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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

स्वतंत्रता दिवस 2015 पर साथियो की कविताएँ


स्वतंत्रता  दिवस के उपलक्ष्य में अनेक साथियों ने अपनी या अपने पसंदीदा कवि कि कवितायेँ पेश की।
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राष्ट्रगीत में भला कौन वह
भारत-भाग्य-विधाता है
फटा सुथन्ना पहने जिसका
गुन हरचरना गाता है.

मखमल टमटम बल्लम तुरही
पगड़ी छत्र चंवर के साथ
तोप छुड़ाकर ढोल बजाकर
जय-जय कौन कराता है. 

पूरब-पश्चिम से आते हैं
नंगे-बूचे नरकंकाल
सिंहासन पर बैठा,
उनके
तमगे कौन लगाता है. 

कौन-कौन है वह जन-गण-मन
अधिनायक वह महाबली
डरा हुआ मन बेमन जिसका
बाजा रोज बजाता है.
||रघुवीर सहाय||

वो अपनी मौत का मुआवजा लेने नहीं आयेंगे .. ....
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सूरज सहरावत
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वे गीत गाते हुए खेतों तक जाते हैं
वे लोटते हुए भी गीत गाते हैं
उनके बच्चों ने कभी भी उनकी जेब टाफी या चाकलेट के लिए नहीं टटोली
उनकी जेबे हवा और पानी से भरी होती है
उनके सरों से सटा होता है आसमान
उनके पैरों से जमीन लिपटी रहती है
उनके लिए दुनिया का भूगोल
उनके खेत का भूगोल भर हैं
इतिहास उनके खेत का इतिहास भर
वे खुद अपने पुरखों का दोहराव भर उनके लिए प्रेम पानी, इज्जत मिट्टी और हवा कहानी
सुबह और शाम उनका सीना और पीठ भर हैं

तुम बेवजह खौफ खाते हो
उनकी जिंदगी नियति का सिद्धांत है
उनकी औरतों ने बहुत डरावने किस्से सुने हैं
वो आने नहीं देगी उन्हें तुम्हारे दरवाजे तक
उनका पसीना तुम्हारा ब्याज तक नहीं उतार पायेगा
वे मरने से पहले खुद मर जायेंगे
उनकी आँच तुम्हारी हवा में कोई शोर गुल नहीं करेगी
वो अपनी मौत का मुआवजा लेने कभी नहीं आयेंगे

देखो मुझे ज्यादा बातें नहीं आती
बातों पर हम यकीन भी नहीं करते हम
हमारी औरतें बच्चे तुम्हारे लिए आने वाले हजारों सालों में फसल उगाते रहेगे
(जमीन रही तो)
वोट डालते रहेगे
बिना किसी परेशानी के कम और कम होते रहेंगे
मरते रहेंगे
मरने से पहले तुम बेवजह परेशान मत रहा करो
०००

देश कागज पर बना नक्शा नहीं होता / ----
सर्वेश्वरदयाल सक्सेना
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यदि तुम्हारे घर के
एक कमरे में आग लगी हो
तो क्या तुम
दूसरे कमरे में सो सकते हो?
यदि तुम्हारे घर के एक कमरे में
लाशें सड़ रहीं हों
तो क्या तुम
दूसरे कमरे में प्रार्थना कर सकते हो?
यदि हाँ
तो मुझे तुम से
कुछ नहीं कहना है।
देश कागज पर बना
नक्शा नहीं होता
कि एक हिस्से के फट जाने पर
बाकी हिस्से उसी तरह साबुत बने रहें
और नदियां, पर्वत, शहर, गांव
वैसे ही अपनी-अपनी जगह दिखें
अनमने रहें।
यदि तुम यह नहीं मानते
तो मुझे तुम्हारे साथ
नहीं रहना है।
इस दुनिया में आदमी की जान से बड़ा
कुछ भी नहीं है
न ईश्वर
न ज्ञान
न चुनाव
कागज पर लिखी कोई भी इबारत
फाड़ी जा सकती है
और जमीन की सात परतों के भीतर
गाड़ी जा सकती है।
जो विवेक
खड़ा हो लाशों को टेक
वह अंधा है
जो शासन
चल रहा हो बंदूक की नली से
हत्यारों का धंधा है
यदि तुम यह नहीं मानते
तो मुझे
अब एक क्षण भी
तुम्हें नहीं सहना है।
याद रखो
एक बच्चे की हत्या
एक औरत की मौत
एक आदमी का
गोलियों से चिथड़ा तन
किसी शासन का ही नहीं
सम्पूर्ण राष्ट्र का है पतन।
ऐसा खून बहकर
धरती में जज्ब नहीं होता
आकाश में फहराते झंडों को
काला करता है।
जिस धरती पर
फौजी बूटों के निशान हों
और उन पर
लाशें गिर रही हों
वह धरती
यदि तुम्हारे खून में
आग बन कर नहीं दौड़ती
तो समझ लो
तुम बंजर हो गये हो-
तुम्हें यहां सांस लेने तक का नहीं है अधिकार
तुम्हारे लिए नहीं रहा अब यह संसार।
आखिरी बात
बिल्कुल साफ
किसी हत्यारे को
कभी मत करो माफ
चाहे हो वह तुम्हारा यार
धर्म का ठेकेदार,
चाहे लोकतंत्र का
स्वनामधन्य पहरेदार।
००००

