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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

बीज वक्तव्य : संजीव कुमार जैन

बीज वक्तव्य-

"यह सुअरों के एक सुखी परिवार की सीधी सादी कहानी है जिसमें एक पापा सुअर एक मम्मी सुअर और तीन नन्हे सुअर थे। सबसे छोटा सुअर का बच्चा अपनी जिज्ञासा से बेबस होकर हमेशा मुसीबत में फंसता रहता था। उससे दिनचर्या बर्दाश्त नहीं होती थी। वह हर चीज को आजमाने के चक्कर में रहता था और हमेशा किसी नई और अलग चीज की फिराक में रहता था।
लेकिन उसके लिए कभी कोई बात बनती नहीं थी। उसके बडे भाई - बहन बिल्कुल लीक पर चलते और सही रहते थे। पतझड के मौसम में एक रविवार को जबकि आसमान बिल्कुल साफ नीला दिख रहा था। सबसे छोटे सुअर के बच्चे ने बाहर घूमते हुए दिन बिताने और अपनी जिज्ञासा को बेलगाम छोड देने का निश्चय किया। लेकिन कुछ भी ठीक नहीं हुआ। अपने स्थापित दायरे से बाहर कदम रखते ही उस पर एक छोटे कुत्ते ने हमला बोल दिया। घायल हो जैसे-तैसे अपनी जान बचाने में वह कामयाब ही हुआ कि उसे लगा कि उसने एक और कुत्ता देखा है। उसने उस कुत्ते को लकडी से छेड दिया। वह कुत्ता मधुमक्खियों का झुंड निकला। बेचारा नन्हा सुअर गुस्साई मधुमक्खियों के भयानक जहरीले हमले से बस मर ही गया था। एक के बाद एक असफलता में उसका दिन गुजरता गया और रात होने पर निराश, हताश जब वह घर लौटा तो उसके पास किसी और अभियान के बारे में कल्पना करने की भी हिम्मत नहीं बची थी।
व्यवहारिक सूझ-बूझ  वाला उसका पिता, जो उसका इंतजार कर रहा था, एक विनम्र शिक्षा शास्त्री के कल्याणकारी अंदाज में कहता है,  'मुझे मालूम था कि तुम एक दिन ऐसा करोगे। हम लोगों को बंधे-बंधाये ढर्रे से नहीं हटना चाहिए यह सीखने का तुम्हारे पास और कोई रास्ता नहीं था। अगर हम बदलने के फेर में पडेंगे तो बुरी तरह चोटिल  होने का खतरा झेलेंगे। जैसा कि आज तुतुम्हारे साथ हुआ होगा।'
खामोशी और पश्चाताप में डूबा नन्हा सुअर अपने व्यवहार कुशल पिता का 'समझदार' विमर्श सुनता रहा।
स्वतंत्रता से भय हमें अपनी उत्पीडन कारी स्थितियों में जकडे रखने का तर्क है जो वर्चस्वी वर्ग की ओर से निरंतर कई तरीकों से प्रवाहित किया जाता रहा है। दूसरी ओर हमें उन संभावनाओं को तलाशने के खिताब भी डराया जाता है जिनके संभव होने से वर्चस्वी वर्ग की स्थिति को खतरा उत्पन्न हो सकता है। इस लिए हमें निरंतर दिशा - निर्देशित किया जाता है और उनके द्वारा सोचे और बिछाए गए हमारे ही वर्ग के रक्त कालीन पर चलने के लिए अनुकूलित किया जाता है ताकि हम नए सृजनात्मक रास्तों की ओर न कदम उठा सकें।"

000 संजीव कुमार जैन
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टिप्पणियाँ:-

