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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

23 जनवरी, 2026

राजकुमार कुम्भज की दो कविताऍं


सर्दियाॅं पास हैं,तो वसंत भी दूर नहीं









एक

अभी ठिठुर रहे हैं शब्द 

अपने भीतर अपने ताप के लिए 

तंबू तने हैं घने-सूने जॅंगलों में 

पीने के पानी की कमी है चहूॅं-ओर

सरकारें सेंक रही हैं मुर्गे और

भेड़ेंऔर तीतर वग़ैरह

बकरियाॅं मिमिया रही हैं समर्थन में 

चूहे लिख रहे हैं प्रशस्तियाॅं और प्रार्थना-पत्र 

खेतों में लहलहा रहा है

अकाल जैसा ही कुछ-कुछ 

नालियों में विचार और व्यवहारिकताऍं

सभी दुबके हैं अभी ओढ़कर कंबल 

जाग रही हैं, झाॅंक रही हैं बहते जल में 

झिलमिल-झिलमिल  

गिलहरियाॅं ,तितलियाॅं और चींटियाॅं

शेरों को,मगरमच्छों को,हो रहा है अजीर्ण

सर्दियाॅं पास हैं,तो वसंत भी दूर नहीं 

साॅंसत में हैं प्राण प्रायः

०००

दो

बुझी हुई कंदील लिए हाथों में 

अंधे,अंधों को,अंधेरे में दिखा रहे हैं रास्ता 

और बम-बम बमबारी करते हुए 

चिल्ल-पों मचाते हुए इधर-उधर की 

बता रहे हैं कि इधर, इधर ही  है मुक्ति-मार्ग 

सर्दियाॅं पास हैं, तो वसंत भी दूर नहीं 

अच्छे दिनों का स्वादिष्ट है अचार 

और बेहद चटपटा भी कुछ कम नहीं 

कारागृह जाने से बचाता है बख़ूबी 

कपड़े बदलना भी सिखाता है 

जो सीख गये कुशल कारीगर कहलाये 

और जो सीख नहीं पाये ये महान कला

पीछे-पीछे आये,आते गये पैदल 

आहिस्ता-आहिस्ता. 

०००


स्त्रियों से ही है वसंत.

_________

स्त्रियों से ही है वसंत

और स्त्रियों से ही है जीवन-सुख अनंत

न हों स्त्रियाँ तो फिर कैसा ब्रह्म,कैसा ब्रह्मांड ..?

नदियाँ स्त्रियों से,फूलों में ख़ुशबू स्त्रियों से,

आकाश स्त्रियों से,आकाश में उड़ना स्त्रियों से 

शस्त्र और शास्त्र स्त्रियों से और हार-जीत भी

पाँव-पाँव चलता है,दौड़ता है,हाँफता है संसार 

तार-तार भी,बेतार भी,हो जाता है स्मृतियों में

पहाड़ सदियों के ढोता है अपने काॅंधों पर 

बिजली के तारों से लपेटता है दु:ख अपने  

दुःख मगर स्त्रियों के भी तो कुछ कम नहीं 

टुकड़ा-टुकड़ा सुलगती रहती हैं गीली लकड़ियाँ 

जीवन में जीवनभर के लिये भर जाता है धुआँ

अक्षर-अक्षर क्षरण,घिसता है पत्थर भी

परिभाषाएँ बदलती नहीं हैं ताप की,संताप की 

जितना-जितना खुलती हैं अपनी आकाँक्षाओं में

उतना-उतना बंद होती जाती हैं स्त्रियाँ 

अपनी पवित्रताओं से करती हैं उद्धार सभी का

उनकी सोच सिर्फ़ उनकी नहीं,न प्रेम ही

एकाकी कुछ नहीं उनके एकान्त में कुछ भी नहीं 

ढोल-ढमाके छीनते ही रहते हैं उनके सपने 

सपने वे भी छिन ही जाते हैं स्त्रियों के

स्त्रियाँ जो देखती हैं सपने दूसरों के लिए

दूसरों की दुनिया में जीवन नहीं,जीवन का अनंत है 

स्त्रियों से ही वसंत है.

०००

 

ये वसंत है कि दोस्त कोई.