संजना तिवारी:-: आप सभी को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं मेरी भारत माँ को समर्पित इस कविता द्वारा

  ।। अमूल्य माँ ।।

'ऐ ' स्वर्ग सी सुंदर

भारत माँ

है मेरे लिए अनमोल तू .....

क्या तेरी अभिलाषा है ?

एक बार तो

बोल तू ....

है मेरे लिए अनमोल तू    ।

ऋतुओं का तू

चक्र है

नीर का शीतल स्रोत ...

हरी-भरी तेरी

ममता है ...

फल-फूल से अरोत -प्रोत ...

झरझर-झरझर झरनों में

रही मस्त पवन सी

डोल तू ...

है मेरे लिए अनमोल तू ..... ।

तेरी हर छटा

में संगीत है

तेरा हर कदम मृदंग .....

तूझ पर शोभा   

दे रहे

भांति –भांति के रंग ....

कलकल –कलकल लहरों में

रही मीठी वाणी

बोल तू ....

है मेरे लिए अनमोल तू ...॥

हिमालय तेरा

ताज है

और वस्त्र हैं हिमानी ....

आभूषण है वनस्पतियाँ

तेरा शस्त्र आसमानी .....

पलपल-पलपल निशा के संग

लाती रहती नई

भोर तू ......

है मेरे लिए अनमोल तू .... ।

ये जीवन तेरी 

धरोहर है

ये साँसे तेरी पूँजी.....

सीना चौड़ा हो जाता है

तेरी जय जयकार जो गूंजी ....

रग-रग में बहती रहती

बनके रक्त का

घोल तू ......

है मेरे लिए अनमोल तू ..... ।

क्या तेरी अभिलाषा है  ?

एक बार तो बोल तू .....

है मेरे लिए अनमोल तू ...

है मेरे लिए अनमोल तू ...... ॥

संजना अभिषेक तिवारी

ब्रजेश कानूनगो:-
इस गणराज्य में आजादी

एक
कितना सहज है कि
वे और मैं अब अलग नहीं लगते

वे सुझा रहे हैं कि क्या  होना चाहिए मेरा भोजन
मैं वही देखता हूँ
जिसे कहा जा रहा है कि यही सुन्दर और वास्तविक है

मैं नाच रहा हूँ ,गा रहा हूँ उसी तरह
जैसे झूम रहे हैं साहूकार
बोल रहा हूँ सौदागरों की भाषा
बेचा जा सकता है हर कुछ जिसकी मदद से

मुझे पता नहीं है कि
कहाँ लगा है मेरा धन
और कितनी पूँजी लगी है परदेसियों की
मेरा घर सजाने में

मेरा शायद हो मेरा
जो समझता था उनका
लगता ही नही कि अपना नहीं था कभी

उनके निर्देशों के अनुरूप चलती हैं मेरी सरकारें
नियम और कानून ऐसे लगते हैं
जैसे हमने ही बनाए हैं अभी