अमेय कान्त:-
इस छोटी-सी कहानी के माध्यम से समाज की जिस व्यवस्था की बात की गई है वह यथार्थ रूप में हमेशा हमारे आसपास मौजूद रही है। हमारी दुनिया का इतिहास गवाह है कि वर्चस्वी वर्ग ने कभी नहीं चाहा कि दमित और शोषित वर्ग कभी स्वतंत्रता का मतलब जान पाए । बने-बनाए रास्ते पर चलने को 'समझदारी' माना गया और सीमाओं से बाहर की बात करना 'मूर्खता' ।
    मनुष्य की  स्वाभाविक जिज्ञासा ही उसे सीमाओं का अतिक्रमण करने के लिए प्रेरित करती है। वर्चस्वी वर्ग को सबसे बड़ा ख़तरा हमेशा इसी जिज्ञासा से रहा। क्योंकि जहाँ जिज्ञासा होगी वहाँ प्रश्न होंगे और प्रश्न हमेशा नई दिशाओं की ओर जाने के लिए प्रेरित करेंगे। हमारी शिक्षा-पद्धतियों के साथ भी सबसे बड़ी समस्या यही रही कि इसमें  शिक्षक की भूमिका महज एक 'एज्यूकेटर' की होकर रह गई और शिक्षा का उद्देश्य विद्यार्थी को प्रश्न करना सिखाने के बजाए व्यवस्था के साथ अनुकूल बनाने और बने-बनाए ढर्रे पर चलना सिखाने तक सीमित हो गया। तथाकथित व्यावहारिकता हमेशा परिस्थितियों से समझौता करने के पक्ष में रही। समझौता न करने के अपने ख़तरे होते हैं । लेकिन स्वतंत्रता का रास्ता उन्हीं ख़तरों से होकर जाता है। धीरे-धीरे अनुकूलन करते हुए व्यक्ति ख़तरे उठाने का साहस खो देता है और अंततः इस व्यवस्था का एक हिस्सा बनकर रह जाता है।

प्रज्ञा:-
साथियों शिक्षा के क्षेत्र में ही नहीं जीवन में रचनात्मक होने की बात बड़े पुरज़ोर तरीके से रखी जाती है। लेकिन इसका दूसरा पहलू यह भी है जब कोई बच्चा एक बंधे बंधाये ढर्रे से अलग होकर रचनात्नक दिशा में बढ़ने की कोशिश करता है तो उसे एक मुक्त दायरा, कुछ समय और दुनिया जहां को उसकी अपनी नज़र से देखने पर तमाम दिक्कतें क्यों खड़ी हो जाती हैं? सिद्धांत में हम जिन प्रयोगों का बखान करते हैं व्यवहार में उन्हें उतरते देख हम सशंकित होते हैं। रचनात्मकता से अर्जित नवीनता कहीं हमारे तय मानकों के ढांचे को दरका न दे, कहीं ये नई नज़र यथास्थिति से अर्जित सुख को ध्वस्त न कर दे, कहीं सत्ता द्वारा पोषित ख़ामोशी की संस्कृति पर खतरा न मंडराने लगे और ज़ुल्म के कारखानों की मशीनें जंग खा जाएँ। दुनिया भर में कितने ही शिक्षा शास्त्रियों ने इस रचनात्मकता की वकालत की है। हम चाहें टेगोर की तोता पढ़ें या तेत्सुको कोरोंयांगी की तोतो चान। गांधी के सिद्धांत पढ़े या पाउलो फ्रेरे के। रचनात्मकता मुक्ति की दिशा का एक  ठोस विकल्प है। आज इसी विषय पर हमारे समूह के साथी अपना विचार रख रहे हैं। आइये हम सब इस लेख को पढ़े और गौर करें अपनी प्रतिक्रिया रख

