बात बता डालूं। सच कहूं तो इन सबकी वजह भी मैं ही हूं और असली दोषी भी। खैर! मैं अपने आपको अगर दोषी मान भी लूं तो मैं अपने आपको क्या सजा दे सकता हूं?
वैसे भी तो डिप्रेशन और नींद की गोलियां खाकर ही सो पा रहा हूं। बड़े बेटे का अपाहिज पैदा होना। छोटे का दारू पीकर शरीर को नष्ट करना। कुछ दिन पहले ही वह हॉस्पिटल में एडमिट हुआ था। गांव से भाईयों का मुझे जमीन -जायदाद से बेदखल करना मुझे बुरी तरह तोड़ गया है।
कई- कई दिनों तक मैं लोगों का फोन नहीं उठाता । कई बार तो मैं मोबाइल भी स्विच ऑफ करके रख देता हूं। मित्रों की मुझसे बहुत शिकायत रहती है कि तुम्हारा फोन नहीं लगता और लगता भी है तो तुम उठाते नहीं।
आखिर कौन मेरी चिंता को बांट लेगा या कम कर देगा?आखिर कौन मेरे कष्ट को दूर कर सकता है?
तीस साल तक स्कूल टीचर की नौकरी की। अपने क्षेत्र का अच्छा कथाकार होने के बावजूद न तो स्कूल के प्रिंसिपल ने और न ही शिक्षकों ने मेरी कोई इज्जत की। मुझे ऐसा महसूस होता था कि यह सब मुझसे जलते हैं। जलते हैँ, इसलिए कह रहा हूं कि आप सब साधारण भाषा में इस तरह की प्रक्रियाओं को जलना-भुनना और अंदर-अंदर सड़ना कहते हैं ।
लोग कहते हैं कि तुम्हें डिप्रेशन किस बात का है? दो बेटों की सरकारी नौकरी लग गई। रानीगंज शहर में तीनतल्ला घर बना लिया। तीस हजार रुपये हर महीने पेंशन आ रही है।
आज जो अश्वनी का दाह - संस्कार करके आ रहा हूं ,क्या यह मेरे डिप्रेशन का कारण नहीं बनेगा? हर सुबह अश्वनी का मुझे फोन आ जाता था और हम घंटों बातें करते। बस यही वो समय था ,जब मुझे सच में खुशी मिलती थी।
हम दोनों की एक -दूसरे से कोई भी बात छिपी नहीं थी। जब उसने अपने बेटे की शादी की बात पक्की की तो मुझे लड़की के बारे पता लगाने को कहा गया। लड़की रानीगंज शहर से थोड़ी दूर स्थित आसनसोल शहर की थी,जो मेरे शहर से मात्र चौदह किलोमीटर दूर है । उस शहर में मेरे कई मित्र भी थे।
फिर बातों -बातों में मित्रों से इस बात की चर्चा कर लड़की के बारे में पता लगाने को कह देता। फिर धीरे -धीरे कई मित्रों से लड़की की जानकारी मेरे पास आने लगी। किसी एक ने गलत कहा होता तो मान लेता लड़की गलत है। पर सबकी राय एक थी। लड़की दो लड़कों से प्रेम लीला कर चुकी थी। पहला प्रेम कॉलोनी के लड़के से थाऔर दूसरी बार का प्रेम यूनिवर्सिटीे में हुआ। दोनों बार प्रेम शादी की दहलीज तक नहीं पहुंच पाया। चूंकि पहले प्रेम के वक़्त उसकी पढ़ने की उम्र थी, सो घर में पता लगते ही भाई ,पिता,मां सबने उसको खूब फटकार लगाई और पास में मोबाईल रखना बंद करवा दिया । मैंने यह सोचा था कि अश्वनी को यह बात बताऊंगा। एक बार कोलकाता गया तो घर पर खुशी का जो नज़ारा देखा तो कुछ कहने की हिम्मत ही नहीं हुई । शाम के वक़्त होने वाली बहू भाभी (अश्वनी की पत्नी) से खूब बातें कर रही थी। बहुत खुश दिख रही थी । भाभी भी होने वाली बहू की खूब तारीफ कर रही थी । यह सब देखकर कुछ कहने की मेरी हिम्मत ही नहीं हुई।
सब कुछ ठीक चल रहा था। अश्वनी का बेटा गौरव एम.ए के बाद एक न्यूज़ एजेंसी में नौकरी पर लग गया। करीब तीन साल नौकरी करने के बाद गौरव नौकरी छोड़कर वापस कोलकाता आ गया और दोबारा नौकरी न करने की बात कही। वो अपना व्यवसाय करना चाहता था।