पराधीनता का कोई भाव ही दिखाई नहीं देता गणराज्य में
तो कैसे जानूँ आजादी का अर्थ ।

दो
बर्गर और पिज्जा बेचने वाली
नईबहुराष्ट्रीय दुकान का विज्ञापन देखकर
उछल पडता है बच्चा
जैसे मिल गई आजादी
दुनिया भर के  भोजन को चबा डालने की

अभिव्यक्ति की आजादी का  मतलब है
दो वक्त की रोटी से मंहंगी कलम से
कर्ज के  दस्तावेज और पुरस्कार के चेकों पर
दस्तखतों का फिसलना

सबसे आगे रहने के  लिए
बाधाओं को छलांगते हुए दौड जाने की आजादी मिलती है
थकान और पसीने से बचानेवाले
बहुमूल्य जूतों के चयन के बाद

आजादी के लिए उपवास की बात
अब किताबों से हटा दी गर्ईं हैं
गर्व से ऊपर उठता है मस्तक
सनसनाते पेय के  हलक से उतरते ही

उत्साह और उमंग के  बाजारी जश्न में
बेडियों के  विस्तार को मिल गई है आजादी ।

मनीषा जैन :-
सौ में सत्तर आदमी
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अदम गोंडवी
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सौ में सत्तर आदमी फ़िलहाल जब नाशाद* है
दिल पे रख के हाथ कहिए देश क्या आज़ाद है

कोठियों से मुल्क के मेआर* को मत आंकिए
असली हिंदुस्तान तो फुटपाथ पे आबाद है

जिस शहर में मुंतजिम* अंधे हो जल्वागाह के
उस शहर में रोशनी की बात बेबुनियाद है

ये नई पीढ़ी पे मबनी* है वहीं जज्मेंट दे
फल्सफा गांधी का मौजूं* है कि नक्सलवाद है

यह गजल मरहूम मंटों की नजर है, दोस्तों
जिसके अफसाने में ‘ठंडे गोश्त’ की रुदाद* है

* नाशाद - उदास, दुखी 
* मेआर  - मापदंड, रूतबा 
* मुन्तज़िम - व्यवस्थापक 
* मबनी  - निर्भर 
* मौजूं - उचित, उपयुक्त 
* रूदाद - विवरण, वृतांत 

निधि जैन :-
बेबस हूँ बिखरी हूँ उलझी हूँ सत्ता के जालो में,
एक दिवस को छोड़ बरस भर बंद रही हूँ तालों में,

बस केवल पंद्रह अगस्त को मुस्काने की आदी हूँ,
लालकिले से चीख रही मैं भारत की आज़ादी हूँ,

जन्म हुआ सन सैतालिस में,बचपन मेरा बाँट दिया,
मेरे ही अपनों ने मेरा दायाँ बाजू काट दिया,

जब मेरे पोषण के दिन थे तब मुझको कंगाल किया
मस्तक पर तलवार चला दी,और अलग बंगाल किया

मुझको जीवनदान दिया था लाल बहादुर नाहर ने,
वर्ना मुझको मार दिया था जिन्ना और जवाहर ने,

मैंने अपना यौवन काटा था काँटों की सेजों पर,
और बहुत नीलाम हुयी हूँ ताशकंद की मेजों पर,

नरम सुपाड़ी बनी रही मैं,कटती रही सरौतों से,
मेरी अस्मत बहुत लुटी है उन शिमला समझौतों से,

मुझको सौ सौ बार डसा है,कायर दहशतगर्दी ने,
सदा झुकायीं मेरी नज़रे,दिल्ली की नामर्दी ने,

मेरा नाता टूट चूका है,पायल कंगन रोली से,
छलनी पड़ा हुआ है सीना नक्सलियों की गोली से,

तीन रंग की मेरी चूनर रोज़ जलायी जाती है,
मुझको नंगा करके मुझमे आग लगाई जाती है

मेरी चमड़ी तक बेची है मेरे राजदुलारों ने,
मुझको ही अँधा कर डाला मेरे श्रवण कुमारों ने

उजड़ चुकी हूँ बिना रंग के फगवा जैसी दिखती हूँ,
भारत तो ज़िंदा है पर मैं विधवा जैसी दिखती हूँ,

मेरे सारे ज़ख्मों पर ये नमक लगाने आये हैं,
लालकिले पर एक दिवस का जश्न मनाने आये हैं

बूढ़े बालों को ये काली चोटी देने आये हैं,
एक साल के बाद मुझे ये रोटी देने आये हैं,

जो मुझसे हो लूट चुके वो पाई पाई कब दोगे,
मैं कब से बीमार पड़ी हूँ मुझे दवाई कब दोगे,

सत्य न्याय ईमान धरम का पहले उचित प्रबंध करो,
तब तक ऐसे लालकिले का नाटक बिलकुल बंद करो

रुचि गांधी :-
परी हो तुम गुजरात की, रूप तेरा मद्रासी !
सुन्दरता कश्मिर की तुममे ,सिक्किम जैसा शर्माती !!
:
खान-पान पंजाबी जैसा, बंगाली जैसी बोली !
केरल जैसी आंख तुम्हारी ,है दिल तो तुम्हारा दिल्ली !!
:
महाराष्ट्र तुम्हारा फ़ैशन है, तो गोवा नया जमाना !
खुशबू हो तुम कर्नाटक कि,बल तो तेरा हरियाना !!
:
सिधी-सादी ऊड़ीसा जैसी,एम.पी जैसा मुस्काना !
दुल्हन तुम राजस्थानी जैसी ,त्रिपुरा जैसा इठलाना !!
:
झारखन्ड तुम्हारा आभूषण,तो मेघालय तुम्हारी बिन्दीया है !
सीना तो तुम्हारा यू.पी है तो ,हिमांचल तुम्हारी निन्दिया है !!
:
कानों का कुन्डल छत्तीसगढ़ ,तो मिज़ोरम तुम्हारा पायल है !
बिहार गले का हार तुम्हारा ,तो आसाम तुम्हारा आंचल है !!
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नागालैन्ड- आन्ध्र दो हाथ तुम्हारे, तो ज़ुल्फ़ तुम्हारा अरुणांचल
है !
नाम तुम्हारा भारत माता, तो पवित्रता तुम्हारा ऊत्तरांचल है !!
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सागर है परिधान तुम्हारा,तिल जैसे है दमन- द्वीव !
मोहित हो जाता है सारा जग,रहती हो तुम कितनी सजीव !!
:
अन्डमान और निकोबार द्वीप,पुष्पों का गुच्छ तेरे बालों में !
झिल-मिल,झिल-मिल से लक्षद्वीप, जो चमक रहे तेरे गालों में !!
:
ताज तुम्हारा हिमालय है ,तो गंगा पखारती चरण तेरे !
कोटि-कोटि हम भारत वासियों का ,स्वीकारो तुम नमन मेरे !!
जय भारत माता

जीवेश चौबे:-
आजा़दी का जश्न बस मनने मनने को है... कई आज से वीकेन्ड पर चले जायेंगे ...सैर सपाटे शराब के बीच कुछ आजादी का जश्न भी मना लेंगे .....
आज आजादी पर पाबंदियों की जो तैयारी हो रही है वो सब देखकर भी हम खामोश हैं ,,,
इन संदिग्ध हालातों में पेश है
साहिर लुधियानवी की यह रचना...

लब पे पाबन्दी नहीं एहसास पे पहरा तो है
फिर भी अहल-ए-दिल को अहवाल-ए-बशर कहना तो है
अपनी ग़ैरत बेच डालें अपना मसलक़ छोड़ दें
रहनुमाओ में भी कुछ लोगों को ये मन्शा तो है
है जिन्हें सब से ज्यादा दावा-ए-हुब्ब-ए-वतन
आज उन की वजह से हुब्ब-ए-वतन रुस्वा तो है
बुझ रहे हैं एक एक कर के अक़ीदों के दिये
इस अन्धेरे का भी लेकिन सामना करना तो है
झूठ क्यूं बोलें फ़रोग़-ए-मस्लहत के नाम पर
जि़न्दगी प्यारी सही लेकिन हमें मरना तो है

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