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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

30 जून, 2019

पाठ

84वीं सृजन संवाद’ गोष्ठी में कहानीकार खुर्शीद हयात का कहानी पाठ


जमशेदपुर, 9 जून 2019 ‘सृजन संवाद’ की 84वीं गोष्ठी में बिलासपुर से आए उर्दू के कहानीकार-सामाजिक कार्यकर्ता खुर्शीद हयात ने अपनी कहानी ‘नदी, पहाड़, औरत’ का पाठ किया। कहानी स्त्री को नदी और पुरुष को पहाड़ के रूप में चित्रित करती है। पर्यावरण की चिंता से लैस कहानी पर श्रोताओं ने अपनी- अपनी प्रतिक्रिया दी।



डॉ. सन्ध्या सिन्हा को कहानी प्रकृति का केनवस और मानव मन की विसंगतियों को दिखाती नजर आई। मुंबई से आए अभिनेता संजय ने कहा कि इस कहानी में कोई एक करैक्टर नहीं है, इसके बावजूद ढ़ेर सारे पात्र कहानी को संपूर्ण बनाते हैं। डॉ. मीनू रावत के अनुसार कहानी उर्दू में होने के कारण समझने में थोड़ी दिक्कत हुई। यदि इसे सुना नहीं, पढ़ा जाए तो समझने में अधिक आसानी होगी। अजय मेहताब ने इसे कई रंग की कहानी बताया, जिस पर शोध की आवश्यकता है।
डॉ. आशुतोष ने कहानी की भाषा को काव्यात्मक बताते हुए निर्मल वर्मा का जिक्र किया। कहानी आज के भयावह समय को प्रतिबिम्बित करती है। अरविंद अंजुम ने कहानी में मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक तत्वों की चर्चा की। अभिषेक गौतम ने कहानी में स्त्री तत्वों की चर्चा करते हुए कहा कि यदि स्त्री नहीं होगी तो कुछ भी नहीं बचेगा। प्रदीप कुमार शर्मा ने कहानी में प्रकृति के नष्ट होने की चिंता को रेखांकित किया।
डॉ. विजय शर्मा ने कहानीकार के पढ़ने और यूट्यूब पर किसी दूसरे द्वारा पढ़े जाने के अंतर को बताया। कहानीकार के मुँह से कहानी सुनना भिन्न रस का संचार करता है। खुर्शीद हयात ने इस कहानी में बहुत सारे दृश्य खड़े किए हैं, ऐसा लगता है, किसी गैलरी में चित्र प्रदर्शनी लगी हो। कहानी एक से अधिक पाठ की माँग करती है। अनवर इमाम के अनुसार कहानी का प्रवाह बहुत तीव्र है। कहानी श्रोता को बाँधे रखने में सक्षम है ऐसा डॉ. चंद्रावती का विचार था। अपर्णा संत सिंह तथा सरिता सिंह ने भी कहानी पर अपने विचार रखे।
इसके साथ ही ‘सृजन संवाद’ ने अपने सात वर्ष पूरे किए।विजय शर्मा ने सदस्यों का धन्यवाद किया। जुलाई, आठवें वर्ष की शुरुआत प्रेमचंद के साहित्य पर आधारित गोष्ठी से होगी, इस विचार के साथ सभा समाप्त हुई।
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प्रस्तुत कर्ता: विजय शर्मा

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