बस गौरव का यह फैसला बहू को पसंद नहीं था। गौरव दो साल तक कुछ नहींं कर सका। दोनों के बीच मनमुटाव बहुत बढ़ गया था। हां! अश्विनी ने अपने मित्रों से जो आखिरी बात कही थी ,वो यह थी कि गौरव से बहुत बड़ी गलती हुई है। वो कौन सी गलती की बात कर रहे थे? सुबह -सुबह गौरव का गैस का जलाना या नौकरी का छोड़ना? आखिरी सांस तक अश्वनी यही कहता रहा कि गौरव से गलती हो गई है। अब तक भाभी किडनी की बीमारी के वजह से गुजर चुकी थी, जिससे कुछ पता कर सकते।
उस दिन बहू सामने पलंग पर चुपचाप बैठी थी। उसे एक खरोंच तक नहींं आयी थी। घर पर इतना बड़ा हादसा हो जाये और बहू को खरोंच तक न आये। यह बात मेरे पल्ले न पड़ी। खैर! क्या आपको यही लगता है कि इस घटना को जिस तरह मैं देख रहा हूं ,अगर उसी नज़र से आप भी देखें तो इस मौत
का जिम्मेदार क्या मैं नहीं लगता?
अश्वनी को दुनिया से गये आज चार महीने हो गये हैं। बहू अश्वनी के घर पर ही रह रही है । वो उस जगह को छोड़ कर नहीं गयी है।वहीं एक प्राईवेट स्कूल में नौकरी पकड़ ली है । अश्वनी के पूरे जायदाद की मालकिन अब वही है। मेरे मन में बहुत कुछ जानने की इच्छा थी। पर सच तो यह है कि मैं अश्वनी से मिल ही नहीं पाया। डॉक्टरों द्वारा उससे मिलने की मनाही थी। बेटा और बाप दोनो ही आई सी यू में थे।
मुझे दुख इस बात का है कि विदा होने से पहले मैंने भाभी को देखा था , गौरव को देखा था , लेकिन अश्वनी को देखने का मुझे अवसर ही नहीं मिला। एक तरह से यह अच्छा भी है कि उसका सौम्य चेहरा ही अभी तक मेरी आंखों में बसा हुआ है। जब तक हम लोग जिंदा हैं, भौतिक रूप से ही उसकी विदाई हुई है।वह हमारी स्मृतियों से दूर जा ही नहीं सकता। कैसे उसे विदाई दे दूं ?
परिचय
ईमेल: bikram007.2008@rediffmail.com
जन्म : १ जनवरी १९८१ को जमशेदपुर (झारखण्ड) में
शिक्षा: ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा
संपर्क : बी-११, टिहरी विस्थापित कॉलोनी, हरिद्वार, उत्तराखंड-२४९४०७
0 देश भर की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कहानियाँ प्रकाशित
0 प्रकाशित कहानी संग्रह :
" और कितने टुकड़े"(२०१५)
प्रकाशित उपन्यास -"अपना खून","लक्खा सिंह",मऊ जंक्शन
फ़िल्म-निर्माण - "पसंद-नापसंद" (शॉर्ट फिल्म) "वजह''(शॉर्ट फिल्म)
अभिनय:- "त्वमेव सर्वम्" (शॉर्ट फिल्म)
पी से प्यार फ से फरार (हिंदी फीचर फिल्म)
"मेरे साँई नाथ," (हिंदी फिल्म)
पसंद-नापसंद (शॉर्ट फिल्म)
लेखन और अभिनय
वजह(शॉर्ट फिल्म)- लेखन और अभिनय
एक अजनबी शाम - मुख्य भूमिका
पुरस्कार:-
* बेस्ट स्टोरी (मधुबनी फिल्म फेस्टिवल)
* अवार्ड ऑफ एक्सीलेंस (हमीरपुर, हिमाचल फिल्म फेस्टिवल)&
*आउट स्टैंडिंग अचीवमेंट अवॉर्ड (टैगोर इंटरनेशनल शॉर्ट फिल्म फेस्टिवल)
*बेस्ट शॉर्ट फिल्म ऑन सोशल अवॉर्नेस (पिंक सिटी इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल)
*अवॉर्ड फेस्टिवल स्पेशल मेंशन (चंबल इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल)