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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

13 मई, 2020

लॉकडाउन के समय शिक्षक और शिक्षार्थियों की चुनौतियाँ



अनुपमा तिवाड़ी



यूँ तो देश और दुनियाभर में लॉकडाउन से हर क्षेत्र में असर पड़ा है. लेकिन इस महामारी के संकट में विद्यालयों के सामने यही एक विकल्प था कि बच्चों की शिक्षा की निरंतरता को ऑनलाइन माध्यम से जारी रखा जाए.इस समय विद्यालय यदिबच्चों के साथ किए जाने वाले कामों में अधिक सूझबूझ और धैर्य से काम लें तो वे लॉकडाउन और इस बीमारी की भयावहता को कम करते हुए इसे एक सुन्दर अवसर बना सकते हैं यह तो है कि जो काम विद्यालयों में बच्चों के साथ मिलकर किए जा सकते थेवे डिजिटल गजेट्स को काम में लेते हुए उतनी गुणवत्ता के साथ नहीं किए जा सकते हैं.फिर भी यह एक अच्छा अवसर हो सकता है जब हम अपने परिवार के सदस्यों के साथ अधिक समय बिता सकते हैं,आपस में मिल बैठकर एक दूसरे से सीख सकते हैं. डिजिटल गजेट्स के माध्यम से दूर बैठे अपने परिजनों और मित्रों के साथ जुड़े रह सकते हैं.

आमतौर पर सरकारी स्कूल्स के शिक्षक,कोविड– 19 के काम में सरकार के साथ सीधे फील्ड में उतर कर सहयोग कर रहे हैं. वहीँ वे बच्चों को ऑनलाइन टीचिंग भी करवा रहे हैं जिससे बच्चों के साथ शिक्षण कार्य में उनकी नियमितता बनी रहे. इस ऑनलाइन टीचिंग में उच्चप्राथमिक और माध्यमिक स्तर के बच्चे तो लगभग जुड़ पा रहे हैं लेकिन प्राथमिक स्तर पर कहीं – कहीं बच्चे इससे नहीं जुड़ पा रहे हैं. आमतौर पर परिवारों में बड़े बच्चों की तुलना में छोटे बच्चों की शिक्षाको  वरीयता नहीं दी जा रही है. कई परिवारों में बालकों को तो ये अवसर मिल पारहे हैं लेकिन बालिकाएँ बीच – बीच में घर के कामों में भी सहयोग कर रही हैं जिसके कारणों की जड़ें भारतीय परिवारों में बालिकाओं के पालन – पोषण, उनसे अपेक्षाओं और उनके भविष्य की तस्वीर में देखी जा सकती है.कहीं – कहीं माता – पिता के पास लेपटॉप तो क्या की – पैड वाले फोन ही हैं जिनमें इंटरनेट नहीं होने सेबच्चे व्हाट्सएप और मेल के माध्यम से शिक्षण कार्य से नहीं जुड़ पा रहे हैं. कई सारे परिवारों में तो रिचार्ज नहीं करवा पाने की समस्या भी माता – पिता के सामने है. ऐसे में बच्चे अपने परिवार में और अधिक अभाव को महसूस कर रहे हैं.

वहीँ निजी विद्यालयों की स्थिति और भी विकट है. बहुत से निजी विद्यालय बच्चों के साथ प्रतिदिन पाँच – पाँच घंटे तक की कक्षाएँ आयोजित कर रहे हैं. जिसमें बच्चों और शिक्षकों का काफी अधिक समयऑनलाइन कक्षा के माध्यम से घंटों लेपटॉप या मोबाईल पर बैठना शारीरिक ही नहीं मानसिक रूप से भी उन्हें पीड़ा देने वाला है. कई बार बीच – बीच में नेटवर्क का चला जाना, आवाज़ का बीच – बीच में अवरुद्ध होना जैसी समस्यायें अपनी जगह हैं. यदि घर में एक लेपटॉप है और माता – पिता दोनों कामकाजी हैं तो गेजेट्स की उपलब्धता की समस्या और बढ़ जाती है. कई बार शिक्षक – शिक्षिका द्वारा शिक्षण कार्य के दौरान बच्चों को कुछ लिंक भेजे जाते हैं.जिन्हें खोल कर उन्हें पढ़ना – समझना होता है,कक्षाकार्य और होमवर्क को अपलोड या व्हाट्सएप करना होता है और समझ नहीं आने पर उन्हें अपने घर में किसी अन्य सदस्य की मदद लेनी होती है. ऐसे में परिवार के सदस्यों की झुंझलाहट या परेशानी का सबबभी बच्चा महसूस कर रहा होता है.

अब यदि शिक्षकों को देखें तो उन्हें बच्चों के साथ तो हमेशा बने ही रहना होता है.इसके बाद उन्हें बच्चों के काम को चेक करके उन्हें भेजना, होमवर्क डालना जैसे काम भी करने होते हैं. इसके अलावा अपने विद्यालय प्रशासन को प्रतिदिन किए काम को रिपोर्ट भी करना होता है जो कि अमूमन सामूहिक बैठक के रूप में साझा करते हुए किया जाता है. यह प्रक्रिया एक अच्छे खासे समय की माँग करती है. अभी इन दिनों सोशल साइट्स पर बहुत तरह की वार्ताएँ और कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं इसलिए कई निजी स्कूल्स भी अपने शिक्षकों के लिए शिक्षाविदों और अनुभवी शिक्षकों के द्वारा शिक्षा से जुड़े सत्रों का आयोजन कर रहे हैं.जिसमें सभी शिक्षकों को अपनी भागीदारी  सुनिश्चित करनी होती है.

इस पूरी कवायद को यदि देखें तो हम पाएँगे कि शिक्षण कार्य की यह प्रक्रिया अपनी सहजता और जीवन्तता खोती दिखाई दे रही है. यदि विद्यालय प्रशासन बच्चों के परिवारों की स्थिति, बच्चों के बाल मनोविज्ञान और अपने कार्मिकों की आवश्यकता / क्षमता पर विश्वास करते हुए काम करें तो वेशिक्षण की इस प्रक्रिया को एक सुन्दर अवसर में तब्दील कर सकते हैं.

यदि हम शिक्षा के यदि वृहद् उद्देश्यों को हम देखें तो पाएँगे कि बच्चों के साथ कक्षा में जिन दक्षताओं पर औपचारिकता के चलते कम काम हो पाता था, इस समय उन पर थोड़ा ठहरकर, गहराई के साथ काम कर लिया जाए तो एक अनौपचारिक माहौल में सीखने को और अधिक आनंददायी बनाया जा सकता है. जब हम अनौपचारिक रूप से बच्चों के साथ कुछ काम करते हुएऔर अधिक रचनात्मकता, कल्पना करने, चिंतन और विश्लेषण करने के  अवसर उपलब्ध करवाते हैं तो बच्चे सहज ही कई चीजों को स्वतः ही सीख लेते हैं जैसे - इन दिनों बच्चों को चित्र बनाने, कहानी – कविताओं की छोटी – छोटी पुस्तकें, कुछ पहेलियों ( हिंदी, गणित या अन्य प्रकार की ) हल करने को दी जा सकती हैं.कुछ कहानियों के ऑडियो, वीडियो और बाल फिल्म्स दी जा सकती हैं जिन्हें बच्चे अपने परिवारों के साथ भी देख सकते हैं. बच्चे और उनके माता – पिता कहानी सुनाने या बालगीत के छोटे – छोटे वीडियो बना कर अपलोड कर सकते हैं. बच्चे एकदूसरे को पत्र लिख सकते हैं. अपने अनुभवों को लिखकर साझा कर सकते हैं. इस सब सेबच्चों में भाषा, गणित, पर्यावरण और न जाने कितने ही गैरसंज्ञानात्मक दक्षताओं का भी विकास किया जा सकता है. हाँ, इन सबका मूल्यांकन एक परीक्षा या होमवर्क चेक करने जैसा नहीं हो. इसी प्रकार कहानियों में सीख और शिक्षा मिलने जैसी बातें सीधे – सीधे नहीं हों.सभी बच्चे अपनी क्षमतानुसार चीजों को समझने का प्रयास करते हैं और अपने विवेक को काम में लेते हुए सीख भी लेते हैं. इस समय माता – पिता भी बच्चों के साथ हो रहे काम में अनौपचारिक रूप से जुड़ सकते हैं.बच्चों के साथ हर दूसरे या तीसरे दिन घंटे – दो घंटे जुड़कर उनसे फीडबेक लिया जा सकता है, उनकी पसंद – नापसंद को जानते हुए उन्हें आवश्यकतानुसार सामग्री भेजी जा सकती है.

जहाँ तक शिक्षकों का सवाल है उनसे भी अनौपचारिक माहौल में उनके बच्चों के साथ के और स्वयं के अनुभवों को साझा किया जा सकता है. उनकी क्षमतावर्धन पर काम किया जा सकता है. उन्हें शिक्षा और बाल मनोविज्ञान से जुड़े अच्छे लेख या पुस्तकें भेज कर रिव्यू लिखने जैसे कामों के सुझाव दिए जा सकते हैं. अपने विषय में और बेहतर तरीके से काम करने की योजनाएँ साझा की जा सकती हैं. हमें यह ध्यान रखना होगा कि सीखने में ज्ञान का थोपा जाना सीखने वाले को सीखने से विमुख कर देता है फिर चाहे बड़े हों या बच्चे. एक अनौपचारिक, सुखद और रचनात्मक माहौल ही सीखने – सिखाने में सहायक हो सकता है.







अनुपमा तिवाड़ी

(शिक्षाविद, साहित्यकार व सामाजिक कार्यकर्ता)



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