             एक

ये वसंत है कि दोस्त कोई 

मुड़ता नहीं,मोड़ता नहीं जोड़ता है  

कि जैसे पानी को पानी से 

कि जैसे धूप को धूप से 

कि जैसे पसीने को पसीने से 

और कि जैसे धूल को धूल से 

बात नहीं सिर्फ़ बदलते मौसम की

बात है उन तमाम कारगुज़ारियों की

जो बाॅंधती हैं,बनाती हैं बंधक

और जो रोकती हैं उड़ानों की तमीज़

चरण-चरण बदलते रहते हैं आचरण 

चरण-चरण उठते आते हैं अंधड़ धूलभरे 

चरण-चरण बदमाशियाॅं,बेईमानियाॅं

छुप-छुप जाते हैं चेहरे और चरित्र 

बदल जाती है चाल भेड़ियों की 

अनायास ही हो जाते हैं विनम्र 

मुर्गे बन जाते हैं मोर अपनी कलाबाज़ी से 

और सरपट चुगने लगते हैं योजनाऍं

चुग़लख़ोर टोपियाॅं छुपाने लगती हैं गंजत्व

फिर भी है अकाल जैसे मृत्यु सिर ऊपर 

मैं करता हूॅं कोशिश कि उठाऊॅं पत्थर 

और दे मारुॅं अपनी ही खोपड़ी पर 

क्यों फॅंसा रहा परछाइयों के बीच 

क्यों बॅंधा रहा अंधेरी गुप्त गुफ़ाओं में

छेड़खानी करता है ज़िद के साथ-साथ 

ये वसंत है कि दोस्त कोई?

_____________

 छुपा रुस्तम है वसंत.

              दो

कोई चुग़लख़ोर है सामने

दंडकारण्य में बिल्कुल वस्त्रहीन 

फटी जेब है,फटा है कुर्ता 

टॅंगा है लालक़िले की दीवार पर

काॅंप रही हैं दीवारें,काॅंप रहे हैं पहरेदार 

वज़ह बताती हैं बहती हवाऍं कि बार-बार 

फटा कुर्ता टकराता है दीवारों से 

ज़मीन कुरेदती है सुबह की पारदर्शी धूप 

उछलते-कूदते हदें पार करते हैं खरगोश 

कच्चे धागे से बॅंधी आती हैं तितलियाॅं

वह जो दिखाई नहीं देता है कहीं भी 

छुपा रुस्तम है वसंत.

०००

वसंत नहीं है नौकर.

             एक

प्रेम नहीं,शराब नहीं,दु:ख नहीं

विचार नहीं,सवाल नहीं,जीवन नहीं 

सपना नहीं,भरोसा नहीं,उम्मीद‌ नहीं 

तब फिर यहाॅं रहने लायक़ ऐसा है ही क्या 

कि जिसके लिए मर जाना चाहिए मुझे 

कोई तो बताए,कोई तो सुझाए फटाफट 

कि जब शून्य ही शून्य है चारों तरफ़

तब फिर पहरा क्या,ख़तरा क्या 

क्यों नहीं करूॅं फिर अभिव्यक्ति धड़ल्ले से 

क्यों चुप-चुप का घुटनभरा नाटक करूॅं 

क्यों भीतर ही भीतर हो जाऊॅं आत्महंता

क्यों कहलाऊॅं इतिहासहंता नौकर नहीं हूॅं 

क्यों नाटकीयता से हॅंसता रहूॅं बेशर्म- हॅंसी

और क्यों  रखूॅं खोपड़ी अपनी सफाचट 

क्यों नहीं उठाऊॅं पत्थर,क्यों नहीं ख़तरे 

ख़तरे उठाने की होती है ज़िद और क़ीमत

तो क्यों नहीं उठाऊॅं कुछ चीज़ें वज़नदार

जान भी जा सकती है इस सब खेल में, 

जाए तो जाए,जान जाने से फ़र्क़ क्या 

लेकिन जब है ही नहीं कोई विकल्प

तो फिर करूॅं क्या जीवन-युद्ध जीतने में 

वसंत नहीं है नौकर किसी के बाप का  

कि जगराता करता फिरे गली-गली 

और पीटता रहे ढ़ोल-ताशे,माथा 

विकल्प नहीं होने से कितना सरल 

और कितना सुंदर से सुंदरतम है जीवन 

सब है,सब अच्छा ही अच्छा है,यहाॅं-वहाॅं

कहीं कोई संघर्ष नहीं,कुछ भी बंद नहीं

कहीं भी,कोई भी ख़तरा उठाने का 

ज़रा-ज़रा भी सवाल नहीं,मलाल नहीं 

धार नहीं,तलवार नहीं, कहीं कोई 

ख़तरे जैसा ख़तरनाक कोई ख़तरा नहीं 

ग़ुलाम हुए तो हुआ क्या,सब शून्य 

आना हुआ,जाना हुआ और हुआ और

सही-सही काम याद करते हुआ भूलना  

भूलता हूॅं,स्याह सब भूलता हूॅं मैं इधर 

ज़रुरी तो नहीं कि हर मुश्किल दौर में 

ज़ुबान हो मुॅंह में.