अनूप सेठी:-
मैं शिक्षाशास्‍त्री नहीं हूं, सामान्‍य व्‍यक्‍ति के रूप में ही अपनी बात रख रहा हूं। मैं कैसी शिक्षा चाहता हूं ? 
ऐसी शिक्षा जो व्‍यक्‍ति को ऐसा व्‍यक्‍ति बनाए जो अखिल प्रकृति का अभिन्‍न अंग बने, प्रकृति का विजेता नहीं। लेकिन अपनी आंतरिक प्रकृति का विजेता बने। इस संतुलन को साधने में वह सहानुभूति के बजाए समानुभूति को अनुभव करने में समर्थ बने। इन तत्‍वों या मूल्‍यों को प्राप्‍त करने के लिए जब इन्‍हें समझा और समझाया जाएगा तब धर्म, राष्‍ट्रवाद, मौरल पुलिसिंग जैसे पाशों में फंस जाने से सावधान रहना होगा, क्‍योंकि इस विषय में गलतफहमी की बहुत आशंका है।
हमारी शिक्षा प्रणाली, व्‍यवस्‍था नामक मशीन में नौकरी पाने वाले पुर्जे तैयार करती है। इस मशीन की चाबी किसी दूसरे के हाथ में रहती है। इन कलपुर्जों में आत्‍मा का संचार करना होगा। इन पुर्जों में संवेदना और विवेक का सामंजस्‍य  होना जरूरी है। हमारी शिक्षा आधुनिकता के नाम पर वैज्ञानिक सोच तो पैदा नहीं करती, उलटे शहरी और बाबू या उच्‍चभ्रू संस्‍कृति को वरीयता देती है। जबकि होना यह चाहिए कि हमारी शिक्षा प्रणाली हमारे देश को सम्‍पूर्णता में देखना सिखाए। यहां के पारंपरिक पेशों को उचित गरिमा से देखना सिखाए। स्‍नातक युवक को खेती बाड़ी घृणित कार्य न लगे।
आज हमारी शिक्षा प्रणाली बाजार की शक्‍तियों से चालित हो रही है। यह दबाव इतना अधिक है कि इसे बदलना आसान नहीं। लेकिन इसी तंत्र में छात्र को बेहतर मनुष्‍य (यानी संवेदनशील, सहनशील, समानुभूतिशील, विवेकवान, कलाअनुरागी, सौंदर्यप्रेमी और सौंदर्य पारखी, धरोहर पारखी और आस्‍वादक) बनाया जा सके तो शायद वह कम लालची किंचित उदार, कम स्‍वार्थी किंचित त्‍यागी, मनुष्‍य बन  सके। मुझे लगता  है इस दिशा में थोड़ा भी प्रयास करने का अवसर मिल जाए तो इस पृथ्‍वी को कुछ और समय तक रहने योग्‍य बनाए रखा जा सकेगा।

प्रदीप कांत:-
शिक्षा का उद्देश्य हो की वह मनुष्य को मनुष्य और रचनात्मक मनुष्य बनाए

ऐसा बनाए की उन मनुष्यों से जो समाज बने सम भाव वाला समाज बने

सत्यनारायण:-
शिक्षा का उद्देश्य प्रश्नों के उत्तर जानना नहीं, बल्कि प्रश्न खड़े करने की योग्यता विकसित करना है। जिस देश या समाज के लोग जितने अधिक प्रश्नाकुल होंगे-वह समाज उतनी तेजी से रूपांतरित होगा। अपनी समस्याओं के हल ढूंढ़ पाएगा। एक सार्थक उत्तर की तलाश वही व्यक्ति कर सकता है, जिसे प्रश्न परेशान करते हों !

लेकिन क्या हमारी वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में इसकी गुंजाइश है ? क्या यह जिज्ञाशु अथवा सृजनशील मनुष्य के निर्माण में योगदान देना चाहती है ?

इसका पहला उत्तर तो यही होगा कि हमारी शिक्षा व्यवस्था आज भी मैकाले की प्रेत छाया से मुक्त नहीं हो पाई है। आज भी मैकाले की 'फिल्ट्रेशन थ्योरी' शिक्षा में लागू है। पहले एक जिले में एक सरकारी कालेज खोले जाने की नीति थी। अब एक जिले में एक जवाहर नवोदय विद्यालय खोला जाता है।

