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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

04 अगस्त, 2019

‘सृजन संवाद’ में प्रेमचंद के साहित्य पर बनी फ़िल्मों की चर्चा एवं प्रदर्शन

विजय शर्मा

जमशेदपुर. ‘सृजन संवाद’ ने 85वीं मासिक गोष्ठी के साथ अपने 8वें वर्ष में प्रवेश किया। 20 जुलाई की शाम जमशेदपुर के साहित्य प्रेमी प्रेमचंद की फ़िल्मों तथा साहित्य पर चर्चा करने एवं फ़िल्म क्लिपिंग्स देखने हेतु सीतारामडेरा में एकत्र हुए। सबसे पहले उभरते रचनाकार प्रदीप कुमार शर्मा ने प्रेमचंद की कहानियों के पात्रों पर अपनी बात रखते हुए बताया कि प्रेमचंद के पात्र सदैव जीवित रहेंगे। उन्होंने प्रेमचंद के पात्रों को आधुनिक संदर्भों से जोड़ा। डॉ. मीनू रावत को आपत्ति थी कि प्रेमचंद के कई पात्र आत्महत्या क्यों करते हैं? डॉ. सन्ध्या सिन्हा ने प्रेमचंद के साहित्य में नारी पात्रों पर लिखा अपना पर्चा पढ़ा। उन्होंने बताया प्रेमचंद कई स्थानों पर अपने नारी पात्रों को लेकर संशय की स्थिति में हैं। बात को आगे बढ़ाते हुए डॉ. आशुतोष कुमार झा ने कहा कि जिस तरह शरतचंद नारी को ले कर स्पष्ट हैं, उनकी दुर्दशा का चित्रण करते हैं, वैसा प्रेमचंद के यहाँ अधिक नहीं मिलता है। शरतचंद को भावुकता का तमगा दे कर हाशिए पर डालना उचित नहीं है। जोबा मुर्मू ने बताया कि वे प्रेमचंद की कहानियों का संथाली में अनुवाद कर रही हैं।


डॉ. विजय शर्मा ने प्रेमचंद के साहित्य पर बनी फ़िल्मों की चर्चा करते हुए बताया कि भले ही प्रेमचंद को सिने-जगत रास न आया हो मगर सिने निर्देशकों को वे रास आए। त्रिलोक जेटली, मृणाल सेन, सत्यजित राय, अजय मेहरा, गुलजार जैसे निर्देशकों ने इनके काम पर फ़िल्म बनाई है। ‘मजदूर’ फ़िल्म की कहानी स्वयं प्रेमचंद ने लिखी मगर जब फ़िल्म बन कर तैयार हुई तो कहानी भिन्न थी, प्रेमचंद इससे बड़े निराश हुए। ‘सेवासदन’ पर उसके उर्दू शीर्षक ‘बाजार-ए-हुस्न’ तथा ‘सेवासदन’ नाम से फ़िल्म बनी जो नहीं चलीं, लेकिन बाद में तमिल में ‘सेवासदनम’ नाम से फ़िल्म बनी जिसमें एम. एस. सुब्बलक्ष्मी ने अभिनय किया और इसकी खूब प्रशंसा हुई। त्रिलोक जेटली की बनाई ‘गोदान’ फ़िल्म के होली दृश्य की क्लिपिंग दिखाते हुए विजय शर्मा ने बताया कि इस फ़िल्म का संगीत विश्वप्रसिद्ध संगीतकार रविशंकर ने दिया है। यहाँ होली के पारम्परिक प्रतीकों का प्रयोग हुआ है। गोबर पिचकारी का बाँसुरी के रूप में भी प्रयोग करता है। साथ में ढोलक, ढप्प, झाँझ मंजीरा, तबला तो हैं ही। इस श्वेत-श्याम फ़िल्म के होली गीत को अनजान ने लिखा है। हालाँकि फ़िल्म नहीं चली लेकिन इसका होली गीत आज भी बराबर सुनाई देता है। इस फ़िल्म में हास्य अभिनेता महमूद ने गंभीर भूमिका की है। इसके अन्य गीत भी लोकप्रिय हुए।
प्रेमचंद के ‘गबन’, ‘सद्गति’, ‘दो बैलों की कथा’, ‘कफ़न’ तथा अन्य कहानियों पर फ़िल्म बनीं। मृणाल सेन ने ‘कफ़न’ पर तेलगू भाषा में फ़िल्म बनाई जबकि सत्यजित राय ने ‘सद्गति’ तथा ‘शतरंज के खिलाड़ी’ पर हिन्दी भाषा में फ़िल्में बनाई। ‘शतरंज के खिलाड़ी में राय ने अवध की संस्कृति का ध्यान रखते हुए ऐसे अभिनेताओं का चुनाव किया जिनकी उर्दू-हिन्दी जबान साफ़ है। हालाँकि राय ने फ़िल्म का अंत बदल दिया है मगर इससे फ़िल्म में निखार आ गया है और वह वर्तमान से जुड़ गई है।
गोष्ठी में परमानंद रमण, ऋतु शुक्ला, कन्हैया कुमार तथा जोबा मुर्मू ने भी अपनी बात रखी। अगस्त की गोष्ठी में काव्य पाठ रखने के विचार के साथ गोष्ठी संपन्न हुई।
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विजय शर्मा

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