०००


फिर-फिर पूछता है वसंत.

            एक

जागना है, सोना है, मर्ज़ी है 

ज़बरदस्ती आख़िर क्यों और किसलिए 

वसंत को आना है वह आ रहा है

निमंत्रण की कभी भी रही नहीं ज़रूरत 

जहाॅं-जहाॅं बाक़ी है ध्वनियों में रिक्तता 

वहाॅं-वहाॅं बाक़ी है अभी थोड़ा अतिरिक्त 

फिर सवाल बनकर बदल रहा है मौसम 

कम नहीं है कालिख पोतने की दुर्भावनाऍं

उल्लुओं का प्रवेश हुआ नहीं है निषिद्ध 

मामला अस्पृश्यता से कहीं अधिक 

इस जासूसी में होता जा रहा है सक्रिय 

कि कहाॅं-कहाॅं पानी में छुपी है आग 

क्यों जागती हैं,जगाती हैं ख़ुशबुऍं सब   

क्यों राख के ढ़ेर में चुप बैठी हैं चिंगारियाॅं

क्यों पत्थर हुई जाती हैं विचार  की उड़ानें

फिर -फिर पूछता है वसंत.

००००


मैं ढूॅंढ़ता हूॅं वसंत.

दहशत ही दहशत है चारों ओर 

भीतर भी बाहर भी हुबहू वही की वही 

मैं दहशत में हूॅं भारी दहशत है मुझ में 

जानता हूॅं कुछ-कुछ और शायद सही भी 

कि दहशत की वज़ह हैं क्या-कैसी 

मैं ढूॅंढता हूॅं वसंत कि ख़ुद में ताप

एकाॅंगी राह पर एकाॅंगी चलता है वह जो 

सिर्फ़ अपनी ही फ़ितरत में रहता है वह 

कहता है फूलों को खिलने दो

ख़ुशी-ख़ुशी खेलने दो बच्चों को 

मैं ढूॅंढता हूॅं वसंत कि पाऊॅं चार-यार 

मगर बाग़-बग़ीचे,खेल-मैदान,पाठशालाऍं 

मस्ती में गाते-गुनगुनाते हुए उजाड़ते हुए 

अपनी ही ज़िद लिए चलता है वह जो 

खौलता दूध खौलता आदमी देखते ही 

नालियाॅं साफ़ करवाता है वह जो 

क़ानून उसका,क़ानून में सुधार उसका

मैं ढूॅंढता हूॅं वसंत कि रॅंग सूर्योदय 

गिरगिट के रॅंगों पर अधिकार उसका 

कौन रॅंग किसका,कौन रॅंग खिसका 

हर कोई भूतों की टोली का वारिस 

प्रेतात्माओं की हड्डियों का अन्वेषक 

बेशर्म श्मशानी चीज़ों का बशर्म संपादक 

चहुॅंओर,चहुॅंओर आते-जाते फैलाता खुजली और हैजा और अफ़वाहें 

मैं ढूॅंढता हूॅं वसंत कि नहाता मौसम 

सड़ाॅंधभरे बिस्तर,सड़ाॅंधभरे दिमाग़

पता नहीं कौन,कहाॅं,किसके साथ है 

छोटे-छोटे आदमियों के लम्बे-लम्बे हाथ हैं

पकड़ नहीं पाते हैं मगरमच्छ

दिन-रात पकड़ते रहते हैं मच्छर

पकड़े रहते हैं चम्मच,उठाते रहते हैं लोटा

काटते रहते हैं चाॅंदी से लोहा हर-कहीं  

चाबुक हैं,पोस्टर हैं,ख़ूनी दीवारों पर 

दहशत ही दहशत है चारों ओर

मैं ढूॅंढता हूॅं वसंत.

०००

मैं पुकारता हूॅं वसंत फिर-फिर.