बच्चों की जिज्ञासा को परवान चढ़ाने के बजाय यह शिक्षा व्यवस्था उनकी जिज्ञासा का बचपन से ही गला घोटना शुरू कर देती है। इसका सबसे बड़ा हथियार है-भाषा। आजादी के बाद से देश की शिक्षा नीतियों तथा आयोगों ने कम से कम प्राथमिक शिक्षा को मातृभाषा के माध्यम से देने की पैरवी की गई, लेकिन यह सभी बच्चों के लिए आज तक लागू नहीं हो पाया है। अंग्रेजी माध्यम से पढ़ने वाले बच्चे समझने के बजाय विषयवस्तु को रटने को मजबूर हैं। शिक्षा के बाजारीकरण के कारण हर आय वर्ग के लिए एक अलग तरह का स्कूल है। लोगों की आमदनी का एक बड़ा हिस्सा बच्चों की शिक्षा पर खर्च हो रहा है। सच तो यह है कि हमारी  शिक्षा व्यवस्था समानता तथा न्याय जैसे संवैधानिक मूल्यों की अवहेलना करती है तथा असमानता और भेदभावपूर्ण समाज व्यवस्था का निर्माण करती है।

अगर हम संविधान का सम्मान करते हैं तो उसकी मंशा के समाज निर्माण के लिए हमें पड़ौसी स्कूल की अवधारणा पर आधारित समान स्कूल प्रणाली को स्थापित करने के लिए संघर्ष करना होगा। ऐसा होने पर ही न सिर्फ हमारे बच्चे सही शिक्षा पाने लगेंगे, बल्कि बच्चों की सृजनात्मकता को भी फलने-फूलने का मौका मिलेगा।

दिनेश कर्नाटक,नैनीताल:-
आज का बीज वक्तव्य बिजूका एक के साथी संजीव कुमार जैन का लिखा है। पहली टिप्पणी भी बिजूका एक के ही मित्र अमेय कान्त ने लिखा जबकि टिप्पणी दो बिजूका दिल्ली की प्रज्ञा ने लिखी है।

आपकी प्रतिक्रिया और टिप्पणी इस महत्वपूर्ण विषय को समझने में और मदद करेगी।

संजीव:-
भाई वागीश जी, अनूप जी,  देवेश जी , अमेय जी और प्रज्ञा जी के साथ उन सभी साथियों को धन्यवाद जिन्होंने सुअर परिवार की कहानी को पढा और उस पर अपने विचार गंभीरता से रखे।
इस
यह कहानी मेरी नहीं है। पाओलो फ्रेरे की पुस्तक उम्मीदों का शिक्षा शास्त्र से ली गई है।
इस कहानी का जो उद्देश्य था वह  बात चीत के अभाव में विविफल  हो गया।
जिन चार साथियों ने अपने विचार रखे वे सही दिशा में विषय को ले जा रहे थे। पर अन्य सहयोगियों की चुप्पी ने उस विमर्श को निष्क्रिय कर दिया।
फ्रेरे को पढना एक अलग ही अनुभव है।दिमाग की नसों पर लगी जंग को साफ करने वाला विमर्श पैदा करता है। वह शिक्षा के माध्यम से किये जा रहे मानसिक अनुकूलन और अमानुषीकरण के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए प्रेरित करता है। यह एक राजनीतिक  कार्यवाही की शुरुआत मानी जा सकती है। शिक्षा भी एक शोषण कारी राजनीति है। इससे पूरी बौद्धिक चेतना को पंगु बनाया जा रहा है। फ्रेरे इस नई दासता के बरक्स मानवीय सच्ची स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने कीं बात करता है।

अर्पण कुमार:-
यह अगस्त का महीना है।भारत की आज़ादी का महीना।
किसी देश की स्थिति का अंदाज़ा उसकी राजधानी की स्थिति से भी लगाया जाता है।दिल्ली पर कई लोगों ने बहुत कुछ लिखा है।अपने सुदीर्घ दिल्ली प्रवास के दौरान मैंने जो दिल्ली को देखा समझा,उस पर एक लंबी कविता लिखी।उस  कविता के कुछ अंश
आउटलुक के नवीनतम अंक (1-15 अगस्त,2015) में  प्रकाशित हुए हैं।
आप सभी के समक्ष इसे  रख रहा हूँ।प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी

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