                 तीन

पीठ पीछे भी होते हैं आईने

जिनके भीतर कच्चे चिट्ठे और दु:ख 

रखे रहते हैं सभी के कुछ ऐसे 

कि जैसे जॅंगल में बूढ़े वृक्ष 

और बहती नदियों में नन्हीं मछलियाॅं

मैं पुकारता हूॅं वसंत फिर-फिर 

हरी शाखें इकठ्ठा करते हुए 

भूलते हुए उन मृतकों के पते-ठिकाने 

जिन्होंने कभी देखा नहीं,चखा नहीं नीम

जो हमेशा ही चखते रहे 

चूसते रहे गन्ना और पसलियाॅं

सच और सच्चाईयाॅं छोड़ते हुए 

झूठ और झूठी बातों का अजीर्ण है वहाॅं

काठ के ऊल्लू परोस रहे हैं कालिख

ढ़ोर हैं कि उड़ा रहे हैं पैरों से धूल 

मैं पुकारता हूॅं वसंत फिर-फिर 

ये देखने के लिए कि अब बचे ही कितने हैं

यहाॅं-वहाॅं लुटे-पिटे प्रतिपक्ष के पक्ष में थे 

मारे गए गुलफ़ाम सभी के सभी 

चौराहे-चौराहे पर लगीं हैं तख़्तियाॅं

प्रेम लुटाया जिसने भी अंततःबचा ही नहीं

किसी को भी पानी पिलाने के क़ाबिल 

अच्छा हुआ जो मर गए वे मुझ से पहले 

वर्ना पकड़ गला मारे जाते बीच बाज़ार 

मैं पुकारता हूॅं वसंत फिर-फिर.

०००

सर्दियाॅं पास हैं,तो वसंत भी दूर नहीं.

एक 

अभी ठिठुर रहे हैं शब्द 

अपने भीतर अपने ताप के लिए 

तंबू तने हैं घने-सूने जॅंगलों में 

पीने के पानी की कमी है चहूॅं-ओर

सरकारें सेंक रही हैं मुर्गे और

भेड़ेंऔर तीतर वग़ैरह

बकरियाॅं मिमिया रही हैं समर्थन में 

चूहे लिख रहे हैं प्रशस्तियाॅं और प्रार्थना-पत्र 

खेतों में लहलहा रहा है

अकाल जैसा ही कुछ-कुछ 

नालियों में विचार और व्यवहारिकताऍं

सभी दुबके हैं अभी ओढ़कर कंबल 

जाग रही हैं, झाॅंक रही हैं बहते जल में 

झिलमिल-झिलमिल  

गिलहरियाॅं ,तितलियाॅं और चींटियाॅं

शेरों को,मगरमच्छों को,हो रहा है अजीर्ण

सर्दियाॅं पास हैं,तो वसंत भी दूर नहीं 

साॅंसत में हैं प्राण प्रायः

०००


सर्दियाॅं पास हैं,तो वसंत भी दूर नहीं.

दो 

बुझी हुई कंदील लिए हाथों में 

अंधे,अंधों को,अंधेरे में दिखा रहे हैं रास्ता 

और बम-बम बमबारी करते हुए 

चिल्ल-पों मचाते हुए इधर-उधर की 

बता रहे हैं कि इधर, इधर ही  है मुक्ति-मार्ग 

सर्दियाॅं पास हैं, तो वसंत भी दूर नहीं 

अच्छे दिनों का स्वादिष्ट है अचार 

और बेहद चटपटा भी कुछ कम नहीं 

कारागृह जाने से बचाता है बख़ूबी 

कपड़े बदलना भी सिखाता है 

जो सीख गये कुशल कारीगर कहलाये 

और जो सीख नहीं पाये ये महान कला

पीछे-पीछे आये,आते गये पैदल 

आहिस्ता-आहिस्ता. 

०००

कामना वसंत.

एक

एक के बाद जिस तरह दूसरा

आता है,जाता है ॳॅंक और आदमी 

ठीक उसी तरह मौसम और रॅंग 

परिप्रेक्ष्य कामना वसंत 

ठीक उसी तरह प्रेम और दु:ख

मैं भी और तुम भी.


वसंत की लिपि.

दो

वसंत की लिपि अदृश्य 

दृश्य में अफ़वाह और दृष्टिकोण 

पल-पल बदलती है दुनिया 

अपने विचारों के समीकरण 

अपना क्या कुछ?


प्रश्न-वसंत 

तीन 

दिव्य है,भव्य है चेतना 

किन्तु उससे कहीं अधिक प्रबल 

और-और शक्तिशाली है वसंत 

जो पुकारता है प्रश्न बार-बार 

जो हर कहीं-हर कहीं.

०००

वसंत का आगमन.

चार


वसंत का आगमन 

आमंत्रण भी है नये जीवन का 

मैं फिर-फिर लौटता हूॅं 

अपने ही भीतर के जॅंगल में 

खोजने ख़ुद को.

०००

ऐसा ही है वसंत.

पांच

शुद्ध है अंत:करण

बेशर्त है,बेशर्म है पत्ता-पत्ता 

खनकता है,महकता है चारों ओर 

जवानी की ज़ुबान लिए महुआ 

तमाम बंदिशें ठेलता हुआ 

ऐसा ही है वसंत.

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संपर्क;-331,जवाहरमार्ग, इन्दौर,452002.

फ़ोन,0731-2543380.

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rajkumarkumbhaj47@gmail.com

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